नवरात्र भारतीय सांस्कृतिक चेतना का ऐसा पर्व है, जिसमें आध्यात्मिकता, लोकपरम्परा, संगीत, नृत्य और सामूहिक उत्सव एक साथ दिखाई देते हैं। इन पारम्परिक प्रस्तुतियों में फ्यूजन म्यूजिक का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
प्राय: देवी पूजन में उच्चारित किए जाने वाले इस मंत्र का अर्थ है कि जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में विराजमान हैं, उन मां जगदम्बा को बारम्बार नमन है।
देवी की आराधना के इन 9 दिनों में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट संगीत परम्पराएं हैं। कहीं गरबा और डांडिया की धुनें हैं, कहीं देवी जागरण और भजन हैं, तो कहीं लोकगीतों और पारम्परिक वाद्यों के माध्यम से शक्ति की उपासना की जाती है। सदियों से आ रही इन परम्पराओं के आश्चर्यजनक बदलाव अधिकांश हमें अब विचलित करने लगे हैं। बदलते समय के साथ अब इन पारम्परिक प्रस्तुतियों में जिस तरह से फ्यूजन म्यूजिक का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है वह हमारी अपसंस्कृति के अंधानुकरण की एक बानगी है। फ्यूजन का सामान्य अर्थ अलग-अलग संगीत परम्पराओं, वाद्ययंत्रों, गायन शैलियों अथवा संगीत तकनीकों का रचनात्मक मेल है।

नवरात्र के संदर्भ में यह मेल भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत के साथ आधुनिक वाद्ययंत्रों, इलेक्ट्रॉनिक बीट्स, रॉक, जैज, पॉप और विश्व संगीत की ध्वनियों के रूप में सामने आ रहा है। आज के युवा श्रोता पारम्परिक देवी गीत को गिटार, की-बोर्ड, ड्रम्स, इलेक्ट्रॉनिक बीट्स और आधुनिक रिकॉर्डिंग तकनीक के साथ सुनना पसंद करते हैं।
यह परिवर्तन केवल मनोरंजन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव भी काम कर रहे हैं। यद्यपि डिजिटल माध्यमों ने संगीत की पहुंच को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और विभिन्न संगीत मंचों के कारण कलाकार अपनी प्रस्तुतियों को स्थानीय मंच से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं तक पहुंचा सकते हैं। ऐसे में लोकधुनों और पारम्परिक देवी गीतों को आधुनिक संगीत संयोजन के साथ प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस प्रवृत्ति में संगीत और भाष्य का जो माधुर्य था वो सिरे से गायब है। विशेष रूप से नवरात्र के दौरान आयोजित होने वाले गरबा, डांडिया और देवी जागरण कार्यक्रमों में फ्यूजन संगीत ने एक नया आकर्षण तो पैदा किया है।किंतु परोग का आधिक्य है। पारम्परिक गरबा की ताल के साथ इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक का संयोजन युवाओं को आकर्षित करता है। इसी तरह देवी स्तुति में शास्त्रीय गायन के साथ पश्चिमी वाद्ययंत्रों का प्रयोग प्रस्तुति को एक नया स्वरूप देता है।
लेकिन यहां यह समझना आवश्यक है कि फ्यूजन केवल पुराने संगीत को आधुनिक बीट्स के साथ जोड़ देने का नाम नहीं है। वास्तविक फ्यूजन तभी सार्थक होता है जब कलाकार दोनों संगीत परम्पराओं की प्रकृति, भाषा, लय, भाव और सांस्कृतिक संदर्भ को समझकर उनका संतुलित संयोजन करे। अन्यथा वह केवल ध्वनियों का मिश्रण बनकर रह जाता है।
भारत की लोक परम्पराओं में पहले से ही विविधता और प्रयोग की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं। उत्तराखंड के संदर्भ में देखें तो यहां देवी उपासना से जुड़े अनेक लोकगीत, जागर, मांगल, ढोल-दमाऊं, हुड़का, रणसिंघा और अन्य लोकवाद्यों की समृद्ध परम्परा है। इन लोकधुनों को आधुनिक संगीत संयोजन के साथ प्रस्तुत करने की सम्भावनाएं बहुत व्यापक हैं। यदि किसी पहाड़ी देवी गीत की मूल धुन और उसकी आत्मा को सुरक्षित रखते हुए उसमें आधुनिक वाद्य संयोजन किया जाए, तो वह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
फ्यूजन संगीत की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह परम्परा को संग्रहालय की वस्तु बनने से बचाते हुए उसे वर्तमान पीढ़ी के अनुभव का हिस्सा बना सकता है। युवा पीढ़ी जिस भाषा और ध्वनि-संसार से परिचित है, उसी के माध्यम से यदि उसे अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जाए तो परंपरा अधिक जीवंत और प्रभावशाली बन सकती है।
हालांकि इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। बाजार और लोकप्रियता की होड़ में कभी-कभी पारम्परिक गीतों के मूल भाव, शब्द और सांस्कृतिक संदर्भ कमजोर पड़ जाते हैं। देवी आराधना से जुड़े गीत केवल मनोरंजन के साधन नहीं होते, उनमें लोकविश्वास, आस्था और सामुदायिक स्मृति जुड़ी होती है। इसलिए उनके आधुनिक रूपांतरण में संवेदनशीलता और सांस्कृतिक जिम्मेदारी आवश्यक है।
हमें यह भी देखना होगा कि फ्यूजन के नाम पर लोक संगीत की मौलिकता समाप्त न हो। लोककलाकारों और पारम्परिक वाद्ययंत्रों को इस प्रक्रिया में उचित स्थान मिलना चाहिए। यदि आधुनिक संगीतकार लोक कलाकारों के साथ मिलकर काम करें, उनकी धुनों और परम्पराओं को समझें तथा उन्हें रचनात्मक रूप से नए मंचों पर प्रस्तुत करें, तो यह प्रक्रिया दोनों पक्षों के लिए लाभकारी हो सकती है।
नवरात्र के अवसर पर फ्यूजन संगीत का बढ़ना इस बात का संकेत भी है कि भारतीय संस्कृति स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर प्रवाहमान है। हमारी परम्पराएं समय के साथ नए रूप ग्रहण करती रही हैं। शास्त्रीय संगीत ने लोक से सीखा है और लोक ने भी समय-समय पर नए वाद्यों और शैलियों को अपनाया है। इसलिए आधुनिकता और परम्परा को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय उनके बीच संवाद स्थापित करना अधिक उचित होगा।
आज आवश्यकता ऐसे सार्थक सांगीतिक प्रयोगों की है, जिनमें तकनीक आधुनिक हो, प्रस्तुति आकर्षक हो, लेकिन भारतीय संगीत की आत्मा सुरक्षित रहे। नवरात्र जैसे पर्व इस प्रयोग के लिए अत्यंत उपयुक्त अवसर प्रदान करते हैं। यदि देवी स्तुति, लोकधुन, शास्त्रीय राग, क्षेत्रीय वाद्य और आधुनिक संगीत तकनीक एक संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ मिलते हैं, तो एक ऐसा नया संगीत जन्म ले सकता है जो अपनी जड़ों से जुड़ा होने के साथ-साथ वैश्विक श्रोताओं को भी आकर्षित करे।
फ्यूजन का उद्देश्य परम्परा को बदलना नहीं, बल्कि परम्परा के भीतर छिपी सम्भावनाओं को नए श्रोताओं तक पहुंचाना होना चाहिए। नवरात्र की शक्ति केवल देवी की आराधना में नहीं, बल्कि उस सामूहिक सांस्कृतिक ऊर्जा में भी है जो समाज को जोड़ती है। यदि फ्यूजन संगीत इस ऊर्जा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनता है, तो उसका बढ़ता प्रभाव निश्चित रूप से भारतीय सांस्कृतिक जीवन के लिए एक सकारात्मक और रचनात्मक संकेत है।
डॉ. राकेश भट्ट

