पांच राज्यों के चुनावी माहौल के बीच केरल की राजनीति भी इन दिनों अपने चरम पर है। 140 सदस्यीय विधानसभा के लिए 9 अप्रैल 2026 को एक ही चरण में मतदान प्रस्तावित है, जबकि मतगणना 4 मई 2026 को होगी। ताजा सर्वेक्षणों ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। कुछ प्रमुख सर्वेक्षणों में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) को हल्की बढ़त मिलती दिखाई दे रही है, जबकि सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को 57 से 69 सीटों के बीच सिमटने का अनुमान है। नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के खाते में 1 से 5 सीटें जाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, कई अन्य सर्वेक्षण इस मुकाबले को कांटे की टक्कर बता रहे हैं, जिससे चुनावी रोमांच और अनिश्चितता दोनों बढ़ गई हैं।
यह चुनाव एक दशक से सत्ता में काबिज लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सरकार के भविष्य के लिए निर्णायक माना जा रहा है। प्रश्न यह है कि क्या मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी कर पाएगा या फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सत्ता में लौटने में सफल होगा।
केरल की राजनीतिक परंपरा लंबे समय से द्विध्रुवीय रही है, जहां एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है। इस बार भी मुख्य टक्कर इन्हीं दोनों गठबंधनों के बीच है, जबकि नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) तीसरे विकल्प के रूप में अपने वोट शेयर को बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।

लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ), जिसकी अगुवाई सीपीआई(एम) कर रही है, 2016 और 2021 में लगातार जीत दर्ज कर चुका है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में सरकार ने स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक कल्याण और आपदा प्रबंधन के क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। कोविड-19 के दौरान केरल मॉडल को देशभर में सराहा गया। महिला सशक्तिकरण, वृद्धावस्था पेंशन और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना इसकी प्रमुख उपलब्धियां रही हैं। एलडीएफ इन्हीं कार्यों को अपनी चुनावी रणनीति का आधार बना रहा है।
इसके विपरीत, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) पिछले दस वर्षों से विपक्ष में है। विपक्ष के नेता वी. डी. सतीशन सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि लंबी सत्ता के कारण एलडीएफ के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी बढ़ी है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्तर पर ‘इंडिया’ गठबंधन में साथ रहने वाले दल केरल में आमने-सामने चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
हाल में हुए सर्वेक्षणों के अनुसार मतदाताओं की राय इस बार मिश्रित नजर आ रही है। जहां स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के कार्यों की सराहना हो रही है, वहीं महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय समस्याओं को लेकर असंतोष भी स्पष्ट है। अनुमानित वोट शेयर के अनुसार यूडीएफ को लगभग 39-40 प्रतिशत, एलडीएफ को 36-38 प्रतिशत और एनडीए को 15-17 प्रतिशत वोट मिलने की संभावना है। एनडीए का बढ़ता वोट शेयर कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले को और दिलचस्प बना सकता है।
हालांकि, क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति भिन्न-भिन्न नजर आती है। उत्तर केरल में कासरगोड और कन्नूर में एलडीएफ मजबूत है, जबकि वायनाड और मलप्पुरम में यूडीएफ को बढ़त मिल सकती है। मध्य केरल में यूडीएफ की स्थिति बेहतर है, जबकि दक्षिण केरल में एलडीएफ अपेक्षाकृत मजबूत है। हालांकि, एनडीए नेमोम जैसी सीटों पर चुनौती पेश कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव में एंटी-इनकंबेंसी एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में उभर रही है। दस वर्षों की सत्ता के बाद एलडीएफ के खिलाफ कुछ असंतोष दिखाई दे रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव और स्थानीय निकाय चुनावों में इसके अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन ने इस धारणा को और बल दिया है। महंगाई, बेरोजगारी और विकास मॉडल को लेकर बहस तेज है।

उधर, नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) भी हिंदुत्व और विकास के एजेंडे के साथ अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। नेमोम, कजाक्कूट्टम और त्रिशूर जैसी सीटों पर उसका प्रभाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही बाढ़ प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और वर्तमान विधायकों का प्रदर्शन भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं।
केरल की राजनीति में पारंपरिक रूप से सत्ता परिवर्तन का रुझान रहा है। ऐसे में एलडीएफ के लिए लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी करना एक बड़ी चुनौती है। यदि यूडीएफ जीतता है, तो यह उसकी महत्वपूर्ण वापसी होगी, जबकि एलडीएफ के लिए यह एक ऐतिहासिक ‘हैट्रिक’ साबित हो सकती है। कुल मिलाकर, यह चुनाव ‘स्थिरता बनाम बदलाव’ के मूल प्रश्न पर केंद्रित दिखाई देता है।
वामपंथी राजनीति के परिप्रेक्ष्य में केरल को उसका अंतिम मजबूत गढ़ माना जाता है, क्योंकि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में उसका आधार काफी सीमित हो चुका है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या एलडीएफ इस बार भी अपनी सत्ता बरकरार रख पाएगा।
अब सभी की निगाहें 9 अप्रैल को होने वाले मतदान पर टिकी हैं। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राज्य की भविष्य की दिशा तय करने का भी अवसर है। मतदाता यह निर्णय करेंगे कि वे स्थिरता को प्राथमिकता देते हैं या बदलाव को अपनाते हैं। अंततः 4 मई 2026 को मतगणना के साथ स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और तय होगा कि केरल की सत्ता किसके हाथों में जाएगी।
– डॉ. संतोष झा

