भारतीय कला में नागों की यह उपस्थिति इतनी व्यापक है कि यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर एक ऐसे जीव को, जिससे मनुष्य सामान्यतः भयभीत रहता है, मंदिरों की पवित्र शिल्पकला में इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों मिला? इसका उत्तर भारतीय संस्कृति की उस दृष्टि में मिलता है, जिसमें प्रकृति और मनुष्य को एक-दूसरे से अलग नहीं माना गया।
भारतीय परंपरा में नाग केवल जैविक अर्थ में सांप नहीं है। नाग एक ऐसी सांस्कृतिक और धार्मिक संकल्पना भी है, जिसमें सर्प के साथ जल, धरती, उर्वरता, रहस्य, शक्ति और संरक्षण जैसे अनेक अर्थ जुड़े हैं। प्राचीन भारतीय परंपराओं में नागों को भूमिगत लोक, जलाशयों और प्राकृतिक शक्तियों से भी जोड़ा गया।
यही कारण है कि मंदिर शिल्प में नाग कभी मनुष्याकार तो कभी सर्पाकार और कभी मानव शरीर तथा सर्पाकार शरीर के सम्मिलित रूप में दिखाई देते हैं। नागों को कई फणों के साथ दिखाना भी उनकी असाधारण शक्ति और दैवी स्वरूप का संकेत माना गया।
भारतीय मंदिर शिल्प में नागों की सबसे प्रसिद्ध उपस्थिति विष्णु और शिव से जुड़े रूपों में दिखाई देती है। भगवान विष्णु के अनंतशयन रूप में शेषनाग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विष्णु अनंत की कुंडलियों पर शयन करते हैं और उसके अनेक फण उनके ऊपर छत्र की तरह फैल जाते हैं। यहां नाग केवल एक सर्प नहीं, बल्कि अनंतता, संरक्षण और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है।
दूसरी ओर शिव की प्रतिमाओं में सर्प उनके गले में दिखाई देता है। शिव के साथ सर्प का संबंध भय और मृत्यु पर नियंत्रण, शक्ति और वैराग्य की प्रतीकात्मक व्याख्याओं से जोड़ा गया है। इस प्रकार एक ही जीव विष्णु के लिए शैय्या और छत्र बनता है तथा शिव के लिए आभूषण। यह भारतीय प्रतीक-चिंतन की विशेषता है कि प्रकृति का कोई जीव एक ही अर्थ में सीमित नहीं रहता।

समुद्र मंथन की कथा में भी नागराज वासुकि की महत्वपूर्ण भूमिका है। देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन के लिए वासुकि को मथनी की रस्सी के रूप में उपयोग किए जाने का प्रसंग भारतीय कला में अनेक रूपों में अंकित हुआ है।
नागों का एक महत्वपूर्ण रूप रक्षक का है। भारतीय धार्मिक परंपराओं में नागों को जलाशयों, कुओं, तालाबों और भूमिगत संपदा के संरक्षक के रूप में देखा गया। इसी कारण नाग प्रतिमाओं का संबंध केवल गर्भगृह या मुख्य देवता से ही नहीं रहा, बल्कि मंदिर परिसर और पवित्र जलस्थलों से भी जुड़ा। भारतीय मंदिर शिल्प में नागों का अंकन कई बार देवता के साथ अधीनस्थ या सहायक रूप में दिखाई देता है, जबकि कुछ स्थानों पर वे स्वतंत्र रक्षक के रूप में उपस्थित हैं।
यहां एक गहरा सांस्कृतिक संकेत दिखाई देता है। जल जहां जीवन का आधार है, वहीं जलस्रोतों के आसपास सर्पों की प्राकृतिक उपस्थिति भी रही है। संभव है कि लोकजीवन के अनुभवों ने धीरे-धीरे जल और नाग के बीच धार्मिक संबंध को मजबूत किया हो। इसीलिए नाग पूजा में जल, वर्षा, उर्वरता और समृद्धि के भाव भी दिखाई देते हैं।

भारत के अनेक हिस्सों में नागों को उर्वरता और संतान प्राप्ति से जोड़ा गया है। दक्षिण भारत में नागशिलाओं की पूजा की परंपरा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पवित्र वृक्षों के नीचे स्थापित नाग प्रतिमाओं के सामने संतान और समृद्धि की कामना की जाती है। भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के अध्ययन में नाग पूजा को उर्वरता और समृद्धि से जुड़े अनुष्ठानों से भी जोड़ा गया है।
यह संबंध केवल धार्मिक कल्पना नहीं है। कृषि समाज के लिए वर्षा, जल, भूमि और फसल का आपसी संबंध जीवन-मरण का प्रश्न था। इसलिए जिन प्राकृतिक शक्तियों का संबंध जल और भूमि से माना गया, उन्हें सम्मान देने की परंपराएं विकसित हुईं।
नागों की उपस्थिति केवल हिंदू मंदिरों तक सीमित नहीं रही। बौद्ध कला में भी नाग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रारंभिक बौद्ध कला में नागों को रक्षक के रूप में चित्रित किया गया। बौद्ध कला में नाग मूलतः प्रकृति-आधारित संरक्षक आत्मा के रूप में उपस्थित थे और बाद में बुद्ध की शिक्षाओं के रक्षक के रूप में उनकी छवि विकसित हुई।
इसी प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप की धार्मिक कला में नागों के मानव-सर्प मिश्रित रूप भी मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि नाग की अवधारणा भारतीय कला में बहुत व्यापक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रही।
मंदिर शिल्प में नागों का उपयोग केवल धार्मिक कथाओं को दिखाने के लिए नहीं हुआ। सर्प का लहराता शरीर स्वयं एक अत्यंत प्रभावशाली अलंकरणात्मक रूप प्रदान करता था। उसके वक्र, कुंडल और फैले हुए फण पत्थर की सतह पर गतिशीलता पैदा करते हैं।
कहीं नाग द्वार या तोरण के आसपास दिखाई देता है, कहीं देवता के पीछे छत्र बनाता है और कहीं स्तंभ या पट्टिका पर सजावटी रूप में दिखाई देता है। इस प्रकार शिल्पकार ने प्राकृतिक जीव की आकृति को स्थापत्य की लय में बदल दिया।
नागकन्या या नाग-नागिन के मानवीय रूप भी इसी कलात्मक परंपरा का हिस्सा हैं। इनमें मानव और प्रकृति के बीच एक सांकेतिक संबंध दिखाई देता है। नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा भारत के अनेक क्षेत्रों में की जाती है।
नाग कभी शेष बनकर ब्रह्मांड को थामते हैं, कभी शिव के गले का आभूषण बनते हैं, कभी देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन का माध्यम बनते हैं और कभी मंदिर तथा जलस्रोतों के रक्षक के रूप में दिखाई देते हैं। कहीं वे उर्वरता और समृद्धि के प्रतीक हैं तो कहीं प्रकृति की रहस्यमय शक्ति के।
शायद यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी मंदिरों के पत्थरों पर उकेरे गए नाग हमें केवल एक जीव की आकृति नहीं दिखाई देते। वे भारतीय सभ्यता के उस विचार की याद दिलाते हैं, जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसी व्यापक जीवन-जगत का एक हिस्सा मानता था।
नाग पंचमी के अवसर पर मंदिरों में दिखाई देने वाले ये नाग इसलिए केवल शिल्प नहीं हैं। वे भारतीय संस्कृति की स्मृति में दर्ज सह-अस्तित्व, संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान की सनातन परम्परा है।
आचार्य ललित मुनि
