Assam Assembly Election 2026 के प्रचार का शोर 7 अप्रैल को थम चुका है। अब 9 अप्रैल को मतदान और 4 मई को परिणाम के साथ यह स्पष्ट होगा कि राज्य की राजनीति में नेतृत्व, संगठन और सामाजिक समीकरणों की इस प्रतिस्पर्धा में कौन बाजी मारता है। इस चुनाव की विशेषता यह है कि मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता तथा विविध सामाजिक समूहों के बीच संतुलन स्थापित करने की क्षमता के बीच है। कांग्रेस ने गौरव गोगोई को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर नई पीढ़ी पर दांव लगाया है, जबकि भारतीय जनता पार्टी हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में अपनी सुदृढ़ स्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रही है।

गौरव गोगोई के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वे अपने पिता तरुण गोगोई की राजनीतिक विरासत को समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप ढालकर उसे चुनावी सफलता में परिवर्तित कर सकते हैं। तरुण गोगोई के कार्यकाल (2001–2016) में कांग्रेस ने अपेक्षाकृत स्थिर शासन प्रदान किया था, किंतु वर्तमान असम पहले की तुलना में अधिक जटिल सामाजिक-राजनीतिक संरचना वाला राज्य बन चुका है। जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय पहचानों की भूमिका अब चुनावी परिणामों को अधिक निर्णायक रूप से प्रभावित करती है।
2021 के विधानसभा चुनावों के आंकड़े इस जटिलता को स्पष्ट करते हैं। 126 सीटों में से भाजपा-नीत एनडीए ने 75 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी थी। भाजपा को 60 सीटें प्राप्त हुईं, जबकि सहयोगी दलों ने शेष सीटों में योगदान दिया। दूसरी ओर, कांग्रेस-नेतृत्व वाले महाजोत को 50 सीटों पर संतोष करना पड़ा। यद्यपि वोट शेयर के स्तर पर अंतर अत्यधिक नहीं था, तथापि सीटों के संदर्भ में यह अंतर निर्णायक सिद्ध हुआ। यह तथ्य इस चुनाव में रणनीति की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है।
क्षेत्रीय समीकरणों की दृष्टि से ऊपरी असम, निचला असम और बराक घाटी— इन तीनों क्षेत्रों का राजनीतिक व्यवहार भिन्न-भिन्न है। ऊपरी असम में असमिया अस्मिता तथा स्वदेशी समुदायों का प्रभाव अधिक है, जहां भाजपा ने मजबूत आधार निर्मित किया है। निचले असम में मुस्लिम मतदाताओं की अपेक्षाकृत अधिक संख्या के कारण कांग्रेस को पारंपरिक समर्थन प्राप्त होता रहा है। वहीं, बराक घाटी में बंगाली भाषी हिंदू और मुस्लिम मतदाता अपनी-अपनी सामाजिक एवं राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर मतदान करते हैं। इन विविध क्षेत्रों में संतुलन स्थापित करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक जटिल चुनौती है।

धार्मिक समीकरण भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। असम में मुस्लिम आबादी लगभग 34 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। 2021 में कांग्रेस और एआईयूडीएफ गठबंधन ने इस वर्ग के मतों को काफी हद तक एकजुट किया, किंतु भाजपा ने हिंदू एकीकरण तथा क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर व्यापक समर्थन अर्जित किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल एक वर्ग विशेष के समर्थन से सत्ता प्राप्त करना कठिन है; व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता अनिवार्य है।
जातीय परिप्रेक्ष्य में असम और भी अधिक जटिल है। बोडो, कार्बी, मिसिंग, राभा जैसे जनजातीय समूहों की अपनी विशिष्ट राजनीतिक आकांक्षाएं हैं। भाजपा ने इन समूहों के साथ रणनीतिक गठजोड़ स्थापित कर अपनी स्थिति सुदृढ़ की है। कांग्रेस के लिए इन समुदायों में पुनः विश्वास स्थापित करना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। गौरव गोगोई को इन वर्गों तक प्रभावी पहुंच बनाने के लिए नवोन्मेषी रणनीतियों की आवश्यकता होगी।
गौरव गोगोई के समक्ष द्विस्तरीय चुनौती विद्यमान है। पहली, कांग्रेस के पारंपरिक मतदाता आधार— मुस्लिम समुदाय, चाय बागान श्रमिक तथा कुछ असमिया हिंदू वर्ग— को सुदृढ़ बनाए रखना और दूसरी, नए सामाजिक समूहों, विशेषकर युवा, आदिवासी तथा ऊपरी असम के मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता का विस्तार करना। इसके लिए उन्हें केवल भावनात्मक अपील या विरासत पर निर्भर रहने के बजाय ठोस नीतिगत एजेंडा प्रस्तुत करना होगा। रोजगार, शिक्षा, कृषि सुधार, बाढ़ नियंत्रण तथा सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दे उनके चुनावी अभियान के प्रमुख बिंदु रहे हैं।
कांग्रेस की एक प्रमुख कमजोरी उसका संगठनात्मक ढांचा भी है। पिछले एक दशक से सत्ता से बाहर रहने के कारण पार्टी का जमीनी नेटवर्क अपेक्षाकृत कमजोर हुआ है। कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और एकजुटता का अभाव भी परिलक्षित होता है। यदि गौरव गोगोई संगठन में नई सक्रियता उत्पन्न करने में सफल होते हैं, तो चुनावी प्रतिस्पर्धा अधिक तीव्र हो सकती है। उन्होंने अपने प्रचार अभियान में भ्रष्टाचार, सामाजिक ध्रुवीकरण और विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी है, जो शहरी एवं युवा मतदाताओं को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।

दूसरी ओर, हिमंत बिस्वा सरमा का नेतृत्व भाजपा के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रस्तुत करता है। उनकी राजनीतिक शैली आक्रामक, निर्णायक और परिणामोन्मुखी मानी जाती है। उन्होंने विकास कार्यों, बुनियादी ढांचे और निवेश को प्राथमिकता दी है, साथ ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक मुद्दों को भी राजनीतिक विमर्श में प्रमुख स्थान दिया है। भाजपा का सशक्त संगठनात्मक ढांचा तथा बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता नेटवर्क उसे चुनावी बढ़त प्रदान करता है।
इस चुनाव में गठबंधन राजनीति भी निर्णायक सिद्ध हो सकती है। 2021 में महाजोत ने मुस्लिम मतों को एकजुट किया, किंतु हिंदू मतदाताओं में विभाजन के कारण उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। यदि कांग्रेस इस बार छोटे दलों और स्थानीय नेतृत्व के साथ अधिक प्रभावी तालमेल स्थापित करती है और यह तालमेल वोट ट्रांसफर में परिलक्षित होता है, तो वह भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती है।
असम का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक संतुलन और राजनीतिक दिशा निर्धारण का भी महत्वपूर्ण अवसर है। 2021 के चुनाव में वोट शेयर का अंतर अपेक्षाकृत सीमित था, किंतु सीटों का अंतर व्यापक रहा। इससे यह स्पष्ट होता है कि रणनीति, गठबंधन और क्षेत्रीय समझ इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।
यह चुनाव इस बात की परीक्षा है कि क्या गौरव गोगोई अपनी विरासत को आधुनिक रणनीतियों के साथ समन्वित कर असम की जटिल सामाजिक संरचना को साध पाते हैं, या हिमंत बिस्वा सरमा का नेतृत्व एक बार फिर भाजपा को विजय दिलाता है। 9 अप्रैल को असम की जनता का निर्णय न केवल राज्य की राजनीतिक दिशा निर्धारित करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि बदलते समय में नेतृत्व की वास्तविक कसौटी क्या है।
– डॉ. संतोष झा

