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‘हम’ और ‘तुम’

‘हम’ और ‘तुम’

by रमेश पतंगे
in ट्रेंडींग, राजनीति
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भारत में ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) को लेकर इन दिनों काफी चर्चा हो रही है। आरोप लगाए जाते हैं कि आंदोलन करने वालों को विदेशों से आर्थिक सहायता मिलती है और आंदोलनों के पीछे की वैचारिकता भी विदेशों में बैठे लोगों से ही आती है। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, इसकी जांच करना केंद्र सरकार का काम है। केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियां इस काम को अच्छी तरह करने में सक्षम हैं। जिस अमेरिका से ‘जेन-ज़ी’ के इस उपद्रव की शुरुआत हुई है, ऐसा कहा जाता है, उस अमेरिका की वर्तमान स्थिति क्या है, यह जानना इस संदर्भ में काफी दिलचस्प होगा।

आइए, दो बेहद चर्चित पुस्तकों की चर्चा करते हैं। पहली पुस्तक का नाम है, The Fourth Turning: An American Prophecy और दूसरी पुस्तक का नाम है, The Fourth Turning Is Here। पहली पुस्तक के लेखकों की जोड़ी का नाम है विलियम स्ट्रॉस (William Strauss) और नील होवे (Neil Howe), जबकि दूसरी पुस्तक के लेखक नील होवे हैं। पहली पुस्तक वर्ष 1997 में प्रकाशित हुई थी और दूसरी वर्ष 2023 में। दूसरी पुस्तक के प्रकाशित होने तक विलियम स्ट्रॉस का निधन हो चुका था।

The Fourth Turning: What the Cycles of History Tell Us About America's Next Rendezvous with Destiny eBook : Strauss, William, Howe, Neil: Amazon.in: Books The Fourth Turning Is Here

पहली पुस्तक काफी चर्चित हुई। इसका कारण यह था कि लेखकों ने अमेरिकी इतिहास का चक्रीय विश्लेषण किया था। उनका कहना था कि अमेरिका के इतिहास को चार चरणों के माध्यम से समझना होगा। ये चार चरण इस प्रकार हैं :

पहला चरण – उत्कर्ष का सर्वोच्च शिखर
इस कालखंड में भौतिक विकास बहुत अधिक होता है। सामाजिक एकता मजबूत होती है। समान मूल्यों का संरक्षण किया जाता है और सामूहिकता को बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है।

दूसरी अवस्था – ‘अवेकनिंग’ (जागृति)
इस कालखंड में आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना बढ़ने लगती है। व्यक्तिवाद का विकास होता जाता है और इसी के साथ स्थापित मूल्यों के प्रति विद्रोह की भावना भी पैदा होने लगती है।

तीसरी अवस्था – ‘अनरेवलिंग’ (बिखराव)
यह समाज के बिखरने का कालखंड होता है। इस दौरान सामाजिक व्यवस्था कमजोर होने लगती है, संस्थाओं का विघटन होता है, सामाजिक समूहों के बीच ध्रुवीकरण बढ़ता है और हर प्रकार की अपेक्षाएं टूटने लगती हैं।

चौथा कालखंड – ‘क्राइसिस’ (संकट)
लेखक इसे आपातकाल अथवा संकट का कालखंड कहते हैं। इस दौरान समाज में बड़े पैमाने पर बेचैनी और उथल-पुथल होती है। पुरानी व्यवस्थाएं ढहने लगती हैं और उनके स्थान पर नई व्यवस्था खड़ी करने के प्रयास शुरू होते हैं। यह एक ऐसा कालखंड होता है, जिसमें समाज बड़े बदलावों से गुजरता है।
The Fourth Turning Is Here पुस्तक के लेखक नील होवे ने अमेरिका की वर्तमान स्थिति का जो विश्लेषण किया है, वह हमारे देश में चल रहे आंदोलनों के संदर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण है।

लेखक अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के बारे में कहता है कि कांग्रेस की प्रभावशीलता लगातार सीमित होती जा रही है। इसका कारण यह है कि अमेरिका के दो प्रमुख राजनीतिक दलों ‘डेमोक्रेट’ और ‘रिपब्लिकन’ के बीच आपसी तालमेल बिल्कुल नहीं है। पिछले एक दशक पर नजर डालें तो बहुत कम नए कानून पारित हुए हैं। देश का शासन व्हाइट हाउस से कार्यकारी आदेश जारी करके चलाया जा रहा है। (अर्थात देश का शासन कांग्रेस द्वारा बनाए गए कानूनों के आधार पर नहीं चल रहा है।) राज्यों के स्तर पर जो भी दल सत्ता में आता है, वह विधानमंडल के माध्यम से अपनी इच्छानुसार काम करता रहता है। इसलिए कुछ लोगों को यह चिंता सताने लगी है कि यदि ऐसी स्थिति में कोई गलत दल केंद्र की सत्ता में आ गया, तो क्या होगा?

लेखक का अगला विश्लेषण यह है कि अमेरिका में प्रत्येक चुनाव, चाहे वह स्थानीय स्तर का ही क्यों न हो, राष्ट्रीय चुनाव मान लिया जाता है। (अब हमारे यहां विधान परिषद के चुनावों को लेकर जो चर्चा चल रही है, उसे भी इस संदर्भ में ध्यान में रखना चाहिए।) प्रत्येक राष्ट्रीय चुनाव को जीवन-मरण का प्रश्न बना दिया जाता है। किसी राजनीतिक दल को वोट देने वाले मतदाता कहते हैं कि, “यदि हमने गलत दल को वोट दे दिया, तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।”

आधे लोग कहते हैं कि, “यह संघर्ष सत्य और असत्य के बीच है।” लगभग एक-तिहाई लोगों का कहना है कि, “राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हिंसा करना उचित है।” वहीं, दो-तिहाई लोगों की राय है कि, “भविष्य के चुनाव परिणामों को लेकर हिंसा होना अपरिहार्य है।”
चुनाव परिणाम आने के बाद क्या होता है? लेखक नील होवे कहते हैं कि चुनाव जीतने वाले दल देश के पुनर्निर्माण की रूपरेखा सामने रखते हैं, जबकि पराजित दल के लोग कहते हैं कि, ‘चुनाव में धांधली हुई है, मतदान में गड़बड़ी हुई है।’ इसके बाद वे आंदोलन की तैयारी करने लगते हैं और सरकार का विरोध करने की रणनीति बनाने लगते हैं। सत्ताधारी और पराजित दल एक-दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं। विरोधी दल यह नहीं कहते कि, ‘यह जनता का जनादेश है और हमें स्वीकार है।’ प्रत्येक दल का दावा होता है कि जनमत उसी के साथ है।

लेखक आगे लिखता है कि इस प्रकार की उथल-पुथल और बेचैनी की प्रवृत्ति भले ही अमेरिका के लिए विशेष चिंता का विषय हो, लेकिन यह अस्थायी है और समाप्त हो जाएगी, ऐसा मानना गलत होगा। लेखक आगे कहता है कि इस प्रकार की बेचैनी की लहरें दुनिया के विकासशील और विकसित देशों में भी फैलने लगी हैं। लेखक का मुख्य संदर्भ यूरोप के देशों से है।

आर्थिक असमानता, नई पीढ़ी का सामाजिक समावेशन और उस पर लगने वाली सीमाएं, साथ ही नस्लीय और धार्मिक समूहवाद के लिए सोशल मीडिया का हथियार की तरह इस्तेमाल— ये सभी प्रवृत्तियां बढ़ने लगी हैं। लोग ‘अधिनायकवादी’ शासन की अपेक्षा करने लगे हैं। दक्षिण और मध्य यूरोप के साथ-साथ लैटिन अमेरिका के कुछ देशों में भी लोकप्रियता के दम पर सत्ता में आने वाले शासक दिखाई देने लगे हैं।

लोकतंत्र से संबंधित वैश्विक सर्वेक्षण का निष्कर्ष भी लेखक ने अपनी पुस्तक में दिया है। ‘ग्लोबल डेमोक्रेटिक रिसेशन’ अर्थात ‘लोकतंत्र की वैश्विक गिरावट’ इस सर्वेक्षण का निष्कर्ष है। यह प्रवृत्ति दुनिया के अधिकांश देशों में दिखाई देती है। अमेरिका में नई पीढ़ी के युवाओं में भी यह प्रवृत्ति देखी जा रही है।
इसके समर्थन में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने ‘लोकतंत्र का भविष्य’ विषय पर जो अध्ययन किया, उसका निष्कर्ष इस प्रकार दिया गया है, “हमारे अध्ययन में यह सामने आया कि दुनिया के अधिकांश देशों में नई पीढ़ी लोकतंत्र से बेहद असंतुष्ट है। इस असंतुष्टि के सूचकांक में समृद्ध देशों की नई पीढ़ी सबसे आगे है।”

हमारे देश में भी कुछ लोग ऐसी भाषा बोलने लगे हैं कि, ‘अब फैसले संसद में नहीं होंगे, फैसले सड़कों पर करने पड़ेंगे।’ इसका दूसरा अर्थ यह है कि, ‘लोकतंत्र जाए भाड़ में, हमें अधिनायकवादी शासन चाहिए!’

ऊपर जिन दो पुस्तकों का उल्लेख किया गया है, वे भले ही एक ही विषय पर आधारित हों, लेकिन उनके प्रकाशन के बीच 26 वर्षों का अंतर है। उनका पूरा विश्लेषण सामाजिक परिवर्तन पर आधारित है, इसलिए उनका एक अलग ही महत्त्व है।

दुनिया भर में असंतोष फैलाने और सरकारें बदलने का अभियान चलाने वाला एक समूह भले ही अमेरिका में सक्रिय हो, लेकिन वहां एक दूसरा अध्ययनशील वर्ग भी है, जो अमेरिका की स्थिति को लेकर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। अमेरिका के विश्वविद्यालयों और अकादमिक क्षेत्र में ज्ञान की साधना होती है। यही कारण है कि वहां ज्ञान में वृद्धि करने वाली और विचारों को गति देने वाली पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। अपने विश्वविद्यालयों के बारे में ज्यादा कुछ न लिखना ही बेहतर है!

अमेरिका के सत्ताधारी वर्ग को यह समझना चाहिए कि उसके अपने घर में ही क्या कुछ घटित हो रहा है। लेखक ने अमेरिका के संदर्भ में प्रत्येक कालखंड के प्रभावों का विश्लेषण किया है और यह भी बताया है कि एक ही कालखंड में अगले कालखंड के बीज किस प्रकार मौजूद रहते हैं। इसे समाज की गतिशीलता का एक जैविक विकासक्रम ही कहा जाना चाहिए।

यदि हम अपने देश के संदर्भ में विचार करें, तो स्वतंत्रता के बाद अब आने वाली पीढ़ी को चौथी पीढ़ी माना जाना चाहिए। प्रत्येक पीढ़ी की आशाएं और आकांक्षाएं अलग-अलग होती हैं। अगली पीढ़ी अपने साथ पिछली पीढ़ी की विरासत लेकर आगे बढ़ती है। वर्तमान पीढ़ी को भी पिछली पीढ़ी से एक विरासत मिली है।

उसे ‘संसदीय लोकतंत्र’ की राजनीतिक विरासत मिली है। ‘कानून का शासन’ संवैधानिक विरासत है। ‘सांस्कृतिक एकता’ सांस्कृतिक विरासत है और अपनी जड़ों की खोज, अपनी ‘अस्मिता की खोज’ पिछली पीढ़ी से मिली विरासत है।
अमेरिका में होने वाले सामाजिक परिवर्तनों के प्रमुख आधार राजनीतिक और आर्थिक हैं। उपर्युक्त पुस्तकों के लेखकों ने भी अपनी पुस्तकें मुख्य रूप से राजनीतिक और आर्थिक अवधारणाओं के आसपास ही लिखी हैं।

लेकिन हमारा देश ऐसा नहीं है। हम परंपरा से ‘राजसत्तावादी’ अथवा ‘आर्थिक उपभोगवादी’ नहीं रहे हैं। हमारे अस्तित्व का केंद्रबिंदु वह धर्म है, जो सर्वसमावेशी है और सबका धारण-पोषण करता है।

दिल्ली में जो लोग संघर्ष कर रहे हैं, वे अमेरिकी विचारों से प्रभावित होकर ऐसा कर रहे हैं। उन्हें संघर्ष करने दीजिए। लेकिन वे अमेरिका जैसी उथल-पुथल भारत में नहीं कर सकते क्योंकि हमें यह समझना होगा कि हम ‘हम’ हैं और विदेशी विचारों से पोषित ‘तुम’ हो।

– रमेश पतंगे

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