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परीक्षा परिणाम

परीक्षा परिणाम

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, शिक्षा
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विद्यार्थियों के लिए मार्च का महीना परीक्षा की मेहनत – मशक्कत से भरा होता है और अप्रैल तो, परीक्षा परिणामों के लिए ही जाना जाता है। परिणाम की घोषणा होते ही सोशल मीडिया से लेकर आस-पड़ोस में हलचल तेज हो जाती है। सिर्फ बच्चे ही नहीं, उनके माता-पिता भी तनाव में आ जाते हैं। प्राइवेट कोचिंग में बच्चों की भीड़ लग जाती है कि परिणाम में क्या होने वाला है?

मंदिरों में भी भगवान से अरज लगायी जाती है। मन्नत के धागों से वृक्ष की टहनियां भर जाती हैं। परीक्षा परिणाम कितनों के मनोबल को जोड़ देता है तो कितनों को तोड़ देता है। वैसे, परीक्षा के पर्चे बच्चे की प्रतिभा और भविष्य को पूरी तरह परिभाषित नहीं करते हैं, फिर भी कुछ संकीर्ण मानसिकता के अभिभावक व अन्य लोग बच्चों को उसी आधार पर प्रतिभावान मानते हैं। कोई रिजल्ट को स्टेटस पर डालता है तो कोई सोशल मीडिया पर लंबी-चौड़ी पोस्ट डालता है। परिणामों को कतई स्टेटस सिंबल न बनाएं।

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आप नहीं जानते इसके दुष्परिणाम क्या होंगे। जिनके परिणाम उत्कृष्ट नहीं आते उन्हें कितनी मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। सबसे बड़ी बात पहले तो रिजल्ट को डिवीजन में वर्गीकृत करके मापदंड बनाए जाते थे और फर्स्ट डिवीजन या सेकेंड डिवीजन पर ही पीठ थपथापायी जाती थी और थर्ड डिवीजन पर सांत्वना प्रकट की जाती थी। समय के साथ प्रतियोगिता तेजी से बढ़ी और टॉपर 100 प्रतिशत नंबर लाने लगे।

इसके साथ ही 90-95 प्रतिशत वाले भी बहुआयत में आने लगे तो अस्सी प्रतिशत भी कम प्रतिशत वाला माना जाने लगा। अब 60-70 प्रतिशत वालों का तो पूछो ही नहीं। सोशल-मीडिया पर एक वीडियो देख कर हतप्रभ रह गई कि 96 प्रतिशत आने पर माँ-बेटी दहाड़े मार कर रो रही थी।

एक छात्रा ने 92 प्रतिशत नंबर आने पर आत्महत्या कर ली। सच कहिए तो, यह घटना हृदय विदारक थी। क्या परीक्षा परिणामों का प्रतिशत आपका जीना मरना तय करेगा ।

अभी एक और खबर कोटा से आई है, जहाँ एक बच्चे ने नीट के मॉक टेस्ट में कम नंबर आने पर आत्महत्या कर ली, जबकि कोचिंग संस्थान ने भी उसे प्रतिभावान मान कर स्टार बैच में रखा था। अब सोचिए! जब वास्तविक परीक्षा नहीं दी गई और उसका परिणाम आया भी नहीं फिर यह आत्महत्या किस तर्क के आधार पर की गई? क्या बच्चों पर बढ़ता परिणाम का दबाब इतना बढ़ गया है कि वो मानसिक रूप से इतने दुर्बल हो गये है कि इस मॉक टेस्ट के नकली दबाब को भी नहीं झेल पा रहे है? हमें, अपने पूरे सिस्टम को बदलने की जरूरत है।

सिर्फ एजुकेशन सिस्टम ही नहीं बल्कि समाजिक परिवेश को भी बुहारने की जरूरत है। बच्चों को परिवार में भी स्वस्थ माहौल की जरूरत है और उनकी मानसिक स्थिति का जायजा लेना भी बेहद जरूरी है। समय रहते अगर स्थितियों को नहीं सँभाला गया तो हमारे नौनिहाल परीक्षा परिणाम की भेंट ही चढ़ते रहेंगे ।

परिणीता स्वयंसिद्धा

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Tags: Academic PressureBoard Results 2026Education System ReformExam Result StressKota Suicide NewsMock Test PressureParenting TipsSocial Media Status SymbolStudent DepressionStudent Mental Healthकोटा कोचिंगपरीक्षा का तनावबच्चों का मानसिक स्वास्थ्य

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