सदियों से वैश्विक ज्ञान, विज्ञान और चिकित्सा अनुसंधान की दिशा तय करने का एकाधिकार पश्चिमी देशों के पास रहा है। किसी नई बीमारी का टीका खोजना हो, कैंसर जैसी जटिल व्याधियों की आधुनिक दवाएं तैयार करनी हों या फिर मानव जीन से जुड़े गूढ़ रहस्यों को सुलझाना हो, पूरी दुनिया की निगाहें अमेरिका और यूरोप की प्रयोगशालाओं पर टिकी रहती थीं। किंतु इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक के मध्य में पहुंचते-पहुंचते यह वैश्विक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ग्लोबल ऑब्जर्वेटरी ऑन हेल्थ रिसर्च एंड डेवलपमेंट द्वारा जारी नवीनतम रिपोर्ट ने इस बदलाव पर आधिकारिक मुहर लगा दी है। इस रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि बायोमेडिकल रिसर्च और क्लिनिकल ट्रायल के क्षेत्र में अब पश्चिम का एकछत्र राज समाप्त हो गया है और दुनिया के शीर्ष 10 देशों की सूची में चीन तथा भारत ने अमेरिका सहित तमाम विकसित पश्चिमी राष्ट्रों को काफी पीछे छोड़ दिया है। यह केवल आंकड़ों का उलटफेर नहीं है, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति और वैज्ञानिक शक्ति के केंद्र के पश्चिम से पूर्व की ओर स्थानांतरित होने का स्पष्ट उद्घोष है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के इन नवीनतम आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो स्थिति अत्यंत रोचक और दूरगामी परिणाम देने वाली नजर आती है। वैश्विक स्तर पर पंजीकृत क्लिनिकल ट्रायल की संख्या के मामले में चीन 24,524 ट्रायल के साथ दुनिया में पहले पायदान पर काबिज हो गया है, जबकि भारत 21,410 क्लिनिकल ट्रायल के साथ दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। सबसे चौंकाने वाली स्थिति दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका की है, जो 8,851 ट्रायल के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गया है। अर्थात अकेले भारत या चीन में जितने चिकित्सा परीक्षण और शोध हो रहे हैं, अमेरिका में उनकी संख्या आधे से भी कम रह गई है।
इस वैश्विक सूची के अन्य देशों पर नजर डालें तो चौथे स्थान पर ईरान 4,237 ट्रायल के साथ, पांचवें स्थान पर जापान 3,656 ट्रायल के साथ, छठे पर जर्मनी 3,455 के साथ, सातवें पर तुर्की 2,923 के साथ और आठवें स्थान पर फ्रांस 2,560 ट्रायल के साथ मौजूद है। वहीं स्पेन और यूनाइटेड किंगडम 2,170 ट्रायल के साथ संयुक्त रूप से नौवें और दसवें स्थान पर सिमट गए हैं। ये आंकड़े प्रमाणित करते हैं कि चिकित्सा विज्ञान के भविष्य का निर्माण अब एशिया की प्रयोगशालाओं में हो रहा है।
सामान्य जनमानस के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्लिनिकल ट्रायल और बायोमेडिकल हब बनने का वास्तविक अर्थ क्या है और इससे किसी देश की प्रतिष्ठा व आम नागरिक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। वास्तव में क्लिनिकल ट्रायल किसी भी नई चिकित्सा पद्धति, दवा, वैक्सीन या मेडिकल उपकरण के विकास की सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक कड़ी है।
जब वैज्ञानिक प्रयोगशाला में किसी नए अणु या फॉर्मूले की खोज करते हैं, तो उसे मानव उपयोग के लिए सुरक्षित और प्रभावी प्रमाणित करने हेतु कई चरणों के सख्त मानवीय परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। जिस देश में ये परीक्षण सर्वाधिक होते हैं, वहां न केवल नई दवाओं का सबसे पहले विकास होता है, बल्कि उस देश के चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और संस्थानों को आधुनिकतम तकनीक व शोध का प्रत्यक्ष अनुभव भी मिलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जो राष्ट्र क्लिनिकल रिसर्च में अग्रणी होता है, आने वाले समय में वैश्विक पेटेंट, सस्ती दवाओं की उपलब्धता और स्वास्थ्य सुरक्षा की कुंजी उसी के हाथों में होती है।
भारत के संदर्भ में यह उपलब्धि इसलिए भी अधिक गौरवपूर्ण है क्योंकि दशकों तक दुनिया भारत को केवल जेनेरिक दवाओं के एक सस्ते उत्पादक यानी दुनिया की फार्मेसी के रूप में ही देखती रही है। पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियां मूल शोध और पेटेंट अपने पास रखती थीं और भारत की भूमिका केवल उन दवाओं के बड़े पैमाने पर विनिर्माण तक सीमित मानी जाती थी। परंतु बीते कुछ वर्षों में भारत ने इस पारंपरिक छवि को तोड़ते हुए स्वयं को एक नवाचार और अनुसंधान केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की देखरेख में देश का क्लिनिकल ट्रायल बाजार 1.42 अरब डॉलर के स्तर को पार कर चुका है और वर्ष 2030 तक इसमें प्रतिवर्ष 8 प्रतिशत से अधिक की चक्रवृद्धि दर से विस्तार होने का अनुमान है। इतना ही नहीं, दवाओं के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले सबसे मुख्य घटक एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स की वैश्विक फाइलिंग में भारत की हिस्सेदारी बढ़कर 48 प्रतिशत हो गई है, जबकि चीन का हिस्सा 18 प्रतिशत और अमेरिका का हिस्सा घटकर मात्र 8 प्रतिशत रह गया है।
भारत के इस तीव्र उत्थान के पीछे कई ठोस आर्थिक, जनसांख्यिकीय और नीतिगत कारण काम कर रहे हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण लागत की प्रतिस्पर्धात्मकता है। अमेरिका या यूरोप की तुलना में भारत में उच्चस्तरीय क्लिनिकल ट्रायल और बायोमेडिकल अनुसंधान का खर्च लगभग 30 से 35 प्रतिशत तक कम आता है।
दूसरा महत्वपूर्ण कारक भारत की विशाल जनसंख्या और यहां पाई जाने वाली अद्वितीय आनुवंशिक विविधता है। दुनिया की बड़ी फार्मा कंपनियों को अपनी दवाओं के वैश्विक प्रभाव को परखने के लिए जिस विविधतापूर्ण रोगी समूह की आवश्यकता होती है, वह भारत में सहज रूप से उपलब्ध है। इसके साथ ही देश में विश्वस्तरीय अस्पतालों का बढ़ता नेटवर्क, अंग्रेजी बोलने वाले कुशल डॉक्टरों, वैज्ञानिकों व पैरामेडिकल तकनीशियनों की विशाल फौज और डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत स्वास्थ्य डेटा के एकीकरण ने भारत को वैश्विक चिकित्सा शोध के लिए सबसे आकर्षक गंतव्य बना दिया है।
केंद्र सरकार की दूरदर्शी नीतियों ने भी इस वैज्ञानिक क्रांति को गति देने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है। आज भारत की राष्ट्रीय बायो-इकोनॉमी 195 अरब डॉलर के विशाल आकार को छू चुकी है और सरकार की नई बायोई3 नीति अर्थात अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से इसे वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
नियामक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, सिंगल विंडो क्लीयरेंस और अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन जैसी पहलों ने विश्वविद्यालयों और उद्योग जगत के बीच की खाई को पाटने का काम किया है। यही कारण है कि केवल क्लिनिकल ट्रायल ही नहीं, बल्कि नेचर इंडेक्स 2026 की समग्र वैज्ञानिक शोध रैंकिंग में भी चीन पहले और भारत वैश्विक स्तर पर आठवें स्थान पर पहुंच गया है।
भारत की इस प्रगति की सराहना चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स को भी करनी पड़ी है, जिसने अपने विशेष विश्लेषण में स्वीकार किया है कि भारत और चीन मिलकर चिकित्सा विज्ञान के पश्चिमी एकाधिकार को समाप्त कर रहे हैं।
वैश्विक बायोमेडिकल परिदृश्य में भारत और चीन का यह उभार विकासशील और गरीब देशों यानी ग्लोबल साउथ के लिए भी एक बड़ी उम्मीद लेकर आया है। पश्चिमी देशों का चिकित्सा अनुसंधान मुख्य रूप से उन बीमारियों पर केंद्रित रहता था, जिनसे उन्हें भारी मुनाफा मिल सके। इसके विपरीत भारत में होने वाले शोध में उष्णकटिबंधीय बीमारियों, संक्रामक रोगों, टीबी, मलेरिया के साथ-साथ मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर के सस्ते उपचारों को प्राथमिकता मिल रही है।
जब किसी नई जीवनरक्षक दवा का परीक्षण और विकास भारतीय जमीन पर होता है, तो उसकी कीमत पश्चिमी देशों की तुलना में कई गुना कम होती है, जिसका सीधा लाभ दुनिया के करोड़ों वंचित नागरिकों को मिलता है। कोविड महामारी के दौरान स्वदेशी टीकों के विकास और वितरण के माध्यम से भारत अपनी इस मानवीय और वैज्ञानिक क्षमता का परिचय पूरी दुनिया को पहले ही दे चुका है।
अलबत्ता, इस ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ भारत के कंधों पर एक बड़ी नैतिक और वैज्ञानिक जिम्मेदारी भी आई है। विश्व में दूसरे स्थान पर पहुंचने के बाद अब भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने अनुसंधान की गुणवत्ता और नैतिक मानकों को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखने की है। क्लिनिकल ट्रायल के दौरान इसमें भाग लेने वाले सामान्य नागरिकों और मरीजों के अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा, सूचित सहमति के नियमों का कड़ाई से पालन और डेटा की प्रामाणिकता से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं होना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में मूलभूत अनुसंधान और विकास पर होने वाले सरकारी व निजी निवेश को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि हम केवल विदेशी कंपनियों के ट्रायल करने वाले केंद्र न बने रहें, बल्कि पूर्णतः स्वदेशी मौलिक दवाओं के पेटेंट धारक भी बनें।
निष्कर्षतः, विश्व स्वास्थ्य संगठन की यह रिपोर्ट नए भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास का जीवंत दस्तावेज है। सूचना प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी धाक जमाने के बाद भारत ने अब जैव-चिकित्सा और फार्मास्युटिकल अनुसंधान में भी अपनी वैश्विक श्रेष्ठता सिद्ध कर दी है। जैसे-जैसे भारत वर्ष 2047 के विकसित राष्ट्र के अपने संकल्प की ओर कदम बढ़ा रहा है, बायोमेडिकल रिसर्च और स्वास्थ्य नवाचार का यह मजबूत स्तंभ न केवल देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा, बल्कि संपूर्ण मानवता को सस्ती, सुलभ और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में भी निर्णायक भूमिका निभाएगा। चिकित्सा विज्ञान का सूर्य अब पूर्व से उदित हो रहा है और भारत उसकी सबसे चमकदार किरण बनकर उभरा है।
– महेन्द्र तिवारी
