भारतीय मनीषा के उषःकाल से ही मानव चेतना का सबसे सघन, सनातन और संकुल प्रश्न यदि कोई रहा है, तो वह दुःख का तिमिर-गर्भ ही है, जिसकी निवृत्ति के लिए आदि-काव्य के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि के अंतस से फूटती करुणा की प्रथम व्याकुल व्याहृति से लेकर भगवान तथागत बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण तक की एक दीर्घ, जाज्वल्यमान और जीवंत ज्ञान-परंपरा हमारे समक्ष प्रदीप्त रही है।
समकालीन हिंदी वाङ्मय में परंपरा के इसी प्रवाह को कमलेश कमल की लेखनी से निस्सृत और उनके गहन चिंतनोन्मुख मानस से प्रस्फुटित कृति ‘दुःख : उद्भव, कारण और निदान’ समग्रता में स्वर देती है। यह पुस्तक दुःख से जूझते मनुष्य को ठहरकर स्वयं को देखने की दृष्टि देती है। इसमें दर्शन है, मनोविज्ञान है और आत्मिक शांति की खोज भी।
लेखक ने इस कृति में दुःख को किसी अभिशाप, भर्त्सना या पलायन के बिंदु के रूप में नहीं देखा है, अपितु उसे एक सच्चे शिक्षक, एक आत्म-जागृति के महद् उपकरण और जीवन-शोधन की भट्टी के रूप में स्वीकार किया है, जहां तपकर ही चेतना का कुंदन निखरता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की गंभीर मनोविकार-मीमांसा और कुबेरनाथ राय की ललित, रसमय निबंध-परंपरा का यह समकालीन विस्तार पाठक को विचार के उस धरातल पर ले जाता है, जहां भाषा स्वयं एक साधना बन जाती है और शब्द अर्थों के नए-नए वातायन खोलने लगते हैं।
देश के बौद्धिक परिदृश्य में अपनी अनन्य भाषाई प्रखरता के लिए विख्यात कमलेश कमल ने छत्तीस निबंधों के इस गुलदस्ते में दुःख की अनगिनत परतों को उघाड़ा है, मानो वे किसी कुशल शल्य-चिकित्सक की भांति मानवीय चित्त की ग्रंथियों को एक-एक कर सुलझा रहे हों। यह कृति पाठक को आंतरिक विवेचना के एक ऐसे मौन, नितांत एकांत और निस्पंद कोने में ले जाकर खड़ा कर देती है, जहां वह अपनी ही दुर्बलताओं, अपने ही संतापों और अपनी ही आकांक्षाओं से साक्षात्कार करने के लिए विवश हो जाता है।
दो खंडों में विभक्त यह ग्रंथ हमारी आंतरिक चेतना की द्विआयामी यात्रा का पथ-प्रशस्त करता है। प्रथम खंड जहां दुःख के प्राकट्य, उसकी आभ्यंतरिक प्रकृति, व्यावहारिक लौकिक कारणों और दैनंदिन जीवन से जुड़े निवारणों को चौबीस अत्यंत मौलिक मनो-वैज्ञानिक निबंधों के माध्यम से उद्घाटित करता है, वहीं द्वितीय खंड तथागत बुद्ध के ‘सर्वं दुःखम्’ के कालजयी आर्य-सत्य और अष्टांगिक मार्ग की एक सर्वथा नूतन, आधुनिक और विज्ञान-सम्मत प्रदीप्ति प्रस्तुत करता है।
लेखक का यह अनन्य वैशिष्ट्य है कि वे प्राचीन आर्ष-ग्रंथों की तार्किकता को अद्यतन सकारात्मक मनोविज्ञान के आधुनिक सांचे में इस प्रकार ढालते हैं कि दर्शन का हर क्लिष्ट सूत्र हमारे रोजमर्रा के एकाकीपन, अवसाद और अजनबीपन का अचूक उपचार बन जाता है। कसावटभरी, तत्समबहुल, प्रांजल और सम्मोहक भाषा-शैली विचार के प्रवाह को एक संगीतात्मक गति, एक सहज लय और एक गरिमा प्रदान करती है। ‘अपेक्षा की अग्नि’, ‘मोह की मरीचिका’, ‘विषाद का निविड़ अंधकार’ और ‘वासना की विकलता’ जैसे शब्द-युग्म पुस्तक में इस तरह गुंथे हुए हैं कि वे पाठक के हृदय में एक गहरा संवेदन-बिम्ब अंकित कर जाते हैं।
ग्रंथ की वैचारिक यात्रा में जब क्रोध, भय, वासना और अहंकार जैसे मनोविकारों का विवेचन आता है, तब लेखक की मेधा अपने पूरे यौवन पर दिखाई देती है। क्रोध के विषय में उनका यह तर्क कितना विलक्षण है कि क्रोध के लौकिक कारण वस्तुतः बहुत कम होते हैं, पर हमारा अहंकारी मन उन कारणों को खोजने और फिर उन्हें तार्किक रूप से उचित ठहराने की कुत्सित चेष्टाओं में अधिक व्यस्त रहता है।
हम पहले क्रोधित होते हैं और फिर अपनी उस पाशविक वृत्ति को सही सिद्ध करने के लिए तर्कों का एक कृत्रिम महल खड़ा करते हैं। इसी प्रकार, जब वे दुःख और तनाव के बीच एक तात्विक विभेद रेखा खींचते हैं, तो उनकी लेखनी किसी सिद्ध मनोचिकित्सक की भांति सूक्ष्म हो जाती है; वे स्पष्ट करते हैं कि दुःख जहाँ किसी आंतरिक या बाह्य बाधा के सम्मुख उत्पन्न हुई गहरी ‘अस्वीकृति’ से जन्म लेता है, वहीं तनाव दो विपरीत दिशाओं में खींचते हुए वैचारिक तंतुओं का खिंचाव है। इन दोनों का यह सटीक अंतर-विभाजन पाठक को अपने स्वयं के दुःखों के वर्गीकरण और उनके सम्यक शमन की दिशा में एक स्पष्ट और व्यावहारिक दृष्टि प्रदान करता है।
पुस्तक का उत्तरार्द्ध तथागत बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग की आधुनिक मीमांसा को समर्पित है, जो इस कृति को केवल एक विश्लेषणात्मक ग्रंथ होने की सीमा से ऊपर उठाकर एक व्यावहारिक जीवन-दर्शन और आचरण की संहिता बना देता है।
सम्यक दृष्टि से लेकर सम्यक समाधि तक के प्रत्येक सोपान को लेखक ने विज्ञान की अद्यतन कसौटियों, आधुनिक न्यूरोलॉजिकल सिद्धांतों और समकालीन जीवन के संदर्भों पर इस प्रकार कसा है कि ढाई हजार वर्ष पुराने ये सूत्र आज के भागदौड़ भरे जीवन की सबसे अनिवार्य और महती आवश्यकता प्रतीत होने लगते हैं।
अंततः, कमलेश कमल की यह कृति ‘दुःख : उद्भव, कारण और निदान’ एक ऐसी बहुमूल्य निधि है, जो अपने सौंदर्यशास्त्र, अपनी विचार-कसावट, अपनी शब्द-शिल्प की गरिमा और अपनी दार्शनिक गहराई के कारण सुधी पाठकों का मार्ग आलोकित करेगी। प्रत्येक उस जिज्ञासु के लिए, जो जीवन के व्याकरण को समझना चाहता है और जो दुःख के इस संकुल संसार में एक परिपक्व, संतुलित और प्रज्ञापूर्ण जीवन की ओर उन्मुख होना चाहता है, उसके लिए यह कृति उपयोगी होगी।
– पुरु शर्मा

