भारतीय सिनेमा और ओटीटी की दुनिया में हाल ही में नीरज पांडे और मनोज बाजपेयी की नई फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ की घोषणा ने एक बार फिर उस सच्चाई को उजागर कर दिया है, जिसे वर्षों से ‘कला की आज़ादी’ के आवरण में छिपाया जाता रहा है। यह फिल्म केवल एक कहानी नहीं, बल्कि उस दीर्घकालिक और सुनियोजित नैरेटिव की अगली कड़ी है, जिसमें एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को अपराध, लालच और पतन का पर्याय बनाया जाता है।
यह प्रश्न अब केवल सिनेमा का नहीं रहा बल्कि यह मानसिक संरचना और सामाजिक मनोविज्ञान का प्रश्न बन चुका है।
1. चयनात्मक पहचान : जब ‘मज़हब’ अदृश्य और ‘जाति’ अनिवार्य हो जाती है,
भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा दोहरापन यहीं से शुरू होता है। दशकों से हमें रटाया गया कि “आतंकवादी का कोई मज़हब नहीं होता।” इसी सिद्धांत के तहत, जब भी पर्दे पर आतंकवादी दिखाया जाता है, उसकी धार्मिक पहचान धुंधली कर दी जाती है, नाम बदले जाते हैं, पृष्ठभूमि गायब कर दी जाती है ताकि किसी की भावनाएं आहत न हों। लेकिन जैसे ही विषय भ्रष्टाचार, शोषण या अपराध का होता है, कैमरा अचानक जनेऊ, तिलक और उपनाम पर ज़ूम कर देता है।
‘घूसखोर पंडत’ का शीर्षक स्वयं घोषणा करता है कि यहाँ अपराधी व्यक्ति नहीं, बल्कि उसकी पहचान है। क्या कोई फिल्मकार “घूसखोर मौलाना” या “बलात्कारी पादरी” जैसे शीर्षक रखने का साहस कर सकता है? यदि नहीं, तो यह संवेदनशीलता नहीं, बल्कि चयनात्मक कायरता है।
2. स्टीरियोटाइप का इतिहास : एक गहरा षड्यंत्र
सिनेमा ने दशकों से पात्रों का विभाजन उनके ‘सरनेम’ के आधार पर किया है:
* लोभी ब्राह्मण और धूर्त पंडत : फिल्मों में ‘पंडित’ को अक्सर दान-दक्षिणा का भूखा, चालाक या षड्यंत्रकारी दिखाया गया। ‘ओमकारा’ का ‘ईश्वर त्यागी’ हो या ‘आर्टिकल 15’ के पात्र, ब्राह्मणों को व्यवस्था के दमनकारी चेहरे के रूप में पेश करना एक फैशन बन गया है।
* अत्याचारी राजपूत/ठाकुर : वीरता, बलिदान और राष्ट्ररक्षा के इतिहास को दबाकर फिल्मों में ‘ठाकुर’ का अर्थ ही ‘कोड़े बरसाने वाला जमींदार’ बना दिया गया। ‘गंगा जमुना’, ‘कोयला’, और ‘करण अर्जुन’ जैसी अनगिनत फिल्मों में राजपूत समाज को केवल ‘शोषक’ की पहचान तक सीमित कर दिया गया।
* सूदखोर बनिया : व्यापारिक नैतिकता को नकारकर उन्हें हमेशा ‘मदर इंडिया’ के ‘सुक्खी लाला’ की तरह दिखाया गया, जो अंगूठा लगवाकर जमीन हड़प लेता है।
3. ‘गुड मौलाना’ बनाम ‘बैड पंडित’ : आस्था का चयनात्मक चित्रण
सिनेमाई पर्दे पर धार्मिक स्थलों का चित्रण भी असंतुलित है।
* मंदिर : यहाँ अक्सर षड्यंत्र, अपराध और अंधविश्वास दिखाया जाता है। ‘OMG – Oh My God’, ‘PK’ और ‘आश्रम’ जैसी सीरीजों ने सीधे तौर पर हिंदू मान्यताओं का उपहास उड़ाया। मंदिर जाने वाला पात्र अक्सर ‘कट्टरपंथी’ या ‘पाखंडी’ होता है।
* मस्जिद/दरगाह : इसके विपरीत, इन्हें हमेशा शांति, करुणा और रूहानियत के केंद्र के रूप में पेश किया जाता है। मौलाना लगभग हमेशा उदार, नैतिक और मानवीय दिखाए जाते हैं। यह कला नहीं, बल्कि मानसिक ध्रुवीकरण है।

4. ‘आधुनिकता’ का छल और ‘Self-Loathing’
वेब सीरीज़ और विज्ञापनों में अक्सर शर्मा, पांडे या चटर्जी जैसे उपनाम वाले सवर्ण परिवारों को ‘पिछड़ा’, ‘दकियानूसी’ और ‘दमघोंटू’ दिखाया जाता है। संदेश साफ़ है: “आधुनिक बनने के लिए अपनी परंपरा, पहचान और संस्कार छोड़ने होंगे।” इसका परिणाम नई पीढ़ी में अपनी ही विरासत के प्रति हीन भावना पैदा करने के रूप में निकल रहा है।
5. ब्राह्मणों को बाहरी शत्रुओं की ज़रूरत नहीं
सबसे कड़वा सत्य यही है कि इस नैरेटिव को गढ़ने वालों में बड़ी संख्या उसी समाज से आती है, जिसे बदनाम किया जा रहा है। पुरस्कार, वैश्विक स्वीकृति और ‘लिबरल सर्टिफिकेट’ के लिए अपनी ही जड़ों पर कालिख पोतना एक आत्मघाती प्रवृत्ति बन चुकी है। जब घर के रक्षक ही ‘ग्लोबल पहचान’ के लिए अपनी विरासत को नीचा दिखाने लगें, तो बाहरी शत्रुओं की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
6. दलित-सवर्ण विमर्श : सुधार या स्थायी संघर्ष?
अत्याचारों पर चर्चा आवश्यक है— पर जब कहानी एकतरफा राक्षसीकरण में बदल जाए, तो उद्देश्य सुधार नहीं, स्थायी सामाजिक टकराव बन जाता है। ‘पाताल लोक’ और ‘तांडव’ जैसी सीरीज में सवर्णों को मानसिक रूप से विक्षिप्त या अपराधी दिखाना एक सुनियोजित Civil Conflict Narrative का हिस्सा है।
7. वैश्विक तुलना और सुरक्षित लक्ष्य
हॉलीवुड या यूरोप में अपराध को व्यक्तिगत माना जाता है, वहां किसी की नस्लीय या धार्मिक पहचान को फिल्म के शीर्षक में ‘घूसखोर’ या ‘अपराधी’ के साथ नहीं घसीटा जाता। भारत में यह छूट केवल इसलिए है क्योंकि यहाँ का बहुसंख्यक समाज सहिष्णु है। जब जोखिम चुनिंदा हो, तो वह स्वतंत्रता नहीं बल्कि सुरक्षित प्रोपेगेंडा होता है।
जागृति ही समाधान है
‘घूसखोर पंडत’ जैसे शीर्षक केवल फिल्में नहीं है वह समाज के धैर्य की परीक्षा हैं। कला तब तक कला है, जब तक वह निष्पक्ष है। जब वह बार-बार एक ही पहचान को नीचा दिखाए, तो वह मनोवैज्ञानिक युद्ध बन जाती है।
आज का दर्शक अब जागरूक हो रहा है। मनोरंजन के नाम पर परोसे जा रहे इस विषैले चश्मे को उतारना अब अनिवार्य है। यदि हमने आज अपनी पहचान के इस ‘अपराधीकरण’ का विरोध नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों को पहचानने से इनकार कर देगी।
आतंक का मज़हब नहीं होता, क्योंकि वहाँ आप डरते हैं। भ्रष्टाचार की जाति होती है, क्योंकि यहाँ आप जानते हैं कि यह समाज सहिष्णु है। दर्पण अगर केवल एक ही तरफ का चेहरा काला दिखाए, तो समझ लीजिए कि आईना बिका हुआ है, चेहरा नहीं।
– अखिलेश चौधरी

