सावन मास हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित है। सावन के प्रत्येक सोमवार का विशेष महत्व होता है, लेकिन अंतिम सोमवार पर भक्ति की एक अलग ही लहर उमड़ पड़ती है। इस दिन देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ देखने को मिलती है।
सावन के अंतिम सोमवार को ‘सावन का अंतिम सोमवार’ या ‘अंतिम सोमवार व्रत’ के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। लोग इस दिन व्रत रखते हैं, जलाभिषेक करते हैं, बिल्वपत्र चढ़ाते हैं और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं। कई भक्त कांवड़ यात्रा पूरी करके गंगाजल चढ़ाने के बाद इस दिन मंदिर पहुँचते हैं।

देश के प्रमुख शिव मंदिरों—काशी विश्वनाथ, उज्जैन के महाकालेश्वर, सोमनाथ, त्र्यंबकेश्वर, केदारनाथ, भोलेनाथ मंदिरों तथा स्थानीय शिवालय—में इस दिन सुबह से ही लंबी कतारें लग जाती हैं। श्रद्धालुओं में युवा, बुजुर्ग, महिलाएँ और बच्चे सभी शामिल होते हैं। कई जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई जाती है, क्योंकि भीड़ अत्यधिक होती है। भक्त धूप, गर्मी और लंबी प्रतीक्षा को सहते हुए भी दर्शन का सुखद अनुभव लेते हैं।
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इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, रुद्राभिषेक, भंडारे और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। कई मंदिरों में रात भर जागरण भी रखा जाता है। श्रद्धालु दूध, दही, शहद, घी, गंगाजल और बिल्वपत्र से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। कुछ लोग सावन मास भर व्रत रखकर इस अंतिम सोमवार को पारणा करते हैं।सावन के अंतिम सोमवार की यह भीड़ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की सामूहिक भक्ति भावना को भी दर्शाती है। लोग अपनी समस्याओं, इच्छाओं और कृतज्ञता को लेकर भगवान शिव के सामने उपस्थित होते हैं। इस दिन की भक्ति में एक अद्भुत शांति और विश्वास छिपा होता है।
सावन के अंतिम सोमवार पर मंदिरों में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ हमें याद दिलाती है कि आस्था अभी भी समाज को जोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति है। भगवान शिव की कृपा सभी भक्तों पर बनी रहे—यही कामना है।

