महाराष्ट्र के अकोला में 79 स्वनाथ बच्चों के लिए आयोजित “मामाच्या गावाला जाऊ या” किचनलेस निवासी शिविर ने दुनिया के सामने रखा सामाजिक मातृत्व का एक अनूठा मॉडल।
कल्पना कीजिए…
ऐसे बच्चों की, जिनके जीवन में माँ का आँचल नहीं, पिता का संरक्षण नहीं, परिवार का स्थायी सहारा नहीं।
कल्पना कीजिए…
ऐसे समाज की, जहाँ सैकड़ों माताएँ अपने घरों में भोजन बनाती हैं, अपने बच्चों के लिए नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए जिन्हें वे जानती तक नहीं।
कल्पना कीजिए…
ऐसे शिविर की, जहाँ ढाई दिनों तक कोई रसोई नहीं जलती, कोई कैटरिंग नहीं होती, कोई व्यावसायिक व्यवस्था नहीं होती, फिर भी हजारों भोजन प्रेम और ममता के साथ परोसे जाते हैं।
और फिर कल्पना कीजिए…
ऐसे दृश्य की, जहाँ एक स्वनाथ बालक, जो कभी स्वयं जीवन की कठिन राहों पर अकेला चला था, आज सैकड़ों स्वनाथ बच्चों के सामने खड़ा होकर कहता है
“डरना मत… यदि जीवन में कभी कोई समस्या आए, तो मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
12, 13 और 14 जून 2026 को महाराष्ट्र के अकोला शहर में घटित यह दृश्य किसी चलचित्र का भाग नहीं था, बल्कि “हर बच्चे को माँ” अभियान के अंतर्गत आयोजित “मामाच्या गावाला जाऊ या” निवासी स्नेहमिलन शिविर की वास्तविकता थी।
विश्वमांगल्य स्वनाथ परिषद द्वारा आयोजित यह शिविर केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं था। यह उस विचार का साकार रूप था कि समाज यदि चाहे, तो किसी भी बच्चे को स्वयं को अनाथ महसूस नहीं होने देगा।

जब पूरा समाज बना “माँ”
इस विश्व पटल पर एकमात्र अकोला शहर (महाराष्ट्र) में 12,13,14 जुन 2026
स्वनाथ (वंचित निराधार अनाथ) CNCP बच्चे (Child in need of care and protection) बच्चों के लिए आयोजित एक अनुठा “मामाच्या गावाला जाऊ या” किचनलेस निवासी शिविर बना सामाजिक संवेदना, मातृत्व और राष्ट्रनिर्माण का जीवंत मॉडल।
“हर बच्चे को माँ” अभियान का अनूठा प्रयोग- जहाँ ढाई दिनों के लिए समाज ने केवल स्वनाथ बच्चों की जिम्मेदारी नहीं ली, बल्कि उन्हें परिवार का अनुभव कराया।

भारत में करोड़ों ऐसे बच्चे हैं जो विभिन्न कारणों से माता-पिता के संरक्षण, भावनात्मक सुरक्षा और पारिवारिक वातावरण से वंचित हैं। इनमें से अधिकांश बच्चे किसी अनाथालय में नहीं रहते, बल्कि समाज के बीच रहते हुए भी अकेलेपन, असुरक्षा और उपेक्षा का सामना करते हैं। ऐसे बच्चों को केवल आर्थिक सहायता की नहीं बल्कि अपनत्व, मार्गदर्शन, संरक्षण और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है।
इसी आवश्यकता को केंद्र में रखकर विश्वमांगल्य स्वनाथ परिषद द्वारा संचालित “हर बच्चे को माँ” अभियान पिछले 2 वर्षों से अकोला में एक अभिनव सामाजिक प्रयोग कर रहा है। इस अभियान का उद्देश्य केवल सहायता करना नहीं बल्कि समाज और स्वनाथ बच्चों के बीच एक स्थायी भावनात्मक संबंध स्थापित करना है।
12, 13 और 14 जून 2026 को अकोला की मनुताई कन्याशाला में आयोजित ढाई दिवसीय निवासी स्नेहमिलन शिविर “मामाच्या गावाला जाऊ या” इसी अभियान का एक महत्वपूर्ण चरण था। यह केवल एक शिविर नहीं बल्कि समाज की सामूहिक मातृत्व चेतना का सजीव उत्सव बन गया।
एक विचार जिसने हजारों हृदयों को जोड़ा
इस अभियान की संकल्पना आदरणीय प्रशांतजी हरताळकर, जो 35 वर्ष संघ के प्रचारक रहे हैं, इन्होंने अक्टूबर 2024 में समाज के सामने रखी थी।
उनका प्रश्न सरल था—
“क्या हम ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं जहाँ कोई भी बच्चा स्वयं को अनाथ महसूस न करे?”
यहीं से “हर बच्चे को माँ” अभियान की शुरुआत हुई।
प्रारंभ में कुछ माताएँ जुड़ीं। फिर एक-एक कर गृहिणियाँ, डॉक्टर, वकील, शिक्षक, उद्योजिकाएँ, सरकारी अधिकारी, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार और समाजसेवी इस अभियान से जुड़ते गए। ऐसी विविध क्षेत्र अनेक सामाजिक संगठन जैसे माहेश्वरी समाज, जानकीवल्लभ परिवार, मारवाड़ी युवा मंच, खंडेलवाल समाज, लोहाणा समाज, विश्वमांगल्य सभा, राष्ट्र सेविका समिति, अलग-अलग भजनी मंडलों और अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों ने इस अभियान को अपना अभियान बना लिया।
मई 2025 में ज्ञानदर्पण विद्यालय, अकोला में आयोजित पहले “मामाच्या गावाला जाऊ या” शिविर में 78 स्वनाथ बच्चों ने भाग लिया था। उस शिविर ने समाज को यह विश्वास दिलाया कि मातृत्व केवल जैविक संबंध नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी हो सकता है।
इसी अनुभव के आधार पर 2026 का शिविर और अधिक व्यापक स्वरूप में आयोजित किया गया।
अकोला के गाँवों से लेकर बालगृहों तक पहुँचा अभियान
इस वर्ष आयोजित शिविर में अकोला जिले के लगभग 15-16 गाँवों, अकोला शहर, शासकीय बालगृह, अकोला महानगरपालिका विद्यालयों तथा गायत्री बालिकाश्रम से आए 79 स्वनाथ बच्चों ने सहभागिता की।
इन बच्चों की आयु, पारिवारिक परिस्थितियाँ और जीवन अनुभव भिन्न थे, लगभग हर एक बच्चे के जीवन की एक अलग कहानी थी, लेकिन एक बात समान थी- उन्हें जीवन में प्रोत्साहन, संरक्षण और आत्मीयता, ममत्व की आवश्यकता थी।
ढाई दिनों तक इन बच्चों ने केवल कार्यक्रमों में भाग नहीं लिया बल्कि परिवार, समाज और अपनेपन का अनुभव किया।
“अनाथ” नहीं, “स्वनाथ”- दृष्टिकोण बदलने का प्रयास
विश्वमांगल्य स्वनाथ परिषद की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक विशेषता वृषाली ताई जोशी जो विश्वमांगल्य सभा की अखिल भारतीय संगठन मंत्री है, उन्होंने हर समय मातृभोजन के पूर्व उपस्थित सभी स्वनाथ माताओं के सामने रखी।
विश्वमांगल्य स्वनाथ परिषद इन बच्चों को “अनाथ” क्यों नहीं कहती, इस विचार को स्वनाथ माताओं के समक्ष ऐसे रखा।
परिषद का मानना है कि किसी बच्चे की पहचान उसकी कमी से नहीं बल्कि उसकी संभावनाओं से होनी चाहिए।
इसीलिए इन बच्चों को “स्वनाथ” कहा जाता है।
ज्ञानेश्वरी में वर्णित “स्वनाथ” की अवधारणा से प्रेरित यह शब्द बताता है कि इन बच्चों का वास्तविक नाथ स्वयं परमात्मा है और इनके प्रति उत्तरदायित्व पूरे समाज का है।

यह केवल शब्द परिवर्तन नहीं बल्कि दृष्टिकोण परिवर्तन का प्रयास है।
पाँच स्तंभों पर आधारित राष्ट्रनिर्माण की अवधारणा
विश्वमांगल्य स्वनाथ परिषद ने स्वनाथ बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पाँच मूलभूत स्तंभ निर्धारित किए हैं—
शिक्षा
स्वास्थ्य
संस्कार
सुरक्षा
स्वरोजगार
शिविर का संपूर्ण ढाँचा इन्हीं पाँच स्तंभों पर आधारित था।
शिक्षा से जुड़े सत्रों में लक्ष्य निर्धारण, अध्ययन की आदत, व्यक्तित्व विकास और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गई।
स्वास्थ्य के अंतर्गत health checkup,स्वच्छता, पोषण, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर डॉ. प्रवीण पाटील के साथ ओझोन हॉस्पीटल की टीम, डॉ. झंवर, डॉ. महाजन, डॉ. लड्ढा, डॉ. राठी का अमुल्य सहयोग रहा। डॉ. अर्पना लड्ढा ने सभी डॉक्टरों की टीम के साथ समन्वय रखा। डॉ. शुक्ला मॅडम ने बच्चो को लगने वाली दवाइयाँ देकर सहयोग किया, यह था स्वास्थ स्तंभ।
संस्कार आधारित गतिविधियों में प्रार्थना, मंत्रोच्चार, भारतीय जीवन मूल्यों, परिवार व्यवस्था, कर्तव्यबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषय शामिल थे।
सुरक्षा के अंतर्गत बच्चों में आत्मविश्वास, भावनात्मक मजबूती और जीवन की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता विकसित करने पर विशेष बल दिया गया।
स्वरोजगार, compititive exams और आत्मनिर्भरता के संदर्भ में बच्चों को कुलर, वॉटर प्युरीफायर, प्लंबिंग, एअर कंडीशनर, स्प्रे पंप इन सभी की basic जानकारी चंदू लड्ढा, श्री डाबेराव, श्री काचलीया, श्री झंवर, काजल राजवैद्य तथा श्र अजय कुटे जी के माध्यम से दी गयी।

शिबीर की सबसे बड़ी विशेषता
किचनलेस शिविर : संभवतः देश का एक अनूठा सामाजिक प्रयोग था।
इस शिविर की सबसे उल्लेखनीय विशेषता थी कि यह पूर्णतः “किचनलेस निवासी शिविर” था।
ढाई दिनों तक चलने वाले इस शिविर में कहीं भी कोई रसोई नहीं बनाई गई।
कोई व्यावसायिक कैटरिंग नहीं थी।
कोई भोजन ठेका नहीं दिया गया।
फिर भी भोजन व्यवस्था इतनी व्यवस्थित थी कि हजारों भोजन बिना किसी बाधा के संपन्न हुए।
कैसे?
समाज की सैकड़ों स्वनाथ माताओं ने इसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।
पूर्व निर्धारित मेन्यू के अनुसार विभिन्न समयों का भोजन अलग-अलग परिवारों ने अपने घरों में तैयार किया और टिफिन के माध्यम से शिविर स्थल तक पहुँचाया, लेकर आये।
नाश्ता, भोजन, चाय, छाछ, फल, आइसक्रीम और अन्य अल्पाहार भी विभिन्न निरपेक्ष दानदाताओं द्वारा स्वयं शिविर स्थल पर लाकर परोसे गए।
ढाई दिनों के दौरान स्वनाथ बच्चे, स्वनाथ माताएँ, स्वयंसेवक, कार्यकर्ता, अतिथि और सहयोगियों सहित लगभग 1000 से 1100 लोगों ने भोजन ग्रहण किया, जबकि लगभग 2000 लोगों तक नाश्ता और अल्पाहार पहुँचा।
यह केवल भोजन व्यवस्था नहीं थी।
यह समाज द्वारा स्वनाथ बच्चों को दिया गया मातृत्व का प्रत्यक्ष अनुभव था।
मातृभोजन: जब समाज ने निभाई माँ की भूमिका
शिविर का सबसे भावनात्मक और चर्चित उपक्रम था- मातृभोजन।
शहर की विभिन्न माताएँ अपने घरों से भोजन लेकर आईं और स्वनाथ बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर भोजन किया।
किसी ने आग्रह करके खिलाया।
किसी ने बच्चे की थाली में उसकी पसंद का व्यंजन रखा।
किसी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- “बेटा, और दूँ क्या?”
इन छोटे-छोटे क्षणों ने बच्चों के मन में गहरी छाप छोड़ी।
शिविर के बाद अनेक माताओं ने स्वीकार किया कि वे बच्चों को प्रेम देने आई थीं, लेकिन लौटते समय स्वयं अधिक संवेदनशील और समृद्ध होकर गईं।
एक स्वनाथ की कहानी जिसने सभागार को मौन कर दिया
पुणे से आए संतोष कुलकर्णी के सत्र ने शिविर को एक नई ऊँचाई दी।
संतोष स्वयं एक स्वनाथ बालक रहे हैं। अभाव, संघर्ष, असुरक्षा और अकेलेपन से लड़ते हुए उन्होंने पुणे में अपनी अलग पहचान बनाई।
जब उन्होंने अपनी जीवन यात्रा सुनाई, तो पूरा सभागार लगभग डेढ़ घंटे तक भावविभोर होकर सुनता रहा।
एक बालिका भावनात्मक रूप से इतनी प्रभावित हुई कि वह रोते हुए कुछ समय के लिए बाहर चली गई।
लेकिन सत्र का अंत आशा के साथ हुआ।
संतोष कुलकर्णी ने सभी स्वनाथ बच्चों से कहा
“यदि कभी जीवन में कोई कठिनाई आए, तो मेरे पास आना। मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ।”
यह वाक्य बच्चों के लिए केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जीवन भर की प्रेरणा बन गया।
समाज का विराट सहयोग
इस आयोजन की सफलता के पीछे सैकड़ों लोगों का निस्वार्थ योगदान रहा।
“हर बच्चे को माँ” अभियान की राष्ट्रीय अध्यक्षा आरती लढ्ढा, विश्वमांगल्य स्वनाथ परिषद की राष्ट्रीय समन्वयक पल्लवी कुलकर्णी, विश्वमांगल्य सभा की राष्ट्रीय सदाचार सभा संयोजिका सोनिया तराळकर, विश्वमांगल्य अकोला अध्यक्ष निशा टावरी, राष्ट्रीय अध्यक्षा रेखाजी खंडेलवाल, गीता परिवार की कल्पना भुतडा, उत्कर्ष शिशुगृह के अध्यक्ष चंदू लड्डा, गोरक्षण समिति के सचिव विजय जानी, गायत्री बालिकाश्रम की सोनल रायपुरे तथा स्वनाथ माता समूह की प्रमुख माणिक नेरकर, कविता मालू, पुष्पा वानखड़े, अश्विनी जकाते और गिरीजा जागीरदार ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अकोला के जाने माने व्यक्तित्व किशोरजी बळी, अजय कुटे, काजल राजवैद्य, प्रदीप अवचार, आर.एल.टी. के चंद्रवंशी, आनंद जागीरदार तथा राम भारती ने प्रेरक सत्रों के माध्यम से बच्चों का मार्गदर्शन तथा मनोरंजन किया।
पर्दे के पीछे रहकर संपूर्ण स्वच्छता एवं जल व्यवस्था का दायित्व हरिष आलितचंदानी और उनकी टीम ने संभाला।
स्वानंद संस्था, पुणे, अनेक निरपेक्ष दानदाताओं, स्वयंसेवकों और सैकड़ों स्वनाथ माताओं ने भी इस सामाजिक यज्ञ में अपना योगदान दिया।
एक शिविर नहीं, भविष्य का सामाजिक मॉडल
विदाई के समय नम आँखें, बच्चों के चेहरे पर लौटता आत्मविश्वास और माताओं के मन में उमड़ता वात्सल्य इस बात का प्रमाण था कि यह केवल ढाई दिनों का कार्यक्रम नहीं था।
यह समाज और स्वनाथ बच्चों के बीच विश्वास का एक नया सेतु था।
अकोला से प्रारंभ हुआ यह प्रयोग आज देश के सामने एक महत्वपूर्ण सामाजिक मॉडल प्रस्तुत कर रहा है- ऐसा मॉडल जिसमें समाज स्वयं आगे आकर स्वनाथ बच्चों के जीवन के पाँच स्तंभों को मजबूत बनाने का दायित्व स्वीकार करता है।
“हर बच्चे को माँ” केवल एक अभियान नहीं बल्कि समाज की सामूहिक मातृत्व चेतना का जागरण है।
और शायद यही इस पूरे प्रयास का सबसे बड़ा संदेश है-
“यदि समाज संकल्प ले, तो कोई भी स्वनाथ बच्चा अकेला नहीं रहेगा।”
ढाई दिन बाद जब विदाई का समय आया, तो केवल स्वनाथ बच्चों की आँखें ही नम नहीं थीं।
वे माताएँ भी भावुक थीं, जिन्होंने पहली बार महसूस किया कि मातृत्व केवल जन्म देने से नहीं बल्कि किसी जीवन को अपनाने से भी प्रकट होता है।
स्वयंसेवकों को लगा कि उन्होंने कोई आयोजन नहीं किया बल्कि एक परिवार को जन्म लेते देखा है।
और स्वनाथ बच्चों को शायद पहली बार यह अनुभव हुआ कि समाज में ऐसे लोग भी हैं जो बिना किसी स्वार्थ के उनके साथ खड़े हैं।
अकोला में शुरू हुआ यह प्रयोग केवल एक शिविर की कहानी नहीं है।
यह उस भारत की कहानी है जहाँ समाज अभी भी संवेदनशील है।
यह उस मातृत्व की कहानी है जो रक्त संबंधों की सीमाओं से परे है।
यह उस विश्वास की कहानी है कि यदि समाज जाग जाए, तो कोई भी बच्चा अकेला नहीं रहेगा।
और शायद यही “हर बच्चे को माँ” अभियान का सबसे बड़ा संदेश है-
“हर बच्चे को केवल संरक्षण नहीं, एक माँ चाहिए।”
और जब समाज माँ बन जाता है, तब राष्ट्र का भविष्य बदलना शुरू हो जाता है।

