25 जून 1975, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला अध्याय है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर संविधान की आत्मा को कुचलने का प्रयास किया था। 21 महीने तक चले इस अंधकारमय दौर में नागरिक स्वतंत्रताएं समाप्त कर दी गईं, प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया गया और हजारों विपक्षी नेताओं, पत्रकारों एवं कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया। इस कालखंड को “संविधान हत्या” का प्रयास मानते हुए भारत सरकार ने 25 जून को प्रतिवर्ष ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
आपातकाल: संविधान पर सीधा आघात
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिन को भारत के इतिहास के “सबसे काले अध्यायों” में से एक बताते हुए कहा कि आपातकाल “हमारे संविधान पर सीधा हमला” था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे “लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय” करार दिया, जिसमें मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया, प्रेस की स्वतंत्रता को कुचला गया और हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सक्रियतावादियों व पत्रकारों को बिना किसी कारण के गिरफ्तार किया गया।
इस दौरान देश ने अभूतपूर्व अत्याचार देखे:
• मीडिया सेंसरशिप: सभी समाचार पत्रों को प्रधानमंत्री कार्यालय से पास कराना अनिवार्य कर दिया गया। विरोध में कई अखबारों ने खाली संपादकीय प्रकाशित किए।
• न्यायिक संकट: सर्वोच्च न्यायालय ने ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ल (1976) मामले में 4:1 के बहुमत से फैसला दिया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए किसी भी अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार निलंबित किया जा सकता है— जिसमें बन्दी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) का अधिकार भी शामिल था।
• 42वाँ संशोधन: तथाकथित “लघु-संविधान” के माध्यम से प्रस्तावना में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द जोड़े गए, मौलिक कर्तव्यों को मौलिक अधिकारों से ऊपर रखा गया और न्यायिक पुनर्वीक्षण की शक्तियों को सीमित किया गया।
• जबरन नसबंदी अभियान: संजय गांधी के नेतृत्व में लाखों पुरुषों— जिनमें अविवाहित युवक भी शामिल थे— को जबरन नसबंदी के लिए उठाया गया।
• तुर्कमान गेट हिंसा: दिल्ली में लोगों को उनके घरों से बेदखल किया गया, मकान ढहा दिए गए और कई पुरुषों को नसबंदी के लिए ले जाया गया।
इन अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने वालों में जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते और जॉर्ज फर्नांडीस जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे, जिन्हें सभी को जेल में डाल दिया गया।
संघ स्वयंसेवकों का त्याग, साहस और बलिदान
जिस समय पूरा देश स्तब्ध और भयभीत था, उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक लोकतंत्र की रक्षा के लिए सबसे आगे खड़े रहे। आपातकाल के विरुद्ध संघ की भूमिका अतुलनीय रही।
संगठन पर प्रतिबंध के बावजूद प्रतिरोध
आपातकाल लागू होने के कुछ दिनों बाद 4 जुलाई 1975 को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। संघ के पू. सरसंघचालक बालासाहब देवरस सहित अधिकांश वरिष्ठ नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी से पहले देवरस ने स्वयंसेवकों को संदेश दिया कि वे संतुलन न खोएं और जनता के बीच अपना कार्य जारी रखें।
विशाल सत्याग्रह और कारावास
संघ के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह में अभूतपूर्व संख्या में भाग लिया। वरिष्ठ संघ नेता रामलाल के अनुसार “यदि संघ के स्वयंसेवकों ने आपातकाल के दौरान सत्याग्रह में इतनी बड़ी संख्या में भाग नहीं लिया होता और जेलें न भरी होतीं, तो सरकार आम चुनावों की घोषणा नहीं करती और जनता पार्टी सत्ता में नहीं आती। आपातकाल लंबे समय तक जारी रहता और भारत एक सत्तावादी शासन का शिकार हो जाता”।
आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं
• MISA (रखरखाव आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) के तहत संघ के 23,015 कार्यकर्ताओं को नजरबंद किया गया, जिनमें 77 महिला कार्यकर्ता भी शामिल थीं।
• आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वालों में 44,965 संघ के स्वयंसेवक थे, जबकि अन्य दलों के लोगों की संख्या मात्र 9,655 थी ।
• लगभग 80 प्रतिशत नजरबंद किए गए लोग संघ के स्वयंसेवक थे।
भूमिगत प्रतिरोध और स्वतंत्र प्रेस
जब मुख्यधारा के मीडिया को पूर्णतः सेंसर कर दिया गया था, संघ के स्वयंसेवकों ने भूमिगत समाचार पत्रों और पैम्फलटों का जाल बिछाया। साइक्लोस्टाइल मशीनों पर मुद्रित ये प्रकाशन हाथों-हाथ वितरित किए जाते थे और जनता तक असंपादित समाचार पहुंचाने का एकमात्र माध्यम बने रहे। द इकोनॉमिस्ट ने दिसंबर 1976 में लिखा कि “श्रीमती गांधी के खिलाफ भूमिगत अभियान दुनिया का एकमात्र गैर-वामपंथी क्रांतिकारी बल होने का दावा करता है” और यह जनसंघ एवं आरएसएस द्वारा संचालित था। जब वरिष्ठ पत्रकार रामनाथ गोयनका के इंडियन एक्सप्रेस अखबार को कठोर सेंसरशिप का सामना करना पड़ा, तो संघ के स्वयंसेवकों ने गुप्त रूप से इसके असंपादित संस्करण मुद्रित कर वितरित करने में सहायता की।
विभिन्न विपक्षी समूहों को एकजुट करना
संघ ने विभिन्न विपक्षी दलों के बीच समन्वयक की भूमिका निभाई। जयप्रकाश नारायण द्वारा ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान करने पर, संघ के स्वयंसेवकों ने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संघ की विकेंद्रीकृत शाखा संरचना ने शीर्ष नेतृत्व के जेल में होने के बावजूद जमीनी स्तर पर प्रतिरोध को जारी रखने में सक्षम बनाया।

संघ का सदैव राष्ट्रप्रथम योगदान
यह पहली बार नहीं था जब संघ के स्वयंसेवकों ने राष्ट्र के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। रामलाल ने उदाहरण देते हुए बताया कि 1965 के युद्ध में जब सैन्य आपूर्ति खतरे के क्षेत्र में गिर गई, तो संघ के स्वयंसेवक रेंगते हुए वहां तक पहुंचे और आपूर्ति को बचाया— इस कार्य में चार स्वयंसेवक शहीद हो गए। 1965 के युद्ध में मात्र 24 घंटे के प्रशिक्षण के बाद संघ के स्वयंसेवकों ने दिल्ली का यातायात इतनी कुशलता से संभाला कि दुर्घटनाओं की संख्या सबसे कम रही।

‘संविधान हत्या दिवस’ केवल एक स्मरण दिवस नहीं है, बल्कि यह हम सभी के लिए एक चेतावनी है कि लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए सदैव सजग रहना होगा। जिस प्रकार संघ के स्वयंसेवकों ने अपने त्याग, साहस और बलिदान से आपातकाल के अंधकार में लोकतंत्र की दीपक को जलाए रखा, उसी प्रकार हम सभी को भी संविधान के प्रति अपनी निष्ठा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित करना चाहिए।
प्रधान मंत्री मोदी ने इस अवसर पर कहा, “हमारा संविधान 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों का प्रतीक है। हम संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी सामूहिक प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हैं”। आपातकाल के उस काले अध्याय ने हमें सिखाया कि लोकतंत्र कितना नाजुक है और उसकी रक्षा के लिए निरंतर प्रयास एवं सतर्कता आवश्यक है।
जय हिंद!
– प्रा. डॉ. रविकांत कोल्हे
मा. स्वतंत्र संचालक गेल इंडिया लिमिटेड.
#SamvidhanHatyaDiwas #DarkDaysOfEmergency #Emergency1975 #RSSContribution #DemocracyRestored #IndianHistory #NationFirst #MukeshGupta #25June1975

