भारतीय सनातन परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी व्यापकता, समन्वयशीलता और विविधता में एकात्मता की भावना है। इस परंपरा ने कभी भी उपासना के अलग-अलग स्वरूपों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना। यहाँ शिव और विष्णु में संघर्ष नहीं है, राम और कृष्ण में श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि प्रत्येक आराध्य के माध्यम से एक ही परम तत्त्व के अलग-अलग स्वरूपों का साक्षात्कार करने की उदात्त दृष्टि है। इसलिए जब कोई धीरेंद्र शास्त्री जैसे महाराज आध्यात्मिक मंच से भगवान राम और श्रीकृष्ण के बीच तुलना करते हुए अपने-पराए का विभाजन खड़ा करता है, तब प्रश्न केवल उस वक्तव्य की भाषा का नहीं रहता, बल्कि धीरेंद्र शास्त्री की आध्यात्मिक समझ और सामाजिक जिम्मेदारी का भी बन जाता है।

बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित (?)
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का हाल ही में दिया गया वक्तव्य इसी दृष्टि से विचारणीय है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में 29 अक्टूबर को आयोजित श्रीराम कथा के दौरान उन्होंने भगवान राम और श्रीकृष्ण की तुलना करते हुए मिमिक्री के साथ कहा कि हमारे राम सीधे खड़े होते हैं, जबकि तुम्हारे कृष्ण तीन जगह से टेढ़े खड़े होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि बांसुरी बजाना खेल है, लेकिन धनुष चलाना खेल नहीं। अयोध्या सीधा धाम है, जबकि वृंदावन टेढ़ा है। उन्होंने इस प्रकार की टिप्पणियाँ कीं। यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी तुलना करने की आवश्यकता ही क्या थी?
भारतीय सनातन परंपरा में भगवान विष्णु के दशावतारों की अवधारणा है। भगवान राम और भगवान कृष्ण दोनों उसी विष्णु तत्त्व के अवतार हैं। दोनों के अवतरण का उद्देश्य धर्म की स्थापना, अधर्म का विनाश और मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना था। परिस्थितियाँ अलग थीं, युग अलग थे, कार्यपद्धति अलग थी, लेकिन उद्देश्य एक ही था।
त्रेता युग में भगवान राम ने मर्यादा, कर्तव्य, त्याग, सत्यनिष्ठा और आदर्श जीवन का ऐसा प्रतिमान प्रस्तुत किया, जो आज भी भारतीय समाज के नैतिक जीवन का आधार है। उनका जीवन बताता है कि व्यक्तिगत सुख से ऊपर कर्तव्य और समाजहित को स्थान देना ही मर्यादा का वास्तविक अर्थ है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए एक अलग प्रकार की भूमिका निभाई। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे बाललीलाओं के माध्यम से आनंद और प्रेम का संदेश देते हैं, गोवर्धन धारण करके प्रकृति और समाज के संरक्षण का आदर्श प्रस्तुत करते हैं, मित्रता में सुदामा के साथ समानता का भाव रखते हैं, कूटनीति के माध्यम से धर्म की रक्षा करते हैं और कुरुक्षेत्र में अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश देकर कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का शाश्वत दर्शन देते हैं।
राम ने मर्यादा के माध्यम से धर्म का मार्ग दिखाया तो कृष्ण ने परिस्थितियों के अनुरूप धर्म के व्यापक स्वरूप को समझाया। राम का धनुष और कृष्ण की बांसुरी दोनों ही भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। एक में अन्याय के विरुद्ध संकल्प की शक्ति है, तो दूसरे में प्रेम, आनंद और चेतना को जागृत करने की क्षमता है। क्या किसी एक को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए दूसरे की महत्ता कम करना आवश्यक है? राम का आदर्श और कृष्ण का दर्शन एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के बिना भारतीय अध्यात्म की समग्रता की कल्पना भी अधूरी है।

धीरेंद्र शास्त्री ने श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा को आधार बनाकर उन्हें टेढ़ा बताया। किंतु क्या भारतीय कला, अध्यात्म और भक्ति परंपरा में श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा भारतीय सौंदर्यशास्त्र और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का अत्यंत सुंदर प्रतीक नहीं है? उसमें शरीर की तीन भंगिमाएँ हैं, लेकिन उन भंगिमाओं के भीतर आनंद, माधुर्य, लय और सृष्टि के साथ एकात्म होने का भाव है। कृष्ण की बांसुरी की धुन केवल गोपियों को आकर्षित नहीं करती, बल्कि भक्त और भगवान के बीच प्रेम के संबंध को अभिव्यक्त करती है। यही कारण है कि भारतीय चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य और साहित्य में कृष्ण की यह मुद्रा एक विशेष आध्यात्मिक स्थान रखती है।
दूसरी ओर, भगवान राम की धनुर्धारी मुद्रा संकल्प, साहस, अनुशासन और धर्मरक्षा के प्रतीक है। दोनों की मुद्राएँ अपने-अपने आध्यात्मिक अर्थ में पूर्ण हैं। एक को सीधा और दूसरे को टेढ़ा कहकर हँसी का विषय बनाना इन प्रतीकों की गहराई को न समझ पाने का परिचायक है। और आध्यात्मिक क्षेत्र में महाराज के रूप में विवरण करने वाले धीरेंद्र शास्त्री के आध्यात्मिक नासमझी को भी प्रस्तुत करता है।
भारतीय सनातन संत परंपरा में भक्त और भगवान के बीच प्रेमपूर्ण संवाद, उलाहना, विनोद और आत्मीयता के अनेक उदाहरण मिलते हैं। संत सूरदास, संत मीराबाई, संत तुकाराम, संत तुलसीदास जैसे अनेक संतों की अभिव्यक्ति में इस भाव की गहराई है। लेकिन किसी संत ने धार्मिक मंच से दो आराध्यों की तुलना करके अपने-पराए का विभाजन खड़ा नहीं किया है। इस बात को समझना आवश्यक है। धीरेंद्र शास्त्री के वक्तव्य में सबसे अधिक आपत्तिजनक बात केवल राम और कृष्ण की तुलना नहीं, बल्कि उसमें प्रयुक्त ‘हमारे’ और ‘तुम्हार’ की विभाजनकारी भाषा है।
भारतीय समाज में भगवान राम किसी एक समुदाय, संप्रदाय या क्षेत्र के नहीं हैं। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भी किसी एक जाति, समाज या क्षेत्र के आराध्य नहीं हैं। राम उत्तर से दक्षिण तक, पूर्व से पश्चिम तक भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित हैं। भारतीय जनमानस ने कभी यह प्रश्न नहीं उठाया कि रामभक्त बड़ा है या कृष्णभक्त। रामनवमी और जन्माष्टमी दोनों उत्सव पूरे श्रद्धाभाव से मनाए जाते हैं। अयोध्या और वृंदावन दोनों भारतीय आस्था के महत्त्वपूर्ण केंद्र हैं। राम और कृष्ण दोनों भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। ऐसे में ‘हमारे राम’ और ‘तुम्हारे कृष्ण’ जैसी भाषा का प्रयोग किस रोगी मानसिकता को प्रकट करता है? क्या आध्यात्मिक मंच पर इस प्रकार की तुलना से किसी सकारात्मक सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति होती है? यदि नहीं, तो
ऐसी अभिव्यक्ति की आवश्यकता ही क्या है?
आज देश में अनेक धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। सोशल मीडिया, डिजिटल माध्यमों और सार्वजनिक आयोजनों ने उन्हें लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचने का अवसर दिया है। धीरेंद्र शास्त्री भी ऐसे ही लोकप्रिय युवा कथावाचकों में एक हैं। उनके विचारों को बड़ी संख्या में लोग सुनते हैं। युवाओं में भी उनके प्रति आकर्षण है। यही उनकी शक्ति है और यही उनकी जिम्मेदारी भी है। वर्तमान में किसी धार्मिक मंच से कही गई बात केवल मंच तक सीमित नहीं रहती। वह समाज के विभिन्न वर्गों में पहुँचती है, चर्चा का विषय बनती है और कई बार सामाजिक धारणाओं को प्रभावित करती है। इसलिए बागेश्वर धाम जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक धरोहर के महाराज के रूप में मंच पर बैठने वाले व्यक्ति की वाणी में संयम, विषय की समझ और परंपरा के प्रति उत्तरदायित्व होना आवश्यक है।
समाज में पहले से मौजूद मतभेदों को दूर करना आध्यात्मिक नेतृत्व का दायित्व है, न कि अपने वक्तव्यों से नए मतभेदों को जन्म देना। धर्म का मंच किसी की व्यक्तिगत लोकप्रियता बढ़ाने का माध्यम नहीं हो सकता। धार्मिक कथाओं में विनोद का स्थान है, लेकिन विनोद की भी एक मर्यादा होती है। जिस विनोद से समाज में भ्रम और विवाद पैदा हो, उस विनोद की सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। समाज में पहले से मौजूद विभाजनों को बढ़ावा देना या धार्मिक प्रतीकों को आपसी श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। महाराज पद के चादर ओढ़ प्रवचन देने वाले किसी भी व्यक्ति की धार्मिक लोकप्रियता उसे अपनी अभिव्यक्ति के सामाजिक परिणामों से मुक्त नहीं करती।
विवाद बढ़ने के बाद धीरेंद्र शास्त्री ने अपने वक्तव्य पर स्पष्टीकरण दिया और क्षमा माँगी, लेकिन प्रश्न केवल क्षमा माँगने से समाप्त नहीं होता। सनातन धार्मिक परंपराओं की गहराई को समझे बिना लोकप्रियता के लिए किए गए विनोद या तुलनात्मक टिप्पणियाँ किस प्रकार अनावश्यक विवाद उत्पन्न कर सकती हैं, इसका आत्ममंथन होना चाहिए। धीरेंद्र शास्त्री को यह समझना आवश्यक है कि भारतीय समाज अपने आध्यात्मिक नेतृत्व का मूल्यांकन उसके आचरण, विचारों, परंपरा के प्रति समझ और समाज को जोड़ने की क्षमता के आधार पर भी करता है।
सनातन परंपरा का इतिहास उन महान संतों और युगपुरुषों से भरा हुआ है, जिन्होंने समाज को जोड़ने का काम किया। सभी संतों की अभिव्यक्ति अलग-अलग थी, उपासना की पद्धति अलग-अलग थी, लेकिन उनके भीतर एक व्यापक आध्यात्मिक एकात्मता थी। राम और कृष्ण का महत्त्व समझने के लिए किसी एक को दूसरे के सामने खड़ा करने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए धीरेंद्र शास्त्री जैसे लोकप्रिय आध्यात्मिक व्यक्तित्वों से अपेक्षा है कि वे अपनी लोकप्रियता को समाज की एकात्मता और सनातन संस्कृति की प्रतिष्ठा के लिए उपयोग करें। राम और कृष्ण को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करके नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को साथ रखकर समाज का मार्गदर्शन करें। एक बात स्पष्ट होनी चाहिए, राम केवल हमारे-तुम्हारे नहीं, सबके हैं। कृष्ण केवल हमारे -तुम्हारे नहीं, सबके हैं। अयोध्या और वृंदावन में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। धनुष और बांसुरी में कोई संघर्ष नहीं है। मर्यादा और माधुर्य दोनों सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं।
भगवान को बाँटकर भक्तों को जोड़ने का दावा नहीं किया जा सकता। जो राम और कृष्ण के नाम पर समाज में विभाजन की भाषा बोलता है, उसे पहले सनातन परंपरा की एकात्मता का पाठ समझने की आवश्यकता है।
धीरेंद्र शास्त्री जी, आपको सुनने वाले लाखों लोग हैं। आपकी वाणी से समाज प्रेरणा ग्रहण करता है। इसलिए आपकी जिम्मेदारी भी सामान्य व्यक्ति से अधिक है। आध्यात्मिकता का अर्थ केवल कथा कहना नहीं है, आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ है मनुष्य को अधिक संवेदनशील, विवेकशील और समाज के प्रति जिम्मेदार बनाना। आपके पास एक बड़ा मंच है। उस मंच से समाज को जोड़ने का कार्य कीजिए, भ्रम दूर कीजिए। सनातन परंपरा की प्रतिष्ठा उसके व्यापक दृष्टिकोण में है। उस प्रतिष्ठा को सीमित करने वाली भाषा से बचना ही सच्ची आध्यात्मिक परिपक्वता का परिचायक होगा।
क्योंकि भारतीय जनमानस की आस्था किसी एक कथावाचक, किसी एक मठ या किसी एक मंच से बड़ी है। यह आस्था हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना से निर्मित हुई है। इस चेतना को दिशा देने का अवसर धीरेंद्र शास्त्री को मिलता है, उसे सबसे पहले इसकी व्यापकता और गरिमा का सम्मान करना चाहिए।
जनता आध्यात्मिक व्यक्तित्वों को सम्मान देती है, उन्हें सुनती है, उनके विचारों को ग्रहण करती है, लेकिन यह सम्मान असीमित और बिना शर्त नहीं है। जब कोई धार्मिक पीठ से जुड़ा हुआ महाराज सनातन परंपरा की मूल भावना से दूर जाकर ऐसी भाषा का प्रयोग करता है, तो सनातन से जुड़ा भारतीय समाज ऐसे महाराजाओं के संदर्भ में अपनी असहमति व्यक्त करने का अवसर भी नहीं छोड़ता है। समाज उन महाराजाओं को उनकी सही जगह भी दिखाता है।
