| भारत में मानसिक स्वास्थ्य आज एक गम्भीर और उभरती हुई चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। जागरूकता की कमी के कारण इसे सामाजिक कलंक के रूप में देखा जाता है, ऐसे में सुविधाजनक, बड़े पैमाने पर और गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिशा में ठोस नीतिगत कदम और व्यापक जनजागरूकता ही इस संकट का समाधान कर सकती है। |
स्वस्थ जीवन के लिए व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ रहना आवश्यक है। मानसिक स्वास्थ्य मन-मस्तिष्क की सलामती की वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति जीवन की अनेक तनावपूर्ण स्थितियों से निपटने में सक्षम होता है, अपनी क्षमताओं को समझता है, सीखता है और अपने उत्तरदायित्वों का भली-भांति निर्वहन करता है। इसके साथ ही वह सामुदायिक गतिविधियों में अपना भरपूर योगदान देता है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं व्यक्ति के विचारों, मनोदशा यानी मूड और व्यवहार को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। मानसिक स्वास्थ्य की स्थितियों में मानसिक विकारों एवं मनोसामाजिक विकलांगताओं के साथ-साथ तनाव, कार्य क्षमता में गिरावट तथा स्वयं को हानि पहुंचाने के खतरे जैसी अन्य मानसिक स्थितियां सम्मिलित हैं। ये तनाव अत्यधिक चिंता, ऊर्जा की कमी या नींद की समस्या के रूप में प्रकट हो सकती हैं। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में व्यग्रता यानी एन्जायटी, बाइपोलर डिसऑर्डर, अवसाद यानी डिप्रेशन, डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी, शिजोफ्रेनिया (व्यक्ति की सोच-भावनाएं और व्यवहार में असामान्यता) जैसे मानसिक विकारों की अन्य स्थितियां सम्मिलित हैं। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी अधिकांश समस्याएं किफायती तौर पर प्रभावी ढंग से उपचारित की जा सकती हैं, फिर भी दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं और उनके उपचार की पर्याप्त सुविधाओं की कमी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में एक बिलियन से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं। बंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्युरोसाइंसेज (निमहैंस) द्वारा वर्ष 2015-16 के दौरान सम्पन्न राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संरक्षण के अनुसार भारत में लगभग 10.6% वयस्क मानसिक विकारों से पीड़ित हैं। भारत में लगभग 13.7% लोग अपने जीवन काल में कभी न कभी मानसिक विकारों की गिरफ्त में आते हैं। मानसिक विकारों से पीड़ित 70 से 92% लोग जागरूकता में तथा मानसिक रोग विशेषज्ञों की कमी व लोग क्या कहेंगे इस भाव के कारण उपयुक्त इलाज नहीं करा पाते। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के अनुसार प्रति एक लाख जनसंख्या के पीछे कम से कम तीन मनोरोग विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है, जबकि ’इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री’ के अनुसार भारत में प्रति एक लाख जनसंख्या में केवल 0.75 मनोरोग विशेषज्ञों की उपस्थिति है।
व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य उसके आंतरिक एवं सहायक मूल्यों पर आधारित होता है, जो उसका मौलिक अधिकार भी होता है। आज भी भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों प्रकार के अधिकांश क्षेत्रों में गम्भीर मानसिक रोगियों को उपयुक्त इलाज उपलब्ध कराने की बजाए उन्हें जंजीरों में बांधने अथवा बंद कमरे में अकेला छोड़ देने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। अनेक स्थानों पर मानसिक रोगी पर भूत-प्रेत की छाया मानकर उसे अनपढ़, ढोंगी तांत्रिकों के पास ले जाते हैं। घर के भोले-भाले अशिक्षित सदस्य प्रेत-बाधा से छुटकारा पाने की चाह में पीड़ित को तांत्रिक द्वारा दी जाने वाली गम्भीर शारीरिक यातनाएं अपनी आंखों से देखने को विवश होते हैं। कुछ गम्भीर मानसिक रोगी शारीरिक एवं मानसिक यातनाओं के चलते उग्र और हिंसक हो जाते हैं। पीड़ित मानसिक रोगी अपनी व्यथा व्यक्त भी नहीं कर सकता। मानसिक रोगियों पर दी जाने वाली यातनाएं पूर्ण रूपेण मौलिक अधिकारों का हनन हैं।
मानसिक विकार के लिए जिम्मेदार स्थितियां
जहां एक ओर महत्वाकांक्षी छात्र-छात्रा इंजीनियरिंग, मेडिकल अथवा किसी अन्य प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश लेने अथवा पढ़ाई के दौरान असफल होने पर गम्भीर अवसाद की चपेट में आ जाते हैं, वहीं कुछ किशोरवय पुरुष और महिला मनचाहे साथी से विवाह नहीं कर पाने, मनचाही सर्विस नहीं मिलने, घर परिवार से बहुत दूर चले जाने जैसी अनेक स्थितियों में गम्भीर अवसाद की गिरफ्त में आ जाते हैं। गलत संगत के चलते मादक द्रव्यों के व्यसन की आदतें भी युवा वर्ग को गम्भीर रूप से मानसिक रोगी बना देती हैं। बुजुर्गों में अकेलापन, गम्भीर बीमारी, शारीरिक एवं आर्थिक परनिर्भरता, जैसी स्थितियां उन्हें गमभीर रूप से अवसाद ग्रस्त कर देती हैं। अवसाद की चरम स्थिति में कुछ लोगों में आत्मघाती प्रवृत्ति भी विकसित हो जाती है, जो दैनिक जीवन में बाधा डाल सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े खतरे
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े खतरे कई तरह से प्रभावित करते हैं। व्यक्ति की अति भावुकता, मादक द्रव्यों/नशीली दवाइयों का व्यसन तथा कुछ मामलों में आनुवंशिक स्थिति मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। गरीबी, पारिवारिक हिंसा, घरेलू एवं सामाजिक असमानता, जैसी स्थितियां भी व्यक्ति को मानसिक रूप से बीमार कर सकती हैं। मानसिक स्वास्थ्य को खतरे में डालने वाली ये स्थितियां जीवन की किसी भी अवस्था में उभर सकती हैं, परंतु बचपन में इन स्थितियों का उभरना विशेषरूप से हानिकारक होता है। उदाहरण के तौर पर माता-पिता एवं शिक्षकों द्वारा बच्चों पर अध्ययन का अत्यधिक दबाव डालना और शारीरिक चोट पहुंचाना बच्चों के मन मस्तिष्क पर गम्भीर रूप से प्रभावित करता है। बच्चे की कद काठी, शारीरिक बनावट, रंग-रूप में असामान्यता के चलते उसके सहपाठियों द्वारा व्यंग करना, चिढ़ाना भी मस्तिष्क को गम्भीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा और इलाज
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का उपचार थेरेपी, दवाइयों के सेवन और जीवन शैली में बदलाव लाकर किया जा सकता है। हालांकि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का सामना करने के लिए अनेक उपाय मौजूद हैं। इन स्थितियों में घर, परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों एवं समाज के सदस्यों के साथ संवाद करना, अच्छी शिक्षा ग्रहण करना, भलाई के कार्यों में योगदान देना, पड़ोसियों के साथ मधुर व्यवहार का आचरण करना, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सामुदायिक कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लेना मानसिक समस्याओं से बचने में सहायक होता है।
चिकित्सा सुविधाओं की तुलना में सामुदायिक स्तर पर उपलब्ध सेवाओं के माध्यम से इसके बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। मानसिक समस्याओं से पीड़ित व्यक्तियों को निम्नलिखित सेवाओं के नेटवर्क के आपसी तालमेल के परिणामस्वरूप सुरक्षा प्रदान की जा सकती है:
* मुख्य चिकित्सा सुविधाओं अथवा अस्पतालों में उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के साथ साझा की जाएं।
* सामुदायिक केंद्रों के स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, योग्य एवं अनुभवी चिकित्सा विशेषज्ञों की समर्पित सेवाओं की व्यवस्था, मनोसामाजिक पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित करते हुए मानसिक रोगियों की आजीविका में सहायता करना लाभकारी हो सकता है।
* चिकित्सा सुविधाओं से इतर स्थानों जैसे की बाल सुरक्षा सेवाओं, स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रमों और जेल में मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
* सामुदायिक केंद्रों और ग्राम पंचायत की चौपालों में मनोरोग विशेषज्ञों के व्याख्यानों को आयोजित कर जागरूकता कार्यक्रम फैलाने की आवश्यकता है।
* प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो द्वारा स्वास्थ्य शिविरों, प्रदर्शनियों तथा व्याख्यानों के माध्यम से मानसिक समस्या से पीड़ित व्यक्ति तथा उसके परिवार के सदस्यों दोनों में जागरूकता फैलाना लाभकारी हो सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य रोगियों के लिए भारत सरकार के प्रयास
मानसिक स्वास्थ्य रोगियों के इलाज और उनकी देखभाल के लिए राष्ट्रीय प्रयासों में शामिल हैं:
नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम : वर्ष 1982 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाना है।
मेंटल हेल्थ केयर ऐक्ट 2017 : देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने और मानसिक स्वास्थ्य रोगियों के अधिकारों की रक्षा करने के उद्देश्य से इस अधिनियम का गठन किया गया है।
डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं : भारत सरकार द्वारा ऑनलाइन कंसल्टेशन और थेरेपी सेवाएं शुरू की गई हैं, जिससे लोगों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से मिल सकें।
भारत में स्थापित 22 नए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों यानी एम्स में भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की शुरुआत की गई है। भारत सरकार द्वारा 47 मानसिक अस्पतालों की स्थापना की गई है। जिनमें तीन प्रमुख मानसिक अस्पताल सम्मिलित हैं : बंगलौर स्थित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिकाविज्ञान संस्थान; तेजपुर, असम स्थित लोकप्रिय गोपीनाथ बारडोलोइ क्षेत्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान और रांची स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री।
भारत सरकार ने आयुष्मान भारत के अंतर्गत 1.73 लाख उप स्वास्थ्य केंद्रों तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को आयुष्मान आरोग्य मंदिर के रूप में अपग्रेड करके उनके साथ मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को एकीकृत किया है। भारत सरकार द्वारा संचालित जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत 767 जिलों में सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को विस्तारित किया गया है। जिसके अंतर्गत परामर्श सेवा, ओपीडी सेवा, सुसाइड निवारण कार्यक्रम तथा जागरूकता कार्यक्रमों का संचालन किया जाता है। जिला स्तर पर मानसिक रोगियों को अस्पताल में भर्ती कर इलाज करने की सेवा उपलब्ध कराई गई है।
- डॉ. कृष्णा नंद पाण्डेय
