भारत में सामाजिक सेवा का स्वागत है, धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान है, विदेशी सहयोग का भी स्वागत है, परंतु भारत की सम्प्रभुता, कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं। यही एफसीआरए सुधार का मूल संदेश है। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर रोक के लिए एफसीआरए को जल्द से जल्द लागू करना आवश्यक है।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सामाजिक, धार्मिक और मानवीय संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, किंतु इसके साथ ही संस्थाओं की गतिविधियों में विदेशी धन का बड़ा हिस्सा जब शामिल हो, तब यह आवश्यक हो जाता कि उस धन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए हो रहा है, उसकी निगरानी कौन कर रहा है और कहीं विदेशी आर्थिक प्रभाव देश की नीतियों, सामाजिक ताने-बाने अथवा राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित तो नहीं कर रहा, यह अवश्य देखा जाए।
वास्तव में इसी व्यापक चिंता के बीच केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने विदेशी अंशदान के नियमन को और अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया, जिसे हम सभी ने एफसीआरए में प्रस्तावित और लागू किए जा रहे बदलावों के रूप में देखा। संसद में भी इसकी खूब चर्चा हुई और संसद के बाहर भी एक वर्ग विशेष ने यह स्थापित करने का कार्य किया और अब भी किया जा रहा है कि एफसीआरए में बदलाव अल्पसंख्यक संस्थानों के विरुद्ध है, परंतु इससे जुड़ा सच यही है कि इसे किसी एक समुदाय, संस्था या विचारधारा के चश्मे से देखना यानी इस पूरे विषय को छोटा कर देना होगा।
मोदी सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट है कि भारत में काम करने वाली हर संस्था को भारतीय कानूनों के अनुरूप वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। यही किसी भी सम्प्रभु राष्ट्र की सामान्य प्रशासनिक आवश्यकता है क्योंकि विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) से जुड़े आंकड़े इस बहस को गम्भीर बनाते हैं। उपलब्ध स्रोत के अनुसार 2019 से 2022 के बीच 13,520 पंजीकृत संस्थाओं ने 55,741 करोड़ रुपये की विदेशी धनराशि का उपयोग किया। वहीं 15 जुलाई 2026 तक 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण अनुपालन में बने हुए थे, जबकि 22,498 पंजीकरण रद्द किए जा चुके थे और 15,212 की वैधता समाप्त हो चुकी थी। स्रोत में यह भी उल्लेख है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले वर्ष भारत में आए लगभग 17,000 करोड़ रुपये के विदेशी धन में करीब 3,000 करोड़ रुपये ईसाई संस्थाओं को भेजे जाने की जानकारी दी थी। इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाली हर संस्था संदिग्ध है। हजारों संस्थाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और राहत के क्षेत्र में वास्तविक काम करती हैं, किंतु कई संस्थाएं इसका अनुचित उपयोग भी करती हैं, यह भी सच्चाई है, यही कारण है कि एक मजबूत नियामक व्यवस्था और भी आवश्यक हो जाती है। जहां धन का प्रवाह बड़ा हो, वहां निगरानी भी मजबूत होनी चाहिए। सरकार का उद्देश्य यदि यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन अपने घोषित उद्देश्य के अनुरूप ही खर्च हो तो इसे लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए।
वस्तुत: मोदी सरकार ने बंद कीं वे खिड़कियां, जहां से जवाबदेही कमजोर पड़ती थी। एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 में नवीनीकरण के लिए न्यूनतम निधि सीमा, कड़े प्रकटीकरण प्रावधान और एक ‘नामित प्राधिकरण’ की स्थापना जैसे उपायों का प्रस्ताव है। इसका मूल उद्देश्य उन संस्थाओं के विदेशी अंशदान और परिसम्पत्तियों को नियंत्रित करना है, जिनका एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो गया है, समाप्त हो गया है या जिन संस्थाओं ने अपना पंजीकरण सरेंडर कर दिया है।
यदि किसी संस्था को विदेशी धन प्राप्त करने की अनुमति उसके एफसीआरए पंजीकरण के आधार पर मिली है और बाद में वह पंजीकरण समाप्त या रद्द हो जाता है तो विदेशी धन से अर्जित सम्पत्तियों और संसाधनों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए अन्यथा नियामक व्यवस्था केवल कागज पर रह जाएगी और संस्था का पंजीकरण समाप्त होने के बाद भी संसाधनों के उपयोग पर प्रभावी निगरानी कठिन हो सकती है। सरकार इसी सम्भावित खामी को दूर करने का प्रयास कर रही है।
धर्म और सेवा की आड़ में विदेशी प्रभाव
भारत में धार्मिक स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित है। इसी प्रकार शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में धार्मिक एवं गैर-सरकारी संस्थाओं का योगदान भी महत्वपूर्ण है, किंतु यदि कोई भी संस्था विदेशी धन लेती है तो उससे यह अपेक्षा अनुचित नहीं है कि वह धन के स्रोत, उपयोग और लाभार्थियों का पारदर्शी विवरण उपलब्ध कराए। धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ वित्तीय नियमों से स्वतंत्रता नहीं हो सकता।
विरोध के बीच भी सरकार का दृष्टिकोण क्यों महत्वपूर्ण है
एफसीआरए संशोधन का विरोध करने वाले कुछ ईसाई संगठनों और नेताओं ने इसे अल्पसंख्यक संस्थाओं के अधिकारों पर हमला बताया है। सीबीसीआई, एनसीसीआई, सीएसआई तथा अन्य संस्थाओं की आपत्तियां खुलकर सामने आ चुकी हैं। इन संस्थाओं की मुख्य चिंता विदेशी धन से बनी सम्पत्तियों और पंजीकरण समाप्त होने के बाद सरकारी नियंत्रण से जुड़ी है। बेशक लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है और सरकार को आलोचनाओं को सुनना भी चाहिए, किंतु किसी कानून का विरोध होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि कानून गलत है। हर बड़े प्रशासनिक सुधार के सामने हितों का टकराव और आशंकाएं स्वाभाविक हैं।
एफसीआरए की बहस को प्राय: अल्पसंख्यक अधिकारों और सरकारी नियंत्रण के बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि ऐसा है नहीं। यदि किसी संस्था का काम पूरी तरह वैध है, विदेशी धन का स्रोत स्पष्ट है, खर्च घोषित उद्देश्य के अनुरूप है और लेखा-जोखा नियमों के अनुसार है तो मजबूत निगरानी उसके लिए बाधा कहां है?
विदेशी दबाव पर भारत का स्पष्ट संदेश
एफसीआरए को लेकर अमेरिका से भी आलोचना सामने आई। अमेरिकी कांग्रेस सदस्य रिले एम. मूर ने भारतीय संशोधनों पर आपत्ति जताई और इसे धार्मिक संस्थाओं के विरुद्ध कार्रवाई बताया। इसके उत्तर में भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि एफसीआरए भारत का आंतरिक सम्प्रभु विषय है और अमेरिका समेत अनेक देश विदेशी वित्तपोषण पर कठोर नियंत्रण रखते हैं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजीकरण रद्द होने या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी वित्तपोषित सम्पत्तियों के प्रबंधन के लिए प्रस्तावित व्यवस्था में पूजा स्थलों के मूल धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने का प्रावधान है।
उत्तरदायित्व से किसी को डर क्यों?
किसी भी लोकतंत्र में सरकार से उत्तर मांगना नागरिक अधिकार है। वहीं, सरकार को भी संस्थाओं से उत्तर मांगने का अधिकार है। विदेशी धन प्राप्त करने वाली संस्था से यह पूछना कि पैसा कहां से आया, कितना आया, कहां खर्च हुआ और उससे कौन-सी परिसम्पत्ति बनी, इसे दमन नहीं कहा जा सकता। मोदी सरकार का एफसीआरए सुधार इसी सोच को मजबूत करता दिखाई देता है कि विदेशी धन भारत में आए तो वह भारत के कानून के अंतर्गत आए, भारतीय संस्थाओं द्वारा घोषित उद्देश्य पर खर्च हो और उसका हिसाब भारतीय नियामक संस्थाओं को दिया जाए। यह व्यवस्था किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए आवश्यक है।
राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर रोक के लिए वित्तीय निगरानी आवश्यक
हमारे यहां कहा भी गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा आधुनिक समय में आर्थिक नेटवर्क, डिजिटल प्रचार, विदेशी वित्तपोषण और सामाजिक प्रभाव भी सुरक्षा के महत्वपूर्ण आयाम हैं। यदि विदेशी वित्तीय स्रोतों का उपयोग अवैध गतिविधियों, हिंसक नेटवर्क, जबरन या धोखाधड़ीपूर्ण धर्मांतरण, राजनीतिक हस्तक्षेप या सामाजिक तनाव पैदा करने वाले अभियानों के लिए होता है तो सरकार को कार्रवाई करनी ही होगी। इस संदर्भ में एफसीआरए केवल वित्तीय कानून नहीं रह जाता, यह राष्ट्रीय सुरक्षा की व्यापक संरचना का हिस्सा बन जाता है।
संदेश साफ है, भारत में पैसा भारत के नियमों से आएगा
भारत विदेशी निवेश और विदेशी सहयोग का विरोध नहीं करता, किंतु विदेशी धन के माध्यम से भारत की आंतरिक व्यवस्था को प्रभावित करने की किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं कर सकता। नरेंद्र मोदी सरकार ने इसी सिद्धांत को मजबूत करने का प्रयास किया है। सरकार का संदेश स्पष्ट है कि विदेशी स्रोत से आने वाला प्रत्येक रुपया उत्तरदायित्व के दायरे में होगा और किसी संस्था की सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक पहचान उसे वित्तीय नियमों से ऊपर नहीं रख सकती।
यही व्यवस्था लम्बे समय में उन संस्थाओं के हित में भी है जो वास्तव में सेवा और जनकल्याण के लिए काम कर रही हैं। पारदर्शिता बढ़ेगी तो संदेह कम होंगे और वास्तविक संस्थाओं की विश्वसनीयता बढ़ेगी। आज जब दुनिया में आर्थिक शक्ति के साथ-साथ सूचना और वित्तीय प्रभाव भी रणनीतिक हथियार बन चुके हैं, तब भारत का अपने वित्तीय तंत्र को सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता है। मोदी सरकार द्वारा एफसीआरए व्यवस्था को मजबूत करना इसी व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण का हिस्सा है। विदेशी धन का प्रवाह जितना बड़ा होगा, उसकी निगरानी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। राष्ट्रीय हित के सामने किसी संस्था, समूह या विदेशी दबाव को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।
फिलहाल हम प्रतीक्षा करें, 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से प्राप्त होनेवाले सुझावों का क्योंकि जो भी नया कानून बनना है, वह जेपीसी से प्राप्त सुधारों के आधार पर ही भविष्य में साकार रूप ले पाएगा। कुल मिलाकर विदेशी धन से जुड़ा ये सुधार बहुत आवश्यक है, जिसे हर हाल में होना ही चाहिए।
डॉ. मयंक चतुर्वेदी

