कोलकाता एयरपोर्ट के रनवे के पास स्थित मस्जिद में नमाज पर रोक और उसके बाद कलकत्ता हाई कोर्ट में हुई सुनवाई ने देश को बहुत कुछ सोचने पर विवश किया है। एयरपोर्ट प्रशासन ने सुरक्षा जोखिम का हवाला दिया और पश्चिम बंगाल सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। न्यायालय ने तत्काल नमाज की अनुमति देने वाला अंतरिम आदेश जारी नहीं किया। यानीकि कलकत्ता हाईकोर्ट ने कोलकाता एयरपोर्ट के रनवे के पास स्थित मस्जिद में नमाज पढ़ने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है।
वस्तुत: इस पूरे मामले का मूल आधार एयरपोर्ट सुरक्षा, रनवे की निकटता, भूमि और धार्मिक गतिविधि से जुड़े कानूनी प्रश्न हैं। फिर भी इससे जुड़ा व्यापक प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है। आखिर भारत में सुरक्षा एजेंसियों को इस्लामिक मजहबी स्थलों और उनसे जुड़े कुछ व्यक्तियों की गतिविधियों के प्रति बार-बार अतिरिक्त सतर्कता क्यों बरतनी पड़ती है?
ध्यान रहे, यह सवाल भारत के सामान्य मुस्लिम नागरिक से नहीं है। यह सवाल उन तत्वों से है, जो इस्लाम के नाम पर हिंसा, कट्टरता और आतंकवाद को वैचारिक आधार देने का प्रयास करते हैं। यह सवाल उस सामाजिक व्यवस्था से भी है, जो ऐसे तत्वों की पहचान करके उन्हें इस्लामिक समाज से अलग करने में कितनी सक्रिय है या सक्रिय दिखाई ही नहीं देती! भले ही आज भारत में करोड़ों मुसलमान शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं। वे संविधान, कानून और लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ आगे बढ़ते हैं।
वास्तव में यह इसलिए है, क्योंकि बार-बार राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विभिन्न जांचों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें मस्जिदों से जुड़े इमाम, मदरसा शिक्षक अथवा मजहबी पहचान रखने वाले व्यक्ति आतंकवादी संगठनों से संपर्क, कट्टरपंथी भर्ती, वित्तीय सहायता या हिंसक षड्यंत्र के आरोपों में गिरफ्तार हुए हैं और लगभग हर रोज ही देश भर में कहीं न कहीं से हो रहे हैं। स्वभाविक है अब, जिन मामलों में अदालतें दोष सिद्ध करती हैं, वे समाज के लिए गंभीर चेतावनी भी बनते हैं।
पश्चिम बंगाल में एनआईए ने अल-कायदा और अन्य प्रतिबंधित आतंकी नेटवर्क से जुड़े मामलों में मदरसा शिक्षक तथा मजहबी (धार्मिक) पद से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया। उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक मौलवी को हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम से जुड़े कथित आतंकी षड्यंत्र के मामले में गिरफ्तार किया गया। हरियाणा के पलवल में एक मस्जिद के इमाम से जुड़ा मामला कथित आतंकी फंडिंग की जांच तक पहुंचा। शिवमोग्गा और मंगलुरु से जुड़े आईएसआईएस मामलों में अदालतों से दोषसिद्धि और सजा के मामले सामने आए।

वस्तुत: यहां इन घटनाओं का उल्लेख किसी धर्म को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं समझें, यह एक कठिन सामाजिक वास्तविकता पर चर्चा के लिए है। आतंकवादी संगठन धार्मिक पहचान की सामाजिक प्रभावशीलता को समझते हैं। मजहबी भाषा, धार्मिक स्थल और इस्लामिक पद उनके लिए नेटवर्क निर्माण का माध्यम बनते हुए अक्सर दिखे हैं। प्रश्न यह है कि ऐसे प्रयासों के विरुद्ध पहला सामाजिक प्रतिरोध कहां से आएगा? वास्तव में यहीं मुस्लिम समाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
जब कोई व्यक्ति इमाम की भूमिका में रहते हुए आतंकवादी विचारधारा से जुड़ने के आरोप में पकड़ा जाता है, तब उसी मस्जिद के जिम्मेदार लोगों को सवाल उठाना चाहिए। जब किसी मदरसे में पढ़ाने वाला व्यक्ति युवाओं को कट्टरपंथी जिहादी संगठन की ओर ले जाने के आरोप में गिरफ्तार होता है, तब मदरसा प्रबंधन को शिक्षा और वैचारिक वातावरण की समीक्षा करनी चाहिए। इसी तरह से जब किसी धार्मिक मंच का इस्तेमाल हिंसा अथवा आतंकवाद के समर्थन के लिए किया जाता है, तब मुस्लिम बुद्धिजीवियों और धर्मगुरुओं की आवाज सबसे पहले और सबसे स्पष्ट रूप से उठनी चाहिए।
एक तथ्य पूरी स्पष्टता से सामने रहना चाहिए कि भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर हिंसा, आतंकी नेटवर्क, हथियार, कट्टरपंथी भर्ती अथवा हिंसक षड्यंत्र को संरक्षण देने का अधिकार किसी व्यक्ति को प्राप्त नहीं है। आज कोलकाता एयरपोर्ट का मामला इसी अंतर को समझने का अवसर देता है। एयरपोर्ट प्राधिकरण ने रनवे की निकटता, सुरक्षा व्यवस्था और कथित प्रवेश संबंधी घटनाओं को आधार बनाया है।
सरकार का कहना है कि किसी व्यक्ति को धर्म पालन से रोकने का उद्देश्य नहीं है और एयरपोर्ट तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। मामले का अंतिम निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर होगा। फिर भी घटनाक्रम से एक असहज प्रश्न सामने आता है। क्या भारत का आम मुसलमान इस बात पर गंभीर आत्ममंथन करेगा कि आतंकवादी और कट्टरपंथी नेटवर्क मजहबी पहचान तथा इस्लामिक संस्थाओं के कथित इस्तेमाल से सबसे बड़ा नुकसान किसे पहुंचाते हैं?
क्या मुस्लिम समाज ऐसी स्पष्ट सामाजिक व्यवस्था विकसित कर सकता है क्या, जहां किसी मस्जिद, मदरसे या पांथिक संस्था को हिंसक विचारधारा के लिए इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को तत्काल सामाजिक अस्वीकृति मिले? क्या इस्लामिक नेतृत्व स्पष्ट शब्दों में कहेगा कि आतंकवाद के लिए इस्लाम के नाम का इस्तेमाल इस्लाम का प्रतिनिधित्व नहीं करता?
क्या मुस्लिम बुद्धिजीवी यह प्रश्न उठाएंगे कि किसी आतंकी संगठन की विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति को धार्मिक पहचान के कारण सामाजिक सहानुभूति क्यों मिले? वस्तुत: आत्ममंथन का अर्थ सामूहिक अपराध स्वीकार करना नहीं है। आत्ममंथन का अर्थ अपने भीतर मौजूद उस विचार और उस व्यक्ति को पहचानना है, जो मजहब (धर्म) के नाम पर हिंसा को वैध ठहराने का प्रयास करता है। आज भारत को इसी स्पष्टता की आवश्यकता है।
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मस्जिद इबादत की जगह है। मदरसा शिक्षा का स्थान है। मौलवी मजहबी मार्गदर्शक है। इन संस्थाओं अथवा भूमिकाओं का इस्तेमाल आतंकवादी नेटवर्क अपने उद्देश्य के लिए करे, ऐसी किसी कोशिश का सबसे मजबूत प्रतिरोध उसी समाज से आना चाहिए, जिसके नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता को आमने-सामने खड़ा करने की जरूरत नहीं है। दोनों साथ चल सकते हैं। धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता के साथ आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कानून भी लागू हो सकते हैं, इसलिए सवाल यह नहीं है कि भारत मुसलमानों से डरता है या नहीं। सवाल यह है कि कुछ इस्लामवादी नेटवर्क की गतिविधियों ने सुरक्षा तंत्र को इतना सतर्क क्यों किया है और उन गतिविधियों के विरुद्ध मुस्लिम समाज की सामाजिक प्रतिक्रिया कितनी मुखर है? वास्तव में आज इस प्रश्न से आंखें मिलाकर बात करने का समय है।
ऐसे में कहना यही है कि आतंकवादी जब मजहबी या धर्म, पंथ, रिलीजन की पहचान का इस्तेमाल करता है, तब उस पहचान से जुड़े समाज की नैतिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह ऐसे व्यक्ति और विचार को सबसे पहले अस्वीकार करे।
अत: अब तक जो हुआ सो हुआ, पर आज समय है कि भारत का आम मुसलमान गंभीरता से विचार करे, जो लोग इस्लाम के नाम पर आतंक और कट्टरता फैलाते हैं, वे किसका नुकसान कर रहे हैं? देश का, समाज का या सबसे पहले उसी मुस्लिम समाज का! अच्छा है, संपूर्ण मुस्लिम समाज इस विषय पर गंभीर विचार मंथन करे!
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

