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जनवरी माह से शुरू होने वाले नए वर्ष में सब से पहले आनेवाला त्यौहार होता है मकर संक्रमण। संक्रमण शब्द का अर्थ है परिवर्तन, आगे बढ़ना या अपनी स्थिति बदलना। और अगर साल की शुरुआत ही परिवर्तन से हो तो स्वाभाविक है कि यह दौर साल के अंत तक चलता है। विगत वर्ष अर्थात सन २०१६ में भी भारत में परिवर्तन हुए; पिछले वर्षों की तुलना में कुछ अधिक ही हुए। ये परिवर्तन कभी सकारात्मक थे तो कभी नकारात्मक; कभी खुशी की लहर दौड़ाने वाले रहे तो कभी दुख का साया फैलाने वाले; परंतु इन सभी ने भारतीय समाज को निरंतर गतिमान रखा। दूसरे शब्दों में हम कहें तो वर्ष २०१६ ‘वाइब्रंट’ रहा।
गत वर्ष की शुरुआत ही पठानकोट हमले जैसी दिल दहला देने वाली घटना से हुई थी। आतंकवादियों की हिम्मत इतनी बढ़ गई थी कि उन्होंने पठानकोट एयरबेस रूपी भारतीय सेना के महत्वपूर्ण ठिकाने पर हमला कर दिया था। आतंकवादी आए, उन्होंने हमला किया, हमारे सैनिकों को मारा, सामान को क्षति पहुंचाई परंतु हम कुछ नहीं कर पाए। लोगों का दिल गुस्से से भर गया था। सभी लोग प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की ओर आशाभरी नजरों से देख रहे थे कि जिस तरह उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान एक भारतीय सैनिक के बदले चार पाकिस्तानी सैनिक या आतंकवादियों को मारने की घोषणा की थी, उसी तरह वे कुछ एक्शन भी लेंगे। परंतु प्रधान मंत्री ने ऐसा कुछ नहीं किया। धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ गया।
समाज अपनी सामान्य गति से चल ही रहा था कि अचानक रोहित वेमुला की आत्महत्या की खबर आ गई। हैदराबाद के इस पीएच.डी. छात्र की आत्महत्या को इस कदर राजनैतिक रंग में रंगा गया कि यूनीवर्सिटी के कुलपति, हैदराबाद के सांसद बंडारू दत्तात्रेय, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी तथा समस्त केंद्र सरकार दलित विरोधी नजर आने लगे। परंतु यह रंग ज्यादा देर तक चढ़ा नहीं रहा। जब इस मामले की परतें खुलने लगीं तो धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि वह तथाकथित मासूम रोहित वेमुला असल में देशद्रोही मानसिकता का है। रोहित वेमुला उन श्रद्धांजलि सभाओं में शामिल हुआ था जो १९९३ में हुए मुंबई बम विस्फोटों के दोषी याकूब मेेमन के लिए आयोजित की गई थीं।
देशद्रोही मानसिकता के रोहित की आत्महत्या को दलित हत्या का स्वरूप देने की कोशिशें करने वाले वामपंथी और मोदी विरोधक रोहित के नाम पर जगह-जगह आंदोलन करवा ही रहे थे कि एक ओर सभा और उसमें लगाए जा रहे नारों ने देशवासियों का ध्यान अपनी ओर खींचा। ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह’ के नारे देश की उस यूनीवर्सिटी से आ रहे थे जिसे भारत में विचारक और प्रज्ञावान लोग बनाने की फैक्टरी कहा जाता है। और अगर यह यूनीवर्सिटी कन्हैया कुमार जैसे काले पत्थर का निर्माण कर रही है जो एक आतंकवादी का समर्थन करता हो और देश के टुकड़े होने के सपने देखता हो तो वह यूनीवर्सिटी, वहां के शिक्षक, प्रशासन और छात्रों सभी पर प्रश्नचिह्न लगना ही है।
एक ओर जहां देश में इतना नकारात्मक वातावरण था वहीं सदैव हमारी रक्षा के लिए तैनात रहने वाली हमारी सेना का एक जवान हनुमंथप्पा सियाचीन में शून्य से ५० डिग्री नीचे के तापमान में बर्फीले गड्ढे में दबे हुए अपने प्राण बचने की उम्मीद लगाए बैठा था कि वहां से सही सलामत निकल कर फिर मातृभूमि की सेवा के लिए तत्पर हो सकें। जिसने भी यह खबर सुनी वह भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि किसी तरह हनुमंथप्पा के प्राण बच जाए। देशद्रोही घटनाओं के बाद सारा देश देशप्रेम और कर्तव्यपूर्ति की भावना से लड़ने वाले जवान की मंगलकामना में डूब गया था। परंतु यह जाबांज जवान अपना जीवन युद्ध नहीं जीत सका।
इसके बाद कुछ दिन तक जनता यह सुुनने को तत्पर थी कि डेविड हेडली क्या कहता है। पूछताछ के दौरान वह और कितने लोगों के नाम लेता है। गौरतलब है कि डेविड हेडली पाकिस्तानी मूल का अमेरिकी निवासी है जिसके सम्बंध लश्कर-ए-तैयबा से हैं। हेविड हेडली पर सन २००८ में हुए मुंबई हमलों का भी आरोप है। इस दौरान इशरत जहां के बारे में कुछ तथ्य सामने आए जिनसे यह साबित हुआ कि वह निर्दोष नहीं बल्कि आतंकवादी गातिविधियों में लिप्त थी। उसके एनकाउंटर में मारे जाने के बाद जिन राजनैतिक, सामाजिक व्यक्तियों और मानवाधिकार का आडंबर रचाने वालों ने मगरमच्छ के आंसू बहाए थे; उनकी कलई भी खुल गई।
एक के बाद एक घटनाओं का सच सामने आने के कारण जनता यह महसूस कर रही थी कि देर से ही सही परंतु सच सामने आ रहा है। और अचानक पनामा पेपर्स नामक एक ऐसा सच सामने आया जिसमें दुनिया केसभी क्षेत्रों की बड़ी-बड़ी हस्तियों का नाम शामिल था। बेनजीर भुट्टो, फुटबॉल खिलाड़ी मेस्सी, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय आदि कई लोगों के नाम पनामा पेपर्स की सूची में शामिल थे। हालांकि भारतीय जनसामान्य पर होने वाले असर के हिसाब से इसका समय बहुत कम रहा परंतु वैश्विक शोध पत्रकारिता के क्षेत्र में इसने नए पैमाने गढ़ दिए।
सन २०१४ में मोदी सरकार आने के बाद से यूपीए सरकार में हुए तमाम घोटाले धीरे-धीरे बाहर आएंगे यह आशा सभी को थी। अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के सामने आने के बाद यह आशा और भी प्रखर हो गई। रक्षा सामग्री पर होने वाले खर्चों, उनमें किए जाने वाले घोटालों की शुरुआत तो बोफोर्स कांड से हो चुकी थी। अगस्ता कांड ने इसमें एक और अध्याय जोड़ दिया। केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को प्रधान मंत्री ने अपने केबिनेट में शामिल ही इसलिए किया था जिससे वे देश की आंतरिक और बाहरी दोनों ओर से रक्षा कर सकें और पर्रिकर इस कसौटी पर खरे उतरते नजर भी आ रहे हैं। पूर्व वायुसेना अध्यक्ष एस.पी.त्यागी, यूपीए कार्यकाल में रक्षा मंत्री रहे एंटनी, तथा कई अन्य कांग्रेसी नेताओं के नाम इस घोटाले में शामिल हैं। अगस्ता वैस्टलैंड घोटाले ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के इटली प्रेम के भी कई तार छेड़ दिए थे।
विगत दो सालों में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश प्रवास पर उनके हर विरोधक ने निशाना साधा था। देश के आंतरिक प्रश्नों को छोड़ कर विदेश जाने का आरोप लगाया था। परंतु चाबहार डील ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं और सभी देशों से भारत के सम्बंधों को सुधारने तथा मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों के सुपरिणाम दे दिए। चाबहार समझौता करके प्रधान मंत्री मोदी ने पाकिस्तान और चीन दोनों देशों पर एक साथ निशाना साधा है। ग्वादर बंदरगाह पर अपना मिलाजुला अधिकार स्थापित कर दोनों देश भारत के विदेश व्यापार और सुरक्षा में बाधा डालने की कोशिशें कर रहे थे; परंतु चाबहार समझौते को सफल कर भारत ने न सिर्फ इस कोशिश को असफल कर दिया वरन् खाड़ी देशों से मित्रता भी कर ली।
जून २०१६ में भारत ने पीएसएलवी का सफल परीक्षण किया। इसरो ने अपने इस अभियान के तहत एक साथ २० सेटेलाइट लांच करने का रिकॉर्ड बनाया।
२०१६ के पहले छह महीने मिश्रित अनुभवों भरे रहे; परंतु बाद के छह महीने सकारात्मकता और खुशी देनेवाले ही रहे।
जुलाई माह में भारतीय सेना ने बुरहान वानी को मार दिया जो कश्मीरी मिलिटेंट ग्रुप का कमांडर था। इसके साथ ही इसके अन्य ७ साथी आतंकवादियों को भी सेना ने खत्म कर दिया था। इसके बाद जम्मू कश्मीर में स्थिति बहुत तनावपूर्ण हो गई थी। सेना तथा सीमा सुरक्षा बलों पर वहां के स्थानीय लोगों द्वारा आए दिन हमले किए जाने लगे थे। इसके जवाब में सेना ने पैलेट गन का इस्तेमाल किया था। इस गन के इस्तेमाल पर भी बहुत राजनीति हुई थी; क्योंकि इस गन से निकल कर जो छर्रे मानव शरीर में पहुंचते हैं वे सारी उम्र के लिए अपने निशान छोड़ते हैं और भविष्य में भी उन लोगों को पहचाना जा सकता है जिन्होंने सेना के जवानों पर पथराव किया था।
वैसे तो भारत में क्रिकेट की तुलना में अन्य खेलों को कम ही महत्व दिया जाता रहा है परंतु इस बार रियो ओलम्पिक खेलों में पी.वी.सिंधु ने बैडमिंटन में रजत पदक और साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्य पदक प्राप्त करके यह साबित कर दिया कि अगर सरकार उनकी ओर थोड़ा अधिक ध्यान दें तो कई खिलाड़ी अपने साथ-साथ देश को भी गौरवान्वित कर सकते हैं।
इससे भी अधिक गौरव की बात रही पैरालम्पिक खेलों में। मरियप्पन थंगवेलू और वरुण सिंह भाटी ने ऊंची छलांग में क्रमश: स्वर्ण पदक तथा कांस्य पदक, देवेंद्र झाझरिया ने भाला फेंक में स्वर्ण, दीपा मलिक ने रजत पदक प्राप्त किया। ये सभी लोग दिव्यांग हैं। इन्होंने भी अपने प्रयत्नों से सामान्य लोगों के दिव्यांगों के प्रति दृष्टिकोण को बदलने पर मजबूर कर दिया।
इन तमाम खुशखबरों के तुरंत बाद १८ सितंबर को पुन: उरी हमले ने सभी देशवासियों में क्रोध और दुख की लहर दौड़ा दी। उरी हमले में सेना के १८ जवान शहीद हो गए थे और केवल चार आतंकवादी ही मारे गए थे। इसके बाद भारत ने २९ सितम्बर को ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करके इसका बदला भी ले लिया। इस सर्जिकल स्ट्राइक में लगभग ३५ आतंकवादी मारे गए थे। हालांकि पाकिस्तान लगातार इस बात से इनकार कर रहा था। सर्जिकल स्ट्रइक के बाद भी घाटी में तनाव का माहौल है और वहां आतंकियों और सेना के बीच छोटी-बडी मुठभेडें होती रहती हैं।
इन तमाम खबरों को पीछे छोड़ते हुए जिसने देश की जनता को सब से ज्यादा प्रभावित किया वो है नोटबंदी। ८ नवंबर की शाम को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता को सम्बोधित करते हुए ५०० और १००० के नोटों को प्रचलन से रद्द करने की घोषणा कर दी। काले धन पर हुए इस सर्जिकल स्ट्राइक ने आम लोगों की भी नींद उड़ा दी थी जबकि उनका पैसा सुरक्षित था। आग तो गिरी थी काले धन के मालिकों पर। दूसरे ही दिन से बैंकों के बाहर लंबी-लंबी कतारें नजर आने लगीं। सभी लोग अपने नोट बदलवाने या जमा करवाने के लिए तत्पर दिख रहे थे। साथ ही सरकार की नजर उन लोगों पर भी थी जो बड़ी मात्रा में धन जमा कर रहे थे। आयकर विभाग के छापे मारने की गति भी तेज हो गई थी। कभी नोट बिस्तर के गद्दे से निकलते तो कभी पानी की टंकी से, तो कभी नदी नाले में बहा दिए जाते थे। यह कार्रवाई इतनी बड़ी थी कि इसका असर आने वाले ६-७ महीनों तक दिखाई देगा।
इस वर्ष विभिन्न क्षेत्रों के कुछ नामी लोगों ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लोकप्रियता के हिसाब से देखा जाए तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ‘अम्मा’ अर्थात जयललिता का नााम सब से पाहले लिया जाना चाहिए। लंबी बीमारी के बाद ५ दिसंबर को उनहोंने अंतिम सांस ली। अम्मा के अलावा, शायर निदा फाजली, राजनेता पी ए सांगमा, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की पत्नी श्रीमती कमला आडवाणी, तथा वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पाडगांवकर ने भी इस दुनिया से कूच कर दिया।
उपरोक्त सभी घटनाओं को एकसाथ पढ़ने पर यह कहा जा सकता है कि किसी देश के लिए इतने अनुभव देने वाला वर्ष सही मायनों में ‘वाइब्रंट २०१६’ रहा।

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