| नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकार ने तीन प्रमुख स्तरों पर रणनीति अपनाई है। पहला, सुरक्षा के क्षेत्र में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती बढ़ाई गई, विशेष बलों का गठन किया गया तथा ड्रोन, सैटेलाइट निगरानी और बेहतर खुफिया समन्वय के माध्यम से नक्सली गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया। |
वर्षों से भोले-भाले वनवासियों को षड़यंत्रपूर्वक विकास से दूर रखा गया। जिसका परिणाम नक्सलवाद के रूप में सामने आया था। अब सरकार को नक्सलमुक्त भारत बनाने की प्रक्रिया में बहुत बड़ी सफलता मिली है। नक्सलवाद केवल मैदानी जंग मात्र नहीं है, यह दिमागी भी है। मैदान से तो इसकी विदाई हो रही है, दिमागी से भी जाए तो ही जीत पूर्ण कही जा सकेगी।
भारत की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष नक्सलवाद कई दशकों तक एक गम्भीर और जटिल चुनौती के रूप में उपस्थित रहा है। यह केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रहा बल्कि सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, विकास की कमी, प्रशासनिक उपेक्षा और वैचारिक संघर्ष से जुड़ा एक बहुआयामी प्रश्न भी रहा है। एक समय ऐसा था जब नक्सलवाद ने देश के विस्तृत भूभाग को प्रभावित कर रखा था, विशेषकर उन क्षेत्रों को जहां राज्य की उपस्थिति अपेक्षाकृत कमजोर थी और विकास की प्रक्रिया धीमी रही।

पिछले एक दशक में केंद्र और राज्य सरकारों ने सुरक्षा और विकास को साथ लेकर नक्सलवाद के विरुद्ध एक समन्वित रणनीति अपनाई है। इस प्रयास को व्यापक रूप से नक्सल मुक्ति अभियान के रूप में देखा जाता है। इस अभियान के परिणामस्वरूप नक्सली हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है और प्रभावित क्षेत्रों का दायरा भी काफी सिमट गया है। इसके बाद भी नक्सलवाद की बदलती प्रकृति, विशेषकर उसके वैचारिक और शहरी नेटवर्क से जुड़े आयामों ने इस समस्या को नए संदर्भों में समझने की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकार ने तीन प्रमुख स्तरों पर रणनीति अपनाई है। पहला, सुरक्षा के क्षेत्र में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती बढ़ाई गई, विशेष बलों का गठन किया गया तथा ड्रोन, सैटेलाइट निगरानी और बेहतर खुफिया समन्वय के माध्यम से नक्सली गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया। दूसरा, विकास के क्षेत्र में सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, मोबाइल नेटवर्क और बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार कर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा गया। तीसरा, आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के अंतर्गत नक्सलियों को आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध कराकर उन्हें हिंसा छोड़कर सामान्य जीवन अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
पिछले एक दशक में नक्सल मुक्ति अभियान के सकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से सामने आए हैं। 2014 में लगभग 126 नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटकर 2025 में 11 और फरवरी 2026 की समीक्षा में केवल 7 जिलों तक सिमट गई। इनमें प्रमुख रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के कुछ जिले शामिल हैं, जबकि सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर केवल 3 रह गई हैं। नक्सली हिंसा में भी भारी कमी आई है- 2010 की 1,936 घटनाएं घटकर 2025 में 234 रह गईं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई तेज हुई है; 2025 में 317 नक्सली मारे गए, 800 से अधिक गिरफ्तार हुए और लगभग 2,000 से अधिक ने आत्मसमर्पण किया।
आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति भी काफी प्रभावी सिद्ध हुई है। 2019 से अब तक हजारों नक्सलियों ने हथियार डाले हैं और पुनर्वास योजनाओं के माध्यम से मुख्यधारा में लौटे हैं। इसके साथ ही सुरक्षा बलों और नागरिकों की मृत्यु दर में भी उल्लेखनीय गिरावट आई है। इन उपलब्धियों से स्पष्ट होता है कि राज्य की प्रभावी उपस्थिति और विकास योजनाओं के विस्तार ने नक्सली संगठनों की शक्ति को बहुत सीमा तक कमजोर किया है।

उभरती चुनौती : शहरी नेटवर्क
हाल के वर्षों में नक्सलवाद की प्रकृति में परिवर्तन देखने को मिला है। यह आंदोलन अब केवल जंगलों और ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा बल्कि शहरों में भी इसके वैचारिक और नेटवर्क आधारित स्वरूप की चर्चा होने लगी है।
अर्बन नक्सल शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन व्यक्तियों या समूहों के लिए किया जाता है जिन पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे शहरों में रहते हुए नक्सली विचारधारा के प्रचार, संसाधन जुटाने या संगठनात्मक नेटवर्क तैयार करने में भूमिका निभाते हैं।
इस संदर्भ में भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद से जुड़ा मामला व्यापक चर्चा का विषय रहा है, जिसमें कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था। यद्यपि यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और इस पर समाज तथा राजनीतिक वर्ग में विभिन्न मत भी देखने को मिलते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि शहरी नेटवर्क नक्सली संगठनों को वैचारिक समर्थन, आर्थिक संसाधन और सम्पर्क उपलब्ध कराने में भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए इस आयाम को भी सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बनाया जाने लगा है।
सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है, जिसमें सुरक्षा, विकास और प्रशासनिक सुधार को समान महत्व दिया गया है। केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आधुनिक तकनीक, बेहतर खुफिया समन्वय और सुरक्षा बलों की क्षमता वृद्धि पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इसके साथ ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, संचार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के माध्यम से स्थानीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
डिजिटल युग में नक्सलवाद से जुड़ा वैचारिक संघर्ष भी बदल रहा है। सोशल मीडिया और साइबर स्पेस में फैलने वाले भ्रामक प्रचार का प्रभावी प्रतिवाद आवश्यक है। हाल के वर्षों में नक्सल मुक्ति अभियान ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है- हिंसा में कमी, प्रभावित क्षेत्रों का सिमटना और बढ़ते आत्मसमर्पण इसके प्रमाण हैं। फिर भी नक्सलवाद केवल सुरक्षा समस्या नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और विकास से जुड़ा जटिल प्रश्न है। इसलिए सुरक्षा, विकास, संवाद और विश्वास-निर्माण के संतुलित दृष्टिकोण से ही इसका स्थाई समाधान सम्भव है।
-डॉ. संतोष झा

