उत्तर प्रदेश में आज जो हुआ, वह कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस्लामिक कट्टरवाद और जिहादी मानसिकता के विरुद्ध योगी जी ने लगभग 10 वर्ष पूर्व जो संघर्ष प्रारम्भ किया था, उस संघर्ष में आज की रात्रि स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई। गाजियाबाद के लोनी में यूट्यूबर सलीम वास्तिक पर हुए जानलेवा हमले के मामले में पुलिस ने हमले के मुख्य आरोपी जीशान को मुठभेड़ में ढेर कर दिया है। पुलिस के मुताबिक एनकाउंटर के दौरान जीशान को दो गोलियाँ लगीं। उसे घायल अवस्था में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। जीशान अमरोहा का रहने वाला था।
शुक्रवार सुबह बाइक सवार दो हमलावर सलीम के दफ़्तर में घुसे और उन्होंने गर्दन तथा पेट पर चाकू से ताबड़तोड़ वार किए। सब कुछ कुछ ही पलों में हो गया। गंभीर रूप से घायल सलीम को तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया और बाद में दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल सूत्रों के अनुसार उनकी गर्दन का ऑपरेशन हो चुका है, एक और सर्जरी शेष है। हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है और इलाज जारी है।

सलीम वास्तिक स्वयं को ‘एक्स मुस्लिम’ बताते थे और इस्लाम से जुड़े अपने अनुभवों तथा विचारों को खुलकर सामने रखते थे। इसी कारण कट्टरपंथी इस्लामिक जिहादी तत्व उनसे विचलित बताए जाते थे और उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रही थीं। अंततः वही हुआ जिसकी आशंका जताई जा रही थी वैचारिक असहमति का उत्तर हिंसा से देने का प्रयास किया गया।
योगी जी को इस कार्रवाई के लिए पूरे समाज की ओर से साधुवाद दिया जाना चाहिए। इस्लामिक कट्टरवाद के विरुद्ध यह एक निर्णायक कदम माना जा रहा है और समाज का एक बड़ा वर्ग इसे उसी रूप में देख भी रहा है। लोगों का कहना है कि योगी जी ने जो कहा था अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा, उसे व्यवहार में भी दिखाया है।
त्वरित कार्रवाई की बात करें तो आज योगी प्रशासन और यूपी पुलिस की कार्यशैली की तुलना अक्सर इसी संदर्भ में की जाती है। धारणा यह बन चुकी है कि मामला चाहे जैसा भी हो, यदि शासन तक बात पहुँच गई तो कार्रवाई में देर नहीं लगती।
लोग कहते हैं कि 48 से 72 घंटे के भीतर परिणाम सामने आ जाता है, वह तस्वीर, जिसका इंतजार होता है, आ ही जाती है। यही त्वरित प्रतिक्रिया आज उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक पहचान बनती दिखाई दे रही है।

उत्तर प्रदेश के बदलते स्वरूप की कहानी इस लेख के माध्यम से सुनाने जा रहा हूँ। 2017 से पहले का उत्तर प्रदेश याद कीजिए। लगभग हर जिले में कोई न कोई गुंडा, बदमाश या संगठित गिरोह सक्रिय था। शाम 7 बजे के बाद लोगों का घर से निकलना कठिन हो जाता था। बहन-बेटियाँ तो दिन में भी सुरक्षित नहीं थीं। विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थिति अत्यंत गंभीर थी। लोग अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेजते थे। अनेक परिवारों ने अपनी बेटियों को उत्तर प्रदेश से बाहर, दूर के रिश्तेदारों के यहाँ भेज दिया था।
यदि कोई व्यवसायी या व्यापारी काम करना चाहता — चाहे वह छोटा दुकानदार हो या बड़ी कंपनी का मालिक सबको हफ्ता या तथाकथित “गुंडा टैक्स” देना पड़ता था। 2017 से पूर्व उत्तर प्रदेश में भय का वातावरण था।
अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे माफिया खुलेआम हत्याएँ करते थे। कृष्णानंद राय की हत्या की घटना कौन भूल सकता है। 2005 का मऊ दंगा भी स्मरणीय है, जिसमें मुख्तार अंसारी पर खुलेआम जीप पर चढ़कर गोली चलाने के आरोप लगे। उस समय सपा सरकार पर मौन संरक्षण के आरोप लगाए जाते रहे।
गुंडे और माफिया जिलों को संचालित करते थे। लगभग हर जिले का एक बाहुबली प्रभावी होता था और वही व्यवहारतः “मालिक” जैसा प्रभाव रखता था। संगठित अपराध अपने चरम पर था।

ऐसी स्थिति थी कि कहा जाता था सरकारें माफियाओं के प्रभाव में चलती हैं। उनके संकेत पर तबादले और नियुक्तियाँ होती थीं। यदि कोई पुलिस अधिकारी माफियाओं के विरुद्ध कार्रवाई करता, तो कार्रवाई करने वाले अधिकारी के विरुद्ध ही कार्यवाही हो जाती थी।
इस स्तर का जंगलराज उत्तर प्रदेश में था। दंगे आम बात हो गए थे।
ऐसा युग 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में था। 2017 में जब योगी आदित्यनाथ जी ने मुख्य मंत्री पद की शपथ ली, तो उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि अपराधियों के लिए उत्तर प्रदेश में कोई स्थान नहीं है — या तो कानून का पालन करें या फिर जेल जाने के लिए तैयार रहें अथवा उत्तर प्रदेश छोड़ दे।
उस समय उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों और अपराध माफियाओं का व्यापक नेटवर्क सक्रिय था। अपहरण, फिरौती, जमीनों पर कब्जा और ठेकों पर नियंत्रण जैसी गतिविधियाँ संगठित रूप से संचालित होती थीं। आसपास के राज्यों तक में अपराध करने के लिए यूपी के इन माफियाओं के गुर्गे जाते थे।
प्रदेश सरकार ने 68 कुख्यात माफियाओं की सूची जारी की, जिनमें से 23 केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश से थे। इसके बाद इनके आर्थिक और आपराधिक ढांचे पर प्रहार शुरू हुआ। अवैध संपत्तियों की पहचान की गई, जब्ती और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई। लगभग ₹3,864 करोड़ से अधिक की संपत्ति जब्त की गई। बाद में कुल जब्ती की राशि ₹4,076 करोड़ से अधिक बताई गई। ₹142 अरब 46 करोड़ 18 लाख से अधिक की बेनामी और अवैध संपत्तियाँ चिन्हित कर कार्रवाई की गई।
कार्रवाई के परिणामस्वरूप कई अपराधी आत्मसमर्पण के लिए थानों तक पहुँचे। कुछ मुठभेड़ों में मारे गए, कुछ की बीमारी से मृत्यु हुई। 2020 तक 68 कुख्यात अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुँचाया गया।

इन अपराधियों में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, विजय मिश्रा, अनिल दुजाना, सुंदर भाटी, रणदीप भाटी, सुनील राठी, नीरज बवाना, योगेश भदौड़ा, बदन सिंह बद्दो, हाजी याकूब कुरैशी, संजीव जीवा (मृत), मुन्ना बजरंगी, विक्की त्यागी (मृत) सहित अनेक नाम शामिल रहे।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार 68 चिन्हित अपराधियों में से मुख्तार अंसारी, विजय मिश्रा, अतीक अहमद, योगेश भदौड़ा, मुनीर, सलीम, रुस्तम, सोहराब, अजीत सिंह उर्फ हप्पू, आकाश जाट, सिंहराज भाटी, सुंदर भाटी, मुलायम यादव, ध्रुव कुमार सिंह उर्फ कुंटू सिंह, अमित कसाना, एजाज, अनिल दुजाना, याकूब कुरैशी, बच्चू यादव, धर्मेंद्र किरठल, रणदीप भाटी, संजय सिंह सिंघला, अनुपम दुबे, विक्रांत उर्फ विक्की तथा उधम सिंह के विरुद्ध कार्रवाई की गई।
माफिया अतीक अहमद की गोली मारकर हत्या हो चुकी है। मुख्तार अंसारी की हृदयाघात से मृत्यु हुई। अनिल दुजाना मुठभेड़ में मारा गया। मुकीम काला की जेल में हत्या हुई। मुनीर को फांसी की सजा सुनाई गई थी और जेल में उसकी मृत्यु हो गई।
पूर्व डीजीपी ब्रजलाल के अनुसार कई बड़े गिरोहों की कमर तोड़ी गई। बदन सिंह बद्दो गैंग, मुख्तार अंसारी गैंग, अतीक अहमद गैंग, धनंजय सिंह गैंग और विजय मिश्रा गैंग कमजोर या निष्क्रिय हुए।
सजा प्राप्त प्रमुख अपराधी:
आकाश जाट – 3 और 7 वर्ष
सुंदर भाटी – आजीवन कारावास
मुनीर – मृत्युदंड
अजीत सिंह उर्फ हप्पू – 4 वर्ष
सलीम, सोहराब, रुस्तम – 7-7 वर्ष
मुलायम यादव – 5 वर्ष
ध्रुव कुमार सिंह – 10 वर्ष
योगेश भदौड़ा – 5 वर्ष
अमित कसाना – 6 वर्ष
एजाज – 5 वर्ष
विजय मिश्रा – 15 वर्ष
रणदीप भाटी – आजीवन कारावास
अनुपम दुबे – आजीवन कारावास
विक्रांत उर्फ विक्की – 10 वर्ष
जीरो टॉलरेंस नीति के तहत:
* 222 दुर्दांत अपराधी मुठभेड़ों में मारे गए
* 8,118 अपराधी घायल हुए
* 20,221 इनामी अपराधियों पर कार्रवाई हुई
* 79,984 अपराधियों पर गैंगस्टर अधिनियम लागू हुआ
* 930 पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) लागू हुआ
डीजीपी प्रशांत कुमार के अनुसार 2017 से दिसंबर 2024 तक:
* 68 चिन्हित माफिया पर प्रभावी पैरवी
* 73 अभियोगों में 31 माफिया और 74 सह-अभियुक्तों को आजीवन कारावास
* 2 को मृत्युदंड
* 795 अभियोग दर्ज
* 617 गिरफ्तारियाँ
* 359 शस्त्र लाइसेंस निरस्त
महिलाओं व नाबालिगों से जुड़े मामलों में:
* 27,425 अभियोगों में सजा
* 11,254 पॉक्सो मामलों में दोषसिद्धि
* 3,775 दहेज हत्या मामलों में सजा
ऑपरेशन कन्विक्शन (जुलाई 2023–दिसंबर 2024):
* 51 मृत्युदंड
* 6,287 आजीवन कारावास
* 1,091 को 20 वर्ष से अधिक
* 3,868 को 10–19 वर्ष
* 5,788 को 5 वर्ष से कम सजा
एंटी भू-माफिया टास्क फोर्स द्वारा:
* 66,000 हेक्टेयर भूमि मुक्त
* 142 भू-माफिया चिन्हित
* एसटीएफ द्वारा 653 जघन्य अपराध रोके गए
* एटीएस द्वारा 130 आतंकवादी एवं 171 रोहिंग्या/बांग्लादेशी तत्व गिरफ्तार
आज उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध पर कठोर कार्रवाई हुई है। समर्थकों के अनुसार यह परिवर्तन प्रशासनिक दृढ़ता और स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध पर अंकुश तो लगा ही, साथ ही लव जिहाद और दंगाई मानसिकता पर भी योगी जी की सरकार ने 2017 से प्रहार शुरू किए। उत्तर प्रदेश को दंगा-मुक्त बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए। चाहे लव जिहाद के विरुद्ध सख्त कानून बनाना हो, गौहत्या पर कठोर कानून लागू करना हो, ज्ञानवापी सर्वे कराना हो, संभल के दंगाइयों को सबक सिखाना हो, बरेली के मौलाना तौकीर रज़ा पर कार्रवाई करनी हो, या झंगूर बाबा द्वारा संचालित लव जिहाद नेटवर्क का पर्दाफाश करना हो, यह सब योगी जी की सरकार के पिछले 9 वर्षों में हुआ है।
दंगा-मुक्त वातावरण और लव जिहाद के विरुद्ध सख्त कार्रवाई यह बताती है कि जब नियत स्पष्ट हो, वैचारिक दृष्टि स्पष्ट हो और प्रतिबद्धता दृढ़ हो, तो असंभव भी संभव हो जाता है। वही योगी जी ने कर दिखाया है।
सलीम के ऊपर हमला करने वाले जीशान का एनकाउंटर आज बाबा की पुलिस ने कर दिया। यह केवल एक खबर नहीं है। यह उस संदेश की पुनः पुष्टि है कि उत्तर प्रदेश में अब हमला करके बच निकल जाना आसान नहीं रहा। जिसने चाकू उठाया, वह कानून से ऊपर नहीं है, यह स्पष्ट कर दिया गया है।
योगी जी से बेहतर हिंदुत्व का पैरोकार कोई नहीं है- यह मैं नारे में नहीं, अनुभव में कह रहा हूँ। आँख, नाक, कान खुले रखकर देख लीजिए। ज़मीन पर क्या बदला है, यह भाषण से नहीं, माहौल से समझ आता है। लोग अपनी राजनीति चमकाने के लिए, दबाव बनाने के लिए या क्षणिक लाभ के लिए योगी जैसे राजर्षि पर प्रश्न उठा सकते हैं। पर सच्चाई यह है कि ज़मीन पर उनसे कुछ बिगड़ नहीं पाया है।
उत्तर प्रदेश ने जो परिवर्तन देखा है, उसे नकारना आसान नहीं है। हमने वह समय भी देखा है जब जाति के नाम पर वोट पड़ते थे और परिणाम अराजकता, दंगे और बहन-बेटियों की असुरक्षा के रूप में सामने आता था। आज यदि व्यवस्था सख्त है, तो इसलिए है कि पहले ढील ने क्या दिया था, वह सबने देखा है।
इसलिए मैं कह रहा हूँ उत्तर प्रदेश के इस बदलाव को अपनी आँखों से देखिए, स्वीकार कीजिए। जाति से ऊपर उठिए। यदि व्यवस्था मजबूत हो रही है, यदि अपराधी भय में हैं और सामान्य नागरिक निर्भय है, तो उस दिशा के साथ खड़ा होना चाहिए।
हिंदुत्व मेरे लिए केवल शब्द नहीं है। वह व्यवस्था का विश्वास है, समाज की सुरक्षा है और शासन की दृढ़ता है। यदि आज यह दृढ़ता दिख रही है तो उसे मजबूत करना ही समाज का कर्तव्य है।
समय गवाह है डर के दिन भी हमने देखे हैं और आज का बदलाव भी देख रहे हैं। अब निर्णय हमारा है कि हम किसके साथ खड़े रहना चाहते हैं।
–दीपक कुमार द्विवेदी
