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महाराष्ट्र के मराठवाड़ा संभाग के लातूर शहर ने भूकम्प और सूखा इन दोनों संकटों का सामना किया है। यहां तक कि पिछले वर्ष लातूर में ट्रेन से पानी लाकर लोगों की प्यास बुझानी पड़ी। इससे सचेत होकर लातूर के सूज्ञ नागरिकों ने जन सहयोग से ऐसा चमत्कार करवाया कि मांजरा नदी लबालब भर गई। प्रस्तुत है इस परियोजना के बारे में श्री अशोक कुकडे (वरिष्ठ संघ स्वयंसेवक) से हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश, जो सूखाग्रस्त गांवों के लिए पथ प्रदर्शक होंगे।

पर्यावरण के विषय में आपके विचार स्पष्ट कीजिए।
पिछले ३०-४० वर्षों में सामाजिक दृष्टि से मानो यह एक नया विषय उभर कर आया है। निसर्ग की अपनी गतिविधियां हैं, जिनसे जल, वायु और पृथ्वी के संबंध काफी हद तक सुचारू रूप से चलते आए हैं। परंतु पिछली सदी में खास करके १९५०-६० पश्चात मानवी जीवन पद्धति में बहुत तेजी से बदलाव हुए हैं। इसके कारण जल, जंगल और जमीन का संतुलन आम तौर पर हम खो बैठे हैं। परिणाम स्वरूप अनेक नए प्रश्न हमारे समक्ष खड़े हुए हैं। पर्यावरण के इन प्रश्नों को अगर नजरअंदाज करें तो निकट भविष्य में मानव समूह के सामने विनाश का भय नजर आता है। इसलिए इन प्रश्नों की व्यापक जानकारी लेना और सुधार के लिए उपाय करना आवश्यक हुआ है।

पर्यावरण दृष्टिकोण से लातूर जिले की भौगोलिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है?
यह इलाका पर्जन्यछाया में आता है। इसलिए सूखा रहता है। पानी का नियोजन बहुत सीमित मात्रा में हुआ है। पिछले ४० वर्षों से शहरीकरण के कारण जंगल क्षेत्र शून्यवत हुआ है। नियोजन के अभाव के कारण मानवी बस्ती अस्तव्यस्त बढ़ी है। पानी का अनिर्बंध उपयोग, जलस्तर घटने का कारण बना है। परिणाम स्वरूप समस्या इतनी उग्र बनी कि दिसंबर १६ तक पानी वितरण करने के लिए व्यवस्था ही नहीं रही।

२५ साल पहले तक पानी के संदर्भ मे लातूर की स्थिति कैसी थी?
गत ५० वर्षों से पानी की कमी हमेशा ही रही है। फिर भी किसी न किसी तरीके से संभालना होता था। पिछले तीन वर्षों में इसका उग्र स्वरूप दिखाई दिया। पानी का स्तर जमीन के नीचे ५०० से १००० फुट तक चला गया। फसल बिल्कुल कम हो गई। नहाने का पानी तो छोड़ ही दीजिए, पीने का पानी भी पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करने के लिए लोगों को घंटों तक परिश्रम करने पड़े। यह सब न केवल प्रकृति से पानी की कमी के कारण हुआ लेकिन मनुष्य ने भी इसमें बहुत हाथ बंटाया है। इस वर्ष संकट के कारण सब कुछ जागरण हो रहा है।

विगत कुछ सालों मे पानी को लेकर लातूर के लोगों को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
पानी याने जीवन! इसी कारण अभाव का परिणाम समाज जीवन के लिए बहुत परेशानी का रहा। नहाने, धोने के लिए पानी नहीं, खेत को पानी नहीं, उद्योग के लिए पानी नहीं, तो विकास होना भी संभव ही नहीं। यहां तक की, लातूर में अपनी बेटी, बहू करके भेजने के लिए अन्य स्थानों से लोग इनकार करने लगे। समाज जीवन पर एक उदासीनता की छाया फैल गई। आम तौर पर यह सब मनुष्य के व्यवहार की खामियों के कारण हुआ।

आज लातूर जिले से पानी की समस्या लगभग समाप्त हो चुकी है। इस स्थिति तक लातूर कैसे पहुंचा?
पानी की समस्या की शिकायतें तो सब करते थे, लेकिन उपाय के लिए शासन को जिम्मेदार ठहराते थे। सुविचारी लोगों को यह महसूस हुआ कि हम ही इसका हल खोजेंगे। इसी माध्यम से जलयुक्त लातूर का आंदोलन निर्माण हुआ। पिछले ३-४ सालों में ऐसा अनुभव आया कि, बरसात कम हुई तो भी संचय अगर ठीक किया गया और पानी का संयम से उपयोग किया गया तो समस्या हल हो सकती है। शहर के प्रश्नों को सुलझाने के लिए समझदार नागरिक इकट्ठा हुए और जल संचय करने के लिए, मांजरा नदी के ठीक से प्रवाहित होने के लिए, उसका मार्ग पूरा खुला कर देना तथा संचय पर्याप्त हो और आसपास में पानी के प्रवाह भूगर्भ में प्रवाहित हो इसलिए वैज्ञानिक पद्धति से दुरुस्त करना इसका निर्णय किया। प्रमुख नागरिकों की एक समिति का गठन किया। उन्होंने कानून के दायरे में नदी पात्र को दुरुस्त करने की योजना की है।
बहुत आनंद की बात रही कि समाज ने भरपूर प्रतिसाद दिया और इस काम के लिए आवश्यवक धनराशि के पांच करोड़ के आसपास प्राप्त हुई। प्रमुख नागरिकों की समिति ने पारदर्शी, आदर्श व्यवहार करते हुए यह काम उत्तम रीति से, बहुत ही गति से पूरा किया। निःस्वार्थ भाव से होने वाला यह काम देख कर समाज ने अनंत हस्ते सहायता की। शासन व्यवस्था से कुछ भी धनराशि न लेते हुए केवल साड़े तीन माह में अठरा कि.मी. लंबाई का, १०० मी. चौड़ाई का और तीन-चार मीटर तक ऊंचाई का यह खनन वैज्ञानिक तरीके से पूरा किया गया। निसर्ग ने कुछ देरी से प्रतिसाद दिया और पिछले वर्ष से तीन गुना बारिश हुई।

लातूर जिले को जल संकट से उबारने के लिए आपने ‘जलयुक्त-लातूर’ योजना को लेकर कार्य किया। इस योजना की कल्पना आपके मन में कैसे आई?
यह कल्पना किसी एक व्यक्ति की नहीं है। सामाजिक समस्या की ओर लगन से देखने के कारण अनेकों के मन में इसके अलग-अलग पहलू उभरते थे। वे इकट्ठा हो गए। संगठित और सामूहिक प्रयास हुए। हरेक ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई। संपर्क व्यवस्था, प्रचार व्यवस्था, हिसाब-किताब, तकनीकी काम इस तरह भिन्न-भिन्न जिम्मेदारियां क्षमतानुसार भिन्न-भिन्न समूहों ने निभाई। नेतृत्व निःस्वार्थी और पारदर्शी रहा। इसके कारण बहुत ही कम समय में यह प्रंचड काम पूरा हुआ। अपेक्षा से अधिक हुआ।

‘जलयुक्त लातूर’ योजना में सरकार और लातूर की जनता का सहयोग किस प्रकार रहा?
जनता के सहकार के बारे में विस्तार से ऊपर आया है। उसी के कारण सफलता मिली। शासन का आर्थिक सहभाग मांगा ही नहीं था। शासन ने कुछ बाधा भी तो डाली नहीं। लेकिन जिलाधिकारी और उनके कार्यालय ने अच्छा सहयोग दिया। समाज का सहयोग भी अच्छा रहा। इसी नदी के किनारे रहने वाले लोगों ने वहां से निकलने वाली मिट्टी उठा कर अपने अपने खेत में ले गए।

‘जलयुक्त लातूर’ योजना सफल रही इस बात को आप कैसे स्पष्ट करेंगे?
जो उद्देश्य सामने रखा था, वह शतप्रतिशत पूरा हुआ। पर्याप्त धनराशि उपलब्ध हुई, कार्यकर्ताओं और समाज में कहीं भी संघर्ष या झगड़ा नहीं हुआ। बिलकुल नियोजन के अनुसार काम हुआ। सफलता के कारण सभी के मन में एक विश्वास पैदा हुआ कि हम अपने बलबूते पर समस्या का निवारण कर सकते हैं। सब मिल कर बहुत बड़ी उपलब्धि हुई।

लातूर के साथ अन्य जिलों में भविष्य में पानी समस्या का समाधान करने में यह योजना किस प्रकार मार्गदर्शक होगी?
यह एक पथदर्शी प्रकल्प हुआ है। आज ही इसका अनुकरण कई स्थानों पर हुआ। लातूर से ७५ कि.मी. की दूरी पर उदगीर शहर में युवकों ने इसी तरीके से काम करते हुए पानी की समस्या का हमेशा के लिए निराकरण किया। स्थान-स्थान पर ऐसे ही छोटे- मोटे प्रयास चल रहे हैं।

मोदी सरकार के स्वप्न ‘स्मार्ट सिटी’ में लातूर शहर को कहां देखा जा सकता है?
आज तो ‘स्मार्ट सिटी’ का दर्शन इसमें होना संभव नहीं है। पानी का यह विषय ‘न्यूनतम समान अपेक्षा’ में आता है। ‘स्मार्ट सिटी’ की कल्पना करने के लिए बहुत ही दूर देखना और चलना होगा।

रोजमर्रे के व्यवहार में पर्यावरण की रक्षा करना हमारी परंपरा रही है। आज यह परंपरा लुप्त होती दिखती है। इस परपंरा का जतन करने के लिए क्या कदम उठाने आवश्यक हैं?
पर्यावरण संतुलन की हमारी परपंरा प्रायः नष्ट हुई है। वह संस्कार फिर से प्रस्थापित करना होगा। हमारी आदतें निसर्गाभिमुख और समाजाभिमुख करनी होंगी। यह संस्कार खून में प्रस्थापित करना होगा। तभी यह समस्या दीर्घकाल के लिए हल हो सकती है।

आधुनिक मानव की बढ़ती गतिविधियों और पर्यावरण की रक्षा इन दोनों का संतुलन कैसे संभव है?
निसर्ग की उपलब्धियों का मात्र उचित प्रयोग का कठोर संस्कार करना पड़ेगा। रईस बाप के गैरजिम्मेदार बेटे जैसा व्यवहार होता रहा तो दिवाला निकल जाएगा और मानव गहरे संकट में पड़ जाएगा।

लातूर में आए भूकंप तथा जलसमस्या इन दोनों ही परिस्थितियों से आपने लातूर को उबारा है। इस कार्य के पीछे की प्रेरणा किसने दी?
पहली बात यह कि, इस संकट से उबरना किसी अकेले का काम नहीं हो सकता। समाज के ये सब घटक व्यक्ति या संगठन, जो कर्तव्य भावना जानते हैं और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ कर समाज के लिए अपना तन, मन और धन देते हैं उनके आधार पर यह काम बनता है। किसी के मन में श्री रविशंकर जी की प्रेरणा रही। मेरे जैसे अनेकों के लिए ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की प्रेरणा रही। कई ऐसे हैं जिनकी आंतरिक व्यक्तिगत प्रेरणा भी रही।

पर्यावरण विशेषांक के द्वारा आप ‘हिंदी विवेक’ के पाठकों को कौनसा संदेश देंगे?
हमारी यह पृथ्वीमाता हमें जीवन देती है। ‘अन्न, जल और प्राणवायु’ यह महत्व के घटक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। लेकिन इन घटकों के उपयोग में संतुलन ना रखे तो हम पृथ्वी के साथ मानव समूह की बरबादी का कारण बनेंगे।

 

 

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