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वर्तमान में दुनिया का हर चौथा इंसान अकेलेपन की समस्या से जूझ रहा है. हाल में अमेरिका में  20,000 युवाओं पर किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि उनमें से लगभग आधे से ज्यादा लोग खुद को अकेला महसूस करते हैं. भारत में भी अकेलेपन के शिकार लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है. अकेलेपन की वजह से ही डिप्रेशन के मामले भी बढ़ रहे हैं.

विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 16 से लेकर 24 आयुवर्ग के करीब 40 फ़ीसदी युवा अकेलेपन के कारण डिप्रेशन का शिकार पाये गये हैं. वहीं दूसरी तरफ, 75 वर्ष से अधिक उम्र के ऐसे 27 फ़ीसदी लोग डिप्रेशन के शिकार हैं. शोध से पता चला है कि इंसान का अकेलापन और सामाजिक रूप से अलग-थलग रहने की उसकी  प्रवृत्ति  के कारण उसमें दिल की बीमारी का खतरा 29 फीसदी और स्ट्रोक का खतरा 32 फीसदी बढ़ जाता है. ब्रिटेन में तो अकेलेपन की इस समस्या से निपटने के लिए बाकायदा ‘अकेलापन मंत्रालय’ (Loneliness Ministry) का गठन किया गया है. ब्रिटिश रेड क्रॉस की रिपोर्ट की मानें तो ब्रिटेन की कुल आबादी करीब 65 मिलियन है, इसमें से करीब 9 मिलियन से ज्यादा लोग अक्सर या कभी-कभी अकेलापन महसूस करते हैं. 

अक्सर लोग अकेलेपन और एकांत को समानार्थी समझते हैं, जबकि इन दोनेां के बीच फर्क है. जब बाहरी परिस्थितियां किसी इंसान को अकेले होने पर मजबूर करती हैं, तो यह उसके लिए दुखदायी हो सकता है. उसे अवसाद की ओर ढकेल सकता है, लेकिन अगर अकेले होने का फैसला किसी इंसान के खुद का होता है, तो इसके कई फायदे होते हैं, जैसे-

– इंसान खुद पर अधिक फोकस कर पाता है. अपने गुणों-अवगुणों का तर्कपूर्ण तरीके से विश्लेषण कर पाता है.

– अकेलापन व्यक्ति की क्रियेटिविटी को बढ़ाने में सहायक होता है. 

– लोगों से मिल कर फिज़ूल बातें करने, बेकार के हंसी-मजाक़ में शामिल होने के बजाय इंसान को सेल्प-एक्सप्लोर करने का मौका मिलता है.

– उसके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है.  

– व्यक्ति नये विचारों का खुल कर स्वागत कर पाता है.

– दुनिया की भीड़-भाड़ और शोर-शराबे से दूर अकेले  बैठे व्यक्ति के सोचने-समझने की ताकत मजबूत होती है. ऐसी अवस्था में व्यक्ति अक्सर पुरानी बातों को सोचता है. उसका विश्लेषण करता है. इससे उसकी याददाश्त मज़बूत होती हैं. 

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