शिक्षक को विद्यार्थियों के सामने हिंदी बोलने को हीनता का विषय नहीं बनने देना चाहिए। यदि कक्षा में हिंदी का प्रयोग केवल कमजोर विद्यार्थियों से जोड़ दिया जाएगा तो बच्चों में उसके प्रति नकारात्मक धारणा विकसित होगी।
भाषा केवल विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह व्यक्ति की संस्कृति, परम्परा, सामाजिक स्मृति और पहचान से भी गहराई से जुड़ी होती है। किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी भाषा में निहित होती है, क्योंकि भाषा के माध्यम से व्यक्ति अपने परिवेश, परिवार और समाज को सबसे सहज रूप से समझता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषाओं का महत्व और भी अधिक है। हिंदी भारत में व्यापक रूप से समझी और बोली जाने वाली भाषाओं में प्रमुख स्थान रखती है। इसके बावजूद वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के सामने अनेक चुनौतियां दिखाई दे रही हैं। विशेष रूप से निजी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम के बढ़ते प्रभाव ने भाषा को लेकर बच्चों, अभिभावकों और समाज की सोच में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है। अंग्रेजी, ज्ञान और आधुनिक शिक्षा का पर्याय बनती जा रही है, जबकि हिंदी को कई बार पिछड़ेपन अथवा कम अवसरों से जोड़कर देखा जाने लगा है।
भारत में शिक्षा व्यवस्था ने समय के साथ अनेक परिवर्तन देखे हैं। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजी को प्रशासन, उच्च शिक्षा और रोजगार की भाषा के रूप में स्थापित किया गया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय भाषाओं को शिक्षा में उचित स्थान देने के प्रयास हुए, लेकिन अंग्रेजी का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव लगातार बना रहा। उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद अंग्रेजी के प्रति आकर्षण और अधिक बढ़ा। सूचना प्रौद्योगिकी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, उच्च शिक्षा तथा वैश्विक रोजगार के अवसरों ने अंग्रेजी को उपयोगी और आवश्यक भाषा के रूप में स्थापित किया। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि अंग्रेजी सीखने से विद्यार्थियों को वैश्विक ज्ञान और संचार के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब अंग्रेजी सीखने की प्रक्रिया हिंदी के प्रति हीन भावना पैदा करने लगे।
आज अनेक निजी विद्यालयों में अंग्रेजी बोलने पर विशेष जोर दिया जाता है। अंग्रेजी बोलना विद्यार्थियों की योग्यता, आधुनिकता और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है। कई विद्यालयों में विद्यार्थियों को विद्यालय परिसर में हिंदी बोलने से हतोत्साहित किया जाता है। परिणामस्वरूप कुछ बच्चे अपने मित्रों अथवा शिक्षकों के सामने हिंदी बोलने में संकोच करने लगते हैं। वे अंग्रेजी के कुछ शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करके स्वयं को अधिक आधुनिक दिखाने का प्रयास करते हैं। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब बच्चा हिंदी भाषा में विचार व्यक्त करने को लेकर असहज अनुभव करने लगे। भाषा सीखना समस्या नहीं है, समस्या तब है जब एक भाषा का ज्ञान दूसरी भाषा के प्रति उपेक्षा या शर्म का कारण बन जाए।
प्रारम्भिक अवस्था में बच्चा जिस भाषा में सोचता और अपने अनुभवों को समझता है, उसी भाषा में जटिल अवधारणाओं को ग्रहण करना उसके लिए अपेक्षाकृत सरल होता है। यदि शिक्षा की भाषा बच्चे के घरेलू और सामाजिक वातावरण से पूरी तरह अलग हो, तो उसे विषय-वस्तु के साथ-साथ भाषा को समझने का अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है। इससे कई बार सीखने की गति और अभिव्यक्ति दोनों प्रभावित होती हैं। हिंदी भाषी क्षेत्रों में यदि विद्यार्थियों को हिंदी के साथ अंग्रेजी का संतुलित ज्ञान दिया जाए तो वे दोनों भाषाओं में दक्ष हो सकते हैं। इसलिए आवश्यकता हिंदी और अंग्रेजी में संघर्ष पैदा करने की नहीं, बल्कि दोनों भाषाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अंग्रेजी का विरोध करना समाधान नहीं है। आज के वैश्विक परिवेश में अंग्रेजी का ज्ञान विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है। विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय संचार के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेजी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए विद्यार्थियों को अंग्रेजी से दूर रखना उचित नहीं होगा। वास्तविक आवश्यकता यह है कि अंग्रेजी सीखने के साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान भी बनाए रखा जाए। बहुभाषिकता को कमजोरी नहीं, बल्कि क्षमता के रूप में स्वीकार करना होगा। एक विद्यार्थी अंग्रेजी में दक्ष होने के साथ-साथ हिंदी में भी उत्कृष्ट अभिव्यक्ति कर सकता है।
हिंदी के सामने एक अन्य चुनौती यह है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की पर्याप्त सामग्री हिंदी में उपलब्ध होने के बावजूद विद्यार्थियों और शिक्षकों में उसके उपयोग की प्रवृत्ति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अंग्रेजी का प्रभुत्व अभी भी काफी अधिक है। यदि हिंदी को ज्ञान-विज्ञान, अनुसंधान और रोजगार की भाषा के रूप में मजबूत करना है तो गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों, शोध सामग्री, डिजिटल संसाधनों और तकनीकी शब्दावली का निरंतर विकास आवश्यक है। केवल हिंदी दिवस अथवा हिंदी पखवाड़े के आयोजन से हिंदी भाषा का विकास सम्भव नहीं है। हिंदी को दैनिक शैक्षणिक और बौद्धिक गतिविधियों का स्वाभाविक हिस्सा बनाना होगा।
अभिभावकों की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक अभिभावक अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में इसलिए भेजना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे बच्चे के भविष्य में अधिक अवसर उपलब्ध होंगे। उनकी आकांक्षा स्वाभाविक है और इसे गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन अंग्रेजी माध्यम का चयन करते समय हिंदी और मातृभाषा को घर से बाहर कर देना उचित नहीं है। परिवार बच्चों के साथ हिन्दी में बातचीत, कहानी, कविता, लोकगीत और साहित्य के माध्यम से उनकी भाषायी क्षमता को मजबूत कर सकता है। यदि घर और विद्यालय दोनों मिलकर बच्चे में भाषायी आत्मविश्वास विकसित करें तो वह एक से अधिक भाषाओं में बेहतर दक्षता प्राप्त कर सकता है।
-डॉ ताड़केश्वर नाथ मिश्र
