समुद्र ने उस दिन खुद से पूछा कि वह इतना खारा क्यों हो गया है और फिर उसी की लहरों ने उसे जवाब दिया कि अब उसमें सिर्फ नमक नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आँसू घुल चुके हैं। दूर फैला हुआ हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य अब कोई साधारण जलमार्ग नहीं रह गया था, बल्कि वह मानो करुणा का एक ऐसा संगम बन गया था जहाँ हर लहर अपने साथ किसी माँ की सिसकी, किसी बच्चे की पुकार और किसी उजड़े घर की कहानी लेकर आती थी।
उसकी लहरें तट से टकराकर जैसे पूछती थीं कि क्या यही वह दुनिया है जिसे कभी स्वर्ग बनाने की कल्पना की गई थी और हर बार तट की रेत खामोश रहकर उस प्रश्न को अपने भीतर दफना लेती थी। समुद्र का धर्म है, जो तुम उसमें डालोगे वही तुम्हें लौटाएगा। पर सब देखते हुए ऐसा लग रहा है कि समुद्र मंथन तो हो रहा है, पर देवगण कहाँ हैं पता ही नहीं। चारों ओर असुर ही असुर हैं और असुरों में भी जातियाँ हो गई हैं, वे आपस में लड़ रहे हैं, कट रहे हैं। लगता तो ऐसा है कि वे केवल समुद्र के पानी को और खारा नहीं, बल्कि रक्त से लाल करने की इच्छा रखते हैं।
रेगिस्तान की सूखी धरती पर, जहाँ कभी जीवन की जिद दिखाई देती थी, अब थकान और प्रतीक्षा का सन्नाटा पसरा था। रेगिस्तान के एक सूखे इलाके में एक बच्चा अपनी माँ से बार-बार पूछता था कि पानी कब आएगा और माँ हर बार आसमान की ओर देखकर वही अधूरा उत्तर देती थी कि जब बादल आएंगे, जबकि वह खुद जानती थी कि अब बादल भी बारूद की गंध से डरकर दूर भागते हैं।
उसी समय कुछ अरब बस्तियों में बच्चे खाली बोतलों को उलट-पलटकर देखते थे, मानो उनमें कभी भरे दूध की स्मृति को तलाश रहे हों और एक बच्ची जब अपनी माँ से पूछती थी कि इसमें पहले जो सफेद पानी आता था वह कहाँ गया, तो माँ की आँखों में उत्तर से पहले आँसू आ जाते थे, क्योंकि वह जानती थी कि अब सवाल सिर्फ भूख या प्यास का नहीं रहा, बल्कि उस दुनिया का है जिसने बच्चों के अधिकारों को भी रणनीति में बदल दिया है।
असुरों का साम्राज्य है और असुरों के कई काले-गोरे राजा और सरदार दुनिया भर में फैल गए हैं, भस्मासुर बनकर। इतिहास की पुनरावृत्ति है, रेगिस्तान के कबीले हमेशा प्यासी रेत को खून पिलाने की कसमें खाते हैं। यह तब हुआ जब चालाक आदमी अपने आपको परमेश्वर का दूत या पुत्र बताकर भोले लोगों को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गए और दुनिया में पुरानी सभ्यताओं को कुचलकर नए कबीलों का जन्म हुआ, पर उनका तामझाम बढ़ा था, अपने आपको सभ्य बताने की होड़ थी उनमें और दुनिया तब से भुगत रही है। इन चालाक कबीलों को लगता है कि देव नहीं आएंगे, अमृत और कामधेनु भी नहीं निकलेंगी और ये नरभक्षी बन दुनिया में आतंक मचा सकेंगे।
धरती खुद कराह उठती थी और कहती थी कि उसने तो अन्न उगाया था, लेकिन मनुष्य ने उसी अन्न की जगह आग उगा दी और पास खड़ा एक सूखा पेड़ अपनी जली हुई शाखाओं के साथ यह गवाही देता था कि उसने कभी छाया दी थी, लेकिन अब उसे धुएँ में बदल दिया गया है। समुद्र यह सब देखता और अपने भीतर उठती लहरों को रोक नहीं पाता, क्योंकि हर नई लहर के साथ उसे और अधिक खारा होना पड़ता था।
इसी के समानांतर, दूर कहीं चमचमाती इमारतों में रोशनी और शोर था, जहाँ यूनाइटेड स्टेट्स, रूस, चीन और नाटो के बड़े-बड़े सभागारों में नक्शों पर लाल रेखाएँ खींची जा रही थीं, जहाँ इंसान नहीं, टार्गेट्स दिखते हैं। पर यह क्या ? यह लाल स्याही थी या इंसानी खून ? उन रेखाओं में इंसानों के चेहरे नहीं, केवल लक्ष्य और संभावनाएँ दिख रही थीं।
वहाँ बैठे लोग वाइन के गिलास उठाकर मुस्कुरा रहे थे और बाजार के चढ़ाव-उतार को सफलता की कहानी की तरह देख रहे थे, मानो हर बढ़ता हुआ ग्राफ किसी नई जीत का संकेत हो और किसी सौदे के पूरे होने पर मुस्कानें फैलती हैं, जैसे युद्ध कोई व्यापार हो और मौत एक निवेश, वाइन के गिलास उठते हैं, बाजार के ग्राफ चढ़ते हैं। समुद्र दूर से यह सब देखकर फुसफुसाता है कि उन गिलासों में भरा लाल रंग शराब नहीं, किसी अनदेखे दर्द का प्रतीक है, जिसे नाम देने की हिम्मत किसी में नहीं, मैंने पास से देखा और जाना, वह तो मानवीय खून था।
उधर ज़मीन पर स्वाद भी बदल गए हैं। अरब की खजूरें, जो कभी मिठास की पहचान थीं, अब अजीब-सी कड़वाहट से भर गई हैं, जैसे हर फल ने समय की त्रासदी को अपने भीतर सोख लिया हो। ईरान के मेवों की खुशबू में अब एक ऐसी कसैली बू घुल गई है, जो बाज़ार की चमक के पीछे छिपे जीवन के क्षरण की याद दिलाती है। इज़राइल ने रेगिस्तान को नंदनवन बनाने की जिद की, पर उसी ज़मीन पर इतिहास और वर्तमान की टकराहट ने कई जगहों को खामोश स्मृतियों में बदल दिया, जहाँ हरियाली और कब्रिस्तान एक-दूसरे के बगल में खड़े हैं। तुर्की के पिस्तों का हरा रंग बाज़ार में चमकता है, पर रंग भी इतने नकली बन जाते हैं कि उनका सौंदर्य व्यापार की चालाकियों में बदल जाता है।
पाकिस्तान के संदर्भ में यह फुसफुसाहट फैलती है कि जब रास्ते आतंकी हो जाते हैं, तो खेतों में अनाज से अधिक भय और अफीम उगाया जाने लगता है, और फार्महाउस ऐसे बनते हैं जहाँ संवेदनशीलता नहीं, कुटिलता पनपती है। ऐसा लग रहा है जैसे हॉर्मुज़ से फार्महाउस तक का सफर ऐय्याश तानाशाहों और अमानवीय महत्वाकांक्षाएँ रखने वाले नए अधर्म गुरुओं के हवाले कर दिया गया हो और देवताओं ने पलायन कर दिया हो।

उसी समय एक आम आदमी, जो अपने घर में रोटी और रिसते घाव पर लगाने की दवा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा था, टीवी पर चल रही बहस को देखता हुआ अपने बच्चे के प्रश्न से बच नहीं पाया कि युद्ध क्या होता है। वह उत्तर देना चाहता था, पर उसके शब्द गले में अटक गए, क्योंकि वह जानता था कि युद्ध केवल बंदूकों और मिसाइलों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि वह उन निर्णयों, सौदों और महत्वाकांक्षाओं में भी छिपा होता है जो धीरे-धीरे जीवन की हर साधारण जरूरत को छीन लेते हैं। उसका बच्चा अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा में था और वह सोच रहा था कि क्या वह उसे सच्चाई बताए या वही परियों वाली कहानी सुनाए जिसमें अंत में सब ठीक हो जाता है।
समुद्र अब और अधिक बेचैन हो उठा था और उसने आसमान से पूछा कि क्या वह इन सब आँसुओं को संभाल सकता है, पर आसमान भी मौन नहीं रह सका और उसकी गहराइयों से जैसे देवताओं का विलाप सुनाई देने लगा। सातवें आसमान से गिरते हुए आँसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि कभी इस धरती को स्वर्ग के रूप में देखा गया था, पर अब वही धरती ऐसे दृश्य दिखा रही थी जहाँ मनुष्य अपने ही अस्तित्व को निगलने लगा है। देवताओं को यह समझ नहीं आ रहा था कि उन्होंने जिस सृष्टि की कल्पना करुणा और संतुलन के साथ की थी, वह कैसे इस अवस्था तक पहुँच गई जहाँ एक ओर बच्चे पानी और दूध के लिए तरस रहे हैं और दूसरी ओर समृद्धि के नाम पर वाइन के गिलासों से खून पीकर जश्न मनाया जा रहा है।
अंततः समुद्र ने अपनी लहरों को शांत करने की कोशिश करते हुए स्वीकार किया कि उसका खारापन केवल प्राकृतिक नहीं रहा, बल्कि वह उन असंख्य आँसुओं का परिणाम है जो हर कोने से बहकर उसमें मिल गए हैं। उसने यह भी समझ लिया कि जब तक यह प्रवाह जारी रहेगा, तब तक उसका स्वाद बदलता रहेगा और वह हर बार एक नया दर्द अपने भीतर समेटता रहेगा। उस क्षण हवा, धरती और आकाश सभी एक साथ चुप हो गए, क्योंकि उन्हें एहसास हो गया था कि समस्या किसी एक स्थान या एक देश की नहीं, बल्कि पूरे मानव अस्तित्व की है और सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि अब दुनिया में सबसे अधिक खारापन समुद्र में नहीं, बल्कि इंसानियत में बस गया है।
– डॉ. मिलिंद खांडवे
