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ऑनलाइन गेम की लत

ऑनलाइन गेम की लत

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, युवा
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ऑनलाइन खेलों के भंवरजाल में फंसकर बच्चे कहीं आत्महत्या कर रहे हैं तो कहीं पैसे गंवा रहे हैं। कभी ब्लैकमेलिंग के शिकार बन जाते हैं तो कभी स्वयं अपराध की राह पकड़ लेते हैं। ऑनलाइन खेलों के जोखिम और स्मार्ट फोन की लत के दुखद परिणाम आए दिन सामने आते हैं। 

गाजियाबाद में हाल ही में ऑनलाइन गेम कोरियन लवर के जाल में फंसकर तीन बहनों ने आत्महत्या कर ली। वास्तव में गाजियाबाद का यह मामला भी लड़कियों के वर्चुअल गेम की एडिक्ट होने भर का नहीं है। स्क्रीन की दुनिया में गुम रहने वाली तीनों बहनें मनोवैज्ञानिक मोर्चे पर भी बड़े भटकाव की शिकार थीं। तीनों नाबालिग लड़कियां कोरियन कल्चर से बेहद प्रभावित थीं। शादी भी किसी कोरियन लड़के से ही करने की इच्छा रखती थीं। कोरियन कल्चर के फेर में उनकी बदलती मनःस्थिति को देखकर ही उनसे स्मार्ट फोन ले लिया गया।

एक पेज के सुसाइड नोट में आत्महत्या का कदम उठाने के लिए तीनों बहनों ने मम्मी पापा से क्षमा मांगी है, साथ ही घर से मिली 8 पन्नों की डायरी में बच्चियों ने लिखा है कि वो कोरियन कल्चर, कोरियन पॉप, कोरियन मूवीज, शोज, संगीत और यूट्यूबर्स को बहुत ज्यादा पसंद करती थीं। वे कोरियन कल्चर को अपनाना चाहती थीं। कुछ समय पहले मध्य प्रदेश में ऑनलाइन गेमिंग में 40 हजार रुपए हारने पर 6वीं कक्षा में पढ़ रहे 13 साल के बच्चे ने आत्महत्या की थी। एक और मामले में फ्री फायर गेम की लत के शिकार 12 वर्षीय छात्र से पापा ने मोबाइल फोन छीना तो उसने फांसी लगा ली थी। मैनपुरी शहर में 10 साल के एक बच्चे ने कार्टून देखने के लिए मोबाइल न मिलने पर जान दे दी। हरियाणा के मामले में तो 5वीं कक्षा के एक बच्चे को मोबाइल से दूर करने पर उसने अपना हाथ ही चाकू से काट लिया था।

बीते दिनों लखनऊ में भी ऑनलाइन गेम फ्री फायर मैक्स के चलते एक बच्चे ने सुसाइड किया था। अपराधियों ने उससे दोस्ती की और गेम में डायमंड्स और हथियार का लालच देकर फंसाया, फिर पैसे मांगे और उसे डराने-धमकाने लगे। पहले तो बच्चा पैसे देता रहा, फिर मानसिक दबाव और भय के चलते आत्महत्या कर ली। इन्हीं दिनों हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में एक टीनेजर ने ऑनलाइन गेम के अपने एक विदेशी साथी के बिछुड़ने की पीड़ा के चलते जीवन का साथ छोड़ दिया। विडम्बना है कि खेल भी ना केवल स्क्रीन की दीवार तक ही सिमट गए बल्कि बच्चों की दुनिया को भी समेट रहे हैं। कई ऑनलाइन गेम मन-मस्तिष्क को काबू करते हुए उनसे मनचाही हरकतें करवा रहे हैं। चैलेंज और आपराधिक चालबाजी का यह जाल बच्चों को मौत के मुंह तक ले जा रहा है।   

व्यावहारिक रूप से जिन चीजों का बच्चों के जीवन में कोई स्थान ही नहीं होना चाहिए, वे नई पीढ़ी के जीने-मरने की परिस्थितियां बना रही हैं। स्मार्ट गैजेट्स के कारण बच्चे जिंदगी से ही लॉगआउट हो रहे हैं। ब्लू व्हेल जैसे गेम के कारण ही अब तक दुनियाभर में  250 से ज्यादा बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं। हमारे देश में भी कई बच्चों ने ब्लू व्हेल खेल के कारण ही आत्मघाती कदम उठाया है। जिसके चलते केंद्र सरकार द्वारा आत्महत्या के लिए उकसाने वाले ब्लू व्हेल गेम पर रोक लगाते हुए प्रमुख सर्च इंजन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यह गेम डाउनलोड करने के लिंक हटाने तक को कहा था। इसके अलावा कीकी चैलेंज, मोमो चैलेंज और  पबजी जैसे ऑनलाइन गेम्स में मिले वर्चुअल चैलेंज भी बच्चों का जीवन छीनने के कारण बन चुके हैं। ऑनलाइन गेम में घर बैठे बच्चों की मनः स्थिति के भटकाव के पीछे कई कारण हैं। टीनेज बच्चों को कभी डराकर तो कभी खेल के रोमांच के नाम पर ब्रेनवाश किया जाता है।

एकबार वर्चुअल खेलों के आदी होने एक बाद बच्चों की मानसिकता बदल जाती है। अपनों से ज्यादा अनजान चेहरों या मशीनी प्रॉम्प्टस की बात मानने लगते हैं। खुद को कुछ विशेष अनुभव करने की फीलिंग आ जाती है। ऑनलाइन खेल के दौरान उनकी मनोवृत्ति में आए भटकाव का एक कारण अपनों की अनदेखी भी होती है। अधिकतर अभिभावक समय रहते नहीं चेतते हैं।

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इस मामले में भी तीनों बहनों का मोबाइल एडिक्शन हद से ज्यादा बढ़ने और स्कूल तक जाना बंद कर देने के बाद परिवार ने मोबाइल के प्रयोग पर रोक लगाई थी। स्पष्ट है कि एक ओर साइबर संसार की अनदेखी- अनजान दुनिया बच्चों की समझ छीनती है तो दूसरी ओर अपनों से सही समय पर मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है। ऑनलाइन गेम्स के लती होने के बाद की गई सख्ती बच्चे नहीं झेल पाते और अतिवादी कदम उठा लेते हैं।

उत्तर प्रदेश बाल कल्याण समिति की रिपोर्ट के अनुसार 3 साल के समय में 3500 बच्चे अभिभावकों द्वारा मोबाइल का प्रयोग नहीं करने देने के कारण घर से भाग गए थे। यह आंकड़ा स्मार्ट गैजेट्स के लती बन रहे बच्चों के बदलते व्यवहार ही नहीं, परवरिश के मोर्चे पर हो रही गलतियों की भी बानगी है। अभिभावकों को यह समझना होगा साइकोलॉजिकली बच्चे ऑनलाइन गेम या स्क्रीन के संसार की दूसरी गतिविधियों से इतना क्यों जुड़ जाते हैं? कैसे उनका मन अनजाने-अनदेखे चेहरों, किसी देश के कल्चर या ऑनलाइन खेल के जानलेवा चैलेंज को मानने लगता है?

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अभिभावक रहें सजग

निःसंदेह, ऐसी घटनाएं ऑनलाइन गेम्स और आभासी संसार के बढ़ते दखल के प्रति सचेत करते हैं। विशेषकर अभिभावकों के लिए यह गम्भीरता से सोचने और गहराई से समझने का विषय बना गया है कि स्मार्ट गैजेट्स पर बच्चे मनोरंजन के नाम पर कैसे खेल खेल रहे हैं? गैजेट्स का प्रयोग किन गतिविधियों के लिए कर रहे हैं? जिसका सीधा सा अर्थ है कि पेरेंट्स को कई फ्रंटस पर सजग रहना होगा।

सख्ती की बजाय उचित मार्गदर्शन से ही बच्चों को ऐसे एडिक्शन से निकाला जा सकता है। वास्तविक दुनिया में समय और स्नेह देकर ही उनका जीवन सहेजा जा सकता है, बस आवश्यकता है स्नेह व उचित मार्गदर्शन की। 

  • बच्चे के बदलते व्यवहार पर चेतें।
  • पसंद की एक्टिविटीज की बजाय स्मार्ट फोन में खोया रहे। 
  • गेम न खेल पाने पर आक्रोश जताए या चुप्पी चुन ले। 
  • एकेडेमिक मोर्चे पर पिछड़ने लगे।
  • अटेंशन स्पैन कम हो जाए।
  • समाज या परिवार में मेलजोल में रुचि ना ले।
  • किसी खास गेमिंग कैरेक्टर की तरह बर्ताव करे।
  • घर के महंगे सामान या पैसे गायब होने लगे।
  • बच्चा डरा-सहमा और अकेला रहने लगे।

डॉ. मोनिका शर्मा

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Tags: #DigitalSafety #GamingAddiction #ScreenTime #CyberSafety #मानसिकस्वास्थ्य #BlueWhale #FreeFire #ChildSafety #StopGameAddiction #DigitalParenting #OnlineGameRisk

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