| पत्रकारिता तेजी से डिजिटल, एआई और डाटा जर्नलिज्म की दिशा में विकसित हो रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने समाचारों को त्वरित, व्यापक और इंटरएक्टिव बना दिया है। एआई की सहायता से समाचार संग्रह, विश्लेषण और प्रस्तुति अधिक सटीक और तेज हो रही है। डाटा जर्नलिज्म जटिल सूचनाओं को सरल और तथ्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करने में सहायक है। |
पत्रकारिता के लम्बे इतिहास में यदि सबसे ज्यादा बदलाव किसी दौर में आए हैं तो इसमें हम बीते दो-तीन दशकों को विशेष रूप से चिह्नित कर सकते हैं। हालांकि लम्बा समय ऐसा रहा है कि समाचार और सूचनाएं रेडियो-टीवी से बाहर मात्र कागज पर छपती थीं, समाचारपत्र के कार्यालयों में टाइपराइटर की आवाज गूंजती थी और सूचनाएं इकट्ठा करने के लिए फोन बूथ या लैंडलाइन पर घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, परंतु इसी अंतराल में हम देख पा रहे हैं कि अब एक साधारण स्मार्टफोन पर कृत्रिम बुद्धिमता से लैस एआई चैटबॉट कुछ ही सेकंड में लाखों सूचनाओं (डेटा पॉइंट्स) को संकलित और विश्लेषित कर समाचार तैयार कर पा रहा है।

यह बदलाव उत्साहजनक है, किंतु चिंताजनक भी। यहां प्रश्न यह उठ रहा है कि पत्रकारिता में डिजिटल, एआई और डाटा जर्नलिज्म की जो भूमिका बन गई है, क्या वे सच में उपयोगी है? क्या ये नई तकनीकें पत्रकारिता को मजबूत बना रही हैं या उसे कमजोर कर रही हैं? निस्संदेह ये तकनीकें और मशीनें महज उपकरण हैं, पर पत्रकारिता के मूल दायित्व यानी सच्चाई की रक्षा का दायित्व अभी भी हम मानवों का ही है।
यदि हम पीछे दृष्टि डालते हैं तो हमें पता चलता है कि 2010 के दौर में सोशल मीडिया के अभ्युदय के साथ डिजिटल पत्रकारिता ने सबसे पहले अत्याधुनिक तकनीक के रूप में अपनी पहचान बनानी शुरू की। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट डिजिटल न्यूज रिपोर्ट 2025 के अनुसार आज वैश्विक स्तर पर कागज पर छपे समाचारपत्रों के मुकाबले सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म्स से समाचार ग्रहण करने वालों की संख्या बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई है।
भारत में यूट्यूब से 55 प्रतिशत लोग समाचार देखते हैं और वीडियो को टेक्स्ट (छपे शब्दों) से ज्यादा पसंद करते हैं। सूचनाओं के डिजिटलीकरण ने सूचना तक सामाान्य मानवों की पहुंच को अभूतपूर्व बनाया है। एक ग्रामीण क्षेत्र का किसान अब दिल्ली के संसद सत्र को लाइव देख सकता है। परस्पर संवाद का मौका देने वाली इंटरैक्टिव स्टोरीज, पॉडकास्ट और लाइव ब्लॉगिंग ने पाठकों को निष्क्रिय दर्शक से सक्रिय भागीदार बना दिया। हालांकि यह अपने साथ फर्जी समाचारों (फेक न्यूज) का सैलाब भी लाया है। व्हाट्सएप पर फैलने वाली अफवाहें अब डिजिटल पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती है। प्रश्न उठता है कि सत्य को कैसे परखें, सूचनाओं के स्रोत की पहचान कैसे करें और कैसे पता करें कि समाचार सही है या गलत? यहां डाटा जर्नलिज्म की भूमिका उभरती है।
![]()
डाटा जर्नलिज्म मात्र आंकड़ों का संकलन करना नहीं बल्कि उनसे कहानी गढ़ना है। यह तकनीक कैसे सहायक सिद्ध होती है, इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कुछ ही समय पहले एक अंग्रेजी दैनिक ने भारत के तीन राज्यों बिहार, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के 2.2 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड्स को एआई की सहायता से विश्लेषित किया। इसमें 90 हजार हिंदी पीडीएफ फाइलों से तथ्य और आंकड़े निकाले गए और गूगल नोटबुक या चैटजीपीटी जैसे एलएलएम (लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स) से उन्हें अंग्रेजी में अनुवादित कर सत्य का अन्वेषण किया। परिणाम? बिहार में महिलाओं के वोटर रिकॉर्ड्स में मतदाताओं के नाम हटाने (डिलीशन) और मृत लोगों को जीवित दिखाने जैसी घटनाएं उजागर हुईं।
इन समाचारों पर संसद में चर्चा की गई और न्यायालयों में सुनवाई हुई। इसी तरह 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी एआई टूल्स की सहायता से इंलाटरैक्टिव मैप और फिल्टर बनाकर लाखों मतदाताओं के डाटा को सेकेंडों में फिल्टर कर उनके कई दिलचस्प परिणाम निकाले गए और समाचारपत्रों ने उन्हें छापा। इन डाटा स्टोरीज ने सरकार की नीतियों को प्रभावित किया और समस्याओं को समझते हुए उनमें सुधार किए।
असल में डाटा जर्नलिज्म ने पारम्परिक रिपोर्टिंग को वैज्ञानिक आधार दिया। पत्रकार पहले इसके लिए साक्षात्कार और दस्तावेजों पर निर्भर थे। अब बिग डाटा, जीआईएस मैपिंग और विजुअलाइजेशन टूल्स से पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य से जुड़ी कई दमदार रिपोर्टें तैयार की जा रही हैं। उदाहरण के तौर पर कोविड महामारी के दौर में एक समाचारपत्र ने सिविल रजिस्ट्रेशन डाटा से कोविड के कारण हुई मौतों का विश्लेषण किया। पता चला कि महामारी से सरकारी आंकड़ों के मुकाबले पांच-छह गुना ज्यादा मौतें हुई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बाद में इन दावों को मान्यता दी। बेशक, डाटा जर्नलिज्म ने पत्रकारिता को निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित बनाया है, किंतु चुनौती यह है कि हर पत्रकार को अब कोडिंग और स्टेटिस्टिक्स समझने की आवश्यकता पड़ रही है, पर इन सारे मामलों में सबसे ज्यादा परिवर्तन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से आई।

एआई को पत्रकारिता का सबसे बड़ा गेम चेंजर कह सकते हैं। खास तौर से जेनेरेटिव एआई (जैसे कि चैटजीपीटी, गूगल-जेमिनी और क्लाउड) ने न्यूजरूम में क्रांति ला दी है। वीडियो का ट्रांसक्रिप्शन, हेडलाइन लगाना, अनुवाद और दस्तावेज लेखन अब सेकंडों का काम है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की जनरेटिव एआई एंड न्यूज रिपोर्ट 2025 के अनुसार 6 देशों (अर्जेंटीना, डेनमार्क, फ्रांस, जापान, यूके, यूएस) में जेनेरेटिव एआई का साप्ताहिक उपयोग समाचार के लिए 2024 के 3 प्रतिशत से दोगुना होकर 6 प्रतिशत हो गया है।
युवाओं (18-24 वर्ष) में यह 8 प्रतिशत है, पर सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा- पूरी तरह एआई से बने समाचारों को लेकर केवल 12 प्रतिशत लोग सहज हैं। मानवों की निगरानी के साथ तैयार किए गए समाचारों के मामले में यह 21 प्रतिशत, एआई की सहायता से मानवों द्वारा तैयार किए गए समाचारों के मामले में 43 प्रतिशत और पूरी तरह मानव-लिखित समाचारों को लेकर 62 प्रतिशत लोग सहज हैं। साफ है कि अभी भी उन समाचारों के पाठक कहीं ज्यादा हैं, जो स्वयं मानव लिखते हैं।
इसमें संदेह नहीं कि एआई के लाभ असंख्य हैं। सत्यान्वेषी (फैक्ट-चेकिंग) टूल्स जैसे कि गूगल फैक्ट चेक एक्सप्लोरर आदि गलत सूचनाओं (मिसइनफॉर्मेशन) को पकड़ते हैं। कदाचित यही कारण है कि भारत में एआई का प्रयोग बढ़ रहा है। कई समाचारपत्र और यूट्यूब चैनल एआई एंकरों का उपयोग कर रहे हैं, किंतु एआई की कुछ सीमाएं भी हैं और यह घातक भी है। रॉयटर्स रिपोर्ट कहती है कि दर्शक मानते हैं कि एआई से समाचार सस्ती और अप-टू-डेट तो होगी, किंतु कम पारदर्शी (-8), कम सटीक (-8) और कम विश्वसनीय (-18) होगी। इसके अलावा चूंकि इसमें एक भूमिका एल्गोरिद्म की भी है, जो पक्षपात स्थाई कर सकती है। इसलिए यदि कोई डाटा पश्चिमी देशों से आता है या अंग्रेजी-केंद्रित है तो उसमें पक्षपात या पूर्वाग्रह हो सकते हैं और उसमें से भारतीय संदर्भ गायब हो सकते हैं।
नैतिक चुनौतियां तो और भी गम्भीर हैं। थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की 2025 रिपोर्ट (ग्लोबल साउथ पर) में 53 प्रतिशत पत्रकारों ने एआई के नैतिक प्रभाव पर गम्भीर चिंता जताई थी। सबसे बड़ा संकट नौकरियां जाने, गलत सूचनाओं (मिसइनफॉर्मेशन) के प्रसार का खतरा और मौलिकता के समापन का है। इस पर समस्या यह है कि एआई से राजनेता का फर्जी भाषण तक वायरल किया जा सकता है। वर्ष 2024-25 के चुनावों में भारत सहित कई देशों में एआई से उत्पादित सामग्री (जनरेटेड कंटेंट) ने विवाद खड़े किए।
पत्रकारिता की पहचान सत्य की खोज, निष्पक्षता और जवाबदेही से बनी है। यदि एआई और अन्य तकनीकें इन पहलुओं को मजबूत बनाती हैं तो हमें इन्हें अपनाने से आपत्ति नहीं, बशर्ते इन तकनीकों पर हम अपना नियंत्रण बनाए रखें। पत्रकारिता का भविष्य न तो पूरी तरह मशीन का है, न केवल पुराने तरीकों का। यह दौर इनमें संतुलन बनाने का है; जहां टेक्नोलॉजी गति देती है और मानवता सत्य की परख करती है।
– अभिषेक कुमार सिंह
