“आसिंधू-सिंधुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका”
सिंधु महाकुंभ…
“आसिंधू-सिंधुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका।
पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः॥”
अर्थात सिंधु नदी से उत्तर-पश्चिम में स्थित भूभाग से लेकर हिंद महासागर तक के भूभाग को जो अपनी पितृभूमि, मातृभूमि, जन्मभूमि और पुण्यभूमि मानते हैं, वे सभी हिंदू हैं। यह सावरकर का कथन राष्ट्र के वैभवशाली इतिहास को जागृत रखने वाला है।
ऐसी इस सिंधु माता की, पिछले 30 वर्षों से निरंतर चल रही “सिंधु दर्शन” यात्रा का स्वरूप अब “सिंधु महाकुंभ” मेले में परिवर्तित हो रहे इस आयोजन का साक्षी बनना वास्तव में परम सौभाग्य की बात है।
13 जून की संध्या को ‘अभयदा’ का फोन आया। अभयदा अर्थात सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी अभय दुदवडकर (राष्ट्रपति के उल्लेखनीय सेवा हेतु पुलिस पदक से सम्मानित), जिन्होंने नारकोटिक्स विभाग (Narcotics), आतंकवाद विरोधी दस्ता, अपराध अन्वेषण शाखा तथा विभिन्न गंभीर अपराधों के निराकरण में साहसपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान दिया है।

अभयदा ने कहा, “21 से 26 जून तक लद्दाख में ‘सिंधु महाकुंभ’ आयोजित हो रहा है, चलोगे क्या?” हमारी कंपनी इस यात्रा को प्रायोजित कर रही है। मैंने बिना अधिक विचार किए तुरंत ‘हाँ’ कह दिया। बाद में पता चला कि हमारे साथ कंपनी के सदस्य निलेश टाकलीकर, शिवानी आहुजा, दिलीप काले (सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त) तथा उनके मित्र हरधन बैतालीक सहित हम कुल छह लोग होंगे।
अवंत ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के निदेशक सुदीप साहा की पहल पर इस सिंधु यात्रा का आयोजन किया गया था। वे “हिमालय परिवार एवं सिंधु दर्शन समिति” महाराष्ट्र के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय हैं। चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट (CFA), बी.टेक. तथा भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद (IIM Ahmedabad) से एमबीए की शिक्षा प्राप्त करने के बाद व्यवसाय करते हुए वे अनेक सामाजिक विषयों में सक्रिय योगदान दे रहे हैं। उनकी भी इस यात्रा में आने की प्रबल इच्छा थी, किंतु कार्यव्यस्तता के कारण वे इस बार नहीं आ सके और अगली बार आने का निश्चय किया।
सिंधु नदी के प्रति मन में विद्यमान श्रद्धा, उसके इतिहास के प्रति गहरी भावनाएँ तथा अखंड सिंधु नदी को पुनः भारत में प्रवाहित होते देखने की तीव्र आकांक्षा के कारण, वर्तमान भारत में स्थित सिंधु माता के दर्शन का अवसर ठुकराना असंभव ही था।
सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत में कैलाश-मानसरोवर के निकट होता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन और पवित्र नदियों में से एक है। सिंधु सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) इसी नदी की घाटी में विकसित हुई। अनेक विद्वानों की मान्यता है कि ‘सिंधु’ शब्द से ही आगे चलकर ‘हिंदू’ शब्द प्रचलित हुआ।
ऋग्वेद में सिंधु नदी को अत्यंत विशाल और पूजनीय नदी माना गया है। वैदिक काल की ‘सप्तसिंधु’ (सात नदियों का प्रदेश) की अवधारणा में सिंधु प्रमुख नदी थी। इसमें सरस्वती, झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलज उसकी सहायक नदियाँ थीं।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार सिंधु नदी की पूजा नदियों की देवी के रूप में भी की जाती है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत में भी सिंधु नदी का गौरव ‘महानदी’ के रूप में वर्णित है। इसी नदी के तट पर प्राचीन ऋषि-मुनियों ने वेदों और उपनिषदों की रचना की। इसी समृद्ध घाटी में विश्व की सबसे विकसित प्राचीन नगरीय सभ्यताओं में से एक सिंधु सभ्यता का विकास हुआ।
भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सिंधु नदी के मुहाने पर वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित हिंगलाज भवानी का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। इसी प्रकार महाभारतकालीन मुल्तान (पूर्व का ‘कश्यपपुर’) में चिनाब नदी के तट पर भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब द्वारा निर्मित भव्य सूर्य मंदिर भी इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रमाण है।
‘सिंधु नदी’ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति के उद्गम और अखंड भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है।
विभाजन के बाद सिंधु नदी पाकिस्तान में चली जाने के कारण आज भी अनेक राष्ट्रवादी लोगों के मन में गहरी पीड़ा है।
“सिंधु के बिना हिंदू अर्थात अर्थ के बिना शब्द, प्राण के बिना शरीर!” ऐसी दृढ़ भावना रखते हुए अनेक लोगों ने सिंधु नदी को पुनः स्वतंत्र और अखंड भारत का भाग बनाने का संकल्प लिया है।

भारत में सिंधु नदी का क्षेत्र मुख्यतः केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में आता है।
सिंधु नदी का उद्गम तिब्बत के मानसरोवर के निकट होता है। वह भारत के लद्दाख क्षेत्र में प्रवेश करती है और आगे ज़ांस्कर पर्वतश्रेणियों के बीच से बहती हुई आगे बढ़ती है। सिंधु के अतिरिक्त झेलम, चिनाब, रावी, व्यास और सतलज जैसी उसकी सहायक नदियाँ पंजाब और हिमाचल प्रदेश को समृद्ध बनाती हैं।
सिंधु नदी लद्दाख की जीवनरेखा और उसके इतिहास का आधारस्तंभ है। मानसरोवर झील के समीप तिब्बत में उद्गम लेकर यह नदी ‘डेमचोक’ से भारत में प्रवेश करती है और लद्दाख के मध्य भाग से होकर बहती है। इसके तटों ने हजारों वर्षों से स्थानीय संस्कृति, कृषि तथा प्राचीन व्यापारिक मार्गों को समृद्ध किया है।
संस्कृत तथा तिब्बती दोनों भाषाओं में इसका पारंपरिक नाम ‘सिंधु’ ही है। लद्दाखी भाषा में इसे ‘सेंगे त्सांगपो’ (सिंह नदी) अथवा ‘शेर दरिया’ के नाम से श्रद्धापूर्वक पूजनीय माना जाता है।
यह नदी डेमचोक और डुंगटी से उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हुई लेह के पास पहुँचती है तथा रमणीय निम्मू संगम पर ज़ांस्कर नदी से मिलती है।
लद्दाख की अधिकांश ऐतिहासिक एवं प्रमुख बस्तियाँ— जिनमें लेह, शे, बसगो और टिंगमोसगंग प्रमुख हैं— सिंधु नदी के उपजाऊ तटों पर ही बसी हुई हैं।
हिंदू धर्म में सिंधु नदी का अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक स्थान है और ऋग्वेद में उसका सैकड़ों बार उल्लेख मिलता है।
सन् 1997 से भारत सरकार प्रत्येक वर्ष प्रायः जून माह में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर शे के निकट स्थित सिंधु घाट पर ‘सिंधु दर्शन यात्रा’ का आयोजन करती है, जिसमें इस नदी को भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक के रूप में गौरव किया जाता है।
सिंधु नदी को जल प्रदान करने वाले हिमनदों का पिघलता हुआ जल लद्दाख की कृषि का आधार है। आज यह नदी एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत भी है, जिसके कारण इस क्षेत्र के अनेक छोटे एवं मध्यम जलविद्युत परियोजनाओं को आधार मिलता है।
इतिहास में लद्दाख की नदी घाटियाँ सिल्क रूट की प्रमुख शाखाओं का भाग थीं, जिन्होंने तिब्बत, भारत और मध्य एशिया को जोड़ने वाले अपेक्षाकृत सुगम मार्ग उपलब्ध कराए।
दूर से देखने पर केवल मिट्टी से ढके हुए नंगे पर्वत दिखाई देते हैं, जबकि शीत ऋतु में यही पर्वत बर्फ की मोटी चादर से ढक जाते हैं। किंतु इन पर्वतों की तलहटी में हरे-भरे गाँव बसे हुए हैं। छह महीने तक चलने वाले अत्यधिक हिमपात के कारण कई लोगों को पूरे समय घरों में रहना पड़ता है अथवा अन्य राज्यों में अस्थायी रूप से पलायन करना पड़ता है।
आस-पास के क्षेत्रों में भ्रमण करते समय स्थानीय लोगों से अनेक अद्भुत जानकारियाँ प्राप्त होती रहीं। जून का महीना होने के कारण सिंधु घाटी में बर्फ नहीं थी, लेकिन लगभग 15–20 किलोमीटर दूर स्थित बर्फ से ढके क्षेत्रों में जाने का मोह हम रोक नहीं सके।
लेह से लगभग 40 किलोमीटर दूर खारदुंगला गाँव की ओर जाते समय गंतव्य से लगभग सात–आठ किलोमीटर पहले भूस्खलन हो गया था। परिणामस्वरूप हमें वहीं से वापस लौटना पड़ा। फिर भी बर्फीले वातावरण में छायाचित्र लेने का अवसर अवश्य मिल गया।
सिंधु घाट के दूसरी ओर लगभग आठ-नौ किलोमीटर की दूरी पर लेह के चुशोट योगमा में पालगा रिनपोछे (Palga Rinpoche) का मठ स्थित है। वे तिब्बती बौद्ध धर्म की द्रुक्पा (Drukpa Lineage) परंपरा के अत्यंत सम्मानित आध्यात्मिक गुरु हैं। उनका पूरा नाम चोक्योंग पालगा रिनपोछे है। उनका जन्म लद्दाख में हुआ है और उन्हें एक ‘तुल्कु’ (पुनर्जन्मी लामा) माना जाता है।
हमें उनके बौद्ध मठ में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रिनपोछे गुरुजी ‘सिंधु महाकुंभ’ के उद्घाटन समारोह में भी उपस्थित थे और उन्होंने स्वयं अपने मठ में आने का निमंत्रण दिया था।
उस परिसर में पहुँचते ही आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा अनुभव हुआ कि मन अत्यंत प्रसन्न और शांत हो गया। वहाँ उपस्थित साधकों ने “जुले… जुले…” कहकर हमारा आत्मीय स्वागत किया। बाद में ज्ञात हुआ कि भोटी भाषा में “जुले” का अर्थ नमस्कार होता है। यह जानने के बाद अगले पाँच-छह दिनों तक हम जिससे भी मिलते, उसे “जुले” कहकर अभिवादन करते और आत्मीयता का अनुभव करते।
जब बौद्ध गुरु साधकों से संवाद कर रहे थे, तब हमारे कानों में “च, चा, चि, ची, चु, चू…” जैसे स्वर सुनाई दिए। जिज्ञासावश हमने गुरुजी से इसके बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि ये वाणी को शुद्ध और स्पष्ट बनाने के लिए उच्चारित किए जाने वाले उनके पारंपरिक ध्वनि-मंत्र हैं। उन्हें सुनते ही मुझे हमारी बारहखड़ी की याद आ गई। दोनों में लगभग शत-प्रतिशत समानता दिखाई दी। यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए तो भारत के अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों में भी भाषाओं में इस प्रकार की समानताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
“सिंधु दर्शन यात्रा” लद्दाख के लेह में सिंधु नदी के तट पर आयोजित होने वाली एक वार्षिक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक तीर्थयात्रा है। इसका मूल उद्देश्य “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना के अंतर्गत राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना, भारतीय संस्कृति के उद्गम स्थल के रूप में सिंधु नदी का सम्मान करना तथा भारत की सांस्कृतिक विविधता का उत्सव मनाना है। यह संकल्पना अनेक प्रतीकात्मक परंपराओं और कार्यक्रमों के माध्यम से साकार होती है।
देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले यात्री और प्रतिनिधि अपने-अपने प्रदेश की प्रमुख नदियों का जल मंगल कलश में भरकर लद्दाख लाते हैं। तत्पश्चात विधिपूर्वक उस जल का सिंधु नदी में विसर्जन किया जाता है। यह पूरे भारत की विविध क्षेत्रीय अस्मिताओं के एक राष्ट्रीय प्रवाह में विलीन होने का प्रतीक माना जाता है।
यह आयोजन सामाजिक और धार्मिक समरसता का भी एक अनूठा उदाहरण है। इसमें बौद्ध लामाओं के नेतृत्व में हिंदू, सिख, मुस्लिम और ईसाई समुदायों के प्रतिनिधि एक साथ प्रार्थना, मंत्रोच्चार और मंगलकामना करते हैं।
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यह यात्रा एक विशाल सांस्कृतिक महोत्सव का स्वरूप ग्रहण कर लेती है, जहाँ भारत के विभिन्न राज्यों से आए कलाकार, विद्वान और यात्री अपनी-अपनी लोककला, लोकसंगीत, लोकनृत्य तथा सांस्कृतिक परंपराओं का प्रदर्शन करते हैं। विशेष रूप से मणिपुर, महाराष्ट्र, लद्दाख, पंजाब, गुजरात आदि राज्यों से आए कलाकारों से संवाद करते हुए तथा उनके साथ छायाचित्र लेने का मोह हम भी नहीं रोक सके।
इस अवसर पर इन्द्रेश कुमार जी से भी लगभग 20 वर्षों के बाद पुनः भेंट हुई। अभय दुदवडकर जी ने हमारा परिचय कराया। उन्होंने कहा कि जब वे मुंबई आएँगे, तब विस्तृत रूप से मिलने का अवसर अवश्य मिलेगा।
“सिंधु दर्शन यात्रा” की अवधारणा सर्वप्रथम वर्ष 1996 में पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, इन्द्रेश कुमार तथा वरिष्ठ पत्रकार तरुण विजय ने प्रस्तुत की थी। समय के साथ यह यात्रा निरंतर विस्तृत होती गई और अब एक वार्षिक यात्रा से आगे बढ़कर भव्य “सिंधु महाकुंभ” का स्वरूप ग्रहण कर रही है। यह महाकुंभ लेह के निकट स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण सिंधु घाट पर आयोजित किया जाता है। इस “सिंधु महाकुंभ” में प्रत्येक राष्ट्रभक्त भारतीय को सहभागी बनने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहिए।
“सिंधु दर्शन” यात्रा का उद्देश्य भारतीय जनमानस में सिंधु नदी तथा उससे जुड़े क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अस्मिता को जागृत करना है। साथ ही यह यात्रा अनेक राष्ट्रीय आकांक्षाओं को प्रेरणा देने वाली भी है—
• कैलाश-मानसरोवर जाने का मार्ग लेह से प्रारंभ हो।
• भोटी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान प्राप्त हो। (भोटी भाषा हिमालयी क्षेत्र— मुख्यतः लद्दाख, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा अरुणाचल प्रदेश आदि में बोली जाने वाली तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार की एक प्रमुख भाषा है।)
• कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र पुनः मुक्त हो।
तिब्बत की स्वतंत्रता भारत की सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, इस आकांक्षा की पूर्ति एवं प्रेरणा हेतु ‘सिंधु महाकुम्भ’ उपयोगी सिद्ध होगा।
इन सभी राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रेरणा प्रदान करने वाला यह “सिंधु महाकुंभ” भविष्य में एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
🙏 जुले… जुले… जुले… 🙏
— दयानंद सावंत

