‘हनुमान अंश’ ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा दिया है। फिल्म की सफलता के पीछे बाबा नीम करौली के प्रति लोगों की गहरी आस्था के साथ-साथ उसके देसी और कर्णप्रिय गीत सबसे बड़ा कारण बताया जा रहा है।
फिल्मी दुनिया के दिग्गज आश्चर्यचकित हैं कि न तो भव्य सेट्स, न एआई, न बड़े स्पेशल इफेक्ट्स॥ बड़ा तो छोड़िए, अनिल रस्तोगी के सिवा कोई जाना पहचाना चेहरा भी नहीं। चमत्कारों की कहानी तो है, लेकिन कहानी चमत्कारिक कतई नहीं। ‘हनुमान अंश’ ने फिल्मी दुनिया से तमाम रिकॉर्ड्स तोड़ दिए हैं। 5वें वीकेंड (सप्ताहांत) में इस फिल्म ने 45.60 करोड़ रुपए कमाए, जबकि इसके मुकाबले धुरंधर ने केवल 35.80 करोड़ रुपए, छावा ने 22 करोड़ रुपए, पुष्पा ने 16 करोड़ और सबसे ज्यादा चर्चित धुरंधर 2 ने तो केवल 12.75 करोड़ रुपए ही कमा पाए थे। दिग्ग्ज मान रहे हैं इसके पीछे एक बड़ा कारण तो लोगों की बाबा नीम करौरी के प्रति अगाध आस्था है।
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लेकिन केवल यही कारण माना जाए तो इसी साल 29 मई को एक और फिल्म रिलीज हुई थी, नाम था ‘श्री बाबा नींब करौरी महाराज’ इसमें मिलिंद गुणाजी, राजेश शर्मा और हेमंत पांडेय जैसे जाने पहचाने चेहरे भी थे, लेकिन कहां गई कितने कमाए, जवाब ढूंढ़े नहीं मिल रहे। जानकार मानते हैं कि बाबा में आस्था के अलावा बड़ा कारण फिल्म के गीत भी थे, उनके बोलों पर तो जमकर शोध और मेहनत हुई ही, उनका देसज संगीत और गाने वाली आवाजें भी हृदय के अंदर उतर गईं।
फिल्म में 12 गाने हैं और जिनमें 3 तो जबरदस्त वायरल हो गए हैं, और ये देसी अंदाज के बुंदेलखंडी आवाज में कम्पोज हुए गाने भारतीय संस्कृति को एक सुरीले अंदाज में सामने लाते हैं और आम जनता को सीधे जोड़ देते हैं।
जब जिद पर आ गईं पार्वती.. पार्वती पार्वती
समझाने पहुंचे सप्तऋषि… सप्तऋषि सप्तऋषि
काहे जिद कर रईं, काहे को मर रहीं
ऐसे वर के लाने
जाके शीश पर गंगा और गले में डारे फिर रहे सांप
इतने सीधे साधे हैं, सब कहते भोले नाथ.
आपको इस गीत में ‘राधा कैसे ना जले’ जैसा जुड़ाव देखने को मिलेगा और इस गीत को ठीक उस जगह रखा गया है जहां बाबा की पत्नी 15 साल बाद मिली हैं और नहीं चाहतीं कि वो वापस जाकर हनुमान भक्ति में रमें और हनुमानजी के भक्तों को तो ये फिल्म एक ऐसा देसी मधुर गीत देती है, जो आम जनता के अंदर तक घुस गया है, जिनको हनुमान चालीसा याद नहीं होता, उनके लिए भी ये रामवाण बन गया है, बोल भी आसान और संगीत भी कर्णप्रिय. बोल पढ़िए
हो मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान
सागर में नैया डार दई।
अरे काहे की वा नाव बनाई, काहे की पतवार
रामा काहे की लगा दई जंजीर..
सागर में नैया डार दई।
यानी एक बिना पढ़ा लिखा व्यक्ति भी हनुमान जी से ऐसे बात कर रहा है, जैसे किसी मित्र से कर रहा हो। आवाज तो बेहद ही विशेष है. दरअसल ये गीत बुंदेलखंड से गुजरने वाली ट्रेनों तो कभी नाव में बैठकर गाने वाले सुनील लोधी का है, फिल्म में उन्हीं से गवाया गया है। फिलहाल वो इंटरनेट सेंसेशन बन गए हैं। ऐसे ही तीसरा गाना ‘आवागमन’ भी बहुत वायरल हो रहा है. जिसमें भोले शंकर से मोक्ष की बात देसी अंदाज के गीता ज्ञान से की गई है। गाने की मूल लाइन है आवागमन मिटा दो भोले शंकर। हिंदुत्व का दर्शन है कि इस जन्म मृत्यु के फेरे से निकालकर मोक्ष दे दो भगवान।
इन तीनों में से बाकी के दो गीत ‘आवागमन’ और ‘जिद पर आ गई पार्वती’ बुंदेलखंड के ही साधु सुशील तिवारी ने ही गाए और संगीतबद्ध किए हैं। उन्होंने 12 में से कुल 5 गाने तैयार किए हैं। कई तरह की बोलियां बोलने वाले लोगों का भी आकर्षण इस फिल्म के प्रति इस कारण से बढ़ा है। बाबा किशोरावस्था में राजकोट में रहे, तो गुजरातियों पर फिल्माए गए दृश्य हैं, बाबा फर्रुखाबाद के नींव करोरी से जुड़े तो वहां के लोगों को तो उस आश्रम के कारण भी विशेष लगाव है, उत्तराखंड का कैंची धाम तो उनका सबसे चर्चित आश्रम है ही. वहीं वो ब्रज में पैदा हुए थे, सो उनके पिता की भूमिका में फर्राटेदार ब्रज भाषा बोलने वाले कलाकार को लिया गया है।

‘हनुमान अंश’ के सपने की नींव डॉ विशाल चर्तुवेदी ने अपनी किताब ङ्गद डीटॉर: दैट चेंजड माई लाईफ’ से जुड़े शोध के लिए 2009 में रखी थी. किताब आने के बाद उन्होंने तीन भागों में बाबा के जीवन को परदे पर उतारने की रणनीति बनाई और ये पहला भाग है, जहां बाबा के बचपन, शादी, नींब करौरी आश्रम की स्थापना से लेकर कैंची धाम के क्षेत्र में पहुंचने तक की कहानी है। इस फिल्म में उनकी आध्यात्मिक यात्रा की शुरूआत और बचपन से ही चमत्कारों की श्रृंखला को दिखाया गया है। कोई और कलाकार बाबा की भूमिका को करने वाला था, लेकिन प्रोडक्शन में सहायक के तौर पर काम कर रहे शोभिनव सत्य पर शायद बाबा की कृपा ही थी कि उनको मिल गया और फिर इतिहास बन गया है। वो जितनी सादगी के साथ बाबा की तरह ही हास्य विनोद करते हैं, भक्तों को बाबा ही लगने लगे हैं।

फिल्म की शुरूआत एक पुराने क्रांतिकारी और बाबा के भक्त राम नंदन भोंसले (चंदन आनंद) बच्चों को बाबा की कहानी सुनाने से करते हैं कि कैसे बचपन में मां की मृत्यु से आहत होकर बालक लक्ष्मी नारायण (विहान) घर छोड़ देता है। तप के जरिए हनुमानजी को प्रसन्न कर श्रीराम से मिलना चाहता है, ताकि मां से मिल सके। ऐसे में राजकोट के एक आश्रम में महंत (अनिल रस्तोगी) से मिलना, महंत का बच्चे के अंदर सिद्धियां अनुभव करना दिलचस्प है। धीरे-धीरे आवश्यकता पड़ने पर वो बालक कई चमत्कार करता है, धीरे धीरे उसकी प्रसिद्धि बढ़ती चली जाती है।
नींब करौरी में जब एक अंग्रेज अफसर युवा बाबा को फर्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट से उतरने को मजबूर कर देता है, तो ट्रेन भी मानो आगे बढ़ने से मना कर देती है। आखिरकार अफसर माफी मांगकर उन्हें उस जगह पर रेलवे स्टेशन बनाने का वायदा करता है। पिता का 15 साल बाद मिलना और बचपन के विवाह की याद दिलाना और फिर पत्नी से संवाद के दृश्य काफी अच्छे बन पड़े हैं। विशेषतौर पर हर बड़ी घटना से जोड़कर तैयार किया गया गीत उस दृश्य को बड़ा बना देता है।
विष्णु शर्मा

