विश्व के कई देशों की तुलना में हमारे यहाँ नवाचार के मामले अपेक्षाकृत कम देखने में आते हैं। दरअसल, हम लीक पर चलने में अधिक सहूलियत महसूस करते हैं। हमारे सरकारी कार्यालयों में यह प्रवृति इस कदर जड़ जमाये हुए है कि वहां तो लोग बीते ज़माने पर फाइलों में लिखी टिप्पणियों के सहारे ही अब तक काम चला रहे हैं। अध्ययन करना और बात है और दूसरे की नक़ल करना दूसरी बात है।
खैर, इधर कुछ लोग नवाचार का अर्थ जुगाड़ मानने लगे हैं जबकि मेरे ख्याल से जुगाड़ किसी समस्या को सुलझाने का एक ऐसा अस्थायी उपाय है जिससे आप उस समस्या से निपटने का तात्कालिक उपाय तो खोज लेते हैं किन्तु वह समाधान बेहतर और स्थाई नहीं होता है।
इधर भारत में कुछ लोगों के सतत प्रयासों से अब हमारे विज्ञान संचारकों का एक तबका यह समझने लगा है कि हमें आविष्कारों के बजाय नवाचारों पर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि आविष्कार एक ऐसा संयोग है जो कब हो, कोई उसकी भविष्यवाणी ठीक से नहीं कर सकता है जबकि नवाचार एक ऐसा सुयोग है जो मानसिक व्यायाम से ताल्लुक रखता है- पूर्व में मौजूद किसी भी प्रौद्योगिकी/ तकनीक/ उपकरण/ विधि/ कौशल आदि का लीक से हटकर एक बेहतर उपयोग।
यूं अपने यहां कुछ सामाजिक परम्परों के अलावा कर्म क्षेत्र में लीक पर चलने को कभी भी सराहा नहीं गया है। बचपन से हम यही सुनते रहे हैं कि
“लीक-लीक कायर चलें, लीकहिं चले कपूत।
लीक छोड़ तीनों चलें- शायर, सिंह, सपूत।
अथवा ” लीक-लीक चींटी चलें, लीकहिं चले कपूत।
लीक छोड़ तीनों चलें- शायर, सिंह, सपूत।”
अथवा ” लीक-लीक गाड़ी चलें, लीकहिं चले कपूत।
लीक छोड़ तीनों चलें- शायर, सिंह, सपूत ।”
बहरहाल, इसकी विस्तृत विवेचना करने की जरूरत कभी किसी ने भी महसूस नहीं की। सामान्य तौर पर इसका अर्थ हम यही समझते रहे कि पैतृक कार्यों के अलावा जीवन यापन के लिए दूसरे रास्ते भी तलाशे जा सकते हैं या फिर पुराने रीति-रिवाजों को तिलांजलि देकर अपने लिए नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं।
दरअसल, होना यह चाहिए था कि हम अपने युवाओं को यह सन्देश और प्रेरणा देने का प्रयास करते कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले साधनों में रद्दोबदल करके वे भारत की आर्थिक तस्वीर को बेहतर बना सकते हैं। इतना ही नहीं, हम अपने युवाओं को यह भी बता सकते थे कि नवाचार के लिए किताबी ज्ञान की नहीं अपितु हर समय कुछ न कुछ नया सोचने की अधिक जरूरत होती है।
हम और हमारे शैक्षणिक संस्थान बच्चों के दिमाग में आंकड़े भरते रहे और हमने अपने इन प्रयासों से रट्टू तोतों की एक ऐसी फ़ौज तैयार कर ली जो किसी भी समस्या का समाधान किताबों में खोजती रहती है। नवाचार को समझाने के लिए मैं यहाँ बचपन में अपने पिता जी से सुना एक किस्सा बताना चाहता हूँ।
आज से सत्तर-पचहत्तर वर्ष पूर्व हमारे उत्तराखंड के दो व्यक्ति रामा और परमा अपने गाँव से किसी दूसरे गाँव जा रहे थे। उनको लगभग तीस किलोमीटर की यात्रा पैदल तय करनी थी। जब वे लगभग आधे रास्ते में थे तो भारी बारिश होने लगी। खैर, उन्हें एक मकान नजर आया और वे उस बारिश से बचने वहां पहुंचे। वह मकान सुनसान था। उसके मालिक ने संभवतया उसे वहां फैले अपने खेतों में इस तरह की मौसमी आपदा से बचने के लिए बनाया था। बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। इन दोनों व्यक्तियों ने फैसला लिया कि अब वे अपनी रात उस मकान में बिताएंगे।
शाम होते – होते उन्हें जोर की भूख महसूस हुई तो उन्होंने खाने का समान टटोला। उन्हें रसोई में आटा, आलू, मिर्च-मसाला, नमक और तेल तो मिल गए किन्तु उन्हें बर्तनों के नाम पर वहां सिर्फ एक तसला नजर आया। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे खाना कैसे बनाएं ? तभी रामा ने परमा से कहा, “अरे, हम इतनी देर से बेकार ही परेशान हो रहे थे। थोड़ी बारिश कम हो जाए तो तुम इस मकान के बाजू में मौजूद तिमल के पेड़ (एक स्थानीय चौड़े पत्तों वाला वृक्ष) से 15 – 20 पत्ते तोड़कर ले आना।”
बारिश थोड़ी हल्की हुई तो परमा पत्ते ले आया। अब उन दोनों ने उन पत्तों से पांच पत्तल बनाई। इसके बाद रामा ने अपने थैले में से लोटा निकाला और पास रखी गागर से पानी लिया। अब उसने तसले में आटा गूंदा और उस गुंदे हुए आटे को एक पत्तल के ऊपर रख दिया। अब उसने थैले से चाकू निकाला और आलू-प्याज छीलकर उनके टुकड़े काटे और उन्हें दूसरे पत्तल में रख दिया। अब उसने तसला धोया और उसे कड़ाही की तरह चूल्हे के ऊपर रख दिया।
उसने फिर उस तसले में आलू-प्याज की सूखी सब्जी बनाई और उसे पत्तल पर रख दिया। अब उसने परमा से फिर से तसला धोने के लिए कहा और इस बार उसे उलटा कर चूल्हे के ऊपर रखा यानी अब उसने उस तसले को तवा बना दिया। अब वह आटे की लोई बनाकर रोटी बनाने लगा और उन्हें उस उलटे तसले के ऊपर पकाने लगा। रोटी बनाने के बाद उन्होंने अपने लिए दो पत्तलों में सब्जी परोसी और भरपेट रोटी खाकर सो गए। सुबह तक बारिश थम गयी और रामा तथा परमा अपने सफ़र पर चल पड़े।
यद्यपि हम रामा और परमा के इस कार्य को नवाचार तो नहीं कह सकते हैं किन्तु रामा ने अपने सामने खड़ी समस्या का समाधान जिस अक्लमंदी से किया उसके लिए डिग्री नहीं अपितु सूझ-बूझ की जरूरत होती है। इसी सूझ-बूझ का उपयोग करते हुए हम अपने कार्यालयों, प्रयोगशालाओं, कल-कारखानों, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों और यहाँ तक कि अपने खेत-खलिहानों में ऐसे नवाचारों का सृजन कर सकते हैं जिनसे हम स्वयं को, समाज को और देश को प्रगति के पथ पर और अधिक तेजी से ले जा सकते हैं।
आइये! हम अपने भीतर मौजूद नवाचारी को पहचानें और उससे अपनी समस्याओं के समाधान में सहयोग देने के लिए कहें। युवाओं को यह ख्याल रखना होगा कि उनके अन्दर मौजूद यह नवाचारी कहीं बिना कुछ किये निकम्मा न हो जाए।
– सुभाष चंद्र लखेड़ा
