पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के संपूर्ण वाङ्मय में “लोकमत परिष्कार” की अवधारणा को लोकतंत्र की शुद्धि, मर्यादा और उसकी सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। वाङ्मय के विभिन्न खंडों में से केवल “लोकमत परिष्कार” विषय से संबंधित संदर्भों का पृष्ठवार (अंकों में) और संदर्भ के साथ संकलित विवरण नीचे दिया गया है:

1. खंड 10 (Volume 10)
इस खंड में मुख्य रूप से चुनावों की पृष्ठभूमि में मतदाताओं को जागरूक करने और राजनीतिक दलों के कर्तव्यों के रूप में ‘लोकमत परिष्कार’ की चर्चा की गई है:
● पृष्ठ 11 (संपादकीय)
संदर्भ: वर्ष 1962 के तृतीय आम चुनावों की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए संपादक लिखते हैं कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी चुनाव (निर्वाचन पर्व) को ‘लोकमत परिष्कार’ का सबसे उपयुक्त और सर्वोत्तम अवसर मानते थे। मतदाताओं को जागरूक करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘ऑर्गनाइज़र’ और ‘पाञ्चजन्य’ पत्रिकाओं में ‘आपका मत’ शीर्षक से 9 लेखों की एक लंबी वैचारिक लेखमाला लिखी थी, ताकि जनता अपने मत के मूल्य को समझ सके।

● पृष्ठ 19 (भूमिका – ‘दीनदयालजी का राजनीतिक प्रबोधन’)
संदर्भ: लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं के प्रबोधन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए यहाँ लिखा गया है कि देश का साधारण मतदाता ही वास्तविक भाग्यविधाता और देव स्वरूप है। इसी प्रसंग में दीनदयाल जी लिखते हैं कि “‘लोकमत परिष्कार’ प्रत्येक राजनीतिक दल का एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।” राजनीतिक दलों का वास्तविक कार्य केवल चुनाव जीतना या उम्मीदवार खड़े करना नहीं, बल्कि जनता के चिंतन और व्यावहारिक व्यवहार के स्तर को ऊपर उठाना है।
आपका मत’ लेखमाला और लोकमत परिष्कार
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा लिखित ‘आपका मत’ लेखमाला भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में मतदाताओं के प्रबोधन, लोकमत परिष्कार और राजनीतिक चेतना के प्रसार को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज है। वर्ष 1962 के तृतीय आम चुनावों के ऐतिहासिक अवसर पर मतदाताओं को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से उन्होंने यह विशिष्ट लेखमाला लिखी थी।
लेखमाला की पृष्ठभूमि
● चुनाव और लोकमत परिष्कार: पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी चुनाव (निर्वाचन पर्व) को केवल मतों के गणित या राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि चुनाव का समय संपूर्ण राष्ट्र में विचारों के आदान-प्रदान, लोक-संस्कार और ‘लोकमत परिष्कार’ का सबसे उपयुक्त तथा योग्यतम अवसर होता है।
● प्रकाशन: मतदाताओं को जागरूक करने के पावन ध्येय से दीनदयाल जी ने तत्कालीन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘ऑर्गनाइज़र’ (Organiser) और ‘पाञ्चजन्य’ में ‘आपका मत’ शीर्षक से नौ लेखों की एक लंबी श्रृंखला लिखी थी।
लेखमाला के सभी 9 लेखों का विस्तृत विवरण
1. आपका मत-1: “मताधिकार कागज़ का टुकड़ा नहीं, लोकाज्ञा है”
● प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 29 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 57)
● संदर्भ: इस प्रथम लेख में दीनदयाल जी स्पष्ट करते हैं कि लोकतंत्र में मताधिकार कोई मामूली कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह मतदाता की ओर से एक पवित्र ‘लोकाज्ञा’ (जनता का आदेश) है। वे मतदाताओं का प्रबोधन करते हुए कहते हैं कि मतदाता देश का भाग्यविधाता और देव स्वरूप है, इसलिए उसे अपने मत का प्रयोग बिना किसी प्रलोभन या दबाव के, केवल देशहित में अपने सद्विवेक और अंतरात्मा की पुकार पर करना चाहिए।
2. आपका मत-2: “मतदाता समय की चुनौती का उत्तर देंगे?”
● प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 5 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 63)
● संदर्भ: द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों के समाप्त होने की पृष्ठभूमि में दीनदयाल जी मतदाताओं को सचेत करते हैं कि अब उन्हें बहुत सोच-समझकर अपने प्रतिनिधियों का चयन करना होगा। वे ‘बिजली के खंभे का युग बीत गया’ उपशीर्षक के अंतर्गत कांग्रेस के प्रति अंध-समर्थन की तीखी आलोचना करते हैं और मतदाताओं से अपील करते हैं कि वे केवल प्रत्याशियों के व्यक्तिगत गुणों को न देखें, बल्कि एक अच्छे, अनुशासित और सिद्धांतवादी दल को चुनें।

3. आपका मत-3: “दक्षिणपंथ व वामपंथ के आधार पर दलों का विभाजन अनुचित”
● प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 12 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 70)
● संदर्भ: इस लेख में वे पाश्चात्य राजनीतिक शब्दावली ‘दक्षिणपंथ’ (Right-wing) और ‘वामपंथ’ (Left-wing) के आधार पर भारतीय राजनीतिक दलों के वर्गीकरण को भ्रामक और अनुचित मानते हैं। उनका तर्क है कि भारतीय राजनीति को विदेशी ढाँचों या वैचारिक नकल के सहारे चलाने के बजाय भारत के मूल राजदर्शन और प्राचीन संस्कृति के आधार पर परिष्कृत किया जाना चाहिए।
4. आपका मत-4: “राष्ट्र की सुरक्षा के प्रश्न को सर्वोपरि महत्त्व दिया जाए”
● प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 22 जनवरी, 1962 [मूल रूप से ऑर्गनाइज़र में 25 दिसंबर, 1961 को प्रकाशित] (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 18)
● संदर्भ: चीन द्वारा भारतीय सीमाओं के अतिक्रमण की गंभीर पृष्ठभूमि में लिखा गया यह लेख देश की बाह्य सुरक्षा और अखंडता पर केंद्रित है। दीनदयाल जी चेतावनी देते हैं कि जो दल या नेता देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति उदासीन हैं, वे राष्ट्र का कल्याण नहीं कर सकते। वे सेना के आधुनिकीकरण और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को चुनावी विमर्श का मुख्य मुद्दा बनाने पर बल देते हैं।
5. आपका मत-5: “अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की संज्ञाएँ घातक हैं”
● प्रकाशन: पाञ्चजन्य, 15 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 8)
● संदर्भ: वे स्पष्ट करते हैं कि भारत ‘एक राष्ट्र और एक संस्कृति’ की भूमि है। समाज को राजनीतिक लाभ के लिए ‘अल्पसंख्यक’ और ‘बहुसंख्यक’ जैसी कृत्रिम व सांप्रदायिक संज्ञाओं में विभाजित करना राष्ट्र की एकात्मता के लिए अत्यंत घातक है। वे तत्कालीन कांग्रेस सरकार की अवसरवादी और तुष्टीकरण की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए राष्ट्रीय एकता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
6. आपका मत-6: “उद्देश्य में समानता परंतु साधनों में विचलन”
● प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 15 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 14)
● संदर्भ: इस लेख में विभिन्न राजनीतिक दलों (कांग्रेस, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ) के चुनावी घोषणा-पत्रों और उनकी आर्थिक नीतियों (समाजवाद बनाम पूँजीवाद) का गहरा तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। वे भारतीय जनसंघ के विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल को देश की आवश्यकताओं के अनुकूल बताते हैं।
7. आपका मत-7: “योजनाओं के प्रति भारतीय जनसंघ का दृष्टिकोण व्यावहारिक”
● प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, गणतंत्र दिवस विशेषांक, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 38)
● संदर्भ: देश के योजनाबद्ध विकास (पंचवर्षीय योजनाओं) पर चर्चा करते हुए दीनदयाल जी लिखते हैं कि विकास और तकनीक का ढाँचा विदेशों से आयातित होने के बजाय देश की सांस्कृतिक मर्यादा और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए। वे भारी उद्योगों के स्थान पर लघु व कुटीर उद्योगों और कुटीर औद्योगिकीकरण को प्राथमिकता देने की वकालत करते हैं।
8. आपका मत-8: “दल और किसान; सरकार की ओर से कृषि और किसानों की उपेक्षा जारी”
● प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 29 जनवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 46)
● संदर्भ: भारत की लगभग 72 प्रतिशत कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था का संदर्भ देते हुए वे तत्कालीन सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र की उपेक्षा को रेखांकित करते हैं। वे भूमि सुधारों, किसानों की क्रय शक्ति बढ़ाने, सहकारी खेती (Cooperative Farming) के खतरों और किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने की मांग उठाते हैं।
9. आपका मत-9: “हर मतदाता को निभानी है भूमिका”
● प्रकाशन: ऑर्गनाइज़र, 12 फ़रवरी, 1962 (वाङ्मय खंड 10, पृष्ठ संख्या: 73)
● संदर्भ: चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में मतदाताओं के अंतिम प्रबोधन के रूप में लिखा गया यह लेख बताता है कि लोकतंत्र की शुद्धि में मतदाता की भूमिका कितनी केंद्रीय है। वे मतदाताओं से अपील करते हैं कि वे विभिन्न दलों के घोषणा-पत्रों का गहराई से तुलनात्मक अध्ययन करें, निष्पक्ष रहें और सकारात्मक व रचनात्मक रूप से राष्ट्र निर्माण में अपना मत देकर ‘लोकमत परिष्कार’ के इस महापर्व को सफल बनाएं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की यह पूरी लेखमाला इस बात का जीवंत उदाहरण है कि लोकमत परिष्कार केवल एक नारा नहीं था, बल्कि मतदाताओं को उनके कर्तव्यों, राष्ट्र की आर्थिक प्राथमिकताओं, सुरक्षा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करने का एक व्यावहारिक और बौद्धिक अभियान था।
2. खंड 11 (Volume 11)
● पृष्ठ संख्या: 247 (अनुभाग: ‘लोकशिक्षा’)
संदर्भ: इस पृष्ठ में ‘लोक शिक्षा’ शीर्षक के अंतर्गत यह बताया गया है कि स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त लोक-संस्कार, स्वाध्याय और ‘लोकमत-परिष्कार’ भी शिक्षा के महत्वपूर्ण साधन हैं। इसके लिए रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, संगीत, पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकालयों और क्लबों का भरपूर उपयोग किया जाना चाहिए और राज्य को इनकी सुयोग्य व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। इसमें यह विशेष सुझाव भी दिया गया है कि रेडियो और टेलीविजन को सरकारी विभाग के बजाय एक स्वायत्त निगम (autonomous corporation) के रूप में चलाया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, चित्रपट (सिनेमा) को लोक-शिक्षा का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा गया है कि शासन को यह ध्यान रखना चाहिए कि सिनेमा लोगों की रुचि बिगाड़ने के स्थान पर लोकमत-परिष्कार तथा समाज में सुरुचि (अच्छी रुचि) पैदा करने का साधन बने।
3. खंड 15 (Volume 15)
इस खंड का अध्याय 13 (पृष्ठ 89 से 92) पूरी तरह से “लोकमत-परिष्कार” विषय पर ही केंद्रित है, जो दीनदयाल उपाध्याय जी की पुस्तक ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ (1971) से लिया गया है। इसका दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण निम्नलिखित पृष्ठों पर मिलता है:
● पृष्ठ 89
संदर्भ: अध्याय की शुरुआत दिल्ली विधानसभा को समाप्त करने के नेहरू जी और एक शिष्टमंडल के संवाद से होती है। दीनदयाल जी प्रश्न उठाते हैं कि जब समाज के अलग-अलग वर्ग अपने स्वार्थों के लिए परस्पर विरोधी माँगें करते हैं, तो ‘जनता की वास्तविक इच्छा’ किसे माना जाए? वे चेतावनी देते हैं कि लोकतंत्र में बिना किसी मर्यादा के केवल अपनी इच्छाओं को ही सर्वोपरि मानकर अड़ जाना अराजकता और अंततः निरंकुश शासन (तानाशाही) को जन्म देता है।
● पृष्ठ 90
संदर्भ: यहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है, बल्कि यह दूसरों के दृष्टिकोण को आदरपूर्वक समझने और विचार-विमर्श की तैयारी है। इसके लिए वे भारतीय ज्ञान परंपरा के सूत्र ‘वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः’ का संदर्भ देते हैं। दृष्टिकोण में इस सामंजस्य को लाने के लिए मानव जीवन में ‘संयम’ की आवश्यकता होती है, जो लोकमत परिष्कार का अनिवार्य हिस्सा है।
● पृष्ठ 91
संदर्भ: दीनदयाल जी बताते हैं कि लोकतंत्र को भीड़तंत्र या तानाशाही में बदलने से रोकने के लिए प्राचीन भारतीय मनीषियों ने ‘लोकमत-परिष्कार’ की एक अद्वितीय व्यवस्था की थी। भारत ने इसका सबसे उत्कृष्ट समाधान यह निकाला था— “राज्य (शासन/सरकार) के हाथ से लोकमत-निर्माण के साधन छीनकर।” उनका तर्क था कि लोकमत परिष्कार का कार्य सरकार या राजनीतिक दल नहीं कर सकते क्योंकि वे स्वयं सत्ता के लोभ में लिप्त होते हैं। यह कार्य केवल “वीतरागी, द्वंद्वातीत संन्यासियों और निष्पक्ष विचारकों” का है जो सांसारिक लालसाओं से मुक्त होकर निस्वार्थ भाव से समाज को धर्म, मर्यादा और संस्कारों की सीख देते हैं।
● पृष्ठ 92
संदर्भ: वे अध्याय का निष्कर्ष निकालते हुए लिखते हैं कि जनता को सुसंस्कृत करने और ‘लोकमत परिष्कार’ का महत्त्व सर्वोपरि है। जब तक इस कार्य को निष्ठापूर्वक करने वाले, राज्य के मोह से दूर और भय से मुक्त महापुरुष तथा संगठनकर्ता समाज में सक्रिय रहेंगे, तब तक लोकमत अपनी सही और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता रहेगा।
