जब तक समर्थों की वाणी में, सत्य-हुंकार नहीं होगी,
सामने खड़े इस षड्यंत्र की, कभी हार नहीं होगी।
तटस्थ रहना भी अधर्म है, जब राष्ट्र-धर्म ललकार रहा,
मौन रहे यदि आज भी हम तो, इतिहास हमें धिक्कार रहा!
इतिहास केवल अतीत के गर्त में दबी हुई मृत घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि वह वर्तमान के लिए एक जीवंत मार्गदर्शक, एक सचेतक और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक कड़ा चेतावनी-पत्र होता है। इतिहास हमें सिखाता है कि राष्ट्रों का पतन केवल अत्याचारियों के अत्याचार से ही नहीं होता, बल्कि समाज के समर्थ, ज्ञानी और शक्तिशाली लोगों की तटस्थता तथा मौन के कारण भी होता है। जब-जब समाज का प्रबुद्ध, समर्थ और विचारवान वर्ग अधर्म, अन्याय, अमर्यादित आचरण और देश-विरोधी षड्यंत्रों पर मौन साधे रहता है, तब-तब महाविनाश की नींव रखी जाती है। भारत का प्राचीन और पौराणिक इतिहास, विशेषकर महाभारत का कालखंड, इस शाश्वत सत्य का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष उदाहरण है।
महाभारत के युद्ध से पूर्व और कुरु सभा के भीतर घटित प्रत्येक घटना पर यदि हम सूक्ष्म दृष्टि डालें, तो गंगापुत्र पितामह भीष्म का चरित्र हमारे सामने त्याग, तपोबल और अविचल निष्ठा का अनुपम उदाहरण बनकर उभरता है। अपने पिता की प्रसन्नता के लिए ली गई उनकी ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ केवल एक वचन नहीं, बल्कि व्यक्तिगत धर्म और कर्तव्य-बोध की अंतिम सीमा थी। पितामह भीष्म के पास अतुलनीय ज्ञान, अमित पराक्रम, ब्रह्मचर्य का महातप, इच्छामृत्यु का वरदान और धर्म-अधर्म का अत्यंत सूक्ष्म विवेक था। हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा और कुल-मर्यादा के प्रति उनका समर्पण निर्विवाद था।
परंतु, महाभारत का यह प्रसंग हमें एक अति-सूक्ष्म और गंभीर धर्म-संकट का बोध कराता है। जब शकुनि और दुर्योधन के छल-प्रपंचों से पांडवों के साथ अन्याय किया जा रहा था, जब उन्हें लाक्षागृह में भस्म करने का षड्यंत्र रचा गया, और जब द्यूत क्रीड़ा के नाम पर उनके सारे अधिकार छीने जा रहे थे, तब पितामह का पराक्रम हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति उनकी व्यक्तिगत प्रतिज्ञा और कुरुवंश की रक्षा के मर्यादा-बंधन तले बंधा रहा। कुरु सभा के बीच जब द्रौपदी का चीर-हरण हो रहा था और सनातन मर्यादाएँ तार-तार की जा रही थीं, तब भीष्म का मौन उनकी अज्ञानता का प्रतीक नहीं था, बल्कि उनकी उस भीषण प्रतिज्ञा की विवशता थी जिसने उनके अपार सामर्थ्य और विवेक को भी नियमों के पाश में बांध दिया था।
यह प्रसंग इतिहास के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को यह सीख देता है कि प्रतिज्ञा और व्यक्तिगत निष्ठा कितनी भी महान क्यों न हो, जब राष्ट्र-हित, सत्य और सार्वभौमिक मर्यादा पर संकट गहरा जाए, तब ‘राष्ट्र-धर्म’ और ‘परम-न्याय’ से बड़ा कोई नियम या व्यवस्थागत बंधन नहीं हो सकता। उचित समय पर उस विवशतापूर्ण मौन को न तोड़ने के कारण धर्म का मार्ग अवरुद्ध हुआ, और अंततः धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एक ऐसा महाविनाशकारी युद्ध हुआ जिसमें करोड़ों निर्दोष योद्धाओं को अपनी आहुति देनी पड़ी। छल और अधर्म से वीर बालक अभिमन्यु का वध हुआ, जिसे इतिहास कभी भूल नहीं सकता। इस पूरे प्रसंग के अंत में स्वयं पितामह भीष्म ने भी बाणों की कठिन शैया पर 58 दिनों के दीर्घकाल तक अतिशय वेदना सहते हुए और अपनी मुक्ति हेतु उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए उस धर्म-संकट का प्रायश्चित किया। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि जब राष्ट्र और धर्म संकट में हों, तब समर्थ जनों का मौन ही सबसे बड़ी आपदा बन जाता है।
आज का भारत इतिहास के ठीक उसी निर्णायक और नाजुक मोड़ पर खड़ा है। अंतर केवल इतना है कि आज का युद्ध केवल सीमाओं पर अस्त्र-शस्त्रों से नहीं, बल्कि देश के नागरिकों की चेतना, सामाजिक सौहार्द, सांस्कृतिक पहचान और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लड़ा जा रहा है। वर्तमान परिदृश्य में भारतीय राजनीति का एक वर्ग, कतिपय तथाकथित बुद्धिजीवी, और विदेशी ताकतों की प्रेरणा पर कार्य करने वाले षड्यंत्रकारी तत्व मिलकर देश की लोकतांत्रिक जड़ों को खोखला करने के कुत्सित प्रयासों में लगे हुए हैं।
विभिन्न राष्ट्रीय एवं सामाजिक मुद्दों पर बार-बार दिखाई देने वाले ये तथाकथित ‘आंदोलनजीवी’ चेहरे वास्तव में देश में एक व्यवस्थित अस्थिरता पैदा करने के सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा हैं। चाहे नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध का मंच हो, किसान आंदोलन की आड़ में राष्ट्र को ठप करने की चेष्टा हो, परीक्षाओं में पेपर लीक के नाम पर युवाओं के असंतोष को भड़काना हो, या फिर चुनाव प्रक्रिया, EVM और निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं की निष्ठा पर बार-बार प्रश्न उठाना हो तो हर स्थान पर वही चेहरे, वही वैचारिक गिरोह और वही भारत-विरोधी तंत्र सक्रिय दिखाई देता है।
यही वर्ग एक ओर जहाँ देश की रक्षा में समर्पित सुरक्षाबलों को अपमानित और कटघरे में खड़ा करने का दुस्साहस करता है, वहीं दूसरी ओर भारत की आर्थिक प्रगति की रीढ़—हमारे स्वदेशी उद्यमियों और निवेशकों के विरुद्ध भ्रम का वातावरण बनाकर देश के विकास चक्र को रोकने का प्रयास करता है। अत्यंत खेदजनक तो यह है कि कतिपय पक्षपाती मीडिया संस्थान भी इस तंत्र का हिस्सा बनकर वास्तविक आरोपियों और उपद्रवियों को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत कर जनमानस को भ्रमित करने का कुत्सित खेल खेलते हैं, जो लोकतंत्र की आत्मा और राष्ट्रीय हितों पर सीधा कुठाराघात है।
इस विकट परिस्थिति में चिंता का विषय यह भी है कि जो प्रबुद्ध एवं राष्ट्रहितकरी वर्ग अब तक एक सशक्त ढाल की भांति राष्ट्र और सनातन संस्कृति की रक्षा में अग्रिम पंक्ति में खड़ा रहता था, वही वर्ग आज वैचारिक क्रिया-प्रतिक्रिया से पीछे हटकर निष्क्रिय होता दिखाई दे रहा है। SC/ST अधिनियम के दुरुपयोग, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के विभिन्न नियमों व नीतियों से उपजे असंतोष, या फिर पर्याप्त सामाजिक-राजनीतिक समर्थन, सहयोग और अपेक्षित मान्यता न मिलने से उपजी उपेक्षा की भावना के कारण इस समर्थ वर्ग ने मौन साध लिया है।
यहाँ पूज्य दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा जी का वह मर्मस्पर्शी कथन अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि ‘घर के गंदे कपड़े चौराहे पर नहीं धोए जाते।’ भाव स्पष्ट है कि परिवार या व्यवस्था की आंतरिक त्रुटियों व असंतोष का निवारण घर के भीतर विमर्श से होना चाहिए, न कि चौराहे पर खड़े होकर राष्ट्र-विरोधी ताकतों को भारत की साख पर प्रहार करने का अवसर देकर। निराशा या मोहभंग के कारण साधी गई यह तटस्थता अंततः उन्हीं विघटनकारी शक्तियों का मार्ग प्रशस्त कर रही है जो देश को विभाजित करना चाहती हैं। यह भूलना आत्मघाती होगा कि नीतियों से असहमति अपनी जगह हो सकती है, किंतु उसके कारण राष्ट्र-धर्म और वैचारिक मोर्चे से विमुख हो जाना देशहित के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो सकता है।
राजनीतिक विमर्श का स्तर जिस कदर गिर चुका है, उसने संसदीय गरिमा को दरकिनार कर दिया है। अमर्यादित भाषा, अपशब्दों और ओछी बयानबाजी का आवरण पहनकर देश के शांत वातावरण को सुलगाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी षड्यंत्र का एक और दुखद पहलू यह है कि भारतीय समाज को वैचारिक और सांस्कृतिक रूप से दुर्बल करने के लिए पश्चिमी आख्यानों को हम पर थोपने का व्यवस्थित प्रयास किया जा रहा है।
पश्चिम की सोच जहाँ समाज को ‘Gen Z’ या ‘Gen Alpha’ जैसे यांत्रिक वर्गीकरणों में बांटकर पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक अलगाव पैदा करती है, वहीं हमारी सनातन परंपरा जीवन को शिशु, बाल, तरुण और युवा के रूप में देखती है। यह भारतीय दृष्टिकोण किसी विभाजन का प्रतीक नहीं, बल्कि संस्कारों, मर्यादा, अनुभव और पारिवारिक निरंतरता का एक ऐसा माध्यम है जो हर पीढ़ी को राष्ट्र-निर्माण से जोड़ता है।
इसी प्रकार, पश्चिमी अवधारणा स्त्री और पुरुष को दो विरोधी पक्षों और प्रतिद्वंद्वियों के रूप में खड़ा करती है, जहाँ संबंधों का आधार संघर्ष और अधिकार-युद्ध बन जाता है। इसके विपरीत, हमारी सनातन सोच में नारी और पुरुष एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों मिलकर परिवार, समाज और राष्ट्र की रीढ़ बनते हैं। भारतीय दर्शन में नारी का स्वरूप बहुआयामी, अत्यंत गरिमामय और वंदनीय है। वह केवल एक सामाजिक या जैविक इकाई नहीं है, बल्कि परिवार के भीतर बेटी, बहन, माँ, चाची, बुआ, दादी और नानी के रूप में निस्वार्थ प्रेम और वात्सल्य की मूरत है।
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारतीय चेतना में नारी का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। वह विद्या, ज्ञान और बुद्धि की दाता माँ सरस्वती है; वह समृद्धि, वैभव और कल्याण की देवी माँ लक्ष्मी है; और जब-जब राष्ट्र तथा धर्म पर संकट आता है, तो वह दुष्टों का संहार करने वाली महाशक्ति माँ दुर्गा का साक्षात रूप धारण कर लेती है। हमारे इतिहास के पृष्ठ साक्षी हैं कि जब-जब देश को नेतृत्व और बलिदान की आवश्यकता पड़ी, तब-तब रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होल्कर और विदुषी ऋषिकाओं की महान परंपरा ने आगे बढ़कर राष्ट्र का मार्गदर्शन किया है।
इन तमाम परिस्थितियों के बीच, सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आज का आम भारतीय नागरिक क्या कर रहा है? यदि आज का समर्थ, शिक्षित, राष्ट्रप्रेमी और जागरूक नागरिक अपनी व्यक्तिगत व्यस्तताओं, जातिगत निष्ठाओं, भाषाई पहचान या राजनीतिक पूर्वाग्रहों के कारण मौन साधे बैठा रहा, तो आने वाला इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा। असत्य, अराजकता और षड्यंत्र के सामने चुप रहना, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देश-विरोधी शक्तियों और उपद्रवियों का समर्थन करने जैसा ही है।
इसलिए, अब समय आ गया है कि इस घातक मौन को तोड़ा जाए। जागो भारत के सपूतों! जागो सनातन और भारत के कर्णधारों! हमें सामाजिक माध्यमों, समाचार माध्यमों और राजनीतिक मंचों के माध्यम से फैलाए जा रहे भ्रामक एजेंडों और विदेशी षड्यंत्रों को पहचानना होगा। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद और असहमति स्वाभाविक हैं, और वे एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान भी हैं; लेकिन जब बात राष्ट्र की अखंडता, सेना के सम्मान, संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और सामाजिक सौहार्द की आए, तो वहाँ कोई समझौता नहीं हो सकता।
अतः अब इस अकर्मण्य मौन का स्थायी त्याग ही समय की परम आवश्यकता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब श्रेष्ठ जनों की चेतना सोती है, तब-तब अधर्म का साम्राज्य फलता-फूलता है। आज प्रत्येक देशवासी को जाति, पंथ, भाषा और क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के संकुचित दायरों से ऊपर उठकर राष्ट्र-रक्षा के इस महायज्ञ में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी। जब जन-जन की चेतना जागृत होगी और असत्य व षड्यंत्र के विरुद्ध मुखर वाणी गूंजेगी, तभी हम भारत की सांस्कृतिक धरोहर, संवैधानिक गरिमा और अखंडता की रक्षा कर सकेंगे। क्योंकि राष्ट्र की संप्रभुता से बढ़कर न कोई दल है, न कोई विचार!
उठो! कि अब यह मौन टूटे, राष्ट्र-हुंकार गूंजने दो,
सत्य, न्याय और धर्म-ध्वजा को, नभ के पार गूंजने दो।
अधर्म, षड्यंत्र और छल का, अब स्थायी संहार करो,
निज स्वार्थों से ऊपर उठकर, केवल राष्ट्र से प्यार करो!
– अखिलेश चौधरी

