फ़्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों और जर्मन चांसलर फ़्रेडरिक मेर्ज़ ने एक ऐतिहासिक संयुक्त घोषणा की है। दोनों देशों ने परमाणु निवारण (न्यूक्लियर डेटेरेंस) के क्षेत्र में आपसी सहयोग को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का निर्णय लिया है। यूरोप की सुरक्षा की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ा क़दम है, विशेषकर रूस से बढ़ते ख़तरे, मध्य पूर्व में युद्ध से उत्पन्न अस्थिरता और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नैटो) के प्रति अमरीकी प्रतिबद्धताओं पर उठते सवालों के बीच।
इस समझौते के तहत एक उच्च-स्तरीय ‘परमाणु समन्वय समूह’ का गठन किया जाएगा, जो रणनीतिक संवाद और सहयोग को मज़बूत करेगा। जर्मनी अब फ़्रांस के परमाणु अभ्यासों में पारंपरिक भूमिका निभाएगा, रणनीतिक स्थलों के संयुक्त दौरों में सम्मिलित होगा और मिसाइल रक्षा और वायु रक्षा जैसी क्षमताओं पर यूरोपीय साझीदारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेगा।

फ़्रांस अपने परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाने की योजना भी बना रहा है। वह अपने सहयोगी देशों के क्षेत्रों में अस्थायी रूप से परमाणु बम वाले विमानों को तैनात करने की तैयारी में है। हालांकि, इन हथियारों के प्रयोग का अंतिम निर्णय फ़्रांस के राष्ट्रपति के पास ही सुरक्षित रहेगा।
भारत के लिए भी यह घटनाक्रम बहुत महत्त्वपूर्ण है। भारत अपनी ‘विश्वसनीय न्यूनतम निवारण’ (मिनिमम क्रेडिबल डेटेरेंस) और परमाणु हथियार का ‘पहले प्रयोग न करने’ की नीति पर अडिग है, जबकि उसे पाकिस्तान और चीन जैसे परमाणु-संपन्न पड़ोसियों से निरंतर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
यूरोप का यह निर्णय भारत की उस पुरानी सोच को सही सिद्ध करता है, जिसमें वह अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता पर ज़ोर देता आया है। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि बाहरी सुरक्षा गारंटियाँ राजनैतिक परिवर्तनों की भेंट चढ़ सकती हैं, इसलिए स्वदेशी शक्ति ही सबसे विश्वसनीय रास्ता है।
इसके अतिरिक्त, फ़्रांस भारत का एक भरोसेमंद रक्षा साझीदार भी है। राफ़ेललड़ाकू विमान, स्कॉर्पीन पनडुब्बियाँ और जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना इसके पुख्ता प्रमाण हैं।
फ़्रांस-जर्मनी के गहराते समन्वय से यूरोप में रक्षा उद्योग मज़बूत होंगे जिससे भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र और छोटे परमाणु रिएक्टर तैयार करने में फ़ायदा मिल सकता है। इसलिए, यह समझौता भारत के लिए कोई संकट नहीं, बल्कि दुनिया के बहुध्रुवीय होने का एक स्पष्ट संकेत है।
सबसे बड़ी बात यह कि एनपीटी के सदस्य फ़्रांस का यह कदम एक ज़िम्मेदार परमाणु शक्ति होने के भारत के दावे को भी मज़बूती देता है। भारत एनपीटी को भेदभावपूर्ण मानता है और इसी कारण उस पर भारत ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। अब दुनिया समझ रही है कि परमाणु हथियार रखना ज़रूरी है, बशर्ते उसे सख़्त अनुशासन और आत्मरक्षा से जोड़ा जाए।

