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dehydration symptoms

कब और क्यों लगती है प्यास

by हिंदी विवेक
in स्वास्थ्य
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प्यास केवल एक साधारण अनुभव नहीं, बल्कि हमारे शरीर की जटिल जैविक व्यवस्था का एक अत्यंत सूक्ष्म संकेत है। यह हमें बताती है कि शरीर में पानी और घुले हुए लवणों का संतुलन बिगड़ने लगा है, और अब सुधार की आवश्यकता है।

मानव शरीर का लगभग दो-तिहाई भाग पानी से बना होता है। पानी रक्त का मुख्य घटक है, कोशिकाओं के भीतर और बाहर का माध्यम है, पाचन, तापमान-संतुलन, पोषक तत्वों के परिवहन और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के लिए अनिवार्य है। जब हम सांस लेते हैं, पसीना बहाते हैं, पेशाब या मल के रूप में द्रव बाहर निकलता है, तो शरीर में पानी लगातार कम होता रहता है। यदि यह कमी केवल थोड़ी सी भी बढ़ जाए, तो शरीर तुरंत अलर्ट मोड में चला जाता है – यही अलर्ट हमें “ प्यास ” के रूप में महसूस होता है।

Complications due to Dehydration – Kmh Health blog

प्यास की अनुभूति का केंद्र मस्तिष्क के एक छोटे से हिस्से अधश्चेतक ( हाइपोथैलेमस ) में स्थित होता है। इस क्षेत्र में विशेष कोशिकाएं (ओस्मोरिसेप्टर्स) होती हैं जो रक्त में घुले लवणों (विशेषकर सोडियम) की सांद्रता के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। जैसे ही शरीर में पानी कम होता है, रक्त थोड़ा “ गाढ़ा ” हो जाता है, यानी उसमें घुले कणों की सांद्रता बढ़ जाती है। ये कोशिकाएं इस बदलाव को पहचानकर मस्तिष्क के प्यास के सर्किट को सक्रिय कर देती हैं, और हमें पानी पीने की इच्छा होने लगती है।

Indian man drinking water from glass while resting in bed at home | Premium  Photo

जब शरीर में पानी की कमी बढ़ जाती है, इसे डीहाइड्रेशन कहा जाता है। हल्के डीहाइड्रेशन में हमें कुछ सामान्य लक्षण दिखाई देते हैं – होंठों का सूखना, गला रूखा लगना, सिर भारी होना, थकान, चक्कर जैसा महसूस होना, और गहरे रंग का मूत्र। यह शरीर का रक्षात्मक तंत्र है, क्योंकि यदि पानी की कमी और बढ़ जाए तो रक्तचाप गिर सकता है, हृदय को पम्प करने में कठिनाई हो सकती है, मस्तिष्क के न्यूरॉन्स का आकार थोड़ा सिकुड़ सकता है और सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए प्यास को अनदेखा करना केवल असुविधा नहीं, स्वास्थ्य के लिए वास्तविक जोखिम भी हो सकता है।

प्यास के साथ-साथ शरीर एक और सुरक्षा तंत्र भी चलाता है – एंटीडाययूरेटिक हार्मोन या वैसोप्रेसिन का स्राव। जब पानी की कमी होती है, तो मस्तिष्क यह हार्मोन अधिक मात्रा में छोड़ता है, जो गुर्दों को संकेत देता है कि वे पानी “ बचाकर ” रखें और पेशाब को गाढ़ा बना दें। इस तरह शरीर पानी की हानि कम कर देता है। इसलिए डीहाइड्रेशन के समय मूत्र कम मात्रा में और अधिक गहरे रंग का दिखता है। यह एक सुंदर उदाहरण है कि कैसे प्यास और हार्मोन साथ मिलकर शरीर का संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं।

प्यास का अनुभव सिर्फ रासायनिक बदलावों पर

Drinking water side view young indian woman enjoy pure fresh cool mineral  water at morning profile निर्भर नहीं होता; यह हमारे व्यवहार और आदतों से भी प्रभावित होता है। बहुत गर्म मौसम, तेज व्यायाम, मसालेदार या अधिक नमकीन भोजन, या अत्यधिक कैफीन और अल्कोहल का सेवन – ये सब प्यास को बढ़ा सकते हैं क्योंकि या तो ये शरीर से पानी ज्यादा निकलवाते हैं या रक्त में लवणों की मात्रा बढ़ाते हैं। वहीं कुछ लोग आदत से नियमित पानी पीते रहते हैं, जिससे प्यास का तीव्र अनुभव अपेक्षाकृत कम महसूस होता है, जबकि कुछ लोग प्यास लगने तक पानी टालते रहते हैं और बार-बार सिरदर्द, थकान की शिकायत करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि उम्र बढ़ने के साथ प्यास की भावना कुछ हद तक मंद पड़ जाती है। बुजुर्गों में ओस्मोरिसेप्टर्स और प्यास के सर्किट की संवेदनशीलता युवा अवस्था जितनी तेज नहीं रहती, इसलिए उन्हें उतनी जल्दी या उतनी तीव्र प्यास महसूस नहीं होती, भले ही शरीर में पानी की कमी हो रही हो। इसी कारण वृद्ध लोगों में डीहाइड्रेशन का खतरा अधिक होता है। बच्चों में उल्टा स्थिति होती है – वे तेजी से खेलते-दौड़ते हैं, उनका मेटाबॉलिज़्म तेज होता है, और वे जल्दी-जल्दी पानी खोते हैं, इसलिए उन्हें समय-समय पर पानी देना जरूरी होता है, भले ही वे खुद प्यास की शिकायत न करें।

Nutritionist Shares Why Just Water Falls Short In Treating Dehydration

जब बाहरी तापमान बढ़ता है, शरीर अपने तापमान को स्थिर रखने के लिए पसीना बहाता है। पसीने के वाष्पीकरण से शरीर ठंडा होता है, लेकिन साथ ही काफी मात्रा में पानी भी निकल जाता है। इसलिए गर्मी के मौसम में प्यास अधिक महसूस होती है। यदि गर्मी में हम पर्याप्त पानी न लें, तो हीट एक्ज़ॉशन या हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिनमें शरीर का तापमान अनियंत्रित रूप से बढ़ जाता है और जान का खतरा तक हो सकता है। इस दृष्टि से प्यास हमारे लिए एक जीवनरक्षक अलार्म की तरह काम करती है।

प्यास केवल शारीरिक नहीं, अनुभवजन्य और मनोवैज्ञानिक भी होती है। विज्ञापन, ठंडे पेय की तस्वीरें, या किसी को पानी पीते देखना, अचानक हमें प्यास महसूस करा सकता है, भले ही शरीर को वास्तविक रूप से पानी की तत्काल आवश्यकता न हो। इसे एंटिसिपेटरी या पूर्वानुमानित प्यास भी कहा जा सकता है। मस्तिष्क अनुभव और परिस्थितियों के आधार पर अनुमान लगाता है कि आगे पानी की जरूरत होगी, और पहले से इच्छा पैदा कर देता है। इसी कारण व्यायाम शुरू करने से पहले थोड़ा पानी पीने की सलाह दी जाती है।

संक्षेप में, प्यास हमारे शरीर के भीतर चल रही होमियोस्टेसिस नामक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है – यह वह व्यवस्था है जो तापमान, पानी, लवण, ग्लूकोज आदि को एक निश्चित दायरे में बनाए रखती है। जैसे ही संतुलन बिगड़ता है, शरीर विभिन्न सेंसरों के माध्यम से इसे पहचानता है और मस्तिष्क तक संदेश पहुंचाता है। प्यास, भूख, थकान – ये सब उसी संतुलन-प्रणाली के अलग-अलग रूप हैं। प्यास हमें यह याद दिलाती है कि हम अपने वातावरण से निरंतर जुड़े हुए हैं; जो पानी लाखों वर्षों की प्राकृतिक यात्रा के बाद हमारे गिलास तक पहुंचता है, वही हमारी हर कोशिका को जीवित रखता है।

-सुभाष चंद्र लखेड़ा

 

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