भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में ऐसे अनेक पर्व हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं हैं, बल्कि समाज को जोड़ने वाले जीवंत लोक उत्सव भी हैं। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा ऐसा ही एक महापर्व है, जिसने सदियों से सामाजिक समरसता, लोक सहभागिता और सांस्कृतिक एकात्मता का संदेश दिया है। यह उत्सव केवल ओडिशा के पुरी तक सीमित नहीं है, बल्कि महानदी के उद्गम क्षेत्र से लेकर उसके महोदधि में विलय तक फैले विस्तृत भूभाग में लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के अनेक नगरों और ग्रामों में निकलने वाली रथयात्राएं इस साझा सांस्कृतिक विरासत की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।

भगवान जगन्नाथ की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सर्वसमावेशी अवधारणा है। जगन्नाथ किसी एक वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय के देवता नहीं हैं। उनके मंदिर और उनकी परंपराएं भारतीय समाज की विविधता को एक सूत्र में बांधती हैं। यही कारण है कि रथयात्रा के अवसर पर समाज के सभी वर्ग बिना किसी भेदभाव के एक साथ उपस्थित होते हैं। रथ की रस्सी खींचना केवल धार्मिक कार्य नहीं माना जाता, बल्कि यह समानता और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। राजा से लेकर सामान्य नागरिक तक सभी एक ही रस्सी को पकड़कर भगवान के रथ को आगे बढ़ाते हैं। यह दृश्य भारतीय समाज में समानता के आदर्श का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करता है।
पुरी की रथयात्रा का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक स्रोतों और यात्रावृत्तांतों में मिलता है। इतिहासकारों के अनुसार बारहवीं शताब्दी में गंग वंश के शासनकाल में वर्तमान श्रीमंदिर का निर्माण हुआ और इसके साथ रथयात्रा की परंपरा अधिक व्यवस्थित स्वरूप में विकसित हुई। हालांकि भगवान जगन्नाथ की उपासना इससे भी प्राचीन मानी जाती है तथा इसमें आदिवासी, लोक और वैदिक परंपराओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। विद्वान हरमन कुल्के तथा गोपीनाथ महापात्र ने अपने शोध कार्यों में जगन्नाथ परंपरा को भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण बताया है।
रथयात्रा की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक विशेषता यह है कि इस दिन भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। सामान्यतः मंदिरों में श्रद्धालु देवदर्शन के लिए जाते हैं, किंतु इस उत्सव में भगवान नगर भ्रमण करते हैं। यह परंपरा इस विचार को पुष्ट करती है कि ईश्वर केवल मंदिर की सीमाओं में नहीं, बल्कि समस्त समाज के हैं। जो लोग किसी कारणवश मंदिर नहीं पहुंच सकते, वे भी भगवान के दर्शन कर सकते हैं। इस दृष्टि से रथयात्रा सामाजिक समावेशन का अनूठा प्रतीक है।
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इस महापर्व की एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा “छेरा पहरा” है। इसमें गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से भगवान के रथ के चारों ओर सफाई करते हैं। भारतीय राजसत्ता के इतिहास में यह परंपरा अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि यहां राजा स्वयं को भगवान का सेवक घोषित करता है। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि सेवा सबसे बड़ा धर्म है और पद अथवा प्रतिष्ठा से ऊपर मानवता का मूल्य है। सामाजिक समरसता की दृष्टि से यह परंपरा अत्यंत प्रेरणादायक है।
महानदी के प्रवाह क्षेत्र में रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि सांस्कृतिक आदान प्रदान का माध्यम भी बनी। छत्तीसगढ़ के रायपुर, महासमुंद, धमतरी, आरंग, सिरपुर, राजिम, जांजगीर, चांपा, रायगढ़, सरायपाली तथा अनेक कस्बों और गांवों में वर्षों से रथयात्रा का आयोजन होता आ रहा है। इन आयोजनों में स्थानीय लोककलाएं, भजन मंडलियां, लोकनृत्य, पारंपरिक वाद्य यंत्र और सामुदायिक सहभागिता इस उत्सव को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जगन्नाथ संस्कृति ने स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करते हुए समाज में सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया है।
जगन्नाथ संस्कृति का एक अनूठा और जीवंत स्वरूप बस्तर के गोंचा पर्व में भी दिखाई देता है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारंभ होने वाला यह महोत्सव भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का स्थानीय रूप है, जिसने बस्तर की जनजातीय संस्कृति के साथ अद्भुत समन्वय स्थापित किया है। जगदलपुर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की रथयात्रा के साथ आरंभ होने वाले इस पर्व की सबसे विशिष्ट पहचान तुपकी और गोंचा है। तुपकी बांस से निर्मित पारंपरिक खिलौना बंदूक होती है, जिससे गोंचा नामक वनफल को प्रतीकात्मक रूप से चलाया जाता है।
यह परंपरा उत्सव, उल्लास और लोक सहभागिता का प्रतीक है। इस पर्व में जनजातीय समाज, राजपरिवार, ग्रामीण और शहरी समुदाय सहित सभी वर्गों के लोग समान उत्साह से भाग लेते हैं। सामाजिक भेदभाव से परे सामूहिक सहभागिता, लोककला, लोकसंगीत और पारंपरिक खेलों का यह संगम गोंचा पर्व को सामाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण बनाता है। यह पर्व इस बात का प्रमाण है कि जगन्नाथ संस्कृति ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करते हुए अपनी मूल भावना, समानता, सेवा और सामाजिक एकता को अक्षुण्ण बनाए रखा है।

रथयात्रा का आर्थिक और सामाजिक पक्ष भी उल्लेखनीय है। इस अवसर पर स्थानीय कारीगर, बढ़ई, चित्रकार, वस्त्र निर्माता, मृद्भांड शिल्पी, प्रसाद बनाने वाले परिवार तथा लोक कलाकार सभी इस उत्सव से जुड़े रहते हैं। रथ निर्माण में विशिष्ट प्रकार की लकड़ी, पारंपरिक शिल्पकला और सामूहिक श्रम का उपयोग होता है। इससे परंपरागत ज्ञान का संरक्षण भी होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है। यह उत्सव केवल आस्था का नहीं, बल्कि लोकजीवन की आर्थिक संरचना का भी महत्वपूर्ण आधार है।
रथयात्रा सामाजिक समरसता का संदेश इसलिए भी देती है क्योंकि इसमें जातीय और सामाजिक विभाजनों का प्रभाव नगण्य दिखाई देता है। भगवान के महाप्रसाद को सभी लोग समान रूप से ग्रहण करते हैं। पुरी की आनंद बाजार परंपरा इस समावेशी दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां महाप्रसाद को किसी भी प्रकार के सामाजिक भेदभाव से परे माना जाता है। भारतीय समाज में समान भोजन और समान सहभागिता सदैव सामाजिक समरसता के महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।
वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के वैचारिक, सामाजिक और आर्थिक विभाजनों का सामना कर रहा है, तब रथयात्रा का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व बताता है कि समाज की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। अलग-अलग भाषाएं, लोक परंपराएं, रीति रिवाज और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां मिलकर ही भारत की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करती हैं। महानदी से महोदधि तक फैली जगन्नाथ परंपरा इस सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उदाहरण है।
रथयात्रा हमें यह भी सिखाती है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं जब उनमें समाज की सक्रिय भागीदारी बनी रहे। यही कारण है कि यह उत्सव सदियों बाद भी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जन-जन का उत्सव बना हुआ है। इसमें आस्था है, लोकजीवन है, सेवा है, समानता है और सांस्कृतिक निरंतरता का अद्भुत भाव है। यही विशेषताएं इसे सामाजिक समरसता के सबसे महत्वपूर्ण भारतीय उत्सवों में स्थान दिलाती हैं।
– आचार्य ललित मुनि

