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भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर इतनी अधिक है कि अगले कुछ सालों में हम चीन को भी मात दे देंगे। मुस्लिम आबादी तो भारत समेत विश्वभर में बेहिसाब बढ़ रही है। इससे सम्पूर्ण देश के विकास और खुशहाली को ग्रहण लग गया है। अतः जनसंख्या नियंत्रण के लिए कड़े और कानूनी कदम उठाए बिना कोई विकल्प नहीं है।

पिछले महीने दो बातों ने विशेष कर ध्यान आकर्षित किया था। ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने मानव अस्तित्व के खतरे से जुड़ी, व्यापक पर्यावरणीय बातों से जुड़ी चेतावनी दी है। उसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। हॉकिंग ने कहा है कि मानव समुदाय इतिहास के सबसे खतरनाक समय का सामना कर रहा है। यदि जल्दी ही पर्यावरण और जनसंख्या से जुड़ी बातों से निपटने का तरीका नहीं अपनाया गया तो स्थिति बदतर हो जाएगी और पृथ्वी बरबादी के निकट होगी। और, दूसरी बात है- अमेरिका के एक अप्रवासी भारतीय नागरिक ने, जो एक बड़ी बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी के सी.ई.ओ. हैं, अपने कर्मचारियों को समझाने के लिए जनसंख्या का तुलनात्मक भारतीय मानचित्र तैयार किया है।

इस मानचित्र में यह दर्शाया गया है कि भारत के किस राज्य की जनसंख्या विश्व के किस देश के लगभग समान है। मानचित्र के अनुसार उत्तर प्रदेश की जनसंख्या ब्राजील की जनसंख्या के बराबर है। मध्यप्रदेश फ्रांस की जनसंख्या के बराबर है। राजस्थान की जनसंख्या ब्रिटेन के बराबर है। इस प्रकार का भारत का मानचित्र बनाते समय उनका शायद यह उद्देश्य रहा होगा कि भारत विश्व के अनेक देशों की जनसंख्या समाहित किए हुए े है और भारत के प्रधानमंत्री दुनिया के अनेक देशों जितनी जनसंख्या को संभाल रहे हैं। भारत के विभिन्न राज्यों की कुछ देशों से तुलना करने वाला मानचित्र बनाने से जाने अनजाने में हम भारतीयों को यह संदेश दिया गया है कि आप विकास के नए-नए कीर्तिमान स्थापित करते रहें, परमाणु महाशक्ति बन जाओ, एक ही साथ १०४ उपग्रह छोड़ कर अपनी क्षमता का झण्डा गाड़ो, सब कुछ कर लो पर जब तक असंयमित बढ़ती जनसंख्या पर लगाम नहीं लगाएंगे, तब तक सीमित संसाधनों के चलते एकसाथ दुनिया के विभिन्न देशों की समस्याओं और चुनौतियों से लड़ते-जूझते रहना पड़ेगा।

भारत की जनसंख्या वृद्धि किस तरह आर्थिक और विकास के लाभों को किस तरह नाकारा बना रही है इसे यह मानचित्र स्वयं साबित कर देता है।आजादी के बाद देश की आबादी चार गुना बढ़ गई है। आजादी के समय ३६ करोड़ आबादी वाला यह भारत देश अभी १३२ करोड़ का हो गया है। अनुमान है कि भारत की जनसंख्या १.२% प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ती हुई २०५० में १९९ करोड़ हो जाएगी। भारत की आबादी की बढ़ती रफ्तार को रोका नहीं गया तो आने वाले सौ सालों के भीतर मानव जाति को अपना वजूद बचाने के लिए किसी दूसरे ग्रह की तरफ रुख करना होगा।

वर्ष २००१ से २०११ के बीच देश की कुल आबादी १७.७ फीसदी बढ़ गई। बढ़ती हुई आबादी नई आर्थिक-सामाजिक चुनौतियां पैदा कर रही हैं। वैश्विक रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि आने वाले सात साल बाद भारत चीन को जनसंख्या वृद्धि में पीछे छोड़ते हुए दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। जनसंख्या वृद्धि एक ऐसी समस्या है जिस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले कुछ दशकों में ही मानव जाति भयानक खतरे में आ जाएगी। विकसित देश इस बात से चिंतित हैं, पर विकासशील और पिछड़े देशों तक यह चिंता सही मायने में और सही रूप में अब तक नहीं पहुंची है। २०३० तक भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश होगा। भारत की अजीब उपलब्धि यह है कि भारत हर वर्ष आस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या के बराबर बच्चे पैदा करता है। वर्तमान में हम विश्व की कुल जनसंख्या का १७.२३ प्रतिशत हैं लेकिन भारत के पास भूमि मात्र २.४५ प्रतिशत ही है।
जनसंख्या वृद्धि के मुख्य कारणों में जन्म दर वृद्धि, मृत्यु दर में कमी, गरीबी, बाल विवाह, धार्मिक एवं सामाजिक अंधविश्वास, शिक्षा का अभाव प्रमुख हैं। जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए जनजागरण करने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ ११ जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाता है।

वर्ष १८०० में दुनिया की तीन फीसदी से भी कम आबादी शहरों में रहती थी। जबकि वर्ष २००५ के अंत तक यह आबादी ५० फीसदी से भी ऊपर पहुंच चुकी थी। अब एक करोड़ या उससे ज्यादा की आबादी वाले २६ महानगर हो गए हैं। जिसमें टोकियो, शंघाई, दिल्ली, मुंबई, मनीला, जकार्ता, कराची, ढाका, कोलकाता, बीजिंग शामिल हैं। महानगरों की आर्थिक कामयाबी के बावजूद बुनियादी सवालों का जवाब चिंताजनक है। चिंता की कई वजहें हैं। शहरों में आबादी की तुलना में ऊर्जा की मांग ज्यादा है। खाद्य, पानी, औैद्योगिक संसाधन और इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए ऊर्जा पर दबाव पड़ता है। समुद्र और नदी के किनारे बसे महानगरों के सामने अपने इलाकों को सुरक्षित बचाए रखना बड़ी चुनौती है; क्योंकि समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। २६ जुलाई की बाढ़ ने मुंबई शहर को इसकी भयावहता की झलक दिखा दी है, लेकिन हमने कोई सबक सीखे हैं, ऐसा लगता नहीं।

झिुग्गयों, गंदी बस्तियों और पुटपाथ पर रहने वाले लोगों की संख्या भी करोड़ों में होना हमारे लिए कलंक की बात है। तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या के कारण उपलब्ध सुविधाओं पर दबाव बढ़ रहा है। सड़कें हों या स्कू ल, कॉलेज, अस्पताल, बस अड्डे सब अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। आवास की समस्या, कुपोषण, रोजगार की समस्या, प्रदूषण तथा अन्य पर्यावरणीय समस्याओं आदि जनसंख्या की लगातार वृद्धि का ही दुष्परिणाम है। इससे स्पष्ट हो रहा है कि हमारे संसाधनों पर कितना दबाव है। बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि विस्तार के लिए वनों को काटा जा रहा है। इसमें कृषि योग्य भूमि बनाने के कारण विविध वृक्ष प्रजातियां भूमि से कम हो रही हैं। औद्योगिक विकास तथा आर्थिक विकास की चाह में कृषि भूमि और वनों का विनाश होते देखना हमारी मजबूरी है।

सबसे अधिक चुनौतियां शहरों की आवासीय व्यवस्था में बढ़ रही हैं। करोंड़ों लोग जर्जर मकानों में गुजरबसर कर रहे हैं या झुग्गी- झोपड़ियों में जीवन गुजार रहे हैं। जन स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की दयनीय स्थिति, प्रति दिन निकलने वाले कचरे को ठिकाने लगाने की व्यवस्था और भी मुश्किल होती जा रही है। बीमारियां, ट्रैफिक जाम, घटिया जल-मल निकास व्यवस्था, लूटमार, भीड़भाड़ और संकरी गलियां अभी भी भारत की पहचान हैं। इससे यह बात स्पष्ट है कि जनसंख्या का बढ़ना केवल एक व्यक्ति को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि संपूर्ण देश की खुशहाली को ग्रहण लगाता है। इसलिए अत्यंत प्रभावी तरीके से जनसंख्या नियंत्रण के बारे में सोचा जाना चाहिए।

भारत की आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि हम कितनी भी प्रगति करें-कितना ही विकास करें-कितनी ही संपत्ति पैदा करें, कुछ परिणाम नहीं होगा। जितना हम विकास कर रहे हैं उससे चौगुनी हम जनसंख्या पैदा कर रहे हैं और विकास कार्य वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं। समस्याएं हल नहीं हो पा रही हैं। मनुष्य ने एक काम किया है कि मौत से एक लड़ाई लड़ी है। असमय मौत को हमने हमने काफी हद तक पीछे ढकेल दिया है। हमने प्लेग जैसी महामारियों से मुक्ति पा ली है। हम आदमी को ज्यादा स्वस्थ कर सके। बच्चे जितने पैदा होते हैं, करीब-करीब सब को बचाने का उपाय कर लिया है। मनुष्य ने मौत से लड़ाई लड़ ली, लेकिन मनुष्य हद भूल गया कि हमें जन्म से भी लड़ाई लड़नी है। मनुष्य प्रकृति के साथ लड़ाई जीतने की अकड़ में है। प्रकृति मनुष्य के साथ भी अलग तरह का सलूक नहीं करेगी। प्रकृति जनसंख्या विनाश के रास्ते ढूंढ़ ही लेगी। प्रकृति ने मनुष्य जाति को उसकी सीमा दिखाना प्रारंभ किया है। प्रकृति के प्रकोप के अनेक भयावह थपेड़े हमने झेले हैं।

हम स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर अपनी तसल्ली तो कर लेते है लेकिन तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या के बोझ तले हमारे संसाधनों की सांसें दब रही हैं। लेकिन वोट बैंक की राजनीति के कारण देश के राजनैतिक नेताओं की मानसिकता जनसंख्या वृद्धि के खतरों को समझने में असमर्थ है। बिडंबना यह है कि राजनीति से प्रेरित प्रयासों के बीच धर्म आधारित जनगणना के असली मुद्दें गौण हो गए हैं।

२००० से २०१० की जनगणना के आकड़े बता रहे हैं कि जनसंख्या वृद्धि और मिुस्लमों की जन्म दर वृद्धि, दोनों बातें देश के लिए अत्यंत गंभीर हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत के दो टुकड़े हो गए। इससे पहले मुसलमानों की जनसंख्या थी उसे भी अभी की मुस्लिम जनसंख्या ने पीछे छोड़ दिया है। दुनिया में मुसलमान सुनियोजित तरीके से अपनी संख्या बढ़ाने में प्रयासरत हैं। जनगणना की यह वृद्धि उनका विश्व पर मुस्लिम वर्चस्व प्रस्थापित करने का प्रयास है। संपूर्ण अमेरिका, यूरोप और रूस में भी पिछले दस सालों में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ी है। अमेरिका, यूरोप में मुस्लिम धर्मियों की वृद्धि १०० प्रतिशत है। रूस में वह ३४० प्रतिशत है। मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि की यह सुनियोजित साजिश चलती रही तो जल्द ही मुस्लिम जनसंख्या दुनिया की सब से बड़ी जनसंख्या होगी। पाकिस्तान में २०२० तक आबादी २९ करोड़ तक पहुंच जाने का अनुमान है। बंाग्लादेश ने इस बारे में एक मिसाल कायम की है, क्योंकि वहां आबादी की रफ्तार पर कुछ अंकुश लगा सका है। इस तुलना में हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि का प्रतिशत कम हो गया है।

भारत के असम और पश्चिम बंगाल राज्यों में मुस्लिम आबादी बढ़ने का मसला बांग्लादेश से घुसपैठ करने वाले अवैध नागरिकों से जुड़ा है। आनेवाले सात सालों में चीन की वर्तमान जनसंख्या से भारत की जनसंख्या अधिक हो जाएगी। भारत की जनसंख्या चीन के आगे निकल जाएगी। २०३० तक यह डेढ़ सौ करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। यह कब तक चलेगा? जनसंख्या वृद्धि का यह मुद्दा सिर्फ पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से ही नहीं जुड़ा है। समाज और राजनीति से भी इस विषय पर महत्वपूर्ण भूमिका अपेक्षित है। सब को शिक्षा, रोटी कपड़ा, मकान, साफ पानी और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं मुहैया कराना आधुनिक लोकतंत्र में राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी मानी जाती है। देश का विकास और स्थिरता नागरिकों को मिलने वाले संसाधनों की उपलब्धता से ही बयां होती है। ऐसे में बिना जनसंख्या पर काबू पाए हम विकास का कोई पैमाना कैसे छू सकते हैं? देश की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण पाने के लिए जनजागरण अभियान के साथ ही राष्ट्रीय कानून बनाने की अत्यंत जरूरत है। जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, वह अब जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करनेवाले राष्ट्रीय कानून के बिना नहीं थमेगी। हम चीन की तरह एक दम्पति एक बच्चा की नीति को कठोरता से न अपनाएं मगर हम दो हमारे दो के नारे को तो नया रंग दे सकते हैं। जिसका आग्रह भारत के साथ दुनिया में भी हो। किसी एटम बम या किसी हाइड्रोजन बम को हमारे ऊपर फेंकने की जरूरत नहीं है। तीव्र गति से बढ़ती विस्फोटक जनसंख्या ही हमारे लिए हाइड्रोजन बम बन जाएगी। आज जो जनसंख्या बढ़ रही है, वह मानव जाति के विनाश का कारण बन सकती है।

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