हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
सभ्यता की रक्षा प्रार्थनाओं से नहीं, पुरुषार्थ से होती है

सभ्यता की रक्षा प्रार्थनाओं से नहीं, पुरुषार्थ से होती है

by हिंदी विवेक
in युवा
0

सभ्यताओं का युद्ध केवल सीमाओं पर खड़े सैनिकों द्वारा नहीं लड़ा जाता। यह युद्ध मनुष्य के मन, उसके संस्कार, उसके परिवार, उसकी शिक्षा, उसकी आस्था और उसकी आत्मा पर लड़ा जाता है। जो समाज इस सत्य को नहीं समझता, वह शत्रु के अस्त्रों से पहले उसके विचारों का शिकार बनता है। आज भारत के समक्ष भी ऐसा ही संकट उपस्थित है। दुर्भाग्य यह है कि हम इस युद्ध को पहचानने के स्थान पर अपने ही विरुद्ध खड़े होकर लड़ रहे हैं। हम अपने मूल विचार, अपने दर्शन, अपनी परम्पराओं और अपने स्वधर्म को भूलकर उन्हीं वैचारिक चश्मों से स्वयं को देखने लगे हैं, जिन्हें हमारी सभ्यता को तोड़ने के लिए गढ़ा गया था। फिर आश्चर्य करते हैं कि समाज में विघटन क्यों बढ़ रहा है, परिवार क्यों टूट रहे हैं, भ्रष्टाचार क्यों बढ़ रहा है और हमारी सामूहिक शक्ति क्षीण क्यों होती जा रही है।

हम विश्व के सामने बहुत महान बनने का अभिनय करते हैं। नैतिकता के बड़े-बड़े उपदेश देते हैं। हम कहते हैं कि हमारी सभ्यता विश्व को मार्ग दिखाती है, किन्तु व्यक्तिगत जीवन में वही सब करते हैं जिनका मंचों से विरोध करते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। हम भीतर से कुछ और हैं, बाहर से कुछ और। हम पाखण्ड को विनम्रता और ढोंग को उदारता का नाम दे देते हैं। समाज में किसी विषय पर चर्चा आरम्भ होते ही पहला वाक्य होता है सरकार क्या कर रही है? संगठन क्या कर रहे हैं? प्रशासन क्यों नहीं जाग रहा? परन्तु यह प्रश्न बहुत कम उठता है कि यह स्थिति उत्पन्न किसने की? दोषी कौन है? अपने दायित्वों का निर्वाह किसने नहीं किया?

हमने स्वतंत्रता का अर्थ ही बदल दिया। स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं था कि अंग्रेज चले जाएँ और उनकी जगह राज्य हमारे जीवन का नया मालिक बन जाए। स्वतंत्रता का अर्थ था समाज का जागरण, स्वावलम्बन और उत्तरदायित्व का पुनर्जागरण। किन्तु हमने राज्य को ही अपना माई-बाप बना लिया। अपने बच्चों का संस्कार भी राज्य करे, शिक्षा भी राज्य दे, रोजगार भी राज्य दे, वृद्धों की सेवा भी राज्य करे, धर्मस्थलों की व्यवस्था भी राज्य करे, उद्योग भी राज्य चलाए, समाज का नेतृत्व भी राज्य करे और हम केवल अधिकारों की माँग करते रहें। यह मानसिकता किसी भी सभ्यता को दुर्बल बना देती है।

इंग्‍लैंड में स्कूलिंग, अल्‍मोड़ा जेल में लिखी अपनी कहानी... बाल दिवस पर  जानिए चाचा नेहरू से जुड़ी बातें - jawaharlal nehru birth anniversary  biography of indias first ...

स्वतंत्रता के बाद पण्डित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में समाजवाद को भारत की विकास-दृष्टि के रूप में स्थापित किया गया। सोवियत संघ से प्रेरित राज्य-नियन्त्रित अर्थव्यवस्था को आधुनिकता का पर्याय बताया गया। लाइसेंस-परमिट-कोटा राज खड़ा हुआ। उद्योग स्थापित करने से पहले उत्पादन की क्षमता से अधिक सरकारी अनुमति की आवश्यकता होने लगी। उद्यमी को राष्ट्रनिर्माता नहीं, संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि उत्पादन आधारित समाज के स्थान पर दलाल संस्कृति विकसित हुई। भ्रष्टाचार व्यवस्था का अंग बन गया। जो कार्य योग्यता से होने चाहिए थे, वे सम्पर्कों से होने लगे। यही नेहरूवियन समाजवाद की सबसे बड़ी त्रासदी थी कि उसने समाज की स्वाभाविक ऊर्जा को राज्य की फाइलों में कैद कर दिया।

शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। भारत की परम्परा में शिक्षा समाज की जिम्मेदारी थी। गुरुकुल समाज चलाता था। ज्ञान को जीवन से जोड़ा जाता था। चरित्र निर्माण शिक्षा का मूल उद्देश्य था। किन्तु धीरे-धीरे शिक्षा भी राज्य के नियंत्रण का विषय बनती गई। पश्चिमी और सोवियत प्रेरित मॉडल को अपनाकर ऐसी व्यवस्था खड़ी की गई जिसमें डिग्रियाँ बढ़ीं, किन्तु व्यक्तित्व सिकुड़ते गए। आज भारत में हजारों विश्वविद्यालय हैं, लाखों विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, किन्तु विश्व की शीर्ष विश्वविद्यालय सूचियों में भारतीय संस्थानों की उपस्थिति सीमित है। समस्या केवल संसाधनों की नहीं है; समस्या दृष्टि की भी है। हम शिक्षा को नौकरी का माध्यम मान बैठे, जीवन निर्माण का नहीं।

हिन्दू समाज के संदर्भ में भी हमने अनेक अवसरों पर मौन साध लिया। 1955-56 में जब हिन्दू कोड बिल के विभिन्न स्वरूप लागू किए गए और हिन्दुओं के पारिवारिक तथा व्यक्तिगत विषयों में राज्य का हस्तक्षेप बढ़ा, तब व्यापक सामाजिक विमर्श क्यों नहीं हुआ? समर्थन और विरोध दोनों पक्षों के अपने तर्क हो सकते हैं, किन्तु यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि समाज ने अपनी भूमिका स्वयं क्यों छोड़ दी? जब समाज अपने अधिकार क्षेत्र को छोड़ता है तो राज्य स्वाभाविक रूप से उस रिक्त स्थान को भरता है। बाद में वही समाज शिकायत करता है कि राज्य हमारे जीवन में अत्यधिक हस्तक्षेप कर रहा है।

आज परिवार व्यवस्था पर आक्रमण अनेक दिशाओं से हो रहा है। कभी उपभोगवाद के नाम पर, कभी अति-व्यक्तिवाद के नाम पर, कभी मनोरंजन उद्योग के माध्यम से, कभी ऐसे वैचारिक अभियानों के माध्यम से जो परिवार को दमनकारी संस्था के रूप में प्रस्तुत करते हैं। विवाह को अप्रासंगिक बताना, मातृत्व-पितृत्व को बोझ बताना, संबंधों को केवल सुविधा का विषय बना देना ये सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। इनके पीछे एक व्यापक वैचारिक संघर्ष है। उनके नाम भिन्न हो सकते हैं, उनके औजार असंख्य हो सकते हैं, पर उनका लक्ष्य स्पष्ट है भारत की उस सामाजिक संरचना को तोड़ना जिसने हजारों वर्षों तक इस सभ्यता को जीवित रखा।
हमारे यहाँ धर्म को कभी अफीम कहा जाता है और कभी उसी धर्म की महानता का ढोल पीटा जाता है। दोनों स्थितियाँ समस्या हैं। धर्म केवल घोषणा नहीं, आचरण है। धर्म केवल मंदिर जाना नहीं, लोभ का त्याग भी है। धर्म केवल शास्त्र पढ़ना नहीं, न्याय करना भी है। धर्म केवल दूसरों को उपदेश देना नहीं, स्वयं अनुशासित होना भी है।

Home - Shri Ram Janmbhoomi Teerth Kshetra

अयोध्या की घटना ने भी हमें यही आईना दिखाया। जिस श्रीराम मन्दिर के लिए पाँच सौ वर्षों तक संघर्ष हुआ, असंख्य लोगों ने बलिदान दिए, करोड़ों लोगों ने अपनी श्रद्धा अर्पित की, उसी मन्दिर के दानपात्र से संबंधित कथित चोरी की घटनाओं के समाचार सामने आए। यदि भगवान के चरणों में अर्पित धन को भी हम लोभ से सुरक्षित नहीं रख सकते, तो समस्या केवल व्यवस्था की नहीं है। यह समाज के चरित्र का प्रश्न है। हम दूसरों की आलोचना करते हैं, पर अपने भीतर झाँकने का साहस नहीं करते। यही कारण है कि समस्याएँ बढ़ती जाती हैं और हम उन्हें देखकर भी मौन साध लेते हैं।

हम त्रिदेव की पूजा करते हैं। महालक्ष्मी का पूजन करते हैं। कुलदेवता, ग्रामदेवता और नवग्रहों को प्रणाम करते हैं। हम प्रकृति की विविधता को परब्रह्म की अभिव्यक्ति मानते हैं। फिर भी सामाजिक जीवन में ऐसी कृत्रिम समानता स्थापित करना चाहते हैं जो प्रकृति के विधान के विरुद्ध है। संसार में कोई दो व्यक्ति समान नहीं हैं। राज्य समान अवसर दे सकता है, समान न्याय दे सकता है, समान सुरक्षा दे सकता है; किन्तु वह सबको समान प्रतिभा नहीं दे सकता। राज्य सबको प्रधानमन्त्री नहीं बना सकता। राज्य सिंह और वानर की प्रकृति को एक नहीं कर सकता। वह केवल यह सुनिश्चित कर सकता है कि किसी के साथ अन्याय न हो।

विद्यालय समाज को चलाने होंगे। उद्योग समाज को खड़े करने होंगे। परिवार समाज को बचाने होंगे। चरित्र समाज को गढ़ना होगा। राज्य सड़क, सुरक्षा और न्याय दे सकता है; किन्तु समाज का स्थान नहीं ले सकता। राज्य भोजन की व्यवस्था कर सकता है, पर आपके स्थान पर भोजन नहीं कर सकता। चलना आपको स्वयं पड़ेगा।

आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि हमें केवल अधिकार चाहिए। कर्तव्य की चर्चा होते ही हम मौन हो जाते हैं। यही कारण है कि भ्रष्टाचार बढ़ता है, नैतिक पतन सामान्य बनता है और समाज धीरे-धीरे अपनी आत्मा खो देता है।

भारत कोई सामान्य राष्ट्र नहीं है। यह एक सभ्यतागत राष्ट्र है। इसकी आत्मा सनातन वैदिक धर्म में प्रतिष्ठित है। धर्म किसी सम्प्रदाय का नाम नहीं, बल्कि उस शाश्वत व्यवस्था का नाम है जो व्यक्ति, समाज, प्रकृति और परमात्मा के बीच संतुलन स्थापित करती है। भगवान नारायण धर्म की रक्षा करते हैं, किन्तु वे उन लोगों के सारथी नहीं बनते जो केवल वाणी से धर्म का उद्घोष करें और आचरण से उससे विमुख रहें।
Mahabharat: Shri Krishna tells to yudhishthira who people went heaven and  hell after death know Mahabharat story about life management - Mahabharat  Katha: श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया मृत्यु के बाद कैसे

महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन का गाण्डीव नहीं उठाया था। सारथी कृष्ण थे, युद्ध अर्जुन को ही लड़ना पड़ा। आज का युद्ध भी वैसा ही है, केवल उसका स्वरूप बदल गया है। आज युद्ध कुरुक्षेत्र में नहीं, आपके घरों में है; आपके बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में है; आपके मोबाइल की स्क्रीन पर है; आपके मनोरंजन में है; आपके विचारों में है; आपकी आत्मा पर आक्रमण कर रहा है।

यह सभ्यताओं का युद्ध है। इसमें विजय केवल उसी की होगी जो धर्म और अधर्म का भेद समझेगा, अपने स्वधर्म का पालन करेगा, पाखण्ड का त्याग करेगा और अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगा। भगवान नारायण सारथी अवश्य बनेंगे, किन्तु धनुष उठाकर युद्ध हमें ही लड़ना होगा। यदि हम स्वयं नहीं जागेंगे, तो कोई अवतार आकर भी हमारी कायरता का प्रायश्चित नहीं करेगा। सभ्यताओं का भविष्य केवल प्रार्थनाओं से नहीं, पुरुषार्थ से सुरक्षित होता है। यही इस युग का धर्म है, यही इस समय की पुकार है।

दीपक कुमार द्विवेदी

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: Civilizational Wareducation systemFamily ValuesHindu Code Billindian cultureNehruvian SocialismSanatan DharmaSocial Awakeningकर्तव्य और अधिकारनई शिक्षा दृष्टिनैतिक पतनवैचारिक युद्धसभ्यतागत राष्ट्रसमाजवाद की त्रासदी

हिंदी विवेक

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0