धार में भोजशाला मां सरस्वती के स्थल को लेकर न्यायालय का आज जो निर्णय आया है, वास्तव में यह उस सनातन चेतना की वैश्विक स्वीकृति है, जिसने हजारों वर्षों से ज्ञान, शिक्षा, कला और सभ्यता को दिशा दी है।
दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया द्वारा अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में मां सरस्वती की 16 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा स्थापित करना इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान की देवी किसी एक धर्म, जाति या देश की सीमाओं में बंधी नहीं हैं।
कमल पर विराजमान वीणा वादिनी मां सरस्वती आज व्हाइट हाउस से कुछ दूरी पर खड़ी होकर पूरी दुनिया को बता रही हैं कि सभ्यताओं की असली शक्ति शस्त्रों में नहीं, शिक्षा और संस्कृति में होती है।

वस्तुत: भारत के मध्यप्रदेश के धार में स्थित भोजशाला को लेकर आया न्यायिक निर्णय एक बार फिर उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सत्य को सामने लाता है, जिसे वर्षों तक विवादों और राजनीति के बीच दबाने का प्रयास किया गया। यह सिर्फ एक इमारत का प्रश्न नहीं है, सही मायनों में देखा जाए तो भारत की ज्ञान परंपरा, मां वाग्देवी की आराधना और सांस्कृतिक स्मृति का विषय है, जोकि भारत भूमि से विश्व के हर कोने तक पहुंचा है।
सनातन परंपरा में मां सरस्वती देवी होने के साथ ज्ञान की चेतना हैं। हाथों में वीणा कला का प्रतीक है, पुस्तक ज्ञान का, माला साधना का और श्वेत कमल पवित्रता का संदेश देता है। भारतीय संस्कृति ने सदियों पहले यह स्वीकार कर लिया था कि शिक्षा सिर्फ रोजगार का माध्यम नहीं है, यह तो मनुष्य को संस्कारित करने की प्रक्रिया है। यही कारण है कि मां सरस्वती की उपासना भारत में बच्चों की पहली शिक्षा से लेकर बड़े विद्वानों की साधना तक का हिस्सा रही है।
मुस्लिम बहुल देश ने समझा सरस्वती का महत्व
इंडोनेशिया की लगभग 88 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, जबकि हिंदुओं की संख्या मात्र 3 प्रतिशत के आसपास है। इसके बावजूद वहां की सरकार ने अमेरिका को मां सरस्वती की प्रतिमा उपहार स्वरूप देकर यह संदेश दिया कि शिक्षा और ज्ञान किसी एक रिलीजन, मत, पंथ (मजहब) की जागीर नहीं होते।
इंडोनेशियाई दूतावास ने स्पष्ट कहा भी कि “यह स्थापना धार्मिक प्रतीक से कहीं अधिक शिक्षा, सांस्कृतिक संवाद और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने का माध्यम है।” यही वह दृष्टि है, जिसने बाली की सांस्कृतिक विरासत को बचाकर रखा और हिंदू परंपराओं को सम्मान दिया।
इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने सरस्वती प्रतिमा के अनावरण के समय कहा भी कि यह प्रतिमा लोगों के दिल और दिमाग खोलने का काम करेगी और नफरत तथा गलतफहमियों को दूर करेगी। यह संदेश आज पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है। धर्मों के संघर्ष, कट्टरता और सांस्कृतिक टकराव के इस दौर में मां सरस्वती का संदेश ज्ञान, संवाद और सह-अस्तित्व का संदेश है। यही कारण है कि अमेरिका जैसे देश में भी यह प्रतिमा लोगों के आकर्षण का केंद्र बन रही है।
आज वॉशिंगटन में स्थापित प्रतिमा को लेकर कहना यही होगा कि यह इस बात का प्रतीक है कि विश्व अब उस भारतीय दर्शन को समझ रहा है, जिसने शिक्षा को ईश्वर का रूप माना। वहीं जब दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश सरस्वती को ज्ञान की सार्वभौमिक देवी के रूप में स्वीकार कर सकता है, तब भारत में अपनी ही सांस्कृतिक धरोहरों को लेकर संकोच और संघर्ष क्यों होना चाहिए?
यही प्रश्न भोजशाला विवाद के केंद्र में भी आज खड़ा दिखाई देता है। भारत को भी अपनी शिक्षा और संस्कृति की इसी विरासत को नए आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखना होगा। भोजशाला इसका जीवंत उदाहरण बन सकती है।
भोजशाला सिर्फ भवन नहीं, ज्ञान का तीर्थ
उल्लेखित है कि धार की भोजशाला को लेकर लंबे समय से विवाद चलता रहा है। इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और स्थानीय परंपराओं का एक बड़ा वर्ग इसे राजा भोज द्वारा स्थापित मां वाग्देवी के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में मानता रहा है। परमार वंश के महान राजा भोज शासक होने के साथ एक महान विद्वान, साहित्यकार और शिक्षा संरक्षक भी थे। उनकी राजधानी धार वर्षों तक भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रमुख केंद्र रही।
भोजशाला में मां सरस्वती की आराधना होती थी और यहां विद्वानों की सभाएं लगती थीं। यही कारण है कि इसे “विद्या की तपोभूमि” माना गया। यहां से प्राप्त शिलालेख, स्थापत्य शैली, स्तंभों की नक्काशी और संस्कृत अभिलेख इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि यह स्थान भारतीय ज्ञान परंपरा से गहराई से जुड़ा रहा है।

आज का निर्णय और उभरते प्रमाण
आज आए न्यायालयीन निर्णय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों ने भोजशाला के संबंध में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को पुनः सामने रखा है। सर्वेक्षण में मंदिर स्थापत्य शैली, देवी-देवताओं से जुड़े चिह्न, कमल आकृतियां, संस्कृत शिलालेख और हिंदू प्रतीकों के प्रमाण मिले। यह भी स्पष्ट हुआ कि संरचना के कई हिस्से मूल हिंदू स्थापत्य पर आधारित हैं।
इन प्रमाणों ने उस ऐतिहासिक धारणा को बल दिया कि भोजशाला मूलतः मां वाग्देवी का मंदिर और शिक्षा केंद्र थी। वर्षों तक इसे विवादित ढांचे के रूप में देखने की कोशिश हुई, किंतु अब पुरातात्विक तथ्य इतिहास की परतों को खोल रहे हैं।
शिक्षा ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके हथियारों या आर्थिक आंकड़ों में नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना में होती है। भारत ने तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसी परंपराएं दुनिया को दीं। भोजशाला उसी गौरवशाली परंपरा की एक कड़ी है। मां सरस्वती का संदेश यही है कि ज्ञान विनम्रता देता है और विनम्रता समाज को जोड़ती है।
वॉशिंगटन में खड़ी मां सरस्वती की प्रतिमा और धार की भोजशाला का संघर्ष मिलकर मानो एक ही संदेश दे रहे हैं और वह यही है कि जो सभ्यता अपनी ज्ञान परंपरा को बचा लेती है, वही दुनिया का भविष्य तय करती है।
दरअसल, इंडोनेशिया आज मुस्लिम बहुल होकर भी अपनी जड़ों से जुड़े रहकर वही कर रहा है जो भारत की ज्ञान परंपरा रही है, ऐसे में आज आए धार, भोजशाला के न्यायालयीन निर्णय ने बहुत दिनों बाद सरस्वती उपासकों को एक नई खुशी दी है, निश्चित ही इसका सर्वत्र आनन्द मनाया जाना चाहिए!
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
