नक्सलमुक्त बस्तर में छलक उठा राष्ट्रप्रेम,
बच्चे, युवा और वृद्धों ने भी बढ़चढ़कर मनाया 80वां स्वतंत्रता दिवस
बस्तर के कई गांव में पहली बार फहराया तिरंगा
अकेले सुकमा जिले के 50 गांवों में पहली बार लहराया तिरंगा
नक्सल मुक्त बस्तर की बदलती तस्वीर,
ग्रामीणों के हाथों में दिखा राष्ट्रध्वज 
देश का 80वां स्वतंत्रता दिवस बस्तर के लिए ऐतिहासिक बन गया। नक्सलमुक्ति के बाद बस्तर के सुदूर गांवों में पहली बार स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराया गया। ग्रामीणों ने राष्ट्रगान के साथ जश्न मनाया। कभी घोर नक्सल प्रभावित रही कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर तिरंगा फहराया गया।
बस्तर का सुकमा जिले के 50 गॉंवों में स्वतंत्रता के दशकों बाद पहली बार ग्रामीणों ने अपने गांव में तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता का उत्सव मनाया। बस्तर के दुर्गम एवं कभी नक्सल हिंसा के गढ़ रहे 50 गांवों में इस बार पहली बार पूरे उत्साह और गर्व के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। चिंतागुफा, चिंतलनार, जगरगुंडा, किस्टाराम और कोंटा सहित विभिन्न थाना क्षेत्रों के गांवों में ग्रामीण एकत्र हुए, राष्ट्रगान गाया और तिरंगे को सलामी दी। कोंटा में सीआरपीएफ और डीएवी स्कूल ने हर घर तिरंगा रैली निकाली। दोरनापाल में बस्तर तिरंगा यात्रा स्वामी आत्मानंद स्कूल के बच्चों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया। इसमें 100 मीटर लंबा तिरंगा निकाला गया।

नारायणपुर में भी यही दृश्य दिखाई दिया। स्वतंत्रता के बाद पहली बार अबूझमाड़ के 9 गांवों में तिरंगा फहराया गया। दशकों से नक्सल हिंसा और भय के साये में रहे कोरसकोडो, हचेकोटी, आदनार, बोटेर, कुमनार, दिवालुर, गुंडेकोट, रेकापाल एवं रासमेटा गांवों में आजादी के बाद पहली बार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराया गया।
अबूझमाड़ के ये गांव लंबे समय तक घनघोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहे हैं और नक्सली गतिविधियों एवं शीर्ष नक्सल नेतृत्व के आश्रय स्थलों के रूप में जाने जाते थे। नक्सल हिंसा के कारण यहां के ग्रामीणों के लिए राष्ट्रीय पर्वों का आयोजन करना और खुले तौर पर तिरंगा फहराना लंबे समय तक संभव नहीं हो सका।
31 मार्च 2026 को क्षेत्र के नक्सलमुक्त होने के बाद यह पहला अवसर है, जब इन गांवों में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन कर पूरे सम्मान और उत्साह के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। गांवों में तिरंगा लहराने के साथ ही ग्रामीणों के चेहरों पर खुशी और गर्व का भाव देखने को मिला।
बस्तर के ताड़मेटला, जहां वर्ष 2010 में सीआरपीएफ के 76 जवान बलिदान हुए थे, वहां पूरे गांव ने राष्ट्रगान गाकर वातावरण को देशभक्ति से ओतप्रोत कर दिया। यहां दशकों पहले स्कूल खुलते ही नक्सलियों ने शिक्षक की हत्या कर दी थी। वर्ष भर पहले ही तिरंगा पहरने पर शिक्षादूत को नक्सलियों ने जनताना अदालत लगाकर मार डाला था। लेकिन नक्सलमुक्त होने के बाद लोगों ने स्वफूर्त स्वतंत्रता दिवस मनाया।

बात कोंडागांव की करें तो, यहां के अंतिम छोर तक तिरंगा लहराया। कोंडागांव की ग्राम पंचायत बेचा स्थित ग्राम कीलम, मंझानार, गुमियापाल, कुधुर, बेचा, नक्सलगढ़ माने जाने वाले ग्राम पंचायत तुमडीवाल के गांव बेडमा में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया।
दंतेवाड़ा के छिंदगढ़ में भी स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से मनाया गया। दंतेवाड़ा के दूरस्थ ग्रामों में स्कूलों और घरों में तिरंगा लहराया।
तिरंगा फहराने का यह दृश्य उन गांवों के लिए खास मायने रखता है, जहां कभी बंदूक और भय का साया था। आज उन्हीं गांवों में बच्चों की आवाज में राष्ट्रगान गूंज रहा है और ग्रामीण गर्व से तिरंगा फहरा रहे हैं। यह तस्वीर बताती है कि बस्तर में बदलाव केवल सड़कों और भवनों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों के मन में भी विश्वास और राष्ट्र के प्रति जुड़ाव मजबूत हो रहा है।
बस्तर के इन गांवों में पहली बार फहराया गया तिरंगा आने वाले समय के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। जहां बंदूक की जगह लोकतंत्र, भय की जगह विश्वास और अलगाव की जगह राष्ट्र की मुख्यधारा मजबूत हो रही है।
— प्रियंका कौशल
( वरिष्ठ पत्रकार)

