ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर एक छात्र राजनीति की साहसी नायिका से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने और वर्तमान समय में घोर राजनीतिक व कानूनी संकटों से घिरने तक की एक बड़ी दास्तान है। जो ‘दीदी’ कभी सड़कों पर वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाने के लिए जानी जाती थीं, वे आज अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं।
वर्तमान परिस्थितियों में ममता बनर्जी पर मुश्किलों के पहाड़ टूटने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं- पहला, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगा, जहाँ उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हार का सामना करना पड़ा और राज्य में भाजपा की सरकार बनी। खुद ममता बनर्जी को भी अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से शुभेंदु अधिकारी के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी।
/theprobe/media/media_files/2026/06/26/mamata-banerjee-2026-06-26-01-31-09.jpg)
15 साल तक राज्य पर राज करने के बाद सत्ता से बाहर होना उनके राजनीतिक पतन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। दूसरा, ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत हमेशा उनकी पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ थी। लेकिन वर्तमान में टीएमसी के भीतर एक बड़ी बगावत छिड़ गई है। कई विधायकों और सांसदों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और पार्टी में तानाशाही रवैये को लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया है, जिससे पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है।
तीसरा, ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा कानूनी और भावनात्मक झटका तब लगा जब चुनाव आयोग ने पार्टी में आंतरिक विवाद के कारण तृणमूल कांग्रेस के नाम और उनके प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘जोड़ा फूल’ को फ्रीज (रोक लगा दी) कर दिया। आयोग ने दोनों गुटों को अस्थाई रूप से नए नाम और सिंबल दिए हैं। ममता बनर्जी ने इसे भारतीय लोकतंत्र का ‘काला दिन’ बताया है और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

चौथा, सत्ता से हटते ही ममता बनर्जी के खिलाफ कानूनी शिकंजा लगातार कसता जा रहा है- चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ और सांप्रदायिक बयान देने के आरोप में उनके खिलाफ कोलकाता और सिलीगुड़ी में एफआईआर दर्ज की गई हैं।
अगस्त 2026 में कोलकाता में छात्र संगठन (टीएमसीपी) की रैली के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में भी पुलिस ने उन पर मामला दर्ज किया है। उनकी पिछली सरकार पर एक विज्ञापन एजेंसी को रु. 635 करोड़ से अधिक का टेंडर देने में गड़बड़ी जैसे भ्रष्टाचार के नए आरोप लग रहे हैं।
पांचवां, ममता बनर्जी ने हमेशा खुद को जनता की लड़ाई लड़ने वाली और महिलाओं के अधिकारों की रक्षक के रूप में पेश किया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य में हुए महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनके विवादित बयानों और भ्रष्टाचार के मामलों (जैसे शिक्षक भर्ती घोटाला आदि) ने उनकी छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया।
जनता में पैदा हुए इसी आक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। संघर्ष की नायिका का वर्तमान रुख, इन सब मुश्किलों के बावजूद, 17 साल की उम्र में दूध के बूथ और स्टेनोग्राफर का काम करके अपने परिवार को संभालने वाली ममता बनर्जी ने हार मानने से साफ इनकार किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे राजनीतिक संन्यास नहीं लेंगी और वे इस ‘गंदे खेल’ के खिलाफ सड़कों पर उतरकर लड़ाई जारी रखेंगी। आगामी उपचुनावों के लिए उन्होंने रणनीति बदलते हुए कांग्रेस उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा भी की है।
भारतीय राजनीति के इतिहास में ममता बनर्जी का नाम एक ऐसी जननेता के रूप में दर्ज रहा है, जिन्होंने शून्य से उठकर जन आंदोलनों के बल पर दशकों पुरानी राजनीतिक संरचनाओं को हिला दिया। छात्र राजनीति के समय से ही उनकी पहचान एक बेबाक और निर्भीक व्यक्तित्व के रूप में रही है। तीन दशकों से अधिक लंबे वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने वाली दीदी ने पूरे पंद्रह वर्षों तक पश्चिम बंगाल की सत्ता पर एकछत्र राज किया। परंतु समय का चक्र ऐसा घूमा है कि वही जुझारू नेत्री आज अपनी ही राजनीतिक यात्रा के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं।
हालिया विधानसभा चुनावों में मिली पराजय, दल के भीतर भड़की बगावत, चौतरफा वैधानिक कार्यवाहियों का शिकंजा और दल की मूल पहचान यानी नाम तथा चुनाव चिह्न का छिन जाना, इन सबने मिलकर उनके समक्ष अस्तित्व रक्षा की अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी है। हाल के विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बड़े मोड़ के रूप में सामने आए। पंद्रह वर्षों के निरंतर शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस को जन-असंतोष और प्रचंड विरोध का सामना करना पड़ा। चुनावी नतीजों में न केवल उनकी पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी, बल्कि ममता बनर्जी को स्वयं अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से पराजय का स्वाद चखना पड़ा। इस परिणाम ने यह सिद्ध कर दिया कि राज्य में बदलाव की लहर अत्यधिक तीव्र थी।
निरंतर शासन से उपजी असंतुष्टि, विभिन्न भर्ती घोटालों के आरोप तथा स्थानीय स्तर पर उपजे जन-रोष ने मिलकर उनकी दलगत जड़ों को कमजोर कर दिया, जिससे राज्य में एक नए राजनीतिक समीकरण का उदय हुआ। किसी भी क्षेत्रीय दल की वास्तविक शक्ति उसका सुदृढ़ संगठन, शालीन भाषा, लोकतांत्रिक मर्यादा और नेतृत्व के प्रति अटूट निष्ठा होती है। तृणमूल कांग्रेस में लगभग तीन दशकों तक ममता बनर्जी ही सर्वमान्य चेहरा और अंतिम निर्णयकर्ता रहीं। किंतु चुनावी असफलता के उपरांत पार्टी के भीतर दबा हुआ असंतोष अचानक बाहर आ गया। विधायकों और सांसदों के एक बड़े धड़े ने शीर्ष नेतृत्व की कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए।
तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद दोनों गुटों द्वारा अधिकार जताए जाने के कारण आयोग को कड़ा कदम उठाना पड़ा। वर्षों पूर्व जिस पहचान को उन्होंने अपने कड़े परिश्रम और संघर्ष से सींचा था, उसी से वंचित हो जाना उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संवैधानिक झटका माना जा रहा है। यद्यपि उन्होंने इस निर्णय को लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध बताते हुए शीर्ष अदालत का द्वार खटखटाया है, परंतु तत्काल रूप से इस स्थिति ने दल के कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस पैदा कर दिया है।
सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी बहुआयामी कानूनी चुनौतियों से भी घिर गई हैं। चुनावी अभियानों के दौरान दिए गए बयानों को लेकर उनके खिलाफ विभिन्न स्थानों पर प्राथमिक दर्ज कराई गई हैं। जनसभाओं और रैलियों के संचालन में उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन तथा व्यवस्था बिगाड़ने के आरोपों में भी दंडात्मक कार्यवाहियाँ शुरू की गई हैं। ये तमाम कानूनी उलझनें न केवल उनकी प्रशासनिक छवि पर प्रश्न खड़े करती हैं, बल्कि उन्हें राजनीतिक पुनर्निर्माण के स्थान पर कानूनी बचाव की मुद्रा में ला खड़ा करती हैं।
ममता बनर्जी की वास्तविक पूंजी उनकी साख थी, जो एक साधारण, त्यागपूर्ण और आम जनता की रक्षक के रूप में बनी थी। जनाक्रोश और सत्ता-विरोधी लहर ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया। इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों में पली-बढ़ी ममता बनर्जी ने आसानी से घुटने न टेकने का संकल्प दोहराया है। राजनीति से संन्यास लेने की बातों को खारिज करते हुए उन्होंने पुनः जन-सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने का मार्ग चुना है। वर्तमान परिस्थितियों में उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए अन्य विपक्षी दलों के साथ हाथ मिलाना शुरू किया है। नंदीग्राम उपचुनाव में अपने प्रत्याशी का नाम वापस लेकर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन करना इसी रणनीति का भाग है।
संक्षेप में कहा जाए तो ममता बनर्जी का वर्तमान समय उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कसौटी पूर्ण परीक्षा का काल है। एक ओर दल में टूट, नाम व प्रतीक का स्थगन और मुकदमों का अंबार है, तो दूसरी ओर अपनी खोई साख को पुनः प्राप्त करने की विशाल चुनौती। इतिहास साक्षी है कि वे संकटों से उभरकर वापसी करने में माहिर रही हैं, किंतु इस बार चुनौती केवल राजनीतिक विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनी ही बिखरी हुई विरासत को समेटने की है। अब यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने जनआंदोलन की पुरानी शैली के बल पर इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेद पाती हैं या नहीं।
– ललित गर्ग
