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संसद से नक्सलवाद के विरुद्ध अमित शाह की दहाड़

संसद से नक्सलवाद के विरुद्ध अमित शाह की दहाड़

संसद में दिए गए गृह मंत्री अमित शाह का पूरा वक्तव्य

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, राजनीति
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महोदय, सबसे पहले मैं, रेड कॉरिडोर के नाम से जो पूरा क्षेत्र जाना जाता था, 12 राज्य, 70 प्रतिशत भूभाग और 20 करोड़ की आबादी इस क्षेत्र में रहने वाले सभी आदिवासी भाईयों, बहनों की ओर से आपको धन्यवाद देना चाहता हूँ कि आपने इस चर्चा हेतु आज यहां पर हमें परमीशन दी है।

महोदय, वे सालों से चाहते थे कि उनका दर्द, उनकी वेदना, उनकी परेशानी, नक्सलियों द्वारा उन पर किया गया अन्याय और उनके भविष्य को अंधेरे में घेरने वाली यह पूरी व्यवस्था एक बार देश की सबसे बड़ी पंचायत, हमारी संसद में उजागर हो और पूरी दुनिया उसे जाने। लम्बे समय तक इसको मौका नहीं दिया गया। मुझे इस बात की भी बहुत खुशी है कि देश और हम सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण एक घटनाक्रम, जो वर्ष 1970 से लेकर वर्ष 2026 तक चला, उस घटनाक्रम के बारे में आज संसद में चर्चा हो रही है।

महोदय, ये जिस थ्योरी का प्रचार कर रहे थे, वे एक गलत प्रकार का नैरेटिव, एक गलत प्रकार का स्वप्न भोले-भाले आदिवासियों के सामने रख रहे थे कि हम आपके अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, हम आपको न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं, आप विकास से महरूम रह गए हो, हम इसलिए लड़ रहे हैं।

महोदय, आज बस्तर से नक्सलवाद लगभग लगभग समाप्त हो चुका है। बस्तर के अंदर हर गांव में एक स्कूल बनाने की मुहिम चली। बस्तर के अंदर हर गांव में राशन की दुकान खोलने की मुहिम चली। हर तहसील पंचायत में पीएचसी/सीएचसी बने। इनके आधार कार्ड बने, इनके राशन कार्ड बने और इन्हें 5 किलो अनाज मिल रहा है। इनके बीच गैस के चूल्हे वितरित होते जा रहे हैं। जो लोग यहां पर नक्सलवाद की वकालत कर रहे थे, मैं उनसे इतना ही पूछना चाहता हूँ कि यह काम वर्ष 1970 से अब तक क्यों नहीं हुआ? पूरे देश को तो वर्ष 2014 में, नरेन्द्र मोदी जी की सरकार आने के बाद देश के हर गरीब को घर मिला, गैस मिली, शुद्ध पीने का पानी मिला, 5 लाख रुपये तक का बीमा मिला, प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 5 किलो अनाज मुफ्त मिला। ये बस्तर वाले क्यों छूट गए थे?

महोदय, मैं कहना चाहता हूँ कि सत्य को झुठलाया जा रहा है। ये बस्तर वाले इसलिए छूट गए थे, क्योंकि वहां लाल आतंक का परछाया था और इसीलिए वहां विकास नहीं पहुँचा था। लाल आतंक का परछाया, वहां विकास नहीं है, इसलिए नहीं गया था, लाल आतंक की परछाई वहां पड़ी थी, इसलिए विकास वहां नहीं पहुँचा था। आज परछाई हट गई है, बस्तर विकसित हो रहा है और बस्तर में विकास पहुँच रहा है। ये जो एक हत्यारी मूवमेंट के वकील बन रहे हैं, वे कहते हैं कि हम अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं।

संविधान को मानोगे या नहीं मानोगे। किसी पर भी अन्याय होता है तो उसका उपाय हमारे संविधान के अंदर निहित है। अदालतें बनी हैं, विधान सभाएं बनी हैं, जिला पंचायतें बनी हैं, तहसील पंचायतें बनी हैं। इस पूरी व्यवस्था को नकारकर हाथ में हथियार उठा लोगे। ऐसा कैसे चलेगा? जो इस चीज को जस्टीफाई करे, मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि वह समय चला गया है, यह नरेन्द्र मोदी की सरकार है, जो हथियार उठायेगा, उसको हिसाब चुकाना होगा। इस तरह से नहीं चलेगा। सरकार संवेदनशील है। सभी समस्याओं को सुनना चाहती है, उनका निराकरण भी चाहती है। यहीं संसद में ढेर सारी योजनाएं बनाई, मगर आप इनका इम्प्लीमेंटेशन भी नहीं करने देंगे, ताकि आपकी आइडियोलॉजी और आपका अवैध शासन वहां पर चलता रहे।

मैं आज पूछना चाहता हूं, अभी कांग्रेस के कुछ सदस्य बहुत जोर-जोर से कह रहे थे कि आदिवासियों का विकास नहीं हुआ, विकास नहीं हुआ। राजकुमार रोत जी जैसे आदिवासी युवा सांसद भी वोट के लालच में कांग्रेस का समर्थन कर रहे थे, कांग्रेस की थ्योरी का समर्थन कर रहे थे। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि 75 सालों में से 60 साल तो आपने ही शासन किया है, तो आदिवासी लोग अभी तक विकास के बिना क्यों वंचित रह गए? विकास तो आकर नरेन्द्र मोदी जी कर रहे हैं। 60 सालों तक उनको घर नहीं दिया, पानी नहीं दिया, उनके लिए स्कूल नहीं बने, मोबाइल टावर नहीं पहुंचने दिए, बैंक की फैसिलिटीज़ नहीं पहुंचने दी और अब आप हिसाब मांग रहे हैं। आप थोड़ा तो अपनी गिरेबान में झांक कर देखिए कि दोषी कौन है।… (व्यवधान) मैं पूरा बताऊंगा।
मान्यवर, 12 राज्य हैं, इनमें छत्तीसगढ़, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक का कुछ हिस्सा और उत्तर प्रदेश के तीन जिले, यह पूरा रेड कॉरिडोर बना हुआ था और वहां कानून का शासन समाप्त कर दिया गया। 12 करोड़ लोग गरीबी में सालों तक जीते रहे, लेकिन किसी ने चिंता नहीं की। हजारों युवाओं की मृत्यु हुई। एक एनजीओ की अगर हम मानें, तो आइदर साइड से 20 हजार युवा मारे गए। कई लोग पूरे जीवन के लिए दिव्यांग बन गए, अपाहिज बन गए, नर्क का जीवन जी रहे हैं और उन तक विकास भी नहीं पहुंचा।
मान्यवर, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या इस देश की सबसे बड़ी लोकतंत्र की पंचायत ने क्षीर-नीर करके इस पर चिंतन नहीं करना चाहिए? या अपनी गढ़ी-गढ़ाई थ्योरी को लेकर घूमते रहना चाहिए। मैं इसके बाद बताता हूं कि नक्सलवाद का मूल कारण विकास की डिमांड नहीं है, एक आइडियोलॉजी है, जिस आइडियोलॉजी को राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के लिए वर्ष 1970 से इंदिरा जी ने स्वीकार कर लिया और इस वामपंथी विचारधारा के कारण नक्सलवाद फैला।

मान्यवर, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने पूरे देश के सामने स्वीकारा था कि कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट की तुलना में भी देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी समस्या हथियारी माओवादी हैं, मगर कुछ नहीं हुआ।
मान्यवर, वर्ष 2014 में परिवर्तन हुआ और मोदी जी के शासन में कई सारी वर्षों पुरानी समस्याओं का निराकरण हुआ। इनमें धारा 370 हट गई 35 (ए) हट गई, राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बन चुका है। जीएसटी इस देश में आज वास्तविकता बन गया है, सीएए का कानून आ गया है। विधायी मंडलों में मातृशक्ति को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। कई सारे बड़े काम जो आजादी के वक्त से इस देश की जनता चाहती थी कि कभी न कभी हों, वे सारे काम नरेन्द्र मोदी जी के इन 12 सालों में हुए और अब नक्सलवाद से मुक्त भारत की रचना भी नरेन्द्र मोदी जी के शासन में ही हो रही है।

ये 12 साल देश के एक प्रकार से बहुत शुभंकर साबित हुए हैं। देश को गरीबी से मुक्ति दिलाने के लिए, देश के युवाओं के लिए नई शिक्षा पद्धति लाने के लिए, देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए, इस देश के मूलों से न जुड़ी हुई पॉलिसियों को दरकिनार करने के लिए, इन 12 सालों में बहुत कुछ हुआ है।
मगर, मैं मानता हूं कि अगर पॉलिटिकल साइंस का कोई विद्यार्थी इसकी रेटिंग करना चाहेगा कि इन सारी चीजों से सबसे बड़ा फायदा किस फैसले और किस सिद्धि से हुआ है तो पॉलिटिकल साइंस का वह विद्यार्थी निस्संकोच नक्सल-मुक्त भारत को नम्बर एक पर रखने से जरा भी नहीं हिचकेगा।

मान्यवर, यह जो बड़ी घटना देश में आकार लेने जा रही है, उसका पूरा श्रेय, उसका पूरा यश हमारे सी.ए.पी.एफ. के जवान, विशेषकर ‘कोबरा’, सी.आर.पी.एफ. के जवान, राज्य सरकारों की पुलिस, विशेषकर छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस, डी.आर.जी. के हमारे जवान और वहां के स्थानीय वाशिंदों को जाता है। अगर उनका सहयोग न होता तो दुनिया में कई ऐसे रिकॉर्ड्स हैं कि बड़े-बड़े तानाशाह हुए, पर जब जनता ने उनका साथ नहीं दिया तो वे दुम हिलाकर भागे हैं। मगर, यहां पर आज वामपंथी उग्रवाद समाप्त होने जा रहा है, इसमें जनता का भी बड़ा साथ है।
आज मैं फिर से एक बार, इस चर्चा की शुरुआत में, जो हजारों युवा मारे गए, जो सिक्योरिटी फोर्सेज के जवान शहीद हो गए, जिन्होंने अपना सर्वस्व इस देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बलिदान कर दिन, उन सभी को मनपूर्वक पूरे सदन की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि देकर उसको ‘एक्नॉलेज’ करना चाहता हूं।

मान्यवर, यह जो विचारधारा है, इसका विकास से कोई लेना-देना नहीं है, विकास की मांग से भी कोई लेना-देना नहीं है। यह विचारधारा कौन-सी है? क्या है माओवादी विचारधारा? इसका ध्रुव वाक्य क्या है? जब हम आजाद हुए, हमने कहा ‘सत्यमेव जयते’, सत्य की हमेशा विजय हो, सत्य की विजय होती है। पर, इनका ध्रुव वाक्य क्या है? इनका ध्रुव वाक्य है कि ‘सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है।’ यह इनका ध्रुव वाक्य है। वहां ‘सत्ता’ शब्द का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यह विकास के लिए नहीं है, अपनी आइडियोलॉजी के अस्तित्व के लिए है, अपनी आइडियोलॉजी के विजय के लिए है और आइडियोलॉजी को भोले-भाले आदिवासियों में स्प्रेड करके सत्ता हासिल करने के लिए है। यहां विकास की कोई बात नहीं है। इनका लोकतंत्र में कोई विश्वास नहीं है।
मान्यवर, यहां ढेर सारे लोग, मैं उनके नाम नहीं लेना चाहता, मैं सुन रहा था, तीन घंटे से कह रहे हैं कि अन्याय है और अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं। लड़ने का तरीका क्या है? हम अँग्रेजों के शासन में नहीं रह रहे हैं। कुछ लोगों ने तो भगत सिंह जी और भगवान बिरसा मुंडा से कम्पैरिजन कर दी। यह क्या हिमाकत कर रहे हैं? शहीद भगत सिंह और भगवान बिरसा मुंडा अँग्रेजों के सामने लड़े। संविधान तोड़ कर हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों की हत्या करने वाले लोगों के साथ आप इसका कम्पैरिजन कर रहे हैं।

ऐसे विषयों में राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठ जाना चाहिए।
मान्यवर, यही विचारधारा कहती है कि दीर्घकालीन युद्ध ही हमारी विचारधारा को फैला सकता है। उनको अपने लोगों का भी खून बहाने से कोई परहेज नहीं है। उनके आदर्श को देखिए। दस हजार सालों के हमारे उपलब्ध इतिहास में कितने आदर्श पुरुष, स्त्री, युवा हुए, उसकी एक बहुत बड़ी लिस्ट बन सकती है। इन्होंने तिलका मांझी को अपना आइडियल नहीं समझा, भगवान बिरसा मुंडा, भगत सिंह या सुभाष बाबू को अपना आइडियल नहीं समझा। इन्होंने आदर्श किसको कहा? इन्होंने आदर्श माओ को कहा। ये अपने आदर्श तय करने में भी उसे फॉरेन से इम्पोर्ट करते हैं।

मान्यवर, बस्तर का सेलेक्शन क्यों हुआ? भारतमंडपम में एक कार्यक्रम था। बस्तर क्षेत्र से जो अच्छी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त किये हुए युवा थे। ऐसे युवाओं के साथ मेरा इंटरएक्शन था। मेरे नास्ते के टेबल पर एक बच्ची बैठी थी। उसने कहा कि साहब, क्या आप बता सकते हैं कि माओवादियों ने हमारे बस्तर को ही क्यों चुना?
मान्यवर, इस विषय को मैं जरा डिटेल में बताना चाहता हूं। हम सब जानते हैं कि वर्ष 1947 में जब हम आजाद हुए, तो संसाधन बहुत कम थे। एक लंबी गुलामी के कालखंड को समाप्त करके हम आजाद हुए थे। देश के अंदर विकास का नामोनिशान नहीं था। दशकों तक लगभग दो सदी तक इस देश को गुलामी में लूटा गया। जब नया राज्य बना तो राज्य की पहुंच कुछ क्षेत्रों में सीमित थी। वहां इसको बढ़ानी चाहिए थी। यह तो समय जाते-जाते बढ़ेगी।

मान्यवर, क्योंकि संसाधन कम थे, रेवेन्यू कम थी तो विकास भी परकोलेट होते-होते हर क्षेत्र में एक साथ नहीं पहुंच पाई। अगर रोड्स बनानी हैं तो पूरे देश में एक साथ नहीं बन सकी। अगर बिजली पहुंचानी है तो पूरे देश में एक साथ नहीं पहुंच सकी। दूरदराज के क्षेत्र तक स्टेट की पहुंच की कैपेसिटी सीमित थी। वहां विकास नहीं पहुंचा था। वहां स्टेट का इकबाल बुलंद नहीं हुआ था। अब वे अत्याचार के खिलाफ की बात करते हैं। अगर वहां स्टेट पहुंचा ही नहीं था, सुनियोजित भेदभाव का वातावरण ही नहीं था तो वहां अत्याचार कैसे हो गए?

मान्यवर, एक कहानी गढ़ी जा रही है। सच्चाई यह है कि इन्होंने पूरे रेड कॉरिडोर को इसलिए चुना था, क्योंकि वहां स्टेट की पहुंच कम थी। वहां के भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथ में हथियार पकड़ाए गए। मैं आपको बाद में कुछ दृश्य बताऊंगा। मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि 15 अगस्त, 1947 के पहले इस देश का ट्राइबल बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती, मुर्मू बंधुओं को हीरो मानकर चलता था, लेकिन वह आदिवासी वर्ष 1947 से 1970 आते-आते माओ को अपना हीरो मानने लगा, यह परिवर्तन क्यों हुआ?

मान्यवर, यह परिवर्तन विकास और अन्याय के कारण नहीं हुआ, क्योंकि कठिन भूगोल के कारण और स्टेट की अनुपस्थिति के कारण अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए वामपंथियों ने एक क्षेत्र को चुना। उन्होंने भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाना चालू किया। उन्हें अपनी विचारधारा का अनुयायी बनाया। थोड़ा आगे बढ़ने के बाद उनको लगा कि यहां तो अच्छा काम हो सकता है। अगर वे पढ़-लिख जाएंगे तो हमारे साथ नहीं रहेंगे। उन्होंने स्कूलें जला दीं। उनके बैंक अकाउंट खुल जाएंगे तो हमारे साथ नहीं रहेंगे, इसलिए बैंकें जला दी। दवाखानें जला दी गई। फिर वे कहते हैं कि यहां विकास नहीं पहुंचा। वामपंथी उग्रवादियों ने उस क्षेत्र में विकास को सालों तक नहीं पहुंचने दिया। आज नरेन्द्र मोदी जी के शासन में वहां विकास पहुंच रहा है। विकास घर-घर जा रहा है। गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इस पूरे क्षेत्र में सालों तक गरीबी रही। मान्यवर, मैं इसको और अच्छे तरीके से सदन के सामने रखना चाहता हूं। नक्सलवाद की जडें गरीबी और विकास से जुड़ी हुई नहीं है। वह वैचारिकी मैं आज वर्ष 1960 के चार क्षेत्रों को पढ़ना चाहता हूं।

एक – नक्सलबाड़ी क्षेत्र में साक्षरता का दर 35 प्रतिशत था। बस्तर की साक्षरता दर 23 प्रतिशत थी। सहरसा, बिहार, जो नक्सलवाद से कभी प्रभावित नहीं हुआ, वहां पर साक्षरता की दर 33 प्रतिशत थी। बलिया, यूपी जो सोनभद्र से सटा हुआ जिला है, जो नक्सलवाद से प्रभावित था, वहां भी साक्षरता की दर 31 प्रतिशत थी। चारों स्थानों पर साक्षरता की दर कमोबेश समान थी, प्रति व्यक्ति आय नक्सलबाड़ी में पांच सौ रुपये थी, जो कि चारों क्षेत्रों में सबसे ज्यादा थी। बस्तर में 190 रुपए थी, सहरसा में 299 रुपए थी और बलिया में 374 रुपए थी। प्रति व्यक्ति आय भी चारों क्षेत्रों में एक समान थी। मगर नक्सलबाड़ी और बस्तर में वामपंथी उग्रवाद पनपा लेकिन सहरसा और बलिया में नहीं पनपा। क्योंकि सहरसा और बलिया का भूगोल उनके अनुकूल नहीं था। वहां घने जंगल नहीं थे। नदी, नाले और छुपने की पहाडियां नहीं थीं। हथियार ले कर अपनी मूवमेंट करने, आदिवासियों को दबाने का, उनको जबरदस्ती अपनी आइडियोलॉजी के साथ जोड़ने की वहां पर अनुकूलता नहीं थी। अगर विकास ही पैमाना होता, अगर प्रति व्यक्ति आय ही पैमाना होता, तो देश के बहुत सारे हिस्से ऐसे थे, जहां सन् 70 में विकास नहीं पहुंचा था। वहां क्यों नहीं नक्सलवाद हुआ?

मान्यवर, आज तो मैं इस सदन में इस विचार को सिरे से खारिज कर रहा हूँ। हम लोकतंत्र में हैं। हमने इस देश के संविधान को स्वीकार किया है। संविधान के माध्यम से ही आज इस महान सदन के हम सदस्य हैं। अन्याय किसी के भी साथ हो सकता है। विकास कहीं पर भी कम ज्यादा हो सकता है। हम संवैधानिक रास्तों से हमारी लड़ाई लड़ेंगे या हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों को मार डालेंगे? किस थ्योरी का यहां से समर्थन हो रहा है? मैं नहीं समझ पा रहा हूँ। अगर आप धमकाना चाहते हैं कि यह होगा तो ये लोग भी हथियार उठाएंगे, ऐसा होगा तो ये भी हथियार उठाएंगे। मान्यवर, यह डरने वाली सरकार नहीं है। यह सबके साथ न्याय करने वाली सरकार है। किसी के साथ भी अन्याय हो तो हथियार हाथ में उठा लेना, क्या यह लोकतांत्रिक तरीका है? क्या हमारे संविधान के बताए हुए सारे रास्ते कुंद हो गए हैं, बंद हो गए हैं? संविधान ने हर चीज़ की व्यवस्था की है।

मान्यवर, आज इस बहस को देख रहे, भारत के युवाओं के लिए नक्सलवाद की टाइमलाइन भी मैं बताना चाहता हूँ। मान्यवर, 1970 के दशक में नक्सलवाद की शुरूआत नक्सलबाड़ी से हुई, बंगाल से हुई। सन् 1971 के एक ही वर्ष में 3620 हिंसा की घटनाएं वहां पर हुई हैं। सन् 80 का दशक आते-आते पीपल्स वॉर ग्रुप बन गया और फिर यह महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और ओडिशा तक गया। जब मैं मध्य प्रदेश बोलता हूँ तो वह पुराना मध्य प्रदेश है, जब छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश एक ही हुआ करता था। माओवादी इन तीन राज्यों में फैले। उसके बाद 90 के दशक में, दुनिया भर में जैसे वामपंथी विचारधारा सिकुड़ती गई, यहां पर भी उग्रवादी गुटों में और वामपंथी पार्टियों में विलय शुरू हुआ तथा वर्ष 2004 में दो प्रमुख गुट मिल गए और सीपीआई माओवादी का गठन किया। सन् 70 से वर्ष 2004 तक, इस पूरे कालखंड में मान्यवर, चार साल छोड़ कर पूरा समय कांग्रेस पार्टी का शासन रहा है। यह उनको याद रखना चाहिए।

कब माओवादी विचारधारा फैली, पनपी, एकत्रित हुई, उसे आपको याद रखना चाहिए। मान्यवर, सन् 1970 को भी हमें याद करना चाहिए। अभी एक माननीय सदस्य जी ने बताया कि 1970 में क्या हुआ था। 1970 में एक नारा लगा था “अंतर्रात्मा की आवाज पर मतदान करो।”

वह नारा इंदिरा जी ने लगाया और संजीव रेड्डी जी के खिलाफ अपना एक प्रत्याशी उतारा। उस वक्त आधार तलाश रहे माओवादी पार्टियों ने इंदिरा जी को समर्थन किया और अपनी पार्टी में अपना वर्चस्व प्रस्थापित करने के लिए श्रीमती गांधी जी ने उस समर्थन को लपक लिया और 1970 से लेकर 1980 तक इंदिरा जी वापस नहीं आई। वे माओवादी विचारधारा की गिरफ्त में रहीं।
मान्यवर, यही समय है, जब नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन बारह राज्यों में फैल गया। देश के 17 प्रतिशत भू-भाग में फैल गया और दस प्रतिशत से ज्यादा आबादी में पहुँच गया। कई सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स ऐसा कहते थे कि सत्ता के समर्थन के बगैर किसी भी हथियारी मूवमेंट का, देश के दिल में बीचों-बीच, तिरुपति से लेकर पशुपतिनाथ तक, यह रेड कॉरिडोर संभव ही नहीं है।

Union Home Minister Amit Shah To Address Lok Sabha Tuesday Noon

अभी राजकुमार जी पूछ रहे थे कि हथियार कहाँ से आए? मैं उनको बताना चाहता हूँ कि जो हथियार पकड़े गए हैं, उनमें से 92 प्रतिशत हथियार पुलिस के लूटे हुए हथियार हैं। थाने लूट लिए, गोलियाँ लूट लीं और उनका उपयोग निर्दोष जवानों को, बच्चों को, कृषकों को मारने के लिए किया है।

मान्यवर, एक भ्रांति की तरह वामपंथी विचारधारा ने इसको प्रोपेगेंडा के माध्यम से फैलाया। अपनी विचारधारा को टिकाने के लिए फैलाया कि अन्याय से बचने के लिए हथियार हाथ में उठाए हैं। मगर में फिर से एक बार पूछना चाहता हूँ कि क्या राज्य, शासन और संविधान की वैधता को किसी भी अन्याय के एवज में चुनौती दी जा सकती है?

अन्याय के खिलाफ लड़ने का हमारे संविधान ने रास्ता बनाया है इसीलिए राजकुमार रोत जी यहाँ बैठे हैं, चुनाव लड़े और इसीलिए यहाँ बैठे हैं, वरना वे भी सरेंडर की लिस्ट में होते, अगर हथियार लिया होता। … (व्यवधान) हाँ, इसीलिए कहता हूँ, यही रास्ता है, यही रास्ता है। आज जिस व्यवस्था के निर्मूलन की मैं बात कर रहा हूँ, वह लोकतंत्र की जड़ों पर वार कर रही है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि किसी भी समस्या का समाधान बहस से निकल सकता है, हथियारों से नहीं निकल सकता।

मान्यवर, इन्होंने इस देश में वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया। स्टेट का वैक्यूम, सारी व्यवस्थाएं नष्ट करके गवर्नेस का वैक्यूम, संविधान पर से श्रद्धा खत्म करके संविधान का वैक्यूम और पुलिस थानों को जलाकर सिक्योरिटी का वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया है।
मैं आज इस मंच से देश की जनता को यह बताने आया हूँ कि माओवादी हिंसा करने वालों के नक्सलिज्म करने वालों के दिन लद गए हैं। अब इस सरकार के रहते ऐसा लंबे समय तक नहीं चलेगा। ऐसा कई देशों में हुआ है जैसे कंबोडिया, पेरू, कोलंबिया। कई देशों के इतिहास इससे भरे पड़े हैं। भयानक रक्तपात हुआ है। हमारे यहाँ भी 20 हजार लोग मारे गए।
मान्यवर, यह एक वैचारिक लड़ाई है। माओवादी, उग्रवादियों को अन्याय के खिलाफ हथियारों की लड़ाई मानने की गलती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वामपंथी विचारधारा अपना आधार खो बैठी है।

सारे वामपंथी येन-केन-प्रकारेन अलग-अलग थ्योरी रचित करके अपने अस्तित्व को टिकाने में लगे हैं। इनका एकमात्र एजेंडा देश में वैक्यूम खड़ा करना है। देश के स्वभाविक असंतोष को हथियारों के माध्यम से दिशा देना है। स्टेट का वैक्यूम, गवर्नेस का वैक्यूम, संविधान का वैक्यूम, सिक्योरिटी का वैक्यूम और रक्तपात, यही उनका उद्देश्य है, जो अब सफल नहीं होगा।
मान्यवर, कई सारे भोले-भाले ग्रामीणों को एनिमी इंफॉर्मर बता कर फांसी पर चढ़ा दिया। कौन-सी अदालत ने फांसी पर चढ़ाया? इन्होंने जनता अदालत के नाम से फारस खड़ा किया, जहां न कोई वकील है, न कोई जज है, वे स्वयं बैठे हैं, वे स्वयं फैसले करते हैं और फांसी दे देते हैं। मैंने इसका जस्टिफिकेशन करते हुए सुना है। मैं आज नाम लेना नहीं चाहता हूं, वरना यहां से लोग खड़े हो जायेंगे। इसका जस्टिफिकेशन नहीं हो सकता है। इस देश में संविधान का राज है। फैसला संविधान द्वारा, सरकारों द्वारा रचित अदालतों में ही हो सकता है। अगर किसी के साथ अन्याय हो गया है, तो उसके लिए त्रिस्तरीय न्यायिक प्रणाली है।

गवर्नेस का वैक्यूम कैसे हुआ? उन्होंने पैरलल गवर्नमेंट चलायी। छत्तीसगढ़ के बस्तर में उनका होम मिनिस्टर होता था, उनका न्याय मंत्री होता था, लूटे हुए अनाज को बांटने वाला खाद्य और आपूर्ति मंत्री होता था। एक जनता की सरकार के नाम से भ्रांति खड़ी की। इन्होंने विकास की योजनाओं को रोकने का काम किया। इन्होंने संविधान और न्याय व्यवस्था को निशाना बनाकर संविधान का वैक्यूम खड़ा करने का काम किया।

कोई चुनाव न लड़े, मतदान नहीं होने देंगे, सरपंच कोई नहीं होगा, कोई तहसील पंचायत, जिला पंचायत का सदस्य नहीं होगा, विधायक जो वे चाहते हैं, वही जीतकर आएंगे। किस प्रकार की व्यवस्था खड़ी करना चाहते थे? इसका समर्थन कैसे हो सकता है? अब कह रहे हैं कि बातचीत करो। जो ऐसा कह रहे हैं, मैं उनको बताना चाहता हूं। मैं बस्तर में जाकर, बस्तर के हर तहसील में जाकर, सार्वजनिक मंचों पर पचास बार कह चुका हूं कि हथियार डाल दीजिए, सरकार आपके पूरे पुनर्वासन की व्यवस्था करेगी, मगर वे हथियार नहीं डालेंगे।
मान्यवर, हमारी सरकार की पॉलिसी है, चर्चा उसी से होती है, जो हथियार डालता है। जो गोली चलाता है, उसे जवाब गोली से ही दिया जाता है। यह हमारी सरकारी पॉलिसी है। मैं आगे बताता हूं कि कितने लोगों ने हथियार डाले हैं और अब पुनर्वासन कर रहे हैं।

मान्यवर, इसका नतीजा यह है कि वर्ष 1970-2026 तक यहां यह चलता रहा। कई ऐसे हमले हुए। जहानाबाद का हमला हुआ। एक हजार आर्म्स नक्सलियों ने सीआरपीएफ के कैंप और जेल को कब्जा करके अजय कानू समेत 389 कैदियों को मुक्त करा कर ले गए। आंध्र-ओड़िशा सीमा पर दर्जनों स्कूलों और इंफ्रास्ट्रक्चर का सुनियोजित विनाश किया। हर ठेके में बीस परसेंट जनता का टैक्स डालते रहे। झारखंड में 70 ट्रकों में एक साथ आग लगा दी। मालगाड़ी की 11 बोगियों में एक साथ आग लगा दी। जनता के टैक्स की वार्षिक वसूली, जो कि इनके ही सेक्रेटरी के कंप्यूटर से मिला है, उसके मुताबिक यह राशि 240 करोड़ रुपये थी। इसको कैसे जस्टिफाई कर सकते हैं? किस तरह से जस्टिफाई कर सकते हैं?
मान्यवर, यह नक्सलवाद मूल रूप से कहां से आया? परंतु हमारे देश के लिए वह किसी भी प्रकार से ऐसी स्थिति थी ही नहीं कि जहां इस प्रकार की साम्यवादी विचारधारा, लेफ्टिस्ट विचारधारा का पनपना हो पाए।

मान्यवर, वर्ष 1905-1924 रूस में साम्यवादियों ने क्रांति की। 1914 के युद्ध में रूस की आर्थिक हालत बहुत बिगड़ गयी और वहां पर भूख, महंगाई, अव्यवस्था और 1905 में खूनी रविवार की घटना ने जनता का विश्वास शासन के प्रति तोड़ दिया और उसने 1917 की क्रांति की नींव तैयार की।

मान्यवर, मजबूर होकर निकोलस द्वितीय ने गद्दी छोड़ दी। वहां एक वैक्यूम पैदा हुआ और उस वैक्यूम को भरने के लिए लेनिन की अध्यक्षता में साम्यवादी सरकार बनी। इसी तरह से चीन में एक अव्यवस्था खड़ी हुई। करोड़ों किसान गरीबी और भुखमरी में जीवन जी रहे थे। वर्ष 1921 में कम्युनिस्ट चीनी पार्टी की स्थापना हुई। माओ उनके नेता बने। कम्युनिस्टों और कुओमिन्तांग, जो वहां के राष्ट्रवादी थे, राजा के वफादार थे, उनके बीच में युद्ध हुआ। वर्ष 1934-35 में एक लॉन्ग मार्च हुआ। पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना वर्ष 1939 में हुई। वर्ष 1939 और वर्ष 1925 की दो महत्वपूर्ण घटनाएं हैं। इसका हमारे देश पर क्या असर हुआ, यह आप लोग समझें। जैसे ही रशिया में साम्यवादियों की सरकार का गठन हुआ, यहां वर्ष 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी सीपीआई की स्थापना हुई।

मैं उनके समर्थकों से पूछना चाहता हूं कि रशिया में कम्युनिस्टों की जब सरकार बनी तो उसी वक्त यहां सीपीआई की स्थापना हुई, तो क्या इसके बीच में कोई रिलेशनशिप है? यह सोचने की बात है कि रशिया की सरकार ने स्पोंसर करके दुनिया भर में कम्युनिस्ट पार्टी की रचना की और इसका एक हिस्सा हमारे यहां बना। जिस पार्टी की नींव ही किसी दूसरे देश की प्रेरणा से पड़ी है, वह हमारे देश का भला कैसे सोचेगा? इन्होंने तो अंग्रेजों का भी समर्थन किया था। वर्ष 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी (मार्कसिस्ट) बनी। सीपीआई (एम) क्यों बना? वर्ष 1969 में … (व्यवधान) आप लोग आज मुझे उकसाओ मत, क्योंकि मैं आज तय करके आया हूं कि मैं यहां पूरी बात बताऊंगा। (व्यवधान)

मान्यवर, वर्ष 1964 में सीपीआई (एम) बना। यह भी समझना होगा कि जब पहले से सीपीआई थी तो सीपीआई (एम) क्यों बनी? मान्यवर, वर्ष 1964 में सोवियत रशिया और चीन के बीच में झगड़ा हुआ। दोनों साम्यवादी राष्ट्रों में अलग-अलग विचारधारा की साम्यवादी सरकारें आयीं। वहां जिस तरह से अलग-अलग विचारधारा की सरकार आयी तो यहां भी एक चीन समर्थक पार्टी सीपीआई (मार्कसिस्ट) खोल दी, जिसके सदस्य श्री अमरा राम जी बोल रहे थे। मान्यवर, ये दोनों पार्टियां कम्युनिस्टों की हैं।

एक रशिया की क्रांति के समय में बनी और दूसरी रशिया-चीन के बीच मतभेद के बाद बनी। इसके बाद वर्ष 1969 संसदीय राजनीति का विरोध करने के लिए, मेरी बात सभी लोग ध्यान से सुनें, आपके माध्यम से मैं देश को भी बताना चाहता हूं कि वर्ष 1969 में सीपीआई (एमएल) (मार्कसिस्ट) की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य विकास का वैक्यूम भरना नहीं था, किसी के अधिकारों की रक्षा करना नहीं था। इनके संविधान में उद्देश्य था कि संसदीय राजनीति का विरोध करके सशस्त्र क्रांति करना। जो रशिया और चीन में कर चुके थे। लेकिन यहां राजशाही नहीं बची थी। अंग्रेज यहां नहीं थे। यहां संविधान से चलने वाली लोकतांत्रिक सरकार बन गयी थी। फिर क्यों संसद का विरोध? ये लोग चुनाव लड़ते, जीतकर आते और अपनी बातों को मनवाते। मगर वैसे तो कोई बात सुनेगा नहीं, इसलिए सशस्त्र क्रांति। क्रांति कई प्रकार की होती है। वैचारिक क्रांति होती है। कुछ लोगों ने गीत लिखकर क्रांति की है। महात्मा जी ने अहिंसक क्रांति की थी। इन्होंने सशस्त्र क्रांति और संसदीय राजनीति का विरोध करना, इन दोनों उद्देश्यों के साथ सीपीआई (मार्कसिस्ट) बना और ये ही आज के माओईस्ट हैं।

 

ये मूल को समझे बगैर अन्याय, अन्याय रटे जा रहे हैं। भाई, यह अन्याय के लिए नहीं है। हमारी संसदीय राजनीति का विरोध करने के लिए, संसद का, जिसके आप सदस्य हैं, इसका विरोध करने के लिए बने हैं। उसके बाद, वर्ष 1975 में जैसे ही कांग्रेस का समर्थन मिला एमसीसी माओइस्ट बनी और बिहार, झारखंड केंद्रित पार्टी बनी। वर्ष 1980 में पीडब्ल्यूजी बना। वह आंध्र प्रदेश केंद्रित बना। वर्ष 1982 में दलित किसान केंद्रित सशस्त्र संघर्ष सीपीआई (एमएल) पार्टी यूनिटी बिहार में बनी। दलित किसान केंद्रित संघर्ष इनका उद्देश्य था। वर्ष 1998 में पीपुल्स वार ग्रुप बना, उसमें माओवादियों का एकत्रीकरण हुआ। इतना सब करने के बाद भी वे सफल नहीं हुए। वर्ष 2000 में पीएलजीए बना, जो सैन्य विंग बनी। गुरिल्ला फोर्स बनाई गई। वर्ष 2004 में पीडब्ल्यूजी और एमसीसी दोनों का विलय हो गया। थ्योरी वाले और हथियार उठाने वाले दोनों का वर्ष 2004 में विलय हुआ। वर्ष 2014 में मोदी जी आए और वर्ष 2026 में सबकी समाप्ति हो गई। इनका टोटल वर्ष 1925 से लेकर वर्ष 2026 तक 101 साल का इतिहास है। इसीलिए मैं साथी सदस्य से कहता हूं, जो सामने बैठे हैं, आप इसको अन्याय के खिलाफ संघर्ष का स्वरूप मानकर महिमामंडित मत कीजिए। हम जिस सदन में बैठे हैं, वे इसका विरोध करने के लिए जन्मे हैं। वे वोट की जगह बुलेट से शासन प्राप्त करना चाहते हैं।

 

मान्यवर, अगर यही बात है कि चर्चा कीजिए, चर्चा कीजिए, चर्चा से कोई परहेज नहीं है। हर कोई चर्चा का स्वागत करता है। फिर पुलिस क्यों रखी गई है? पुलिस की जरूरत ही नहीं है। सेना क्यों रखी गई है? पैरा मिलिट्री फोर्सेज क्यों रखे गए हैं? कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो चर्चा से मानते ही नहीं हैं। वहां बल प्रयोग करके उनके अत्याचार से निर्दोष नागरिकों को बचाना पड़ता है।
जब नक्सलवादियों ने सैंकड़ों निर्दोष किसानों को बम लगा-लगाकर बिना पैर का कर दिया, कई स्कूलों में रेड करके आठ, नौ और दस साल के बच्चों को उठाकर ले गए और नक्सलवाद की सेना में भर्ती कर दिया तो क्या हम मूकदर्शक बनकर खड़े रहें? यह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। हर नागरिक की सुरक्षा नरेंद्र मोदी जी ने सुनिश्चित की है। जो भी नागरिकों के साथ अन्याय करेगा, समझा तो ठीक है, वरना ये फोर्सेज इसी के लिए बनाई गई हैं। इनका उपयोग होगा, परिणाम आएगा और आज आ भी गया है।

 

मान्यवर, जो इनके समर्थन में, जो इनको पॉपुलर लैंग्वेज में अर्बन नक्सल कहते हैं, मैं उन बुद्धिजीवी भाइयों से सवाल करना चाहता हूं। मैंने छह दिन से लगभग दो हजार आर्टिकल देखे हैं। उनको सारे बुद्धिजीवी भाइयों ने लिखा है। मेरे पास उसका पूरा जिस्ट भी है। इन सभी आर्टिकलों में हथियार उठाकर घूमने वाले माओवादियों के साथ चर्चा करो, वे अन्याय के लिए लड़ रहे हैं, उनको मारना नहीं चाहिए, उनके प्रति सिम्पैथी होनी चाहिए, सरकार विकास जल्दी करे, इन सब बातों का जिक्र है। एक भी आर्टिकल जो आठ साल के अबोध बच्चे को उठा ले जाकर हाथ में हथियार पकड़ा दिया, वह उसकी मां के लिए नहीं है।

मान्यवर, एक भी आर्टिकल अपने गांव से खेत में जाते हुए जिस किसान का पैर उड़ गया और पूरा जीवन वह दिव्यांग बन गया, उसकी सिम्पैथी के लिए नहीं है। पांच हजार से ज्यादा सिक्योरिटी फोर्सेज के जवान लड़ते-लड़ते शहीद हो गए, उनकी विधवाओं के लिए एक भी आर्टिकल नहीं है। उनके अनाथ बच्चों के लिए एक भी आर्टिकल नहीं है। सारे आर्टिकल आपकी मानवता-संविधान तोड़कर हिथयार लेकर घूमने वालों के लिए ही हैं?

इनके हथियारों से जो नागरिक मारे जा रहे हैं, उनके लिए आपकी मानवता नहीं है। मानवता के दोहरे चरित्र को मैं स्वीकार नहीं करता हूं, ये मानवतावादी नहीं हैं, नक्सलियों के समर्थक हैं। अगर मानवतावादी होते, तो जिस किसान का पैर उड़ गया, इसकी भी चिंता करते, जिस अबोध बच्चे से उसका बचपन छीन लिया गया, उसकी भी चिंता करते।

Barring one, entire top leadership of Maoists wiped out, Amit Shah tells Lok  Sabha - The Hindu

मान्यवर, वे गरीब हाथ में हथियार नहीं लेना चाहते, गरीबों के हाथों में हथियार देकर अपनी विचारधारा को, अपनी आइडियोलॉजी को पनपाना चाहते हैं, मगर अब उनके भी दिन लद गए हैं। आप स्पष्टता से सुन लीजिए, अब पूरे देश में जागरुकता आ गयी है। उससे क्या हुआ? आज पूरा देश सुन रहा है, आज पूरा देश समझ रहा है।
मान्यवर, मैं आज एक और बताना चाहता हूं, किसी सदस्य ने सलवा जुडूम का जिक्र किया। कांग्रेस के नेता और सारे लोग, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता हूं, वरना फिर से खड़े हो जाएंगे, वे जो सलवा जुडूम का जजमेंट आया, उसका पक्ष लेते हैं।

मान्यवर, सलवा जुडूम की शुरुआत वर्ष 2005 में राज्य समर्थित, मतलब सरकार समर्थित जन आंदोलन के रूप में हुई। आदिवासी युवाओं को एसपीओ बनाया गया, जिसको कोया कमांडो कहते थे। जो लोग आतंक फैलाते थे, उनके सामने लड़ने के लिए उन्हें ट्रेनिंग दी गई।

 

मान्यवर, जो एम्बूश की रणनीति अपना रहे थे, उनके खिलाफ उसी प्रकार की रणनीति अपनाने का निर्णय हुआ। अब मैं यह पूछना चाहता हूं कि सलवा जुडूम की शुरुआत किसने की? यह शुरुआत किसी बीजेपी के कार्यकर्ता ने नहीं की थी। सलवा जुडूम की शुरुआत श्रीमान कर्मा ने की थी, जिनको नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था और वे कांग्रेस के नेता थे।

 

मान्यवर, 5 जुलाई, 2011 को सर्वोच्च अदालत में नंदिनी सुन्दर और अन्य लोगों ने एक विवाद दायर किया और सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सुदर्शन रेड्डी के नेतृत्व में तय किया कि नक्सलियों के खिलाफ राज्य की लड़ाई गैर-कानूनी है और तुरंत ही इन्हें हथियार लेने का वापस का ऑर्डर कर दिया।
मान्यवर, इसका क्या परिणाम हुआ? उनके हथियार वापस लिए गए, नक्सलियों के हाथों में हथियार थे, उन्होंने चुन-चुनकर सलवा जुडूम से जुड़े हुए लोगों को मार दिया। वही सुदर्शन रेड्डी बाद में विपक्ष के उप राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बने। कांग्रेस पार्टी कह रही है कि हमारा नक्सलियों से क्या लेन-देन है? यह लेन-देन है। जो देश की कानून और व्यवस्था को मानता है, वह सुदर्शन रेड्डी को कभी अपना प्रत्याशी नहीं बनाएगा।

 

मान्यवर, हमारे यहां न्याय तंत्र की व्यवस्था है, जो जज बनता है, उसे तटस्थ माना जाता रहा है, यह हमारे न्याय तंत्र की आत्मा है। मगर कोई व्यक्ति जज बनकर अपनी व्यक्तिगत आइडियोलॉजी का उपयोग करके, संवैधानिक कपड़े पहनाकर अपनी आइडियोलॉजी को ऑर्डर में कंवर्ट करके, जिससे लोगों की जान जाए, ऐसा फैसला देता है, तो मैं ऐसे जजमेंट की घोर निंदा करता हूं। मैं उन लोगों की भी निंदा करता हूं, जिन्होंने उनको वोट दिया और प्रत्याशी बनाया। आइडियोलॉजी जनता के भले से ऊपर नहीं हो सकती।

 

मान्यवर, ये कह रहे हैं कि विकास नहीं है। मैं वर्ष 2014 के पहले का बोलूंगा तो फिर से हो-हल्ला करेंगे, मगर 2014 के बाद का तो मुझे बोलने का अधिकार है, क्योंकि हमारी पार्टी की सरकार है, हमारे नेता के नेतृत्व में, नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में यह सरकार चल रही है। वर्ष 2014 के बाद इस पूरे क्षेत्र में 17,589 किलोमीटर सड़कें बनाने की मंजूरी दी है, जिसमें 12 हजार किलोमीटर सड़कें बन चुकी हैं। ये विकास की बात करते हैं। यह इसलिए हो रहा है कि धीरे-धीरे नक्सलवाद समाप्त हो रहा है, वरना वहां सड़कें नहीं होती थीं, आईईडी गाड़ देते थे और ट्रकों को जला देते थे। लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। हम लगभग 5 हजार मोबाइल टावर, 6 हजार करोड़ रुपये के खर्च से लगा चुके हैं। वहां पर दूरसंचार पहुंचेगा, तो ये दुनिया के साथ जुड़ेंगे, देश के साथ जुड़ेंगे और विकसित भारत के साथ जुड़ेंगे। दो अन्य योजनाओं में और 8 हजार फोर जी टॉवर बनाने का हुक्म नरेन्द्र मोदी जी ने किया है। बाद में दिल्ली जितनी ही कनेक्टिविटी छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तेलंगाना के आदिवासी क्षेत्रों में होगी।
मान्यवर, 1,804 बैंक्स शाखायें इन 12 सालों में खुली हैं, 1,321 एटीएम्स खुले हैं, 37,850 बैंकिंग कोरेस्पोंडेंस बनाए गए और 6,025 डाकघर खुले। यह सिर्फ 12 साल में हुआ है। पहले कुछ नहीं हुआ, चर्चायें कीं, लेकिन माओवादियों ने विकास नहीं होने दिया। हमने माओवादियों के साथ चर्चा नहीं की, उनको समाप्त किया और विकास को आगे बढ़ाया। हमने 259 एकलव्य आदर्श विद्यालय बनाए, 47 आईटीआई, 49 एसडीसी, ‘स्किल डेवलपमेंट सेंटर’ बनाए, 16 कौशल विकास केंद्र बनाए। हमने इन सबमें लगभग 800 करोड़ रुपये का और खर्च इन 12 सालों में किया है। जगदलपुर, छत्तीसगढ़ में जहां सीएचसी, पीएचसी नहीं थे, वहां पर 240 बिस्तरों का सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल हमने बनाया है। सिविक प्रोग्राम में 2,212 करोड़ के कार्य किए हैं, जो स्वास्थ्य, शिविर और दवाओं से जुड़े हुए हैं। हमने जनजातीय युवा एक्सचेंज के कार्यक्रम भी बनाए। सिक्योरिटी के लिए, राज्यों की सहायता के लिए एसआरई लेकर आए और दस साल में तीन हजार करोड़ रुपये दिए, स्पेशल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्कीम लेकर आए और पांच हजार करोड़ रुपये दिए, एक्सटेंडेड एसआईएस योजना लेकर आए और दो हजार करोड़ रुपये दिए और 4 हजार करोड़ रुपये केंद्रीय निधि द्वारा क्रिटिकल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए दिए। छोटे-छोटे इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे पानी की टंकी है, जोड़ने वाली पुलिया है, गांव के अंदर पंचायत घर बनाना है, इसके लिए 4 हजार करोड़ रुपये दिए। यह क्यों हो पाया और वर्ष 1970 से अब तक क्यों नहीं हुआ? कांग्रेस पार्टी करना नहीं चाहती थी, ऐसा नहीं है। ये करने जाते थे, वे धमाके करके मार देते थे। हमने धमाके करने वालों को समाप्त किया, तो यह विकास अब हो रहा है और विकसित बस्तर की रचना हो रही है।

 

मान्यवर, हथियारी माओवादियों के खिलाफ हमारे पैरामिलिट्री फोर्सेज़ ने जो अभियान चलाया, मैं अब उस पर आ रहा हूं। वर्ष 2014 के बाद क्या बदला? सीएपीएफ तो वही है, स्टेट पुलिस भी वही है। वर्ष 2014 के बाद क्लियर पॉलिसी और स्ट्रांग पॉलिटिकल विल इस काम में जुड़े। नरेन्द्र मोदी जी ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस देश के किसी भी कोने में चाहे कश्मीर हो, चाहे उत्तर-पूर्व हो, चाहे वामपंथी उग्रवादी विस्तार हो, गैर-कानूनी प्रवृत्ति नहीं चलेगी। इस पर कठोर हाथों से काम लिया जाएगा।
सेंटर और स्टेट के बीच में अलाइनमेंट हुआ। स्टेट की कैपेसिटी में गवर्नमेंट, गवर्नेस और पुलिसिंग तीनों में हमने सुधार किया। सीएपीएफ और स्टेट पुलिस का समन्वय बढ़ाया। एक्शनेबल इंटेलिजेंस को नीचे तक परकोलेट करने की व्यवस्था की और जिम्मेदारियाँ भी स्पष्ट कर दीं।
मान्यवर, ऑल एजेंसी अप्रोच शुरु की। सिर्फ हथियार नहीं, एनआईए, ईडी, इंटेलिजेंस एजेंसी, नेटवर्क, फंडिंग और सपोर्ट सिस्टम सभी पर हमने प्रहार किया। इफेक्टिव सरेंडर पॉलिसी लेकर आए। मैं बाद में आँकड़ा बताता हूँ। डेवलपमेंट और गवर्नेस में हमने कोई वैक्यूम नहीं छोड़ा और पहले जहाँ राज्य की उपस्थिति नहीं थी, स्टेट नहीं था, वहाँ आज राज्य की उपस्थिति है और नक्सलवाद की हार का सबसे बड़ा कारण यह है कि राज्य अब हर गाँव में पहुँच चुका है, वहाँ पंचायत बन चुकी है।

 

मान्यवर, विकास के लिए हमने होल ऑफ गवर्नमेंट अप्रोच ली और सुरक्षा नकेल कसने के लिए होल ऑफ एजेंसी अप्रोच ली। मान्यवर, तीन चीजें, आज मैं देश के सामने तीन तिथियाँ जरूर बताना चाहता हूँ। 24 अगस्त 2024, 20 अगस्त 2019 और कल 31 मार्च 2026। 20 अगस्त को गृह मंत्रालय में एक मीटिंग हुई। मोदी जी ने विकास का काम तो पहले ही चालू कर दिया था। पुलिस को-ऑर्डिनेशन का काम, मॉडर्नाइजेशन का काम, रिटायर्ड नक्सलियों को पुलिस फोर्स में लेने का काम, इनके को-ऑर्डनेशन का काम, खुफिया एजेंसी के साथ ये सब 20 अगस्त को डिजाइन किया गया, तो फिर इतनी देर क्यों लगी?… (व्यवधान) बैठ जाओ, मैं पैसे के बारे में भी बताता हूँ।
मान्यवर, देर क्यों लगी, क्योंकि बीच में, छत्तीसगढ़ में काँग्रेस की सरकार थी। मैं आज रिकॉर्ड पर यह कहना चाहता हूँ। बिहार वर्ष 2024 से पहले नक्सल मुक्त हो चुका था। महाराष्ट्र, एक तहसील छोड़कर वर्ष 2024 से पहले नक्सल मुक्त हो चुका था। ओडिशा वर्ष 2024 से पहले नक्सल मुक्त हो चुका था। झारखंड, एक जिला छोड़कर वर्ष 2024 से पहले नक्सल मुक्त हो चुका था। सिर्फ छत्तीसगढ़ नहीं हुआ था, क्योंकि वहाँ काँग्रेस की सरकार थी। मुझे कहने में कोई संकोच नहीं है, क्योंकि सत्य बोलते हुए कहीं पर, किसी स्थान का विचार नहीं करना चाहिए। सत्य बोलने के लिए ही होता है। छत्तीसगढ़ काँग्रेस की सरकार ने नक्सलवादियों को बचाकर रखा था।
मान्यवर, दूसरी तारीख आती है, 24 अगस्त 2024। वर्ष 2024 की शुरुआत में (व्यवधान) हाँ, एलिगेशन ही है, एलिगेशन है।… (व्यवधान)
मान्यवर, मैं किसी व्यक्ति के सामने नहीं कह रहा हूँ। मुझे रूल्स न समझाएँ। व्यक्ति के सामने यदि करना है, तो भूपेश बघेल को पूछो, प्रूफ रजू करूँ क्या यहाँ पर? हाँ बोले, तो बोलो, वर्ना फँस जाओगे। … (व्यवधान)

 

मान्यवर, वर्ष 2024 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदली, उसके दूसरे ही महीने में वहाँ गया था। भाजपा की सरकार ने पूरा समर्थन का भरोसा दिया। साझा रणनीति बनी और 24 अगस्त को मैंने घोषित किया था कि 31 मार्च 2026 को हम नक्सलवाद पूरे देश से समाप्त कर देंगे। उसके बाद जो हुआ, वह मैं बताना चाहता हूँ।
महोदय, हमने सुरक्षा घेरे में बढ़ोतरी की। माननीय मोदी जी के 11 साल के कार्यकाल में 596 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन बनाए गए। वर्ष 2014 में 126 नक्सल प्रभावित जिले थे और अब सिर्फ दो बचे हैं। वर्ष 2014 में 35 मोस्ट अफेक्टेड जिले थे और अब शून्य हैं। नक्सल घटनाएं दर्ज करने वाले 350 पुलिस स्टेशन थे अब सात हैं। पिछले छ: सालों में 406 नए सीएपीएफ कैम्प बनाए गए, 68 नाइट लैंडिंग हैलीपेड बनाए गए, 400 बुलेट और ब्लॉस्ट प्रूप गाडियां जवानों को दी गई, पांच अस्पताल जवानों के लिए बनाए गए और कॉम्युनिकेशन की व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त की गई।

 

मान्यवर, इसका परिणाम क्या हुआ? यहां बहुत सांसदों ने कहा कि मारना नहीं चाहिए, वार्ता करनी चाहिए इसलिए मैं ये आंकड़े उनके लिए पढ़ना चाहता हूं।
मैं वर्ष 2024, 2025 और 2026 का संयुक्त आंकड़ा पढ़ रहा हूं। मार्च, 2026 यानी तीन साल में 706 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए और 2218 गिरफ्तार हुए। हमने उनको पकड़कर जेलों में डाला और अदालतों की शरण में ले गए। 4839 लोगों ने आत्मसमर्पण किया और ये हमसे संवाद करने की बात कर रहे हैं।
2218 जेल में गए और सिर्फ 706 लोग, जिन्होंने सरेंडर नहीं किया, इनको बैन में रखा गया था, और इनको पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। मैं कहता हूं कि शासन की यही एप्रोच होनी चाहिए कि जो वार्ता करना चाहता है, उसके साथ वार्ता करनी चाहिए और जो किसानों, बच्चों, आदिवासियों और जवानों पर गोली चलाता है, उसका जवाब गोली से देना चाहिए। यही शासन का रूल है और यही शासन का नियम है।
मान्यवर, हमने संवाद, सुरक्षा और समन्वय तीनों का उपयोग किया है। हमने नवीनतम टेक्नोलॉजी का उपयोग करके सटीक निगरानी और ढेर सारे टेलीफोन बिलों का विश्लेषण किया। गृह

 

मंत्रालय ने लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम, मोबाइल फोन की गतिविधियां, साइंटिफिक कॉल लॉग्स, सोशल मीडिया एनालिसिस, फोरेंसिक और तकनीकी संस्थानों की सहायता लेकर पूरे अभियान का नेतृत्व किया। ड्रोन सर्वेलेंस, सैटेलाइट का उपयोग, इमेजिंग टेक्नोलॉजी और एआई आधारित डेटा एनालिसिस से सफलता प्राप्त हुई।
महोदय, कई ऐसे अभियान चले जिसने बड़े-बड़े क्षेत्र क्लियर कर दिए। अगर मैं नहीं बोलूँगा तो हमारे जवानों के साथ अन्याय होगा। वर्ष 2022 में ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ बिहार में बूढ़ा पहाड़ क्षेत्र में चला। वर्ष 2022 में ‘ऑपरेशन डबल बुल गुमला’, लोहरदगा और लातेहार में चला और 8 से 25 फरवरी में तीनों जिले नक्सलवाद से मुक्त हो गए। 1-3 सितम्बर, 2022 में ‘ऑपरेशन थंडर स्ट्रॉम’ झारखंड के सरायकेला पश्चिमी सिंहभूम और खूंटी जिले में चला। वर्ष 2022 में जून-जुलाई महीने में ‘ऑपरेशन भीमबांध’ मुंगेर जिले में चला। वर्ष 2022 में ‘ऑपरेशन चक्रबांधा’ बिहार के गया और औरंगाबाद जिले में चला। ये सारे एरियाज़ इससे मुक्त हो गए।

मैं सदन का ध्यान एक और ‘ऑपरेशन ब्लैक फोरेस्ट’ की तरफ विशेष रूप से दिलाना चाहता हूं। तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सीमा में 50 किलोमीटर लंबी और 37 किलोमीटर चौड़ी एक पहाड़ी है। इस पहाड़ी पर इन्होंने अपना एक परमानेंट कैम्प बनाया था। ये लोग पांच साल लड़ सकें, इनके पास इतना असलहा और हथियार थे। वहां सोलर लाइट की व्यवस्था है, ढेर आईडी बनाने की फैक्ट्रियां थीं। वहां पांच साल का अनाज भरा था और 400-500 कैडर एकत्रित थे। मैं आज बड़ी संवेदनशीलता के साथ कहना चाहता हूं कि बहुत गर्मी थी।
पहाड़ पर 45 डिग्री टेम्परेचर था, 10 बजते-बजते पत्थर गरम हो जाता था। शरीर में से 2 लीटर, 3 लीटर पसीना बह जाता था, हम जवान को पीने के लिए राशनिंग में 300 ग्राम पानी देते थे। जवानों ने उफ़ नहीं की, मान्यवर, 21 दिन तक ऑपरेशन चला, 30 से ज़्यादा माओवादी मारे गए, बाकी सारे नीचे उतरते ही पुलिस के साथ मुठभेड़ों में मारे गए या सरेंडर किए और यह पूरा असलहा हमने ज़ब्त कर लिया। इसी ने महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ मतलब बस्तर और तेलंगाना में माओवादी आंदोलन का अंत किया।
… मैं आज भी बड़ी विनम्रता के साथ और बड़े भाव के साथ (व्यवधान), सुनिए न, आगे सुनिए। मान्यवर, बड़ी विनम्रता के साथ और बड़ी संवेदनशीलता के साथ कोबरा, सीआरपीएफ, डीआरजी और छत्तीसगढ़ पुलिस को मनपूर्वक इस सदन में सैल्यूट करना चाहता हूँ मान्यवर। इन्होंने अमानवीय धैर्य का उपयोग करके इनके किले को तोड़ा है।
ओवैसी जी कह रहे हैं ग्रेहाउंड्स, ग्रेहाउंड्स का भी रोल है, मगर हमें तेलंगाना सरकार ने ऊपर आने से न बोल दिया था कि हम ऊपर नहीं आएंगे, ये नीचे आएंगे तो हम इनको रोकेंगे। इसके लिए धन्यवाद, जो नीचे आए इनको रोका है, ऊपर नहीं आए।

 

मान्यवर, यह आज जो वर्ष 2024 की इनकी मुख्य कैडर है, मैं आज इसकी स्थिति बताना चाहता हूँ। सेंट्रल कमेटी मेंबर और पोलित ब्यूरो मेंबर वर्ष 2024 की शुरुआत में कुल 21 थे। मेरी बात ध्यान से सुनिएगा, यह इनकी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व है। 21 थे, एक पकड़ा गया है, सात सरेंडर हुए हैं, 12 मारे गए हैं और एक फरार है, उसके साथ भी वार्ता चल रही है, मुझे लगता है वह भी बहुत जल्दी सरेंडर कर देंगे। 21 के 21 सेंट्रल कमेटी मेंबर और पोलित ब्यूरो मेंबर समाप्त हो चुके हैं और उनकी केंद्रीय व्यवस्था टूट चुकी है।
दंडकारण्य में 27 की स्टेट कमेटी थी। तीन अरेस्ट हुए, 20 सरेंडर हुए, 11 मारे गए और दो से बातचीत चालू है, वो भी 37 के 37 लोग दंडकारण्य, जो उनकी मुख्य स्टेट कमेटी थी, वह समाप्त हो चुकी है। मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ (एमएमसी) स्टेट कमेटी, तीन सरेंडर कर गए, तीन की ही बची थी। ओडिशा, चार बचे थे, एक सरेंडर करा, तीन मारे गए। ओएससी, ओडिशा, पांच सरेंडर करे, पांच मारे गए, 10 ही थे। डिस्टर्ल्ड रीजन ब्यूरो, अरेस्ट एक हुआ, तीन मारे गए, एक फरार है खाली मान्यवर, एक ही फरार है, तो छह के छह हो गए। तेलंगाना में छह सरेंडर हो गए, तीन मारे गए, एक भी नहीं बचा है। उनकी पोलित ब्यूरो मेंबर और सीएमसी यह पूरा समाप्त हो चुका है। हमने लक्ष्य किया था कि 31 मार्च को नक्सल मुक्त करेंगे। मैं पूरी व्यवस्था होने के बाद देश को भी सूचित करूँगा, मगर मैं ऐसा बोल सकता हूँ, धड़ल्ले से बोल सकता हूँ कि हम नक्सल मुक्त हो गए हैं, ऐसा कहने में कोई तकलीफ नहीं है।

 

मान्यवर, इनके महासचिव बसवराजू न्यूट्रलाइज हुए। हिड़मा, जिन्होंने 27 लोगों को मारा था, 28 वर्ष से एक्टिव थे। बसवराजू जी 49 वर्ष से एक्टिव थे। विवेक 40 वर्ष से एक्टिव था, न्यूट्रलाइज हुआ। गजरला रवि 11 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए। कदरी सत्यनारायण राव रेड्डी 46 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए। गणेश उइके 44 वर्ष से एक्टिव थे, न्यूट्रलाइज हुए। वेणुगोपाल आत्मसमर्पण किया, 46 वर्ष से एक्टिव थे। वासुदेव आत्मसमर्पण किया, 36 वर्ष से एक्टिव थे। पुल्लूरी प्रसाद राव चंद्रन्ना 46 वर्ष से एक्टिव थे, आत्मसमर्पण किया। रामदेर मांझी देबू 36 वर्ष से एक्टिव थे, समर्पण किया। थिप्परी तिरुपति 44 वर्षों से एक्टिव थे, उन्होंने भी सरेंडर कर दिया है। मुख्य हथियारी माओवादी समाप्त हो चुके हैं।
मान्यवर, हमने बिल्कुल ल्यूक्रेटिव पुनर्वसन पॉलिसी को भी अपनाया है। आत्मसमर्पण के लिए प्रोत्साहन राशि 50 हजार रुपये घोषित की गई है, सामूहिक सरेंडर के लिए इस राशि को दोगुना कर दिया जाता है, सबको सरकार की ओर से मोबाइल दिया जाता है, हथियार जमा कराने पर और मुआवज़ा देते हैं, पुनर्वसन केन्द्र पर कौशल प्रशिक्षण व टूल किट का वितरण करते हैं, हम उनको 10 हजार रुपये प्रति माह 36 महीने तक देते हैं, सभी को मोदी जी ने प्रधानमंत्री आवास योजना का गिफ्ट दिया है, नक्सल मुक्त पंचायत होते ही गांवों के विकास के लिए 1 करोड़ रुपये दिये जाते हैं।
मान्यवर, हमने सरेंडर हेतु कैम्प लगाये हैं। मैं आज इस सदन को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ बताना चाहता हूँ। मैं उन कैम्प्स में गया हूँ। बहुत सारी स्वयंसेवी संस्थाएं कैम्प्स में सालों तक हथियार लेकर घूमने वाले नक्सलियों को सामान्य मानवी-नागरिक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जब हम वहां जाते हैं, तो आंखों में आंसू आ जाएं, ऐसे दृश्य सामने होते हैं। किसी नक्सली बच्ची को नेल पॉलिश देते हैं, तो वह उसे लगाते-लगाते रो पड़ती है। उसके ट्यूटर पूछती है कि क्यों रो रही हो, तो वह कहती है कि मैंने जीवन में पहली बार नेल पॉलिश लगाया है। मैं सात साल की थी जब ये मुझे उठा ले गये थे, तब से मैं पैंट, शर्ट और बूट में ही घूम रही हूँ। मैंने ऐसे जीवन को कभी देखा ही नहीं। वे लिपस्टिक लगाते-लगाते रो पड़ती हैं, जब हाथों में मेहंदी लगती है, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं होता।

 

मान्यवर, बस्तर में साप्ताहिक बाजार लगते हैं, वहां उनके मां-बाप से मिलने के लिए ले जाते हैं, खुद तो मां-बाप का आशीर्वाद लेते हैं, नये जीवन का आशीर्वाद मांगते हैं और कुछ लोग मां-बाप को यह कहते हुए पीटने लगते हैं कि नक्सलियों को क्यों दे दिया, क्यों हमारा जीवन बर्बाद कर दिया? वे पच्चीस-तीस साल तक न पढ़े, न लिखे, निरक्षर रहे, खाना नहीं मिला, पशुओं की तरह दौड़ते रहे, न रात देखा न दिन देखा, उनका पूरा जीवन ही तबाह हो गया। जिसको भी नक्सलवादी हिंसा अन्याय का सामना लगता है, मेरा सभी से करबद्ध निवेदन है कि वे कैम्प्स में जाकर दो रात बिताइए, तो आपको मालूम पड़ेगा कि इन नक्सलवादियों ने क्या किया है।
यहां बैठकर फैशनेबल तरीके से इनका पक्ष लेना, इनकी सुनो, इनसे चर्चा करो, ऐसा कहना बहुत सरल है। है किसी के पास जवाब? 15 हजार बच्चों के जीवन बर्बाद कर दिये गये, इसका कौन जिम्मेदार है? है किसी के पास जवाब? सारे बुद्धिजीवी अर्बन नक्सल कैम्प्स में जाकर देखें कि आपने क्या किया है। आप तो ए.सी. चैम्बर में बैठकर कोर्ट के प्रोटेक्शन में आर्टिकल लिखते रहते हैं, लेकिन वहां जीवन के जीवन उजड़ गये हैं और किसी को परवाह नहीं है। अपने आप को ह्यूमैन राइट का चैम्पियन मानते हैं।
मैं पूछना चाहता हूँ कि 32 साल की आयु तक मेहंदी न लगाने वाली बच्ची के ह्यूमैन राइट की चिंता कौन करेगा? मान्यवर, उसकी चिंता नरेन्द्र मोदी करेंगे और कोई नहीं करेगा। इनका जो अधिकार छीन लिया गया है, उसका हिसाब कभी न कभी देना पड़ेगा। मैं तो जन्म से हिंदू हूँ, कर्मों में मानता हूँ। जिन्होंने भी नक्सलवादियों का शब्द से भी प्रछिन्न समर्थन किया है, वे सब इस पाप के उतने ही भागीदार हैं, जितना बंदूक लेकर घूमने वाले।

मान्यवर, हमने इनकी नौकरी और रोज़गार के लिए ढ़ेर सारे प्रयास किए हैं। हमने कौशल केन्द्र बनाये हैं। इनके बच्चों के लिए 12वीं कक्षा तक मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था की है, महिलाओं को दो लाख रुपये और पुरुषों के लिए पांच लाख रुपये के ऋण की व्यवस्था की गई है।
हम बस्तर ओलम्पिक्स और बस्तर पंडुम के माध्यम से खेल को बढ़ावा दे रहे हैं। वहां पर अब 1,20,000 कलाकारों ने बस्तर पंडुम में भागीदारी की है और 5,50,000 आदिवासी लोगों ने खेल खेला।

मेरा विपक्ष के उन सभी सदस्यों से विनती है कि जो इसे न्याय की लड़ाई कहते हैं, वे बस्तर पंडुम और बस्तर ओलम्पिक्स में जाएं।
मान्यवर, जिनके पैर उड़ गए, हाथ कट गए, आंख चली गई, मेरे घर पर ऐसे लोग आए थे, उन्होंने नाश्ता किया था। मैं उनकी वेदना जानता हूं। महामहिम राष्ट्रपति जी ने भी उनको बुलाया था। उनके लिए कभी एक घंटा तो निकालिए। उन पर जुल्म ढाहने वालों पर भाषण देने के लिए आपके पास बहुत समय है। उस जुल्म का परिणाम देखने के लिए आप एक घंटे का समय निकालिए, ऐसा मेरा निवेदन है।

मान्यवर, वर्ष 1970 से नक्सली आतंकवाद क्यों फैला है, मैं अंत में उसकी तह में भी जाना चाहता हूं। जब मनमोहन सिंह जी की सरकार बनी थी, तब एक नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (एनएसी) बनी थी। हमने प्रधानमंत्री की काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स के बारे में सुना था, संसद में बहस के दरमियान सदस्य सलाह दें, हमने वह भी सुना था। एक नई नेशनल एडवाइजरी काउंसिल एक्सट्रा संवैधानिक फोरम खड़ी की गई थी, जो देश के लिए कानून बनाता था। उस फोरम में कौन था? सोनिया जी, इसकी अध्यक्ष थीं। हर्ष मंदर इसके सदस्य थे। उनके एनजीओ ‘अमन वेदिका’ में शीर्ष नक्सली नेता की पत्नी को जिम्मेदारी दी गई थी। यह रिकॉर्ड में है कि वह उन नक्सलियों में शामिल थीं, जिन्होंने अर्बन एरियाज़ में अपहरण के केसेज़ किए थे।
मान्यवर, यह एनएसी देश के लिए नीति निर्धारण करती थी। राम दयाल मुंडा जी कहते थे कि नक्सल ऑपरेशन जरूरत से ज्यादा कठोर हैं। इस प्रछिन्न समर्थन ने ही नक्सलियों की हिम्मत बढ़ाई है। शबनम हाशमी, राम पूनानिया, उषा रामनाथन, एनसी सक्सेना, जीन ड्रेज, फ़राह नक़वी और एक विनायक सेन थे, वर्ष 2010 में वे अदालत द्वारा दोषी पाए गए थे, फिर भी उनको प्लानिंग कमीशन की हेल्थ स्टीयरिंग कमेटी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रखा गया था। एक महेश राउत नामक नक्सली था, जयराम रमेश जी ने उसकी रिहाई के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था।

मान्यवर, नंदिनी सुंदर, रामचन्द्र गुहा, ईएएस शर्मा जैसे लोग सल्वा जुडूम के केस के साथ भी जुड़े हुए थे। जब देश की सर्वोच्च सत्ता के केन्द्र केन्द्र सरकार में एक एक्सट्रा संवैधानिक अथॉरिटी हो, जो प्रधानमंत्री के भी ऊपर थी, वे उसके सदस्य हों, अगर नक्सलवाद के समर्थक हों, तो आप मुझे बताइए कि किस तरह से नक्सलियों का हौसला टूटेगा। यह कांग्रेस पार्टी ने किया है। ये भाग नहीं सकते हैं। यह तो इतिहास है। मेरी बात पर जो लोग विरोध कर रहे हैं, आने वाले दिनों में ऐसी सैकड़ों पुस्तकें लिखी जाएंगी, जो आपके कारनामों से भरी हुई होंगी। आप कैसे भागेंगे? लोकतंत्र के अंदर किसी की आवाज दबाई नहीं जा सकती है।

Whenever there is discussion, he seems to be abroad': Amit Shah slams Rahul  Gandhi over attendance in Lok Sabha | India News - The Times of India

मान्यवर, वर्ष 2011 में मनमोहन सिंह जी ने प्रधानमंत्री रूरल डेवलेपमेंट फेलोशिप लॉन्च की थी। उनका काम युवाओं को एक्सपोजर देना था। उसमें महेश राउत फेलो बने थे, जो महाराष्ट्र पुलिस के नक्सलियों के साथ संबंध की वजह से महाराष्ट्र पुलिस के केस में जेल गए थे। जब प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा लाई गई प्रधानमंत्री रूरल डेवलेपेंट फेलोशिप लॉन्च हुई थी, तो उसका एक लाभार्थी नक्सलवादी है, तो नक्सलवादियों के हौसले भला कैसे टूटेंगे? … (व्यवधान)
श्री बी. मणिक्कम टैगोर (विरुधुनगर): आपने कहा है कि उसने हथियार डाल दिए हैं। (व्यवधान)
श्री अमित शाह : मान्यवर, वर्ष 2010 में गृह मंत्री चिदंबरम जी ने चिंतलनार, छत्तीसगढ़ में एक वक्तव्य दिया था कि एक साथ 76 जवानों को मार दिया गया था। अभी अमरा राम जी जेएनयू का महिमा मंडन कर रहे थे। जेएनयू में उत्सव मनाया गया था।
वहां एक नृत्य किया गया कि पुलिस 76 के जवान मारे गए। उस नृत्य के समय जमीन पर भारत का तिरंगा बिछाकर और उसे पैरों के नीचे रखकर नृत्य किया गया। ये इसका समर्थन करते हैं।
मान्यवर, 76 जवानों के मारे जाने के बाद किसी को खाना मुंह नहीं लगता है और पानी हलक से नीचे नहीं उतरता है। चिदंबरम साहब ने नक्सलियों से कहा- “हम आपसे हथियार डालने के लिए नहीं कह सकते, क्योंकि हम जानते हैं कि आप ऐसा नहीं करोगे, क्योंकि आप हथियारबंद आजादी की लड़ाई में विश्वास करते हैं।”

मान्यवर, किस प्रकार से यह देश चला है? पूरे तालाब में पानी भरा है, उसमें ये गोता लगाते हैं, कपड़े भिगोये बगैर बाहर निकलते हैं और कहते हैं कि हमने तो कुछ किया ही नहीं है। मैंने तो ऐसे जादूगर देखे ही नहीं हैं कि आदमी तालाब में गोता लगा दे और बाहर निकले, तो एक भी कपड़ा भीगा न हो और ये कहेंगे कि मैं तो निर्दोष हूं, मैं तो गया ही नहीं और मैं तो बोला-चाला भी नहीं। इन्हें कमाल का जादू आता है। … (व्यवधान)
मान्यवर, मैं अब उनके नेता राहुल गांधी जी की बात करना चाहता हूं। राहुल गांधी जी अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई बार नक्सलों और उनके हमदर्दों के साथ देखे गए हैं। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठनों ने हिस्सा लिया है। इसका रिकॉर्ड है। इन्होंने वर्ष 2010 में ओडिशा में लाडो सिकाका के साथ मंच साझा किया। सिकाका ने उसी मंच से भड़काऊ भाषण दिया और राहुल गांधी को माला भी पहनाई। वर्ष 2018 में इन्होंने हैदराबाद में गुम्माडी विठ्ठल राव उर्फ गद्दार से मुलाकात की, जो उस विचारधारा के करीब रहे। … (व्यवधान) इन्होंने मई, 2025 को-ऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ पीस के साथ मुलाकात की। … (व्यवधान)

मान्यवर, 172 जवानों को मारने वाला हिडमा जब मारा गया, तो इंडिया गेट पर नारे लगे- “कितने हिडमा मारोगे, हर घर से हिडमा निकलेगा।” … (व्यवधान) उस वीडियो को राहुल गांधी ने स्वयं ट्वीट किया है। ये कैसे बच सकते हैं?… (व्यवधान) इन्होंने वर्ष 1970 से लेकर मार्च, 2026 तक नक्सलवाद का समर्थन किया है और नरसंहार का समर्थन किया है। … (व्यवधान) जो 20,000 लोग मारे गए हैं, अगर उनका कोई एक दोषी है, तो वह कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है।… (व्यवधान) नक्सलों के साथ रहते-रहते यह पार्टी और इनके नेता खुद नक्सलवादी बन गए हैं। इसका जवाब इस देश की जनता को चुनाव में देना पड़ेगा।… (व्यवधान) यह बात यहां पर रुकेगी नहीं। यह बात जनता की अदालत में जाएगी। इसका जवाब इनको देना पड़ेगा। … मान्यवर,
एक बार फिर से इस लड़ाई में जिस-जिस फोर्स के जो-जो जवान शहीद हुए हैं, अपाहिज हुए हैं और जो-जो नागरिक मारे गए हैं, मैं उन सबको पूरे सदन की ओर से मनपूर्वक श्रद्धांजलि देकर (व्यवधान) अपनी बात को पूरा करता हूं। … (व्यवधान)
(इति)

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