पुराणों में वर्णित कथानुसार क्षत्रिय राजा सुजानसेन को उसके बहत्तर उमरावों को ऋषिमुनियों ने, उनके यज्ञ स्थल को बाधित करने के कारण श्राप दे पत्थर में परिवर्तित कर दिया था। तत्पश्चात राजा सुजानसेन की अर्द्धांगिनी ने सभी पत्थर के बुत बने उमरावों की पत्नियों के साथ प्रभु महादेव की घोर तपस्या की। इस घोर तपस्या के परिणामस्वरूप माता पार्वती के आग्रह पर प्रभु महेश, माता पार्वती के साथ प्रकट हो क्षत्रिय राजा सुजानसेन के साथ सभी बहत्तर उमरावों को ज्येष्ठ शुक्ल नवमी वाले दिन न केवल नया जीवन प्रदान किया बल्कि इस तिहत्तर परिवार वाले समाज को आशीर्वाद स्वरूप अपना नाम भी दिया। इसके बाद यह समुदाय जो “माहेश्वरी” नाम से जाना जाने लगा, ने प्रभु महेश की आज्ञानुसार क्षत्रिय कर्म को छोड वैश्य धर्म को अपना कर सत्य, प्रेम व न्याय के पथ पर चलते रह कर धनोपार्जन का संकल्प लिया। इस प्रकार माहेश्वरी समाज वृहद वैश्य समाज का एक हिस्सा तो अवश्य हो गया, लेकिन तब से लेकर आजतक हर ज्येष्ठ शुक्ल नवमी को देवाधिदेव महेश व जगतजननी माँ पार्वतीजी की आराधना करते हुये महेश नवमी पर्व बड़े ही श्रद्धापूर्वक, खूब धूमधाम से पूरे विश्व में हर माहेश्वरी स्थल पर कुटुम्ब सहित मनाते हैं।
उपरोक्त अनुसार माहेश्वरीयों का यह दायित्व हो गया कि सत्य, प्रेम व न्याय के पथ पर चलते हुए धनोपार्जन तो करे ही, साथ ही निस्वार्थ भाव से अपने धन के एक भाग को धर्म कार्यों में लगाते रहे अर्थात बेवजह के खर्चों से बचना है ताकि धर्माचरण की पालना में किसी भी प्रकार की बाधा न आए।
यहाँ यह अवश्य उल्लेख करना चाहूँगा कि तब से लेकर आज तक हमारी संस्कृति में मितव्ययिता व दानशीलता का बहुत ही महत्व है। मितव्ययिता हमें जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण सिखाती है तो दानशीलता हमें सिखाती है कि सद्कार्य के लिये आवश्यकता के समय पर जो भी सम्भव हो, जितना भी सम्भव हो अवश्य दें।
याद रखें मितव्ययी का मतलब कंजूस नहीं होता है बल्कि अनावश्यक खर्च न कर, सोचसमझ कर खर्च करनेवाला ही होता है। इसी तरह दानी के मन में बदले में उपकार पाने की कोई भावना नहीं होती है बल्कि समाज सेवा या राष्ट्र सेवा की भावना होती है। इन्हीं सब गुणों से सम्पन्न होते हैं वैश्य यानी बनिये, जबकि कुछ सिरफिरे साहित्यकारों ने इन्हें मुनाफाखोर बतला बदनाम किया है।
मेरा यह उल्लेख करने का मतलब यही है कि हर समुदाय में कुछ अपवाद होते हैं, जिसका यह मतलब कभी नहीं होता कि सभी उसी तरह के हैं। हाँ यह सही है कि बनिये फालतू उलझने में विश्वास नहीं रखते और चुपचाप शान्ति से अपने काम में लगे रहते हैं। याद रखें बनिये यदि मितव्ययी नहीं होते तो बड़े बड़े दानवीरों में उनका नाम कहाँ से आता। इतिहास में अनेकों ऐसे उदाहरण है जिससे यह सिद्ध होता है कि बनिये अपने नश्वर शरीर के मौज-मस्ती में फालतू खर्च न कर मितव्ययिता बरत सेवा, दान, उत्सव, देशहित में सदा अग्रणी भूमिका निभायी है, जो निम्न उदाहरणों से एकदम स्पष्ट हो रही है-
१] राजस्थान राजपूतानी शौर्य भूमि बीकानेर के मूल निवासी वैश्य अमरचन्द बाँठिया जी की कीर्ति से प्रभावित होकर ग्वालियर की तत्कालीन सिंधिया रियासत के महाराज ने उनको राजकोष का कोषाध्यक्ष बनाया था। उस समय ग्वालियर का गंगाजली खजाना की जानकारी केवल चुनिन्दा लोगों को ही थी। बांठिया जी भी उनमें से एक थे। यहाँ यह बात गौर करने की है कि उस समय के चलन के मुताबिक गंगाजली खजाना से कोई भी कुछ भी निकाल ही नहीं सकता था, फलस्वरूप खजाने की सदैव वृद्धि होती रही।

१८५७ का स्वातन्त्र समर के समय झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई अपने योग्य सेनानायक राव साहब, तात्या टोपे और रानी बैजाबाई एवं अपने सैन्य बल के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुवे ग्वालियर को अपने अधिकार में ले, अंग्रेजों के सहयोगी शासक को वहाँ से हटने को विवश तो कर दिया था, किन्तु उनकी सेना को कई महीनों से न तो वेतन प्राप्त हुआ था और न हीं उनके भोजन आदि की समुचित व्यवस्था हो पा रही थी अर्थात अर्थाभाव के कारण स्वाधीनता समर दम तोड़ता दिखाई दे रहा था। इस स्थिति को समझते हुये बाँठिया जी ने अपनी जान की परवाह न कर महारानी लक्ष्मीबाई को अपनी सारी जमा पूँजी तो समर्पित की ही, साथ ही ग्वालियर का राजकोष भी उनके सुपुर्द कर दिया। यह धनराशि उन्होंने ८ जून १८५८ को उपलब्ध करायी। उनकी मदद के बल पर वीरांगना लक्ष्मीबाई दुश्मनों के छक्के छु़ड़ाने में सफल रहीं थी।
२] एक मराठा सैनिक/सेनापति आपा गंगाधर राव ने ८०० साल पहले पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक क्षेत्र में प्रसिद्ध गौरी शंकर मन्दिर निर्मित किया था। एक बार एक बड़े वैश्य व्यापारी लाला भागमल जी को पता चला कि क्रूर, निर्दयी औरंगजेब ने इस मन्दिर को तोड़ने का आदेश अपने सिपाहियों को दिया है तो उन्होनें औरंगजेब से सीधा सीधा पूछा: बताइये तुझे कितना जजिया कर चाहिए? कीमत बोलिये, लेकिन मन्दिर को कोई हाथ नही लगाएगा, मन्दिर की घण्टी बजनी बन्द नही होगी!

कहते हैं इसके जबाब में उस वक़्त औरंगजेब ने औसत जजिया कर से सौ गुना ज्यादा जजिया कर, हर महीने माँगा था और वैश्य व्यापारी लाला भागमल जी बिना माथे पर शिकन लाये हर माह उतना जजिया कर औरंगजेब को दान के रूप में दिया था। इस तरह वैश्य व्यापारी लाला भागमल जी ने उन आततायी से मन्दिर को न केवल बचाया बल्कि मन्दिर को छूने तक नहीं दिया। इस घटना के कई दशक बाद इसी गौरी-शंकर मंदिर का जीर्णोद्धार सेठ जयपुरिया नाम के शिव भक्त ने १९५९ में कराया था। इस तरह मराठा सैनिक/सेनापति आपा गंगाधर राव के समय से लेकर आज तक मन्दिर की घण्टियाँ ज्यों की त्यों बज रही हैं।

३] सरहिन्द के नवाब वजीर खाँ, गुरु गोबिंद सिंह जी के दो पुत्रों को दीवार में चिनवाने के बाद उनके दोनों साहिबजादों व दादी माँ, जो ६ पूस से १३ पूस… तदनुसार २१ दिसम्बर से २७ दिसम्बर वाले सात दिनों में शहीद हुये, के पार्थिव शरीरों को अन्तिम संस्कार के लिए जगह नहीं दे रहा था। तब वैश्य व्यापारी टोडरमलजी ने उन तीनों महान विभूतियों का अन्तिम संस्कार के लिए सिर्फ चार वर्ग मीटर स्थान ७८००० हजार सोने के सिक्के जमीन पर खड़े कर, वह जगह मुगल सल्तनत से खरीद स्वयं ही उन तीनों महान विभूतियों का अन्तिम संस्कार अपनी पत्नी के सहयोग से फतेहगढ़ साहिब में सम्पन्न किया था।
४] हल्दी घाटी के युद्ध में पराक्रमी महाराणा प्रताप जब अपने परिवार के साथ जंगलों में भटक रहे थे तब दानवीर वैश्य भामाशाह मातृ-भूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप के लक्ष्य को सर्वोपरि मानते हुए अपनी सम्पूर्ण धन-सम्पदा अर्पित कर दी। जिसके चलते महाराणा प्रताप में नया उत्साह उत्पन्न हुआ और उन्होंने पुन: सैन्य शक्ति संगठित कर मुगल शासकों को पराजित कर फिर से मेवाड़ का राज्य प्राप्त कर लिया था।
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महाराणा प्रताप जी भी जब महल छोड़कर जंगल चले गए थे, व उन्हें अकबर के विरुद्ध नयी सेना का गठन करना था, उस समय भी बनिया समाज के श्री भामाशाह जी ने अकूत धनराशि से महाराणा प्रताप जी को भरपूर सहयोग किया था। ऐसे विरल दानवीर वैश्य भामाशाह के लिये ही निम्न पंक्तियाँ कही गयीं थी –
वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला।
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला।।
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५] इसी तरह वैश्य राजा टोडरमलजी (इनको इक्कीस वर्ष की उम्र में बादशाह शाहजहाँ ने ‘राजा’ की उपाधि से नवाजा था) ने पण्डित नारायण भट्ट की प्रेरणा से उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर स्थित देवाधिदेव महादेव काशी विश्वनाथ मन्दिर, जिसे वर्ष १४४७ में इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया था, को १५८५ में पुन:निर्माण करवा, सनातन धर्म रक्षार्थ एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
इसी क्रम में यह भी बताना चाहूँगा कि प्रायः-प्रायः सभी तीर्थ स्थानों में आपको किसी भी वैश्य द्वारा स्थापित धर्मशाला मिलेगी ही। हाल ही के वर्षों में वैश्य समाज विश्वविद्यालय, अस्पताल, विद्यालय, वगैरह भी छोटे से छोटे जगह पर स्थापित किये जा रहे हैं। इन सब कारणों से हम कह सकते हैं कि वैश्य समाज धर्म कर्म, समाज कल्याण के साथ-साथ राष्ट्र उन्नति के लिये कुछ भी करने को सदैव तत्पर रहते हैं क्योंकि उनके जिन्दगी जीने के मापदण्ड कुछ इस प्रकार होते हैं –
जिन्हें सेवा की धुन हो, कुछ अलग होते हैं दुनिया में।
उन्हें तकलीफ पाकर भी, बहुत सुकून मिलता है।।
– गोवर्द्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’

