आज की इस तेज रफ्तार और भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, अकेलापन और मानसिक दबाव हम सभी के जीवन का एक ऐसा अटूट हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिससे चाहकर भी पीछा छुड़ाना मुश्किल होता जा रहा है। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने तक, हर व्यक्ति किसी न किसी अदृश्य दौड़ में शामिल है और इसी अंधी दौड़ का सबसे बड़ा शिकार हमारा मानसिक स्वास्थ्य हो रहा है। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और संवेदनशीलता पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।

हर साल विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस हमें इसी बेहद महत्वपूर्ण जरूरत की ओर ध्यान आकर्षित कराता है। यह दिन केवल मानसिक समस्याओं पर औपचारिकता निभाने का मंच नहीं है, बल्कि यह हम सभी को यह याद दिलाने का अवसर है कि समय रहते मदद मांगना, अपनी भावनाओं को गहराई से समझना और समाज में मानसिक परेशानियों को लेकर बनी पुरानी झिझक व गलत धारणाओं को तोड़ना कितना आवश्यक है। बदलती जीवनशैली, काम का भारी दबाव, रिश्तों में बढ़ती दूरियां, आर्थिक अनिश्चितताएं और सामाजिक परिस्थितियों में तेजी से हो रहे बदलाव लगातार लोगों के मानसिक संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं।
आम तौर पर मानसिक स्वास्थ्य को केवल मानसिक बीमारी या विक्षिप्तता के संकुचित संदर्भ में देखा जाता है, जो कि एक बहुत बड़ी सामाजिक भूल है। इसका दायरा इससे कहीं अधिक व्यापक और जीवन के हर पहलू से जुड़ा हुआ है। मानसिक रूप से स्वस्थ होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि व्यक्ति के जीवन में कभी कोई दुख, परेशानी या चुनौती नहीं आएगी।
इसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि व्यक्ति अपनी भावनाओं को भली-भांति समझता है, रोजमर्रा के तनाव से सकारात्मक तरीके से निपटता है, जीवन की कठिन चुनौतियों का डटकर सामना करता है और अपने परिवार, मित्रों व समाज के साथ स्वस्थ संबंध बनाए रखता है। जीवन में उतार-चढ़ाव आना प्रकृति का एक स्वाभाविक नियम है और हर इंसान कभी न कभी उदासी, चिंता या भावनात्मक दबाव महसूस करता है।
समस्या तब विकराल रूप लेती है, जब ये नकारात्मक भावनाएं लंबे समय तक बनी रहती हैं और व्यक्ति के व्यक्तिगत, सामाजिक या पेशेवर जीवन को बुरी तरह प्रभावित करने लगती हैं। आज की आधुनिक जीवनशैली ने हमारे जीवन को जितना आसान और तकनीकी रूप से उन्नत बनाया है, मानसिक उलझनों को उतना ही ज्यादा बढ़ा दिया है।
समाज के हर वर्ग पर इसका अलग और गहरा दबाव साफ दिखाई देता है। आज के बच्चों पर केवल पढ़ाई का ही नहीं, बल्कि हर प्रतियोगिता में अव्वल आने का भारी दबाव है। परीक्षा के अंक, भविष्य की अनिश्चितता और सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की परफेक्ट जिंदगी से अपनी तुलना करने की प्रवृत्ति उनके कोमल मन को अंदर ही अंदर तोड़ रही है।
कई बार बच्चे अपनी घबराहट या उलझन को शब्दों में बयां नहीं कर पाते और उनके व्यवहार में आने वाला चिड़चिड़ापन, गुमसुम रहना या अकेलापन ही उनके भीतर चल रहे तूफान का संकेत होता है। दूसरी ओर, कामकाजी लोगों के लिए ऑफिस के लक्ष्यों को पूरा करने का तनाव, नौकरी की असुरक्षा, और परिवार के लिए पर्याप्त समय न निकाल पाना उनके मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। रात-रात भर जागना, स्क्रीन के सामने अनगिनत घंटे बिताना और लगातार काम करते रहना मानसिक और शारीरिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देता है।
इसके अलावा, एकल परिवार की संस्कृति ने बुजुर्गों के सामने अकेलापन और सामाजिक अलगाव जैसी गंभीर समस्याएं खड़ी कर दी हैं। अपनों के बीच रहकर भी खुद को अकेला महसूस करना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा आघात करता है।
लगातार बना रहने वाला यह मानसिक तनाव सिर्फ मन को ही नहीं, बल्कि शरीर को भी दीमक की तरह चाटता है। इससे नींद उड़ जाती है, भूख प्रभावित होती है, शरीर का ऊर्जा स्तर गिर जाता है और सिरदर्द, बदन दर्द या रक्तचाप जैसी शारीरिक समस्याएं घर करने लगती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबसे बड़ी बाधा आज भी समाज की वह दबी-कुचली सोच है, जो मानसिक परेशानी को कमजोरी या पागलपन मानती है। लोग खुलकर यह स्वीकार करने से डरते हैं कि वे अंदर से टूट चुके हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि समाज उन्हें कमजोर या अक्षम मान लेगा। यह सामाजिक डर बीमारी को अंदर ही अंदर और अधिक गंभीर बना देता है।
हमें यह समझना होगा कि जिस प्रकार शरीर की अन्य बीमारियां किसी को भी हो सकती हैं और उनका समुचित इलाज संभव है, उसी प्रकार मन का अस्वस्थ होना भी उतना ही सामान्य है। इसके लिए किसी मनोचिकित्सक या काउंसलर के पास जाना किसी भी रूप में शर्म की बात नहीं है, बल्कि यह खुद को बचाने और एक बेहतर जिंदगी जीने की दिशा में उठाया गया बेहद समझदारी भरा कदम है।
इस स्थिति को सुधारने के लिए सामूहिक और व्यक्तिगत स्तर पर ठोस प्रयासों की आवश्यकता है। परिवार किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होता है। यदि घर का कोई सदस्य अचानक शांत रहने लगे, अपनी पसंद की चीजों से दूरी बनाने लगे या लगातार उदास रहे, तो उसे डांटने या नजरअंदाज करने के बजाय प्यार से उसकी बात सुननी चाहिए।
कई बार सिर्फ एक हमदर्द श्रोता मिल जाने से आधा तनाव अपने आप कम हो जाता है। इसके साथ ही, कॉर्पोरेट जगत और कार्यस्थल की भी यह बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि वे कर्मचारियों को मशीन न समझें। काम के घंटों का उचित निर्धारण, कर्मचारियों की मानसिक स्थिति का सम्मान और जरूरत पड़ने पर पेशेवर काउंसलिंग की सुविधा देना आज के कामकाजी माहौल की मुख्य प्राथमिकता होनी चाहिए।
इसके अलावा, सोशल मीडिया की इस आभासी दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक रिश्तों को समय देना और डिजिटल डिटॉक्स अपनाना भी बेहद जरूरी है। स्क्रीन टाइम को कम करना और प्रकृति के करीब वक्त बिताना मानसिक शांति का सबसे बड़ा साधन है।
अपने मन को स्वस्थ और प्रफुल्लित रखने के लिए हमें अपनी दिनचर्या में कुछ छोटे लेकिन बेहद असरदार बदलाव करने होंगे। रोजाना कम से कम सात से आठ घंटे की गहरी नींद दिमाग को पूरी तरह रीचार्ज करती है, जबकि संतुलित आहार शारीरिक और मानसिक दोनों ऊर्जा को बनाए रखता है।
इसके अलावा, रोजाना सुबह की सैर, योग या हल्का शारीरिक व्यायाम शरीर में हैप्पी हॉर्मोन्स को बढ़ाते हैं जो तनाव को छूमंतर करने में मदद करते हैं। अपनी सीमाओं को पहचानना और हर जिम्मेदारी को अकेले अपने कंधों पर उठाने की जिद छोड़कर जरूरत पड़ने पर विनम्रता से ना कहना सीखना भी आत्म-देखभाल का एक अनिवार्य हिस्सा है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का मूल संदेश यही है कि मानसिक स्वास्थ्य को हमारे समग्र स्वास्थ्य से अलग करके कभी नहीं देखा जा सकता। जब तक हमारा मन स्वस्थ, शांत और संतुलित नहीं होगा, तब तक हम जीवन की किसी भी बड़ी जंग को पूरी क्षमता के साथ नहीं जीत सकते। आइए, आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम मानसिक स्वास्थ्य पर बिना किसी झिझक के खुलकर बात करेंगे, अपनों के अनकहे दर्द को समझेंगे और समाज में एक ऐसा संवेदनशील और सुरक्षित माहौल तैयार करेंगे जहां हर व्यक्ति का मन पूरी तरह सुरक्षित और प्रसन्न रह सके।
– डॉ. दीपक कोहली
