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यह बात स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि सरकारों के भरोसे गांवों का विकास नहीं हो सकता है। विकास के कुछ बड़े काम तो सरकार ही कर सकती है, लेकिन कुछ गतिविधियों के लिए समाज को ही उठ कर खड़ा होना होगा। यदि गांव में जन्मे और शहरों में नौकरी अथवा व्यवसाय करने वाले लोग इसमें सहभागी होते हैं तो एक सकारात्मक बदलाव देखने के लिए एक दशक नहीं बल्कि कुछ ही साल चाहिए। ‘मेरा गांव मेरा तीर्थ’ माने तो बहुत परिवर्तन आएंगे।
श्रीमती ऊषा सैनी दिल्ली के लक्ष्मीनगर में रहने वाली एक मध्यमवर्गीय गृहणी हैं। पति एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी करते हैं। उनकी आमदनी से परिवार का मुश्किल से ही गुजारा हो पाता है। दो बच्चों की पढ़ाई और रसोई के खर्च के बाद महीने के आखिरी सप्ताह में बीमार हेतु दवा खरीदने के पैसे भी नहीं बचते। वैसे ये हरेक मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी है। लेकिन इसके बावजूद उषा सैनी अन्य मध्यमवर्गीय गृहणियों से अलग हैं। एक बात जो उन्हें सबसे अलग करती है वह है उनके द्वारा अपने परिवार की सीमित आमदनी के बावजूद पिछले तीन साल में अपने गांव की १३० महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने का प्रेरक प्रयोग। इन १३० महिलाओं में से ४० से अधिक महिलाएं अब उद्यमी हैं जो अपने साथ अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। गांव की ये महिलाएं पहले अपने परिवार की कम आय के कारण न बच्चों को ठीक से पढ़ा पाती थीं और न ही उन्हें पोषणयुक्त भोजन उपलब्ध करा सकती थीं, परन्तु वे आज अपने पूरे परिवार का सहारा बन हुई हैं।
उषा सैनी ने १५ जुलाई, २०१३ को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित अपने मायके पटनी में एक सिलाई प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया। अभी तक वे १३० महिलाओं को प्रशिक्षण प्रदान कर चुकी हैं जिनमें से ११० महिलाएं प्रतिदिन कम से कम २५० रुपए कमा लेती हैं। वे बताती हैं, ‘‘एक सामान्य महिला की सूट की सिलाई गांव में २५० रुपए है। एक दिन में यदि एक महिला एक लेडीज़ सूट तैयार करती है तो २५० रुपए और यदि दो सूट तैयार करती है तो ५०० रुपए आसानी से कमा लेती है। कुछ महिलाएं तीन सूट सिलकर ७५० रूपये तक कमा लेती हैं। ये महिलाएं पेशेवर टेलर की तरह काम करती हैं क्योंकि उन्हें पावर की मशीनों पर काम करने का प्रशिक्षण दिया गया है।’’
श्रीमती सैनी का यह प्रयोग गांव की महिलाओं ने इसलिए हाथों-हाथ लिया, क्योंकि खेत में दिनभर मजदूरी करने के बाद एक व्यक्ति को मुश्किल से २५० रूपये ही मिलते हैं और शाम को मजदूरी करने के बाद वह राशि भी मिल जाएगी इसकी कोई गारंटी नहीं होती, क्योंकि मजदूरी देने वाले किसानों की आर्थिक हालत भी खराब ही रहती है। ऐसी स्थिति में यदि घर की महिला रोज २५० से ५०० रूपये स्वाभिमानपूर्वक कमा लेती है तो यह परिवार के लिए लाटरी लगने जैसा है। उषा सैनी का गांव पटनी सहारनपुर नगर से करीब १२ किमी दूर है और सहारनपुर में थोक कपड़े और रेडीमेड गारमेंट्स का काम बहुत तेजी से बढ़ा है। इसलिए इन महिलाओं के लिए काम की कोई कमी नहीं है। कुछ महिलाओं ने आसपास के सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की वर्दी सिलनी शुरू की है। इसलिए एक प्रशिक्षित महिला जितना चाहे उतना काम कर सकती है।
जब हाथ में पैसा आता है तो स्वाभिमान का जागरण अपने-आप होता है। यही कारण है कि शराब जैसी सामाजिक बुराइयों से ग्रस्त परिवारों की महिलाएं ही नहीं, बल्कि गांव की स्नातक एवं स्नातकोत्तर बालिकाएं भी सिलाई सीख कर अपने परिवारों को संबल प्रदान कर रही हैं। इस केन्द्र पर अब आसपास के आठ गांव की महिलाएं प्रतिदिन कई किमी पैदल चल कर सिलाई सीखने आती हैं। स्वाभिमान के भाव को लेकर भी श्रीमती सैनी की अपनी सोच है। वे कहती हैं, ‘‘जन्म से लेकर मृत्यु तक एक महिला का हाथ हमेशा परिवार के अन्य सदस्यों के समक्ष पैसे लेने के लिए ही उठता है। जब वह बच्ची होती है तो पिता से, विवाह के पश्चात् पति से और वृद्धावस्था में बच्चों से वह पैसे मांगती है। मैं चाहती हूं कि परिवार की महिला का हाथ अब पैसे लेने के लिए नहीं, बल्कि देने के लिए उठे।’’
अभी तक जिन महिलाओं को श्रीमती सैनी ने सिलाई सिखाई है उनका हाथ तो अब कम से कम परिवार के अन्य सदस्यों को पैसे देने के लिए उठने ही लगा है। इस दृष्टि से उनका यह प्रयोग सफल कहा जा सकता है। लेकिन उनके इस प्रयोग की सफलता के दूसरे मायने भी हैं। उन्होंने यह प्रयोग अपने जन्मस्थान यानि अपने मायके में शुरू किया है और सिलाई केन्द्र भी अपने दिवंगत माता-पिता के नाम से प्रारंभ किया है। सामान्यत: विवाह के पश्चात महिलाओं का अपने मायके से लगाव नहीं रहता लेकिन श्रीमती सैनी ने इस मिथक को भी तोड़ा है। साथ ही इस सोच को बल प्रदान दिया है कि विवाह के पश्चात् भी एक बेटी अपने मां-बाप का नाम रोशन कर सकती है।
श्रीमती सैनी के इस प्रयोग से पहले दर्जनों बार सरकारी सहायता से इस प्रकार के केन्द्र शुरू हुए। लेकिन गांव में एक भी महिला ऐसी नहीं है जो सरकारी केन्द्र से सिलाई सीख सकी हो। इसका कारण हम सभी जानते हैं। सरकारी योजनाओं का पैसा जमीन पर कम और फाइलों में अधिक खर्च होता है। यह पूरे देश की समस्या है। इसलिए पटनी गांव में भी ऐसा ही हुआ। आज यदि आजादी के करीब सात दशक बाद और पंचवर्षीय योजनाओं में भारी भरकम राशि ग्राम विकास पर खर्च करने के बाद भी हमारे गांवों का विकास नहीं हो सका है तो इसका कारण सरकारी पैसे की यही बंदरबांट है। इसलिए यह बात स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि सरकारों के भरोसे गांवों का विकास नहीं हो सकता है। विकास के कुछ बड़े काम तो सरकार ही कर सकती है, लेकिन कुछ गतिविधियों के लिए समाज को ही उठ कर खड़ा होना होगा।
आगे बढ़ने से पहले दो तथ्यों पर गौर करते हैं। देश में इस समय कुल ६,४९,४८१ गांव हैं। वर्ष २०११ की जनगणणा के अनुसार देश की कुल १२१ करोड़ आबादी में से ८३.३ करोड़ लोग गांव में रहते हैं और ३७.७ करोड़ लोग छोटे-बड़े शहरों में रहते हैं। यदि प्रतिशत की बात करें तो ६८.८४ प्रतिशत लोग गांव में रहते हैं और ३१.१६ प्रतिशत लोग शहरों में। २०११ की जनगणणा के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि आजादी के बाद पहली बार गांवों की तुलना में शहरों में जनसंख्या अधिक बढ़ी। २००१ की जनगणणा में शहरीकरण का प्रतिशत २७.८१ था जो २०११ में बढ़ कर ३१.१६ प्रतिशत हो गया। २००१ में गांव में रहने वाली जनसंख्या का प्रतिशत ७२.१९ था जो २०११ में घट कर ६८.८४ प्रतिशत रह गया। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ रहा है, जिसे कोई सरकार रोकने की स्थिति में नहीं है।
दूसरा गौर करने लायक तथ्य यह है कि शहरों में रहने वाले ८० प्रतिशत से अधिक लोग किसी न किसी गांव के रहने वाले हैं। कोई व्यवसाय करता है तो कोई नौकरी अथवा छोटा-मोटा रोजगार। इनमें से अधिसंख्य लोग आज भी किसी न किसी रूप में अपने गांव से जुड़े हुए हैं। कुछ तो साल में कई-कई बार अपने गांव जाते हैं। कुछ साल-दो साल में एक बार और कुछ प्रसंगवश अपने गांव जाते हैं। जब भी वे गांव जाते हैं तो सुविधाओं की कमी के कारण सरकार को कोसते हुए शहर वापस आ जाते हैं। लेकिन उनमें से कभी कोई यह सोचने का प्रयास नहीं करता कि जिस गांव में जन्म लेकर और जहां शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करके वे शहर में व्यवसाय अथवा नौकरी करने लायक हुए हैं, अपने पूर्वजों के उस गांव के प्रति क्या उनका कोई दायित्व नहीं है? उसके विकास में क्या उनकी कोई भूमिका नहीं है? कुछ लोग यदि कभी-कभार सोचने का प्रयास करते भी हैं तो उन्हें यह समझ में नहीं आता कि आखिर वे कर क्या सकते हैं। उन्हें लगता है कि ग्राम विकास की कोई भी गतिविधि शुरू करने और उसे जारी रखने के लिए बहुत पैसा चाहिए।
ऐसे सभी लोगों के लिए श्रीमती उषा सैनी एक उदाहरण हैं। वे बताती हैं, ‘‘हमारे सिलाई केन्द्र का मासिक खर्च महज तीन हजार रूपये है। २५०० रूपये हम सिलाई प्रशिक्षिका को देते हैं और औसतन पांच सौ रूपये सेंटर की देखरेख एवं मशीनों की देखभाल पर खर्च होता है। इस समय २५ महिलाएं हमारे पास सिलाई सीखने आ रही हैं। उनसे हम १०० रूपये महीना शुल्क लेते हैं। हालांकि सभी महिलाएं पूरा शुल्क नहीं दे पातीं, लेकिन फिर भी औसतन २००० रूपये प्रतिमाह शुल्क से प्राप्त हो जाते हैं। कुल मिलाकर हमें करीब १००० रूपये प्रतिमाह की राशि जुटानी होती है।’’ एक महीने में १००० रूपये अपने गांव के लिए खर्च करना उन लोगों के लिए मुश्किल नहीं है जो लाखों रूपये हर साल पिकनिक, तीर्थयात्रा अथवा पारिवारिक उत्सवों पर खर्च करते हैं। सेंटर शुरू करने के लिए भी १० से लेकर १५,००० से अधिक राशि नहीं चाहिए। सिलाई और इस जैसी गतिविधियां ग्राम विकास का इसलिए महत्वपूर्ण आधार हो सकती हैं क्योंकि इनसे परिवार की वे महिलाएं स्वाभिमानपूर्वक पैसे कमाने लायक बन जाती हैं जो इस समय परिवार की आय वृद्धि में चाह कर भी सहयोग नहीं कर पातीं। यदि हम परिवार की आमदनी बढ़ाने में मदद कर दें तो बाकी विकास परिवार स्वयं कर लेता है। परिवार का विकास होगा तो गांव का विकास अपने आप होगा।
परन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि शहरों में रहने वाले गांव के लोगों को अपने-अपने गांव के विकास में सहभागी बनने के लिए प्रेरित कैसे किया जाए? ऐसे सभी लोगों के लिए श्रीमती उषा सैनी एक प्रेरणा हैंै। और श्रीमती उषा सैनी की प्रेरणा हैं दिल्ली के व्यवसायी श्री श्रवण गोयल। श्री गोयल ने इस सोच को सबसे पहले हरियाणा के करनाल जिले में स्थित अपने पैतृक गांव जलमाना में मूर्त रूप प्रदान किया। १९९७ में उन्होंने वहां एक विद्यालय शुरू किया और १९९८ में एक सिलाई प्रशिक्षण केंद्र। अपने इस प्रयोग को उन्होंने नाम दिया ‘मेरा गांव मेरा तीर्थ’। इस पूरी सोच को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं, ‘‘शहरों में रहने वाले अधिकतर लोग किसी न किसी गांव के रहने वाले हैं। वे हर साल पिकनिक, तीर्थ यात्रा अथवा छोटे मोटे उत्सवों पर काफी पैसा खर्च करते हैं। तीर्थयात्रा के दौरान वे मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते हैं। कितना अच्छा हो कि वे वर्ष में एक-दो बार अपने गांव को भी एक तीर्थ मानकर वहां जाएं और उसके विकास में सहभागी बनें।’’
इस विचार को संस्थागत रूप प्रदान करते हुए श्री गोयल ने १९९५ में ‘गंगा सेवा संस्था’ की स्थापना की, जिससे पे्ररित होकर आज सात राज्यों-हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, ओड़िशा और उत्तर प्रदेश में सिलाई एवं कम्प्यूटर प्रशिक्षण के २२ प्रकल्प चल रहे हैं। इन प्रकल्पों का संचालन करने वाले कुछ लोग तो ऐसे हैं जो करीब सौ साल बाद अपने गांव से फिर से जुड़ सके। ऐसे ही दिल्ली के एक व्यवसायी हैं श्री संजय गुप्ता। उनका परिवार हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में स्थित अपने पैतृक गांव सलूनी से सौ वर्ष बाद जुड़ा। श्री गुप्ता बताते हैं, ‘‘हमारे पूर्वज व्यवसाय के सिलसिले में १९१४ में दिल्ली आए थे। तब से परिवार का कोई सदस्य अपनी संपत्ति पैतृक को देखने भी गांव नहीं गया। लेकिन २०१३ में उसी गांव में सिलाई प्रशिक्षण केंद्र के माध्यम से हम अपने गांव के विकास में सहभागी बन सके हैं।’’
इसी प्रकार श्री अद्वैत गणनायक एक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मूर्तिकार हैं। उन्होंने ओड़िशा के ढेंकनाल जिले में स्थित अपने गांव न्यूलापोयी में वर्ष २०१२ में ऐसा ही एक सिलाई केन्द्र शुरू किया और अब तक वे ७० से अधिक महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी बना चुके हैं। श्री निर्देश सैनी बंगलौर स्थित विश्वप्रसिद्ध संगणक कंपनी एचपी में बड़े पद पर कार्यरत हैं। पिछले साल २०१५ में उन्होंने भी सहारनपुर जिले में स्थित अपने पैतृक गांव बादशाहपुर में ऐसा ही प्रकल्प शुरू किया है।
श्रीमती सरोज गुप्ता दिल्ली में एक योग प्रशिक्षिका हैं। उनके पति का परिवार भी लगभग सौ साल बाद अपने पूर्वजों के गांव से जुड़ पाया। हरियाणा के झज्जर जिले में स्थित बिलोचपुरा गांव में उन्होंने एक सिलाई प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया है। दिल्ली में चार्टर्ड एकाउंटेंट श्री अनिल गुप्ता ने हिमाचल प्रदेश स्थित अपने ननिहाल सुजानपुर टिहरा में कम्प्यूटर प्रशिक्षण और सिलाई प्रशिक्षण २०११ में शुरू किया। अब तक वे ३५० से अधिक बालिकाओं को सिलाई एवं ४०० से अधिक युवाओं एवं बुजुर्गों को कम्प्यूटर प्रशिक्षण प्रदान कर चुके हैं। ऐसे लोगों की सूची काफी लंबी है जिन्होंने अपने-अपने गांव के विकास में सहभागी बनने का निर्णय लेकर कोई न कोई प्रयोग शुरू किया है। ऐसे प्रयोगों का असर अब दिखने लगा है। ऐसे ही कुछ प्रयोग उत्तराखंड में भी शुरू हुए हैं जहां ‘प्रवासी पंचायत’ के माध्यम से देशभर में रहने वाले पहाड़ के लोगों को उत्तराखंड के विकास में सहभागी बनने के लिए प्रेरित किया जाता है। पिछले कुछ साल से ऐसी प्रवासी पंचायतें मुंबई एवं दिल्ली जैसे महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक में आयोजित की जाती हैं। इसके माध्यम से उत्तराखंड के दर्जनों गांवों में विकास के प्रकल्प शुरू हुए हैं।
शहरों में रहने वाले गांव के लोगों को अपने-अपने गांव के विकास में सहभागी की प्रेरणा को बल प्रदान करने में बहुत से महानुभावों का योगदान है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सेवा प्रमुख रहते हुए श्री सीताराम केदिलाय ने इस प्रयोग में लगे सभी लोगों को सतत प्रेरित किया। हालांकि इस समय वे गांव और ग्रामवासियों को अपना विकास स्वयं करने के लिए प्रेरित करते हुए पैदल भारत परिक्रमा कर रहे हैं, लेकिन अभी भी दूरभाष के माध्यम से वे ऐसे सभी कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने का समय निकाल ही लेते हैं। संघ के वर्तमान अखिल भारतीय ग्राम विकास प्रमुख डॉ. दिनेशजी भी इस सोच को आधार मानकर काम कर रहे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाते रहते हैं। ११ अप्रैल, २०१६ को संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने ऐसे प्रयोगों को बढ़ावा देने के लिए समर्पित गंगा सेवा संस्था के दिल्ली में आयोजित पांचवें वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘आज जब सफल लोग अपने मूल गांव का परिचय देते हुए भी हिचकिचाहट महसूस करते हैं, ऐसे में उन्हें अपने गांव के विकास में सहभागी बनने की प्रेरणा देना प्रशंसनीय प्रयास है।’’
देश के सभी ६,४९,४८१ गांव पिछड़े नहीं हैं। लेकिन जो पिछड़े हैं उनका विकास केवल सरकार के भरोसे नहीं हो सकता। इसके लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है। यदि गांव में जन्मे और शहरों में नौकरी अथवा व्यवसाय करने वाले लोग इसमें सहभागी होते हैं तो एक सकारात्मक बदलाव देखने के लिए एक दशक नहीं बल्कि कुछ ही साल चाहिए। भारत सरकार ने सांसद आदर्श ग्राम योजना शुरू की है लेकिन यकीन मानिए उसके माध्यम से गांव का विकास नहीं होने वाला है। पिछले दो साल का अनुभव तो यही बताता है। प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने देश में ‘स्वच्छता’ और ’बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों के लिए देशवासियों का आहवान किया तो पूरा देश खड़ा हो गया। यदि मोदीजी शहरों में रहने वाले ग्रामवासियों से अपने-अपने गांव के विकास में सहभागी बनने का आहवान करते हैं तो देश एक बड़े परिवर्तन का साक्षी बन सकता है। दुनिया के सभी विकासशील देशों के लिए भी यह एक उदाहरण बन सकता है।

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