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भारत की विभिन्न प्रांतीय रामकथाओं में देवी-उपासना का माहात्म्य

भारत की विभिन्न प्रांतीय रामकथाओं में देवी-उपासना का माहात्म्य

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
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महर्षि वाल्मीकि की संस्कृत रामायण से प्रेरणा ग्रहण करते हुए भारत की विविध प्रांतीय भाषाओं में रामकथा का पुनर्सृजन हुआ। इन रामकथाओं ने मूल कथा को केवल भाषांतरित नहीं किया, बल्कि अपने-अपने प्रदेश की धार्मिक आस्थाओं और सांस्कृतिक संस्कारों को भी आत्मसात किया। इसी कारण विभिन्न प्रांतीय रामकथाओं में देवी-तत्त्व अनेक रूपों में उपस्थित दिखाई देता है। कहीं गौरी विवाह-सौभाग्य की अधिष्ठात्री हैं, कहीं दुर्गा विजय प्रदान करने वाली आद्यशक्ति हैं, कहीं सरस्वती वाणी और काव्य-सृजन की प्रेरक देवी हैं, तो कहीं पार्वती स्वयं रामकथा की जिज्ञासु श्रोता के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। प्रस्तुत आलेख में विभिन्न प्रादेशिक रामकथाओं में देवी उपासना के महात्म की चर्चा की गई हैं।

श्रीरामचरितमानस - Shri Ramcharit Manas (Translated By Jwala Prasad) |  Exotic India Art

अवधी रामकथा

अवधी भाषा की रामकथा-परंपरा में गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस का स्थान सर्वोपरि है। बालकाण्ड में सी माता ता का गौरी-पूजन भारतीय लोकजीवन में कन्या द्वारा विवाह-पूर्व माता गौरी की आराधना की प्राचीन परंपरा को प्रतिष्ठित करता है। माता सीता अपनी माता की आज्ञा से गौरी-पूजन हेतु जाती हैं—
“तेहि अवसर सीता तहँ आई।
गिरिजा पूजन जननि पठाई॥”
(श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 227 के उपरान्त, चौपाई-1)
गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं—
“मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता।
गई मुदित मन गौरि निकेता॥
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा।
निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥”
(श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 227 के उपरान्त, चौपाई-3)

यहाँ देवी गौरी एक कन्या के मनोवांछित वर को प्रदान करने वाली मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। माता सीता की यह पूजा लोकाचार और आध्यात्मिकता, दोनों को एक सूत्र में बाँधती है।
बंगला रामकथा

कृत्तिवासी रामायण के लंकाकाण्ड में रावण-वध से पूर्व श्रीराम द्वारा देवी दुर्गा के अकाल-बोधन और पूजन का विस्तृत वर्णन मिलता है। ब्रह्मा श्रीराम से कहते हैं—

“विधाता कहेन प्रभु, एक कर्म कर विभु,
तबे होबे रावण संहार।
अकाले बोधन करि, पूज देवी महेश्वरी,
तरिबे हे ए दुःख-पाथार।।’’
(कृत्तिवास ओझा, कृत्तिवासी रामायण (श्रीराम पाँचाली), लंकाकाण्ड, प्रसंग-087)
इसके पश्चात् ब्रह्मा षष्ठी-कल्प के अनुसार देवी-बोधन का निर्देश देते हैं—
“विधाता कहेन सार, शुन विधि दिई तार,
कर षष्ठी-कल्पेते बोधन।
व्याघात ना होबे ताय, विधि खण्डि पुनराय,
कल्पखण्डे सुरथ राजन।।’’
(कृत्तिवास ओझा, कृत्तिवासी रामायण (श्रीराम पाँचाली), लंकाकाण्ड, प्रसंग-087)
तदनन्तर श्रीराम द्वारा देवी दुर्गा की विधिवत् पूजा का स्पष्ट उल्लेख है—
“पूजि दुर्गा रघुपति, करिलेन स्तुति नति,
विरचिल चण्डीपूजा सार।।’’
(कृत्तिवास ओझा, कृत्तिवासी रामायण (श्रीराम पाँचाली), लंकाकाण्ड, प्रसंग- 087)
इस प्रकार कृत्तिवासी रामायण में श्रीराम स्वयं भगवती दुर्गा की आराधना करते हैं। यह प्रसंग रावण-वध से पूर्व देवी के ‘अकाल-बोधन’ से सम्बद्ध है और बंगाल की शारदीय दुर्गापूजा की रामकथा-परम्परा का महत्त्वपूर्ण आधार बन गया।
इसके अगले चरण में नवमी-पूजन का स्वतंत्र प्रसंग मिलता है। लंकाकाण्ड के प्रसंग 089—‘नवमी पूजा’ में कहा गया है—
“नवमीते रघुपति, पूजिबारे भगवती,
उद्योग करिला फल मूल।
यथा वेदविधि मत, आनिला सामग्री जत,
कपिगण जोगाइछे फूल।।’’
(कृत्तिवास ओझा, कृत्तिवासी रामायण, लंकाकाण्ड, प्रसंग-089)
इसके बाद अशोक, जवा, मल्लिका, मालती, पलाश, बकुल, गन्धराज, कमल, पारिजात, अपराजिता आदि अनेक पुष्पों तथा नैवेद्य से देवी की पूजा की तैयारी का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है।
कृत्तिवासी रामायण में सरस्वती-तत्त्व भी रामकथा-रचना से जुड़ा हुआ है। आदिकाण्ड में ब्रह्मा वाल्मीकि को काव्य-रचना का वरदान देते हुए कहते हैं—
“सरस्वती रहिलेन तोमार जिह्वाते।
होइबे कविता राशि तोमार मुखेते।।’’
(कृत्तिवास ओझा, कृत्तिवासी रामायण, आदिकाण्ड, प्रसग- 03)
अर्थात् सरस्वती तुम्हारी जिह्वा पर निवास करेंगी और तुम्हारे मुख से काव्य की राशि प्रकट होगी।

मराठी रामकथा
महाराष्ट्र की रामकथा-परंपरा में संत एकनाथकृत भावार्थ रामायण का विशेष महत्त्व है। इसके आरंभ में सरस्वती-वंदना आती है, जहाँ देवी सरस्वती को केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि चेतना और सृजन की मूल शक्ति कहा गया है। देवनागरी में मूल मराठी पाठ—
“आतां वंदूं सरस्वती।
जे चित्तचेतना चैतन्यशक्ती।
जे सकळ स्फूर्तीची स्फूर्ती।
अमूर्ताची मूर्ति स्वरूप जिचें॥”
(श्रीभावार्थ रामायण, बालकाण्ड, अध्याय 1, सरस्वती-वंदना, ओवी 7)
एकनाथ आगे सरस्वती को वाणी, अर्थ और गूढ़ ज्ञान के उद्घाटन की शक्ति के रूप में देखते हैं। इस प्रकार यहाँ देवी-उपासना सीधे साहित्य-सृजन और रामकथा-वाचन से जुड़ती है।

ओड़िया रामकथा
ओड़िशा की प्रसिद्ध जगमोहन रामायण अथवा दांडी रामायण में देवी पार्वती का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पूरी रामकथा ही शिव और पार्वती के संवाद के रूप में विकसित होती है। ओड़िया मूल का देवनागरी लिप्यंतरण—
“शुणिबा हे सुज्ञजने श्रीराम-महिमा।
सदाशिव छामुरे या पुछा कले उमा॥
प्रसन्न होइ कहन्ति तांकु त्रिपुरारि…”
(जगमोहन रामायण, अध्याय 1-आदिकाण्ड का प्रारंभिक शिव–पार्वती संवाद, 185–186)

अर्थात् उमा ने सदाशिव से श्रीराम की महिमा पूछी और त्रिपुरारि शिव ने प्रसन्न होकर रामकथा का वर्णन किया। एक अन्य स्थल पर पार्वती स्वयं रामावतार का रहस्य पूछती हैं और हमें जानकारी प्राप्त होती हैं कि देवी यहाँ निष्क्रिय पात्र नहीं, बल्कि रामतत्त्व की जिज्ञासु साधिका हैं।

“पार्वती कहिले…
केबण अवतारे से रामनाम बहि…
ए कथा विस्तारी मोते कह प्राणनाथ।”
(जगमोहन रामायण, अध्याय 1-आदिकाण्ड का प्रारंभिक शिव–पार्वती संवाद, 232–235)

मलयालम रामकथा
केरल की रामकथा-परंपरा में तुञ्चत्तु एषुत्तच्छन अध्यात्म रामायणम् किलिप्पाट्टु अत्यंत पूजनीय है। इसकी कथा-रचना में उमा-महेश्वर संवाद केंद्रीय संरचना के रूप में उपस्थित है।
“कैलासाचले सूर्य-कोटि शोभिते,
विमलालये रत्नपीठे संविष्टं…
वंदिच्चु वामोत्संगे वाझुन्न भगवती,
सुन्दरी हैमवती, चोदिच्चु भक्तियोडे।”
अर्थात् हिमवान की पुत्री देवी पार्वती कैलास पर शिव को प्रणाम कर भक्तिपूर्वक रामतत्त्व के विषय में प्रश्न करती हैं। बालकाण्ड के अंत में भी यही स्पष्ट रूप से दिया गया है।
“इत्यध्यात्म रामायणे उमा-महेश्वर-संवादे…”
(अध्यात्म रामायणम् किलिप्पाट्टु, बालकाण्ड, “उमा-महेश्वर संवादम्, क्रमांक-110)

यहाँ देवी पार्वती रामकथा की आध्यात्मिक श्रोता हैं और रामकथा स्वयं शिव द्वारा देवी को प्रदत्त ज्ञान का रूप ग्रहण करती है।

तेलुगु रामकथा
तेलुगु साहित्य की प्रसिद्ध कवयित्री मोल्ल ने अपनी रामकथा को किसी सांसारिक राजा को समर्पित न करके देवी-देवताओं के चरणों में अर्पित किया। उनके प्रारंभिक मंगलाचरण में त्रिमूर्ति के साथ सरस्वती से भी आशीर्वाद की याचना की गई है। मोल्ल की इस काव्य-दृष्टि का आशय यह था कि रामकथा-रचना स्वयं देवी-वाणी की कृपा से संभव होती है। उनकी शैली की एक विशेषता यह थी कि उन्होंने सहज तेलुगु का प्रयोग किया और काव्य-प्रतिभा को ईश्वरीय अनुग्रह माना।

कन्नड़ रामकथा
कन्नड़ की प्रसिद्ध तोरवे रामायण के रचयिता नरहरि, जिन्हें कुमार वाल्मीकि कहा गया, अपनी रामकथा के आरंभ में शिव, लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती आदि देवियों और देवताओं का स्मरण करते हैं।
“गिरिजे त्रिजगन्माते…”

(तोरवे रामायण, बालकाण्ड, प्रथम संधि, प्रारम्भिक देवी-स्तुति, पद-4)
यहाँ देवी गिरिजा को त्रिजगत् की माता और कल्याणदायिनी के रूप में संबोधित किया गया है। आगे सरस्वती/भारती का स्तवन मिलता है—
“…भारति निलुगे मन्मुखपद्म सद्मदली…”

(तोरवे रामायण, बालकाण्ड, प्रथम संधि, भारती/सरस्वती-वंदना, पद-6)
अर्थात् कवि प्रार्थना करता है कि भारती उसके मुखरूपी कमल में निवास करें। बालकाण्ड के पीठिका-संधि में गौरी स्वयं शिव से विष्णु-सहस्रनाम के रहस्य के विषय में पूछती हैं—
“वासुदेवस्तुतिपरायणे गौरिदेवतेयु”
(तोरवे रामायण, बालकाण्ड, पीठिका-संधि, पद-24)
और आगे शिव उत्तर देते हुए कहते हैं—
“गिरिजे केळु सहस्रनामद
सरिकणा रघुरामचंद्रन
परममंगलनाम…”
(तोरवे रामायण, बालकाण्ड, पीठिका-संधि, पद-26)
अर्थात्—हे गिरिजे, सुनो; रघुरामचन्द्र का परम मंगलमय नाम सहस्रनाम के तुल्य है।

गुजराती रामकथा

गुजराती रामकथा-परम्परा में कवि गिरधरदासकृत रामायण में देवी-तत्त्व आरम्भ से ही उपस्थित है। कवि मंगलाचरण में सरस्वती को प्रणाम करते हुए रामचरित के गायन के लिए उनकी कृपा की याचना करता है—
“कमलभू तनया सती, सरस्वतीने लागुं पाय…
तुज कृपाए सरस्वती माता, गाऊँ रामचरित्र।”
(गिरधरकृत रामायण, बालकाण्ड, अध्याय 1, मंगलाचरण, पद 8–10, पृ. 20)
अर्थात् कवि ब्रह्मा की पुत्री माता सरस्वती के चरणों में प्रणाम करके उनसे वाणी और काव्य-सामर्थ्य की याचना करता है तथा कहता है कि उन्हीं की कृपा से वह रामचरित्र का गायन कर सकेगा।

बालकाण्ड में जनकपुर के उपवन-प्रसंग में माता सीता अपनी सखियों के साथ देवी-मंदिर में जाकर अम्बा-पार्वती की प्रेमपूर्वक पूजा करती हैं। मूल गुजराती पाठ में स्पष्ट उल्लेख है—
“ते समे पूजवाने अंबा, आव्यां जनकसुता…
पूज्यां पार्वतीने प्रीते…”

(गिरधरकृत रामायण, बालकाण्ड, अध्याय 33, पद 9–11, पृ. 62)
जनकनन्दिनी सीता अम्बा की पूजा के लिए आती हैं और देवी-मन्दिर में प्रवेश कर अत्यन्त प्रेम से पार्वती की पूजा करती हैं। आगे वे हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर देवी से मनोवांछित वर की प्रार्थना करती हैं। यह प्रसंग देवी को कन्या के सौभाग्य, विवाह और मनोवांछित वर की अधिष्ठात्री मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
पंजाबी-ब्रज परंपरा

उत्तर-पश्चिमी भारतीय रामकथा-परंपरा में दसम ग्रंथ के चौबीस अवतार खंड में स्थित राम अवतार एक उल्लेखनीय रचना है। इसके एक पद में मन, वचन और कर्म से दुर्गा-जाप का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
“सीआ संगि लीने गयो धाम आपं॥
मनो बच्च करमं दुरगा जाप जापं”

(दसम ग्रंथ, “चौबीस अवतार”, “रामावतार”, छंद-724)
अत: यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता हैं कि विभिन्न प्रांतीय रामकथाओं में देवी-उपासना का स्वरूप भारतीय धार्मिक चेतना की व्यापक समन्वयशीलता को प्रकट करता है। राम और शक्ति को अलग-अलग साधना-परंपराओं के रूप में देखने के स्थान पर अनेक प्रांतीय रामकथाओं ने दोनों को एक ही आध्यात्मिक संसार के परस्पर पूरक तत्त्वों के रूप में प्रतिष्ठित किया। इसी कारण भारतीय रामकथा केवल कथा का विस्तार नहीं रही, बल्कि वह भारत की विविध भाषाओं, लोकविश्वासों और भक्ति-परंपराओं को जोड़ने वाली सांस्कृतिक धारा बन गई। देवी-उपासना का यह बहुरंगी स्वरूप भारतीय रामकथा-साहित्य की आध्यात्मिक समृद्धि का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

डॉ नरेन्द्र कुमार मेहता “मानसश्री”

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