| युवाओं का कम आयु में मानसिक रोगी बनना एक चेतावनी है कि हमारी विकास की दौड़ में कहीं न कहीं मनुष्य का मन पीछे छूट गया है। यदि समय रहते इस समस्या को गम्भीरता से नहीं लिया गया तो इसका प्रभाव केवल युवाओं तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के भविष्य को प्रभावित करेगा। |
आज के समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक और चिंताजनक हो गया है क्योंकि युवा कम आयु में मानसिक रोगी बन रहे हैं। जिस आयु को ऊर्जा, सपनों और सम्भावनाओं का समय माना जाता था, उसी आयु में अवसाद, चिंता, अनिद्रा, आत्मग्लानि, अकेलापन और यहां तक कि आत्महत्या जैसे विचार युवाओं को घेर रहे हैं। यह समस्या केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है बल्कि समाज, व्यवस्था और बदलती जीवन-शैली का संयुक्त परिणाम है। इसके साथ-साथ, किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित समर्थन और संसाधनों की आवश्यकता है, जिससे कि वे स्वस्थ और समर्थ बन सकें। किशोरावस्था में मानसिक स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।
हाल ही में 2024-2025 के दौरान प्रकाशित कई रिपोर्टों में यह सामने आया है कि भारत में मानसिक रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इनमें सबसे बड़ा हिस्सा 15 से 35 वर्ष के युवाओं का है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद से जुड़े अध्ययनों के अनुसार लगभग आधे मानसिक विकारों की शुरुआत किशोरावस्था में ही हो जाती है, लेकिन पहचान और इलाज देर से होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट भी बताती है कि हर 7 में से एक किशोर किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहा है। यह आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं बल्कि उन युवाओं की मौन पीड़ा का संकेत हैं, जो बाहर से सामान्य दिखते हैं, लेकिन भीतर से टूट रहे होते हैं।
इसलिए, हम सभी को मिलकर किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य, या teenage mental health, पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण बढ़ता हुआ शैक्षणिक और करियर दबाव है। आज का युवा बचपन से ही प्रतियोगिता में धकेल दिया जाता है। अच्छे अंक, प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश, बेहतर पैकेज वाली नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा इन सबकी अपेक्षाएं युवाओं के कंधों पर बोझ बन जाती हैं। असफलता का डर इतना गहरा हो गया है कि छोटी-सी असफलता भी युवाओं को आत्महीनता की ओर ले जाती है। हाल के समाचारों में कोचिंग संस्थानों और परीक्षा-दबाव से जुड़े आत्महत्या के मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह दर्शाता है कि हम सफलता को जीवन से बड़ा बना बैठे हैं, जबकि मानसिक संतुलन पीछे छूटता जा रहा है।
सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक ने भी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाला है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षण और स्वास्थ्य रिपोर्टों में यह स्पष्ट किया गया है कि भारत में डिजिटल लत एक गम्भीर समस्या बनती जा रही है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और अन्य प्लेटफॉर्म पर दिखने वाली परफेक्ट लाइफ युवाओं को निरंतर तुलना की मानसिकता में डाल देती है। वे अपने जीवन को दूसरों के सम्पादित और चमकदार जीवन से तौलने लगते हैं, जिससे हीन भावना, इर्ष्या और अवसाद जन्म लेता है। ऑनलाइन ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग और लाइक्स-फॉलोअर्स की दौड़ मानसिक अस्थिरता को और बढ़ाती है।
परिवार और सामाजिक संरचना में आए बदलाव भी इस समस्या को गहरा कर रहे हैं। संयुक्त परिवारों का टूटना, माता-पिता का अत्यधिक व्यस्त होना और भावनात्मक संवाद की कमी युवाओं को अकेला अनुभव कराती है। कई युवा अपनी समस्याओं को साझा करने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं पाते। ऊपर से मानसिक रोग को लेकर समाज में आज भी झिझक और कलंक बना हुआ है। ‘लोग क्या कहेंगे’ के डर से युवा अपनी परेशानी छुपा लेते हैं और जब तक सहायता लेते हैं, तब तक समस्या गम्भीर रूप ले चुकी होती है।

आर्थिक अनिश्चितता और बेरोजगारी भी युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा असर डाल रही है।
हालिया समाचारों में यह बार-बार सामने आया है कि उच्च शिक्षित युवाओं को भी स्थाई और संतोषजनक रोजगार नहीं मिल पा रहा है। महंगाई, भविष्य की असुरक्षा और सामाजिक तुलना युवाओं को निराशा और तनाव में डाल देती है। कई बार वे स्वयं को परिवार और समाज पर बोझ समझने लगते हैं, जो मानसिक रोगों की ओर एक आत्मघाती रास्ता खोल देता है। जीवन-शैली में आए बदलाव भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। नींद की कमी, अनियमित खान-पान, शारीरिक गतिविधि का अभाव और लगातार भागदौड़ भरी दिनचर्या शरीर के साथ-साथ मन को भी थका देती है। एक गम्भीर पहलू यह भी है कि स्कूल और कॉलेज स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा का अभाव है। युवाओं को यह सिखाया ही नहीं जाता कि तनाव से कैसे निपटना है, भावनाओं को कैसे समझना और व्यक्त करना है। परिणामस्वरूप वे अपनी भावनाओं को दबाते रहते हैं, जो आगे चलकर मानसिक रोग का रूप ले लेती हैं। हाल के वर्षों में कुछ राज्यों ने स्कूलों में काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन यह प्रयास अभी अपर्याप्त हैं। इन सबके बीच यह समझना आवश्यक है कि मानसिक रोग कोई कमजोरी या शर्म की बात नहीं है, यह भी उतनी ही वास्तविक बीमारी है जितनी शारीरिक बीमारी।
हाल के समाचारों में कई सार्वजनिक व्यक्तियों और खिलाड़ियों ने अपने मानसिक संघर्षों के बारे में खुलकर बात की है, जिससे समाज में जागरूकता बढ़ी है। यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसे जमीनी स्तर तक ले जाने की आवश्यकता है।
युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए समाज को सामूहिक रूप से सोच बदलनी होगी। माता-पिता को बच्चों की तुलना करने की बजाय उन्हें समझना होगा। शिक्षा व्यवस्था को केवल अंक और रैंक पर नहीं बल्कि मानसिक संतुलन और जीवन-कौशल पर भी ध्यान देना होगा। सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग और डिजिटल संतुलन को बढ़ावा देना होगा। सरकार और संस्थानों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और किफायती बनाना होगा ताकि युवा बिना डर और झिझक के सहायता ले सकें।
– डॉ. रामेश्वर मिश्र

