भारत में पशु प्रेम और जीव दया की परंपरा सदियों पुरानी रही है। गाय, बकरी, कुत्ते, पक्षी और हर जीव के प्रति करुणा को हमारी संस्कृति ने धर्म और मानवता से जोड़ा है। लेकिन आज सोशल मीडिया पर वायरल हो रही यह तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। तस्वीर में एक मासूम बकरी बंद दरवाजे के सामने खड़ी है, जिस पर लिखा है — “बकरीद के कारण अवकाश” और बगल में PETA का बोर्ड लगा है। यह दृश्य केवल एक फोटो नहीं, बल्कि समाज के दोहरे मापदंडों और चयनात्मक पशु प्रेम पर तीखा व्यंग्य बनकर उभरता है।

आज देश में जब किसी फिल्म, त्योहार या परंपरा में पशुओं के उपयोग की बात होती है, तब कई तथाकथित “एनिमल लवर्स” और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं तुरंत सक्रिय हो जाती हैं। सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट लिखी जाती हैं, प्रदर्शन होते हैं और नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है। लेकिन जब बकरीद के दौरान लाखों पशुओं की कुर्बानी का मुद्दा आता है, तब वही आवाजें अचानक शांत क्यों हो जाती हैं? यही सवाल आम लोगों के मन में लगातार उठ रहा है।
पशु अधिकारों की बात करने वाली संस्था PETA अक्सर हिंदू परंपराओं, त्योहारों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर खुलकर बयान देती दिखाई देती है। कभी जलीकट्टू का विरोध, कभी धार्मिक परंपराओं पर सवाल, कभी खान-पान की आदतों पर अभियान — लेकिन बकरीद के समय वही आक्रामकता और सक्रियता क्यों नहीं दिखती? क्या पशु प्रेम भी अब धर्म और राजनीति देखकर तय किया जाने लगा है?
यहां मुद्दा किसी धर्म विशेष का विरोध नहीं, बल्कि समानता और ईमानदारी का है। यदि किसी भी जीव की पीड़ा महत्वपूर्ण है, तो वह हर परिस्थिति में महत्वपूर्ण होनी चाहिए। पशु अधिकारों की लड़ाई चयनात्मक नहीं हो सकती। अगर किसी त्योहार में जानवरों के प्रति संवेदनशीलता की मांग की जाती है, तो वही संवेदनशीलता हर समुदाय और हर परंपरा पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
तस्वीर में दरवाजे के बाहर खड़ी बकरी मानो मौन होकर समाज से पूछ रही हो —
“क्या मेरा दर्द केवल अवसर देखकर याद किया जाएगा?”
यह सवाल केवल PETA से नहीं, बल्कि उन सभी लोगों से है जो पशु प्रेम को विचारधारा और सुविधानुसार परिभाषित करते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पशु अधिकारों पर चर्चा निष्पक्ष हो, राजनीतिक या धार्मिक झुकाव से मुक्त हो। करुणा का अर्थ तभी सार्थक है जब वह हर जीव के लिए समान हो। अन्यथा पशु प्रेम केवल एक ट्रेंड, एक प्रचार और एक दिखावा बनकर रह जाएगा।

