आज का उपभोक्ता पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और जागरूक है किंतु बाजार की बदलती संरचना और उपभोक्तावादी संस्कृति के विस्तार ने उसके सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी कर दी हैं। जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, नाप-तौल में गड़बड़ी, मनमाने दाम वसूलना, बिना मानक वाली वस्तुओं की बिक्री, भ्रामक विज्ञापन, ऑनलाइन ठगी तथा गारंटी या वारंटी के बावजूद सेवा प्रदान न करना जैसी समस्याएं आज भी उपभोक्ताओं को परेशान करती रहती हैं।
इन परिस्थितियों में उपभोक्ता अधिकार ही वह मजबूत ढ़ाल हैं, जो उपभोक्ताओं को शोषण और धोखाधड़ी से सुरक्षा प्रदान करते हैं। इन्हीं अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिवस ‘सुरक्षित उत्पाद, आश्वस्त उपभोक्ता’ विषय के साथ मनाया जा रहा है, जो उपभोक्ता सुरक्षा, उत्पादों की गुणवत्ता और प्रभावी नियामक व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, उपभोक्ताओं को उनकी शक्ति और अधिकारों का अहसास कराने का महत्वपूर्ण अवसर है। उपभोक्ता आंदोलन की नींव 15 मार्च 1962 को तब पड़ी, जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने अमेरिकी कांग्रेस में अपने ऐतिहासिक भाषण में उपभोक्ताओं के चार मूल अधिकारों को मान्यता दी। यही पहल आगे चलकर वैश्विक उपभोक्ता आंदोलन का आधार बनी। भारत में भी उपभोक्ता आंदोलन धीरे-धीरे विकसित हुआ।
देश में इसकी शुरुआत 1960 के दशक में हुई और वर्ष 1966 में मुंबई में उपभोक्ता संरक्षण की दिशा में प्रारंभिक प्रयास किए गए। इसके बाद 1974 में पुणे में ‘ग्राहक पंचायत’ की स्थापना ने इस आंदोलन को नई दिशा दी। समय के साथ विभिन्न राज्यों में उपभोक्ता कल्याण से जुड़ी अनेक संस्थाओं और संगठनों का गठन हुआ, जिन्होंने उपभोक्ताओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप उपभोक्ता संरक्षण की दिशा में कानूनों और संस्थागत व्यवस्थाओं का विकास हुआ।

दरअसल, बाजार व्यवस्था में उपभोक्ताओं का शोषण कोई नई बात नहीं है। इतिहास के हर दौर में उपभोक्ता को विभिन्न प्रकार की धोखाधड़ी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार का सामना करना पड़ा है। आधुनिक समय में बाजार के विस्तार, वैश्विक व्यापार और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव ने उपभोक्ता संरक्षण की चुनौतियों को और जटिल बना दिया है। ऐसे में उपभोक्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रभावी कानून और त्वरित न्याय प्रणाली की आवश्यकता महसूस की गई। इसी उद्देश्य से भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लागू किया गया, जिसने उपभोक्ताओं को कम खर्च में त्वरित न्याय प्राप्त करने का रास्ता उपलब्ध कराया।
उपभोक्ता अधिकारों को और अधिक मजबूत बनाने के लिए भारत सरकार ने 20 जुलाई 2020 से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 को लागू किया। इस कानून ने लगभग साढ़े तीन दशक पुराने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 का स्थान लिया और उपभोक्ताओं को अधिक व्यापक अधिकार प्रदान किए। नए कानून में भ्रामक विज्ञापनों पर नियंत्रण, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, उत्पाद दायित्व (प्रोडक्ट लाइबिलिटी) और उपभोक्ता शिकायतों के ऑनलाइन निवारण जैसी कई नई व्यवस्थाएं शामिल की गई।
इस अधिनियम के तहत केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) की स्थापना भी की गई, जो उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों में कार्रवाई कर सकता है। भारत के उपभोक्ता संरक्षण कानून के अनुसार प्रत्येक वह व्यक्ति उपभोक्ता है, जिसने किसी वस्तु या सेवा को खरीदने के लिए धन का भुगतान किया है या भुगतान करने का वादा किया है। यदि किसी उत्पाद या सेवा में कमी हो, गुणवत्ता में दोष हो अथवा उससे उपभोक्ता को किसी प्रकार की हानि पहुंचे तो उपभोक्ता को न्याय प्राप्त करने और क्षतिपूर्ति की मांग करने का अधिकार है।
यही अधिकार उपभोक्ताओं को बाजार में होने वाले शोषण से सुरक्षा प्रदान करते हैं। उपभोक्ता अदालतों की व्यवस्था इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुई है। इन अदालतों के माध्यम से उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत सरल और त्वरित न्याय प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
अनेक मामलों में उपभोक्ताओं ने उपभोक्ता फोरम की मदद से अपने अधिकारों की रक्षा की है। उदाहरण के लिए, एक उपभोक्ता ने एक दुकान से बिजली का पंखा खरीदा, जिसकी एक वर्ष की गारंटी थी। कुछ समय बाद पंखा खराब हो गया लेकिन दुकानदार ने उसे ठीक कराने या बदलने से इन्कार कर दिया। अंततः उपभोक्ता ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने न केवल उपभोक्ता को नया पंखा देने का आदेश दिया बल्कि मानसिक कष्ट और असुविधा के लिए हर्जाना देने का भी निर्देश दिया। ऐसे अनेक उदाहरण यह दर्शाते हैं कि उपभोक्ता अदालतें उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि जीवन में कभी न कभी हम सभी को छोटी-बड़ी उपभोक्ता समस्याओं का सामना करना पड़ता है लेकिन अधिकांश लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने से हिचकते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि देश की बड़ी आबादी अभी भी अपने अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं रखती। आश्चर्य की बात यह है कि कई बार शिक्षित लोग भी उपभोक्ता अधिकारों के प्रति उदासीन बने रहते हैं और छोटी-छोटी धोखाधड़ियों को नजरअंदाज कर देते हैं।

यदि उपभोक्ता सचेत और जागरूक हो जाएं तो बाजार की कई समस्याओं पर स्वतः अंकुश लगाया जा सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि कोई भी वस्तु या सेवा खरीदते समय उसकी रसीद अवश्य ली जाए। रसीद ही वह सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जो उपभोक्ता को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी आधार प्रदान करता है। यदि आपके पास खरीद का कोई प्रमाण नहीं है तो उपभोक्ता अदालत में अपनी शिकायत को प्रभावी ढ़ंग से प्रस्तुत करना कठिन हो सकता है।

आज के डिजिटल युग में उपभोक्ता अधिकारों का महत्व और भी बढ़ गया है। ऑनलाइन खरीदारी, डिजिटल भुगतान और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के प्रसार ने उपभोक्ताओं के लिए सुविधा तो बढ़ाई है लेकिन इसके साथ ही साइबर ठगी, फर्जी वेबसाइटों और भ्रामक विज्ञापनों जैसी नई समस्याएं भी सामने आई हैं। इसलिए उपभोक्ताओं को केवल अपने अधिकारों की जानकारी ही नहीं होनी चाहिए बल्कि उन्हें सावधानी और सतर्कता भी बरतनी चाहिए। उपभोक्ता अदालतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां लंबी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने की आवश्यकता नहीं होती।
उपभोक्ता स्वयं भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और इसके लिए सामान्यतः किसी वकील की अनिवार्यता नहीं होती। इसके अलावा मामलों के निपटारे की प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल और कम खर्चीली होती है। यही कारण है कि उपभोक्ता अदालतें आम नागरिकों के लिए न्याय प्राप्त करने का एक सुलभ माध्यम बन गई हैं।
एक सशक्त और जागरूक उपभोक्ता ही स्वस्थ बाजार व्यवस्था की नींव रख सकता है। जब उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति सजग होते हैं और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाते हैं, तभी बाजार में पारदर्शिता, गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है। विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस हमें यही संदेश देता है कि हम केवल वस्तुओं और सेवाओं के उपभोक्ता ही नहीं बल्कि अधिकारों से संपन्न नागरिक भी हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि उपभोक्ता अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्त्तव्यों के प्रति भी जागरूक हों। जागरूकता, सतर्कता और कानूनी जानकारी के माध्यम से ही उपभोक्ता अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं। यदि प्रत्येक उपभोक्ता सजग होकर अपने अधिकारों का उपयोग करे तो न केवल धोखाधड़ी और शोषण पर अंकुश लगाया जा सकेगा बल्कि बाजार व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और भरोसेमंद बनाया जा सकेगा।
– योगेश कुमार गोयल

