हिंदी भाषा को लेकर राष्ट्र के कई प्रांतों में एक नई बहस छिड़ गई है। प्रांतीय भाषा सीखना व जानना स्वागतयोग्य है, लेकिन वो कहीं भी हिंदी पर हावी न हो, यह आवश्यक भी हो जाता है।
भारत देश विविधता में एकता का देश है, इस राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। यह विविधता केवल खान-पान, वेशभूषा, लोक परम्पराओं और धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की भाषाई विविधता भी उसकी पहचान है। देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं और प्रत्येक भाषा अपने भीतर हजारों वर्षों की स्मृतियां, साहित्य, लोकजीवन और सांस्कृतिक अनुभव समेटे हुए है। इसलिए भारत में भाषा का प्रश्न केवल संवाद का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, अस्मिता, संस्कृति और सामाजिक सम्मान से भी जुड़ा हुआ है।
भारत में संवैधानिक रूप से आठवीं अनुसूची के अनुसार 22 भाषाएं हैं, परंतु इसके अतिरिक्त 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 121 प्रमुख भाषाएं हैं, जिन्हें 10,000 या उससे अधिक लोग बोलते हैं। और देश में 19,500 से अधिक मातृभाषाएं या बोलियां भी बोली जाती हैं। इन सबसे मिलकर भारत का सांस्कृतिक वैभव सम्पन्न दिखाई देता है। हिंदी या अन्य बोली-भाषाओं के बीच भी रहने से भारत आंतरिक रूप से अखंड नहीं रह पाता और समय-समय पर भाषाई विवाद देश में जन्म लेते रहते हैं।
इसीलिए भाषा को लेकर होने वाली बहस में दो बातों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय उनके बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। हिंदी का व्यापक ज्ञान भारत के लिए उपयोगी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि किसी प्रांत की स्थानीय भाषा को समाप्त किया जाए। इसी प्रकार किसी राज्य की प्रांतीय भाषा का सम्मान आवश्यक है, लेकिन उसे देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले नागरिकों पर अनिवार्य रूप से थोपना भी उचित नहीं है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत में ऐसी भाषा-दृष्टि विकसित हो, जिसमें नागरिक अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व रखें, हिंदी को देशव्यापी संपर्क और संवाद की महत्त्वपूर्ण भाषा के रूप में सीखें तथा आवश्यकता और रुचि के अनुसार अन्य भारतीय भाषाओं का भी अध्ययन करें। भाषा प्रेम स्वाभाविक हो, भाषा का दबाव नहीं। भाषा तभी फलती-फूलती है जब उसके प्रति प्रेम पैदा किया जाए। किसी बच्चे को उसकी भाषा से प्रेम कराया जा सकता है, लेकिन केवल आदेश देकर भाषा के प्रति आत्मीयता पैदा नहीं की जा सकती। हिंदी के विस्तार के लिए भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए।
यदि हम चाहते हैं कि दक्षिण भारत का नागरिक हिंदी सीखे, तो हमें हिंदी को रोजगार, व्यापार, तकनीक, पर्यटन, साहित्य, सिनेमा और सांस्कृतिक संवाद से जोड़ना होगा। यदि हिंदी सीखने से किसी विद्यार्थी को अधिक अवसर मिलते हैं, किसी व्यापारी को नए बाजार मिलते हैं, किसी पत्रकार को व्यापक पाठक मिलते हैं या किसी युवा को दूसरे राज्यों में रोजगार के अवसर मिलते हैं, तो हिंदी अपने आप आकर्षण का केंद्र बनेगी। इसके विपरीत यदि हिंदी को केवल प्रशासनिक आदेश या राजनीतिक आग्रह के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, तो उससे स्वाभाविक भाषा-स्वीकार्यता के बजाय प्रतिरोध पैदा हो सकता है। इसलिए हिंदी के विस्तार का सबसे प्रभावी मार्ग प्रेम, उपयोगिता और अवसर है।
कर्नाटक भाषा के प्रश्न पर विशेष संवेदनशील राज्य रहा है। यहां देश के दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में लोग शिक्षा, रोजगार और व्यापार के लिए आते हैं। कर्नाटक में आने वाला व्यक्ति कन्नड़ भाषा और संस्कृति का सम्मान करे। यदि कोई व्यक्ति लम्बे समय तक वहां रहता है और कन्नड़ सीखना चाहता है तो यह उसके लिए स्थानीय समाज से जुड़ने का सुंदर माध्यम हो सकता है। दूसरी ओर यह भी विचारणीय है कि क्या किसी दूसरे राज्य से आए व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कन्नड़ को अनिवार्य रूप से स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए? यहीं से स्वैच्छिक भाषा-शिक्षण और अनिवार्य भाषा-व्यवस्था के बीच अंतर महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
यही हाल महाराष्ट्र का भी है, मराठी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। यहां महाराष्ट्र के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, दक्षिण भारत और देश के अन्य हिस्सों से आए लोग लम्बे समय से रहते और काम करते रहे हैं। मुम्बई में काम करने वाले लोग अन्य भाषा-भाषी प्रांत से भी है, और मुम्बई की आर्थिक रीढ़ बॉलीवुड और फिल्म उद्योग पर टिकी हुई है। उसमें काम करने वाले लोग अन्य राज्यों से भी है और यहां तक कि मुम्बई में बनने वाली फिल्में देश के अन्य हिंदी भाषी राज्यों में भी देखी जाती हैं और वहीं से उन्हें पैसा भी मिलता है। ऐसे में यदि अन्य राज्यों ने मुम्बई में निर्मित फ़िल्मों को अपने प्रदेश में दिखाने पर रोक लगा दी तो क्या वे हिंदी फिल्में जिंदा रहेंगी? ऐसे में कुछ राजनैतिक लोगों के कारण केवल बैर ही बढ़ेगा।
मुम्बई का चरित्र ही बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक रहा है। ऐसी स्थिति में मराठी का सम्मान करना आवश्यक है। महाराष्ट्र में रहने वाले व्यक्ति को स्थानीय भाषा और संस्कृति से परिचित होना चाहिए। यह सामाजिक सद्भाव को बढ़ाता है।
लेकिन दूसरी ओर मुम्बई में आने वाले हर व्यक्ति के लिए यह अपेक्षा कि वह तत्काल और हर परिस्थिति में मराठी को अनिवार्य रूप से अपनाए, व्यावहारिक और संवैधानिक दृष्टि से व्यापक बहस का विषय बन जाता है। भारत सरकार को राज्यों के इस तरह भाषाई उग्रवाद को समाप्त करने की दिशा में प्रयास करने चाहिए और एक भाषा के सूत्र के साथ प्रांतों की भाषाई राजनीति को समाप्त कर सद्भाव बढ़ाना चाहिए।
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हस्ताक्षर बदलो अभियान और भारत
भारत में एक अभियान यह भी चल रहा है जिसमें अपने हस्ताक्षर अन्य भाषा से हिंदी भाषा में अथवा भारतीय भाषा में करने का आग्रह है। इस अभियान का उद्देश्य है कि भारतीयों में अंग्रेजी को अपने जीवन के परिचय से कम कर अपनी निज भाषा के अभिमान में वृद्धि की जाएं। मातृभाषा उन्नयन संस्थान ने इस अभियान के माध्यम से अब तक 40 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर अन्य भाषा से हिंदी में बदलवा दिए है। व्यक्ति अपने हस्ताक्षर जब निज भाषा में करता है तो उसका भाषाई प्रेम भी प्रदर्शित होता है। |
डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

