| महाशिवरात्रि भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का वह दिव्य पर्व है, जहाँ खगोल विज्ञान, वेदान्त, योग, तन्त्र और भक्ति सभी एक बिन्दु पर आकर संगम करते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि चेतना के उत्कर्ष का विज्ञान है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली यह रात्रि ‘शून्य से अनन्त की यात्रा का प्रतीक है। वह क्षण जब साधक अपने भीतर स्थित ‘शिव तत्व’ का साक्षात्कार कर सकता है। |
लिंगोद्भव : अनन्त ज्योति का प्राकट्य
महाशिवरात्रि के मूल में ‘लिंगोद्भव’ की अद्भुत कथा निहित है। शिव पुराण और लिंग पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हुआ, तब शून्य से एक अनंत अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ। न उसका आदि था, न अन्त।
ब्रह्मा हंस रूप में ऊपर की ओर और विष्णु वराह रूप में नीचे की ओर खोजते रहे, परंतु सीमा न पा सके। तब उन्हें अनुभव हुआ कि यह अनंत प्रकाश ही परम तत्त्व है, वही शिव हैं।
‘लिंग’ का अर्थ है चिह्न या प्रतीक। शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। यह किसी व्यक्ति-विशेष की प्रतिमा नहीं, बल्कि उस अनंत चेतना का दार्शनिक संकेत है जो सृष्टि का मूल है।
महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि इसी अनंत ज्योति के प्राकट्य का काल मानी जाती है।
पंचतत्वों का स्वामी : पंचभूत स्थलम वेदान्त कहता है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल कणों में व्याप्त हैं। दक्षिण भारत के पाँच मंदिर शिव के पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं: एकाम्रेश्वर (पृथ्वी), जम्बुकेश्वर (जल), अरुणाचलेश्वर (अग्नि), कालहस्ती (वायु) और चिदंबरम (आकाश)। यह दर्शन हमें सिखाता है कि शिव की पूजा वास्तव में प्रकृति की रक्षा और पंचतत्वों के सम्मान की पूजा है।
ज्योतिर्लिंग : अनंत ज्योति के पृथ्वी पर केंद्र
लिंगोद्भव की वही अनंत ज्योति बारह स्थलों पर ‘ज्योतिर्लिंग’ के रूप में प्रतिष्ठित मानी जाती है। उनमें प्रमुख हैं :
* सोमनाथ मंदिर
* काशी विश्वनाथ मंदिर
* महाकालेश्वर मंदिर
* केदारनाथ मंदिर
ज्योतिर्लिंग यह संदेश देते हैं कि शिव केवल दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवंत अनुभूति हैं।
शिव और शक्ति का दिव्य मिलन
पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि पर शिव और पार्वती का विवाह हुआ। वेदांत में यह ‘पुरुष’ (चेतना) और ‘प्रकृति’ (ऊर्जा) के मिलन का प्रतीक है। जब ज्ञान और क्रिया, ध्यान और शक्ति, वैराग्य और सृजन—संतुलित होते हैं, तभी जीवन पूर्ण होता है।
नटराज : ब्रह्मांड का दिव्य नृत्य
शिव का तांडव केवल नृत्य नहीं, ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है। नटराज रूप में शिव सृष्टि, स्थिति और संहार के चक्र को दर्शाते हैं।
* अग्नि-वृत्त : ब्रह्मांडीय ऊर्जा
* डमरू : सृष्टि का प्रथम नाद
* अपस्मार पर चरण : अज्ञान का दमन
* उठाया हुआ पैर : मोक्ष का मार्ग
आधुनिक भौतिकी के अनुसार भी ब्रह्मांड निरंतर कंपन और गति में है— शिव का तांडव उसी शाश्वत लय का प्रतीक है।
वैदिक आधार : रुद्राध्याय और महामृत्युंजय
महाशिवरात्रि की रात्रि में यजुर्वेद के ‘श्री रुद्रम’ का पाठ विशेष फलदायी माना गया है।
महामृत्युंजय मंत्र :
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यह मंत्र मृत्यु-भय से मुक्ति और चेतना के जागरण का प्रतीक है।
चार प्रहरों की साधना परंपरा
महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में पूजा की परंपरा है :
* प्रथम प्रहर : जलाभिषेक
* द्वितीय : दुग्ध
* तृतीय : दधि/घृत
* चतुर्थ : मधु व बेलपत्र
यह क्रम पंचतत्वों की शुद्धि और चेतना के क्रमिक उत्थान का प्रतीक है।
वैज्ञानिक दृष्टि : ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन
महाशिवरात्रि अमावस्या से पूर्व की रात्रि है, जब चंद्रमा अत्यंत क्षीण होता है। चंद्रमा मन का कारक है। इस समय मन अपेक्षाकृत शांत होता है, अतः ध्यान-साधना अधिक प्रभावी होती है।
योगशास्त्र के अनुसार इस रात्रि में शरीर की ऊर्जा (कुण्डलिनी) ऊपर की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। इसलिए ‘जागरण’ का अर्थ है— रीढ़ सीधी रखकर सचेत अवस्था में बैठना।
उपवास भी शरीर की शुद्धि और मानसिक स्पष्टता का साधन है। ‘उप-वास’ अर्थात स्वयं के निकट बैठना।
महाकाल : समय और योग का संगम शिव ‘महाकाल’ हैं— समय के स्वामी। महाशिवरात्रि वह संधि काल है जहाँ भौतिक समय का अंत होकर साधक अनंत काल में प्रवेश करता है। आदियोगी के रूप में शिव ने इसी समय के आसपास योगिक विज्ञान का प्रसार किया था। योगशास्त्र के अनुसार यह रात्रि ‘स्थिरता’ की पराकाष्ठा है। जब शरीर स्थिर होता है और रीढ़ सीधी होती है, तब व्यक्ति समय के बंधनों से मुक्त होकर अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को देख पाता है।
काशी : अविमुक्त क्षेत्र
वाराणसी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है— जहाँ शिव स्वयं मुक्ति प्रदान करते हैं। काशी यह सिखाती है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही शिव के अधीन हैं। मृत्यु भी यहाँ अंत नहीं, मोक्ष का द्वार मानी जाती है।
जीवन दर्शन : युवाओं के लिए संदेश
* विषपान : नकारात्मकता को शक्ति में बदलना।
* अर्धनारीश्वर : संतुलन और लैंगिक समानता का संदेश।
* भस्म : अनित्यता का बोध।
* त्रिशूल : इच्छा, ज्ञान और क्रिया का संतुलन।
नीलकंठ (इमोशनल इंटेलिजेंस) : विषपान का अर्थ केवल जहर पीना नहीं, बल्कि जीवन की कड़वाहट और अपमान को बिना विचलित हुए स्वीकार करना है। शिव ने विष को न निगला (ताकि स्वयं को हानि न हो) और न ही उगला (ताकि संसार का अहित न हो), बल्कि उसे ‘कंठ’ में स्थित किया। यह आधुनिक युवाओं के लिए ‘भावनात्मक संतुलन’ (Emotional Balance) का सबसे बड़ा पाठ है— बाहरी आलोचना को अपनी साधना की ऊर्जा में बदल देना।
सामाजिक समरसता
शिव ‘पशुपति’ हैं सभी के स्वामी। उनकी बारात में देव, दानव, मनुष्य, पशु सभी सम्मिलित हैं। यह समावेशिता का सर्वोच्च आदर्श है।
महाशिवरात्रि हमें समाज की बुराइयों नशा, भ्रष्टाचार, अस्वच्छता के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती है। अपनी ऊर्जा लोककल्याण में समर्पित करना ही सच्चा रुद्राभिषेक है।
प्रकृति का संरक्षण और पशुपति स्वरूप शिव ‘पशुपति’ हैं, जो न केवल मनुष्यों बल्कि समस्त जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के रक्षक हैं। महाशिवरात्रि पर बेलपत्र, धतूरा और बेर जैसी जंगली वनस्पतियों का अर्पण यह संदेश देता है कि सृष्टि में कुछ भी ‘अशुभ’ या ‘व्यर्थ’ नहीं है। जिन वस्तुओं को समाज ‘त्याज्य’ मानता है, शिव उन्हें शिरोधार्य करते हैं। यह पर्व हमें पर्यावरण संरक्षण और जैव-विविधता (Biodiversity) के सम्मान की प्रेरणा देता है।
राष्ट्रीय चेतना और आत्मनिर्भरता शिव का ‘स्व’ से जुड़ाव हमें अपनी जड़ों के प्रति गौरव सिखाता है। ‘स्व’ का अर्थ केवल स्वयं का विकास नहीं, बल्कि अपनी स्व-भाषा, स्व-संस्कृति और स्व-धर्म के प्रति सम्मान है। जब हम शिव की तरह आत्मनिर्भर और अपनी शक्ति में स्थित होते हैं, तभी हम एक श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
“स्व” का जागरण
महाशिवरात्रि उपवास की रात नहीं, ‘उप-वास’ की रात है स्वयं के समीप बैठने की। यह अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संकल्प है। शिव अद्वैत हैं परमात्मा बाहर नहीं, भीतर है।
जब साधक इस रात्रि में जागता है, तो वह केवल रात नहीं जागता, वह अपनी चेतना को जागृत करता है।
महाशिवरात्रि हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है, आत्मगौरव जगाती है और अंततः व्यक्ति को आत्मनिर्भर एवं राष्ट्रनिर्माता बनाती है।
सत्यं शिवम् सुन्दरम्।
हर हर महादेव।
– अखिलेश चौधरी

