हाल ही में जापान के राजदूत ने कहा है कि जापान के 80% से अधिक देवी-देवता भारतीय मूल के हैं। इसी तरह दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों कम्बोडिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार, चीन, कोरिया, वियतनाम, मलेशिया और फिलीपींस सहित विश्व के अन्य अनेक देशों में भारत की सांस्कृतिक छाप दिखाई देती है।
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। उसकी विशेषताएं केवल उसकी प्राचीनता में नहीं बल्कि उसकी समन्वयशीलता, सहिष्णुता, मानवतावादी दृष्टिकोण और ज्ञान परम्परा में छिपी हुई हैं। भारत के धर्म, दर्शन, साहित्य, कला, वास्तुशास्त्र, गणित, खगोलशास्त्र, आयुर्वेद, योग, भाषा और व्यापार परम्परा का प्रभाव भारत की सीमाओं के पार भी बड़े पैमाने पर पहुंचा। विशेष रूप से एशिया के अनेक देशों के सामाजिक, धार्मिक, कलात्मक और बौद्धिक जीवन पर भारतीय संस्कृति की उल्लेखनीय छाप दिखाई देती है। भारत के व्यापारी और यात्री बहुत प्राचीन काल में ही भारत की सीमाएं पार करके एशिया के विभिन्न देशों में पहुंच गए थे। इसलिए अनेक देशों की स्थानीय संस्कृति पर भारतीय धर्म और संस्कृति की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसमें एशिया महाद्वीप के विभिन्न देशों का समावेश होता है। भारतीय संस्कृति के विदेशों में प्रभाव को परस्पर आदान-प्रदान से निर्मित सांस्कृतिक प्रवाह के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
दक्षिण-पूर्व एशिया पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव
भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों पर दिखाई देता है। आज के इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाईलैंड, म्यांमार, वियतनाम, मलेशिया और फिलीपींस इन प्रदेशों से भारत के प्राचीन काल से ही व्यापारिक और सांस्कृतिक सम्बंध थे। भारतीय व्यापारी समुद्री मार्ग से इन प्रदेशों में पहुंचे। उनके साथ भारतीय धार्मिक संकल्पनाएं, भाषा, लिपि, साहित्य, कला प्रकार और सामाजिक-सांस्कृतिक रूढ़ियां भी वहां पहुंचीं। स्थानीय समाजों ने इन परम्पराओं को स्वीकार करते हुए उनका स्थानीय संस्कृति के साथ सृजनशील मिश्रण किया।
कम्बोडिया
ईसा की पहली शताब्दी में कौंडिण्य नामक एक ब्राह्मण ने फुनान नामक राज्य स्थापित किया, ऐसा चीनी अभिलेखों से पता चलता है। वहां के स्थानीय लोग अत्यंत पिछड़े हुए थे। उन्हें कपड़े पहनने से लेकर सब कुछ कौंडिण्य ने सिखाया। वहां की सोमा नामक स्थानीय नागवंशीय रानी से उन्होंने विवाह किया। इसके बाद वहां भारतीय संस्कृति का तेजी से प्रसार हुआ। कम्बोडिया देश में उनके वंशजों ने आगे बौद्ध और हिंदू दोनों धर्मों को राजाश्रय दिया। उसके परिणामस्वरूप बयोन, ता फ्रोम, बांते श्राय और अत्यंत भव्य विश्व का सबसे बड़ा मंदिर अंकोरवाट निर्मित हुआ।
बुद्ध, विष्णु, शिव, दुर्गा, लक्ष्मी, गणपति, नाग, इंद्र इत्यादि और अनेक भारतीय देव-देवताओं की उपासना कम्बोडिया में लोकप्रिय थी, यह आज के अवशेषों से सहज समझा जा सकता है। भारतीय कला, स्थापत्य, सामाजिक रूढ़ियों और परम्पराओं का बहुत बड़ा प्रभाव इस देश में देखने को मिलता है। कम्बोडिया का प्रसिद्ध अंकोरवाट मंदिर समूह इस सांस्कृतिक मेलजोल का उल्लेखनीय उदाहरण है। उसकी वास्तु रचना और शिल्पांकन में भारतीय धार्मिक कल्पनाएं, पुराण कथाएं और विश्व रचना की संकल्पनाएं प्रतिबिम्बित होती हैं। रामायण और महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों के प्रसंग भी यहां के कलाविश्व में दिखाई देते हैं।

इंडोनेशिया में भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव
इन्हीं में से एक देश है आज का इंडोनेशिया। 17,504 द्वीपों के समूह वाले इस देश में केवल 6000 द्वीपों पर मानव की बस्ती है। विश्व का सर्वाधिक भूकम्पप्रवण प्रदेश होने की पहचान भी इसकी है। साथ ही आज यह विश्व का सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है, परंतु इसी देश के विभिन्न द्वीपों पर प्राचीन काल में बसे हुए बस्ती के चिह्न, कला-स्थापत्य के अवशेष यत्र-तत्र बिखरे हुए हैं। इन द्वीपों में जावा एक अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीप था, यह आज भी ध्यान में आता है।
प्राचीन जावा ‘यवद्वीप’ नाम से प्रसिद्ध था। वहां काल के प्रवाह में भारतीय संस्कृति का प्रसार अत्यंत बड़े पैमाने पर हुआ। वहां की परम्परा यह बताती है कि ईसा की पहली शताब्दी में ‘अजिसक’ ने अपना राज्य जावा में स्थापित किया। आगे पंद्रहवीं शताब्दी तक वहां भारतीय संस्कृति का प्रसार होता गया। फा-हियान नामक चीनी यात्री ई. स. 418 के आसपास जावा गया। तब वहां उसे हिंदू धर्म का प्रबलता दिखाई दिया। उसके लिखित प्रमाण के अनुसार उस समय बौद्ध धर्म का वहां अधिक प्रसार नहीं हुआ था।
आज के इस देश की सांस्कृतिक विरासत में भारतीय महाकाव्यों की और प्राचीन हिंदू-बौद्ध परम्पराओं की महत्वपूर्ण छाप है। हिंदू धर्म के अनेक मंदिर जावा में पाए जाते हैं। प्रमुख रूप से शिव, विष्णु और ब्रह्मा के मंदिर बनाए गए। शिव, विष्णु और दुर्गा की मूर्तियां भी यहां मिली हैं। बुद्ध की मूर्तियां और स्तूप भी जावा में पाए जाते हैं। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म एक-दूसरे के पूरक रूप में ही यहां फैले थे। रामायण और महाभारत इन महाकाव्यों ने तो जावा में लोकप्रियता का शिखर ही छू लिया था। उन्होंने इंडोनेशिया के साहित्य, नृत्य, नाट्य और लोक परम्पराओं पर गहरा प्रभाव डाला। रामायण और महाभारत के पात्र और कहानियां, खास तौर पर छाया कठपुतली के पारम्परिक रूप ‘वायांग’ में प्रमुखता से दिखाई देती हैं। जावा द्वीप का प्रांबानन मंदिर समूह हिंदू स्थापत्य परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण है, जबकि बोरोबुदूर बौद्ध वास्तुकला का अद्वितीय नमूना है। इन स्मारकों से भारत से गई धार्मिक और कलात्मक संकल्पनाओं का स्थानीय रूपांतरण स्पष्ट होता है।

थाईलैंड और रामकथा का प्रभाव
थाईलैंड में भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव का एक महत्वपूर्ण पहलू रामकथा का स्थानीय रूप है। थाईलैंड की रामाकियन नामक महाकाव्यात्मक परम्परा पर भारतीय रामायण का प्रभाव है तथापि थाई समाज ने इस कथा को अपने सांस्कृतिक संदर्भ के अनुसार स्वतंत्र स्वरूप दिया है। थाईलैंड की राजनीतिक परम्परा, मंदिर कला, नृत्य नाट्य और शिल्पकला में भारतीय धार्मिक और पौराणिक संकल्पनाओं का रूपांतरित स्वरूप दिखाई देता है। इसलिए भारतीय संस्कृति का प्रभाव स्वीकार करते समय स्थानीय संस्कृति ने जो सृजनशील रूपांतरण किया, वह यहां विशेष महत्वपूर्ण है।
श्रीलंका पर भारतीय प्रभाव
भारत और श्रीलंका के बीच सांस्कृतिक सम्बंध अत्यंत प्राचीन हैं। बौद्ध धर्म के प्रसार से दोनों देशों के बीच सम्बंध अधिक दृढ़ हुए। सम्राट अशोक के काल में महेंद्र और संघमित्रा के माध्यम से बौद्ध धर्म श्रीलंका पहुंचा, ऐसा माना जाता है। श्रीलंका के बौद्ध स्थापत्य, स्तूप, विहार, शिल्पकला, पाली साहित्य और धार्मिक परम्पराओं में भारतीय प्रभाव दिखाई देता है। साथ ही रामायण से सम्बंधित अनेक सांस्कृतिक परम्पराएं भी श्रीलंका में प्रचलित हैं।
म्यांमार और बौद्ध धर्म
भारतीय संस्कृति का म्यांमार पर प्रभाव मुख्यतः बौद्ध धर्म के प्रसार से दिखाई देता है। सम्राट अशोक के काल से बौद्ध धर्म के प्रसार को गति मिली और आगे की अनेक शताब्दियों में भारतीय बौद्ध भिक्षुओं और विद्वानों के माध्यम से बौद्ध विचार दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पहुंचा। म्यांमार के बगान प्रदेश के असंख्य बौद्ध मंदिर और स्तूप इस सांस्कृतिक प्रभाव के साक्षी हैं। बौद्ध दर्शन के साथ-साथ पाली भाषा, बौद्ध साहित्य और मठों की शिक्षण परम्परा का प्रभाव भी इस प्रदेश में दिखाई देता है।
मध्य एशिया और बौद्ध विचार
भारतीय संस्कृति का प्रभाव केवल दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तक सीमित नहीं था। मध्य एशिया और चीन तक बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। व्यापार के लिए प्रसिद्ध रेशम मार्ग के विभिन्न केंद्रों से भारतीय भिक्षुओं, व्यापारियों और विद्वानों का सम्पर्क स्थानीय समाजों से हुआ। गांधार और उत्तर-पश्चिम भारत की बौद्ध कला आगे मध्य एशिया में पहुंची। भारतीय बौद्ध साहित्य का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ। इस प्रक्रिया से भारत के दर्शन और धार्मिक विचारों का व्यापक एशियाई बौद्धिक परम्परा पर प्रभाव पड़ा।
चीन में भारतीय ज्ञान परम्परा
भारत और चीन के सांस्कृतिक सम्बंधों में बौद्ध धर्म को मध्यवर्ती स्थान है। फाशियन, श्वानत्सांग (ह्युएन त्संग) और इत्सिंग जैसे चीनी यात्री भारत आए। उन्होंने भारतीय विद्या केंद्रों, बौद्ध विहारों, समाजजीवन और शिक्षण व्यवस्था का वर्णन किया। नालंदा और अन्य विद्या केंद्रों में शिक्षा प्राप्त करके अनेक विदेशी विद्वानों ने भारतीय बौद्ध और तात्विक साहित्य का अध्ययन किया। इन ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ और उससे भारतीय बौद्ध दर्शन का चीन की धार्मिक और बौद्धिक परमपरा पर प्रभाव पड़ा। कुचा, दन हुआंग के शैलगृहों में बहुत बड़े पैमाने पर बौद्ध देव-देवताओं की मूर्तियां और बौद्ध ग्रंथों की हस्तलिखित प्रतियां मिली हैं।
जापान में प्रभाव
सामान्य रूप से ई. स. की छठी शताब्दी तक जापान में शिंतो धर्म का ही प्रभाव था, ऐसा दिखाई देता है, परंतु सामान्य रूप से ई. स. 538 में कोरिया से जापान में बौद्ध धर्म का आगमन हुआ। ई. स. 538 से 710 तक जापान में भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म-देवताओं का प्रभाव प्रमुख रूप से शिंतो धर्म और वज्रयान बौद्ध धर्म के माध्यम से पहुंचा। जापानी संस्कृति में इन हिंदू देवी-देवताओं को अत्यंत आदर का स्थान है और उन्हें ‘तेन’ या ‘कामी’ (देव) कहा जाता है।
जापान में पूजी जाने वाली प्रमुख हिंदू देवताओं की जानकारी निम्नलिखित है।
1. सरस्वती: बेनझायतेन नामक जापान की अत्यंत लोकप्रिय देवी। संगीत, कला, ज्ञान और जल का प्रतिनिधित्व करती है। भारत में सरस्वती देवी के हाथ में जैसी वीणा होती है, वैसे ही बेनझायतेन के हाथ में ‘बिवा’ नामक जापानी वाद्य होता है। कई बार उसके मंदिर जल के निकट होते हैं या मंदिर परिसर में जल की धारा होती है।
2. लक्ष्मी: किश्शॉतेन नामक सौंदर्य, समृद्धि और सौभाग्य की देवी के रूप में पूजी जाती है। उसका अंकन कई बार राजेशाही वस्त्र पहने हुए भी किया जाता है। उसके हाथ में चिंतामणि रत्न होता है।
3. गणेश: कांगितेन नामक गणपति का यह रूप जापान में बाधाएं दूर करने वाला और सफलता देने वाला देवता मानकर पूजा जाता है। अनेक मंदिरों में हाथी के मुख वाली दो मूर्तियां एक-दूसरे का आलिंगन करती हुई रूप में पाई जाती हैं। कांगितेन की पूजा करते समय उसे नैवेद्य के रूप में मोदक, साके और मूली चढ़ाई जाती है।
4. कार्तिकेय: इदातेन इस नाम से प्रसिद्ध यह देवता बौद्ध मठ, रसोईघर का रक्षक देवता तथा देवताओं का तरुण और शूर सेनापति माना जाता है। धावक भी सफलता प्राप्त करने के लिए उसकी पूजा करते हैं।
5. कुबेर: बिषामोनतेन की सम्पत्ति, उत्तर दिशा की रक्षा और युद्ध के देवता के रूप में पूजा होती है। जापान के ‘सात भाग्यशाली देवताओं’ (डर्शींशप र्ङीलज्ञू ॠेवी / डहळलहळर्षीर्ज्ञीक्षळप) में यह एक प्रमुख दैवता है।
6. शिव: दाईकोकुतेन महाकाल (शिव) का रूप है। जापान में इसे खेती, अन्न और सम्पत्ति का देवता माना जाता है।
7. ब्रह्मा: बोंतेन विश्व के निर्माता और बौद्ध धर्म के रक्षक माने जाते हैं।
8. इंद्र: तायशाकुतेन वज्र धारण करने वाले और दिशाओं की रक्षा करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है।
9. यमराज: एन्मा-ओ मृत्यु और न्याय देने वाले देवता के रूप में जापान में पूजा जाता है।
10. गरुड़: करुरा पक्षी और मानव के संयुक्त रूप वाला दैवत अग्नि और रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
इसके अतिरिक्त अनेक बौद्ध देवता भी जापान में महत्वपूर्ण देवताओं के रूप में पूजे जाते हैं। स्वयं गौतम बुद्ध तो अनेक मंदिरों में दिखाई देते ही हैं, पर उनके अतिरिक्त बोधिसत्व पद्मपाणि अवलोकितेश्वर (कान्नोन), मैत्रेय, हारिती जैसी अन्य अनेक बौद्ध देव-देवताएं भी बड़े पैमाने पर मंदिरों में मिलती हैं। जापान की बौद्ध मंदिर परम्परा, बुद्ध प्रतिमाएं, मंडल संकल्पना और कुछ धार्मिक विधियों में भारतीय बौद्ध परम्परा का दूरस्थ प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। भारतीय बौद्ध विचारों का प्रवास अनेक संस्कृतियों से होकर स्थानीय रूप धारण करने वाले सांस्कृतिक प्रसार का उत्तम उदाहरण है।
भारतीय भाषा, साहित्य और लिपियों का प्रभाव
संस्कृत भारतीय ज्ञान परम्परा की एक महत्वपूर्ण भाषा थी। भारतीय व्यापारियों, धार्मिक व्यक्तियों और विद्वानों के सम्पर्क से संस्कृत भाषा और भारतीय लिपि परम्परा का दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न भागों पर प्रभाव पड़ा। अनेक प्राचीन शिलालेखों में संस्कृत का प्रयोग हुआ पाया जाता है। भारतीय ब्राह्मी परम्परा से विकसित हुई लिपियों की विभिन्न शाखाओं का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया की कुछ लिपियों के विकास से सम्बंधित होने का अध्ययनों से पता चलता है।
भारतीय कला और स्थापत्य
भारतीय कला और स्थापत्य परम्परा ने भी अनेक देशों पर प्रभाव डाला। स्तूप, विहार, मंदिर रचना, देवताओं की प्रतिमाएं, पुराण कथाओं पर आधारित शिल्पांकन, कमल, चक्र और अन्य धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग विभिन्न देशों की कलाओं में स्थानीय शैली के साथ एकरूप होकर दिखाई देता है। भारतीय स्थापत्य कल्पनाओं के स्थानीय रूपांतरण के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया में स्वतंत्र और विशिष्ट वास्तुशैलियां निर्मित हुईं। इसलिए यह प्रभाव केवल अनुकरण का नहीं बल्कि सृर्जनशील सांस्कृतिक समन्वय का परिणाम था।
भारतीय संस्कृति की विश्व के अन्य देशों पर पड़ी छाप बहुआयामी है। बौद्ध धर्म का प्रसार, रामायण-महाभारत की कथाएं, संस्कृत भाषा, भारतीय कला और स्थापत्य, गणित, खगोलशास्त्र, योग, आयुर्वेद और दर्शन इन विविध माध्यमों से भारतीय विचार दूर-दूर तक पहुंचा। विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व और पूर्व एशिया की संस्कृतियों में भारतीय प्रभाव के अनेक ठोस प्रमाण आज भी मंदिरों में, शिलालेखों में, साहित्य में, नृत्य-नाट्य परम्पराओं में और धार्मिक आचारों में देखने को मिलते हैं, परंतु इस प्रभाव को केवल भारतीय संस्कृति ने अन्य संस्कृतियों को प्रभावित किया, ऐसे एकांकी दृष्टिकोण से न देखकर, परस्पर सांस्कृतिक संवाद, स्वीकार और प्रादेशिकीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखना अधिक उचित होगा। भारतीय संस्कृति की सच्ची विशिष्ट देन उसके विस्तार में नहीं बल्कि प्रादेशिक विविधता को स्वीकार करके समन्वय साधने की क्षमता में है। इसलिए भारतीय संस्कृति का विश्व संचार केवल भूतकाल का विषय नहीं बल्कि आज के वैश्वीकरण के युग में भी सांस्कृतिक संवाद, सहअस्तित्व और मानवकल्याण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
डॉ. मंजिरी भालेराव

