मनुष्य के इतिहास में संभवतः पहली बार ऐसा समय आया है जब शोर सामान्य स्थिति बन गया है और मौन असामान्य। सुबह आँख खुलते ही चेतना जिन ध्वनियों से टकराती है, वे रात तक पीछा नहीं छोड़तीं। मोबाइल की घंटी, संदेशों की चेतावनी, समाचारों की आवाज़, सड़कों का कोलाहल, कार्यस्थलों का निरंतर संवाद और फिर मनोरंजन के नाम पर लगातार बजती ध्वनियाँ। इस निरंतर ध्वनि प्रवाह में मौन अब खालीपन नहीं बल्कि असहजता का कारण बन गया है। किंतु आधुनिक विज्ञान अब इस स्थिति को नए दृष्टिकोण से देख रहा है। प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या मानव मस्तिष्क, जो लाखों वर्षों तक प्राकृतिक लयों और विरामों के साथ विकसित हुआ, इस निरंतर शोर को सहने के लिए जैविक रूप से तैयार है।

मानव मस्तिष्क का विकास प्राकृतिक वातावरण में हुआ जहाँ ध्वनियाँ थीं किंतु निरंतर नहीं। पक्षियों की आवाज़, हवा की सरसराहट, वर्षा की बूँदें और रात्रि की निस्तब्धता। इन सबके बीच शांति का स्थान केंद्रीय था। आधुनिक सभ्यता ने इस प्राकृतिक लय को तोड़ दिया है। अब मौन का स्थान तकनीकी ध्वनियों ने ले लिया है। यह परिवर्तन केवल सामाजिक नहीं है बल्कि जैविक भी है। न्यूरोसाइंस बताता है कि मस्तिष्क हर ध्वनि को संसाधित करता है चाहे वह अर्थपूर्ण हो या नहीं। निरंतर ध्वनि मस्तिष्क को सतत सक्रिय अवस्था में रखती है जिससे उसका विश्राम तंत्र बाधित हो जाता है।
मौन की जैविक भूमिका पर सबसे महत्त्वपूर्ण शोध दो हजार तेरह में प्रकाशित हुआ, जिसमें प्रयोगशाला में चूहों को अलग अलग ध्वनि स्थितियों में रखा गया। जिन चूहों को प्रतिदिन दो घंटे का पूर्ण मौन मिला, उनके मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस क्षेत्र में नई तंत्रिका कोशिकाओं का निर्माण अन्य सभी स्थितियों की तुलना में अधिक पाया गया। हिप्पोकैम्पस स्मृति और सीखने का मुख्य केंद्र होता है। यह अध्ययन इस धारणा को खंडित करता है कि केवल सकारात्मक ध्वनियाँ ही मस्तिष्क के लिए लाभकारी होती हैं। वास्तव में मौन स्वयं मस्तिष्क के लिए एक शक्तिशाली जैविक संकेत है।
शोध बताते हैं कि निरंतर शोर मस्तिष्क के श्रवण क्षेत्र के साथ-साथ भावनात्मक केंद्र को भी सक्रिय रखता है। इससे तनाव हार्मोन की मात्रा बढ़ जाती है। यह प्रक्रिया तब भी चलती रहती है जब व्यक्ति स्वयं को शोर का आदी मानने लगता है। शरीर अनुकूलन नहीं करता बल्कि भीतर ही भीतर तनाव जमा होता रहता है। यही कारण है कि आधुनिक समाज में मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी बढ़ती जा रही है। इसे केवल जीवनशैली की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है क्योंकि इसके पीछे स्पष्ट जैविक कारण मौजूद हैं।
मौन को प्रायः निष्क्रिय अवस्था माना जाता है लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह धारणा गलत सिद्ध हो रही है। अनुसंधानों से यह पता चला है कि पूर्ण मौन की अवस्था में मस्तिष्क विशेष प्रकार की सक्रियता में प्रवेश करता है। इसे डिफॉल्ट मोड नेटवर्क कहा जाता है। यह वही अवस्था है जहाँ मस्तिष्क आत्मचिंतन करता है, स्मृतियों को पुनर्गठित करता है और भविष्य की संभावनाओं का आकलन करता है। आधुनिक जीवन में निरंतर व्यस्तता और ध्वनि इस अवस्था को सक्रिय ही नहीं होने देती। परिणामस्वरूप मनुष्य प्रतिक्रियाशील बन जाता है और चिंतनशील क्षमता घटने लगती है।
एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन में यह पाया गया कि प्रतिदिन कुछ समय का पूर्ण मौन मस्तिष्क के स्मृति केंद्र में नई तंत्रिका कोशिकाओं के निर्माण को प्रोत्साहित करता है। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि केवल सकारात्मक ध्वनियाँ ही मस्तिष्क के लिए लाभकारी होती हैं। इस शोध ने यह स्पष्ट कर दिया कि मौन स्वयं एक सक्रिय जैविक संकेत है। यह मस्तिष्क को पुनर्निर्माण का अवसर देता है। इससे स्मृति, सीखने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन बेहतर होता है।

मौन का संबंध केवल मस्तिष्क तक ही सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव हृदय और तंत्रिका तंत्र पर भी पड़ता है। लगातार शोर वाले वातावरण में रहने वाले लोगों में उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों की संभावना अधिक पाई गई है। इसके विपरीत शांत वातावरण में समय बिताने से तंत्रिका तंत्र का वह भाग सक्रिय होता है जो शरीर को विश्राम और मरम्मत की अवस्था में ले जाता है। यह वही तंत्र है जो गहरी नींद और शारीरिक पुनर्निर्माण से जुड़ा है।
नींद और मौन का संबंध विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मस्तिष्क नींद के दौरान दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है। लेकिन यदि सोने से पहले व्यक्ति को शांत और ध्वनिरहित समय न मिले तो मस्तिष्क विश्राम की अवस्था में प्रवेश नहीं कर पाता। शोध बताते हैं कि सोने से पहले मौन का समय मिलने पर नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है और स्मृति स्थायी रूप से सुदृढ़ होती है। इसके विपरीत लगातार ध्वनि या स्क्रीन का उपयोग नींद को सतही बना देता है।
बच्चों के संदर्भ में मौन और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। बाल्यावस्था में मस्तिष्क अत्यधिक संवेदनशील होता है। लगातार ध्वनि और उत्तेजनाओं में पलने वाले बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और भावनात्मक नियंत्रण अपेक्षाकृत कमजोर पाया गया है। इसके विपरीत जिन बच्चों को शांत वातावरण और अकेले समय का अवसर मिलता है उनमें आत्मनियंत्रण और सृजनशीलता अधिक विकसित होती है। यह तथ्य मौन को केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि शैक्षिक आवश्यकता के रूप में भी प्रस्तुत करता है।
रचनात्मकता के क्षेत्र में भी मौन की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विभिन्न प्रयोगों में यह पाया गया कि मौन में काम करने वाले व्यक्ति अधिक मौलिक समाधान प्रस्तुत करते हैं। शोर में काम करने वाले लोग जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं लेकिन उनकी सोच गहराई से रहित होती है। मौन मस्तिष्क को विचारों के बीच संबंध स्थापित करने का समय देता है। यही प्रक्रिया सृजनशीलता का मूल है।
प्राकृतिक वातावरण का मौन विशेष प्रकार का होता है। इसमें पूर्ण नीरवता नहीं होती बल्कि जीवन की कोमल ध्वनियाँ होती हैं। यह प्रकार का मौन मस्तिष्क और शरीर दोनों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। वन क्षेत्रों में समय बिताने से तनाव कम होता है और मानसिक स्पष्टता बढ़ती है। यह प्रभाव केवल मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि जैविक भी है।

भारतीय परंपरा में मौन को सदियों से विशेष महत्व दिया गया है। ध्यान और योग की परंपराएँ मौन को आत्मज्ञान और मानसिक संतुलन का साधन मानती रही हैं। आधुनिक विज्ञान अब इन अनुभवों के जैविक आधार खोज रहा है। यह स्थिति परंपरा और विज्ञान के बीच एक सार्थक संवाद की ओर संकेत करती है।
आज का समाज मौन से डरने लगा है। अकेले चुप बैठना असहज लगता है इसलिए हम हर समय किसी न किसी ध्वनि से खुद को घेर लेते हैं। यह स्थिति केवल आदत नहीं बल्कि एक मानसिक निर्भरता बन चुकी है। जब आत्मसंवाद का समय घटता है तो व्यक्ति बाहरी विचारों का उपभोक्ता बन जाता है। ऐसे समाज में गहन विचार और विवेक का क्षरण होता है।
भविष्य के स्वास्थ्य विज्ञान में मौन को एक गैर औषधीय उपचार के रूप में देखा जा सकता है। जैसे आज व्यायाम और संतुलित आहार की सलाह दी जाती है वैसे ही आने वाले समय में ध्वनि संतुलन की भी बात होगी। कुछ देशों में शांत क्षेत्र और ध्वनि सीमाओं पर काम शुरू हो चुका है। यह संकेत है कि मौन अब केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न बनता जा रहा है।
मौन का विज्ञान हमें यह समझाता है कि चुप्पी कोई खालीपन नहीं बल्कि जैविक पोषण है। यह मस्तिष्क को स्वयं से मिलने का अवसर देती है। मौन स्मृति को सुदृढ़ करता है, भावनाओं को संतुलित करता है और मनुष्य को प्रतिक्रियात्मक जीवन से चिंतनशील जीवन की ओर ले जाता है। शोर से भरी दुनिया में मौन बनाए रखना मानसिक स्वतंत्रता का सबसे गहरा रूप हो सकता है। संभव है कि आने वाले समय में मौन को भी उतना ही आवश्यक माना जाए जितना भोजन और नींद को। यही मौन का विज्ञान है और यही उसकी मानव जीवन में अपरिहार्य भूमिका।
– डॉ दीपक कोहली

